स्याह सफ़ेद

ये भी एक दृष्टिकोण

आधुनिक वेताल कथा

समय-समय पर

ओडिया-माटी

बाअदब-बामुलाहिजा

झरोखा

धारिणी

ब्लॉग गाथा

ब्लॉग गाथा

अगस्त 2010

इस गोद की ज़रूरत गली-गली

आज अगर देखें तो मदर टेरेसा जैसे लोगों की सोच अपनी धार्मिक आस्था से परे भी गर्भपात के ख़िलाफ़ रही है और अकेली माँ के बच्चों को भी जीने के हक की उनकी सोच चाहे ईसाई धर्म से निकली हुई हो, वह दुनिया की तमाम उदार होती विकसित संस्कृतियों में अधिक मान्यता पाते गई है और उनके प्रभाव से परे भी योरप और अमरीका के बहुत बड़े तबकों में यह बात अब कोई ख़ास मायने नहीं रखती कि माँ शादीशुदा है या नहीं है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (20) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 31 अगस्त 2010
सुनील कुमार

हेमंत शेष डॉ. घासीराम वर्मा और मायामृग सम्मानित

चूरू। प्रयास संस्थान द्वारा 28 अगस्त को आयोजित समारोह में वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा ने कवि हेमंत शेष को कविता पुस्तक ‘जगह जैसी जगह’ के लिए डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार-2010 प्रदान किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (40) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 31 अगस्त 2010

मिथलेश-रामेश्वर प्रतिभा सम्मान

दिल्ली । मिथलेश-रामेश्वर प्रतिभा सम्मान के अंतर्गत ऐसी मौलिक व अव्यवसायिकप्रतिभाओं से प्रविष्टियॉं आमंत्रित हैं जिन्होंने साहित्य, पत्रकारिता, संगीत, रंगमंच, चित्रकारी आदि कला के किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करते हुए उपर्युक्त किसी क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बनाई हो। यह सम्मान 21 वर्ष से ऊपर आयु के एक पुरुष एवं एक महिला प्रतिभा के लिए है। आगे पढ़िये...

हलचल, (22) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 31 अगस्त 2010

नागार्जुन की कविताएँ आज भी प्रासंगिक - नामवर सिंह

पटना/छपरा । बाबा नागार्जुन कालजयी कवि यही वजह है कि आज  भी उनकी कविताएँ प्रासंगिक बनी हुई हैं। प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने पटना के ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी में ‘‘नागार्जुन की कविता और आज का भारतीय समाज’’ विषय पर एक संगोष्ठी को 26 अगस्त को संबोधित करते हुए कहीं। आगे पढ़िये...

हलचल, (25) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 31 अगस्त 2010

12 आदिवासी और दलित लेखक होंगे सम्मानित

दिल्ली । रमणिका फाउंडेशन एवं अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच देश भर से चुने गये 12 आदिवासी-दलित लेखकों को सम्मानित करगा। सम्मान समारोह अगले वर्ष 11 जनवरी को रांची में आयोजित होगा। बिरसा मुंडा, सावित्री बाइ फूले, सफदर हाशमी और राजी स्मृति सम्मान के अलावा भारत आदिवासी सम्मान के लिए लेखकों का चयन कर लिया गया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (18) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 31 अगस्त 2010

परमाणु-मुआवज़ा : ज़िंदगियों को सस्ते में न बेचें

दुनिया में बहुत से छोटे-छोटे ऐसे भी देश रहते हैं जहाँ पर सरकारें दुनिया के पूँजीवादी तंत्र के सामने सीना तानकर और रीढ़ की हड्डी के साथ खड़ी रहती हैं। ऐसे में अगर इस विशाल लोकतंत्र को ठेकेदारों की फ़रमाईश या धमकी के आधार पर इस देश के संसद में क़ानून में बनाना ठीक लग रहा है तो वह कम से कम हमारे जैसे बहुत से लोगों को तो बिल्कुल ही ठीक नहीं लग रहा। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (18) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 30 अगस्त 2010
सुनील कुमार

महेश चंद्र पुनेठा को सूत्र सम्मान

राजनांदगाँव। पिछले दिनों बस्तर की साहित्यिक संस्था सूत्र द्वारा ठाकुर पूरन सिंह स्मृति 12वां सूत्र सम्मान उत्तराखंड के जनवादी कवि महेश चंद्र पुनेठा को दिया गया। राजनांदगांव के सृजन संवाद भवन में आयोजित कार्यक्रम में त्रिभुजी कौशिक ने कहा कि सूत्र सम्मान ऐसे युवा साहित्यकार को दिया जाता है जो समकालीन लेखन में अग्रणी रहा है। आगे पढ़िये...

हलचल, (24) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 30 अगस्त 2010

हिन्दी लेखन की अंतर्दशा

यूं तो लिखने-पढ़ने में एकांत मिलता है और ज्ञान की बातों से शांति। मगर यहाँ तो कोलाहल और धक्का-मुक्की के साथ अँधेरे मोड़ और राह में गड्ढे, लूटपाट के लिए नायक के भेष में खलनायक के चरित्र, विचारवॉर (गैंगवार) में भी आप फंस सकते हो। ईर्ष्या में तो फिर मारे भी जा सकते हो। अहं बेमिसाल। हालत इतनी चिंताजनक है कि दस-पंद्रह लेखकों की गोष्ठी में भी घमासान हो सकता है। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (19) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 30 अगस्त 2010
मनोज सिंह

पीपली लाइव, आामिर खान और हिन्दी सिनेमा

मेरी राम भरोसा जी से हमेशा चर्चा होते रहती है, इन्होने 3 उपन्यास लिखे हैं जो सामाजिक सरोकार से संबंधित हैं। समाज का कुरीति और बुराइयों पर इनकी पैनी नजर है, इनके उपन्यासों में आस-पास समाज की झलक दिखाई देती है। इनका पहला उपन्यास “लाल चुनरिया” है, दूसरा उपन्यास “मुसीबत” और तीसरा उपन्यास “विधवा विवाह” है। यह उपन्यास प्रकाशित नहीं है, इनकी पान्डू लिपियाँ राम भरोसा जी के पास सुरक्षित हैं, इन उपन्यासों को मैने देखा है, गांव में रहकर हजामत कार्य करते हुए, लेखन करना एक अद्भुत कार्य है। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (32) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 29 अगस्त 2010
मनीष

कसूरवार कौन? *
कविता, (47) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 29 अगस्त 2010,
राकेश चन्द्र जुगरान

साहित्य अकादमी दे रहा बाल साहित्यकारों को पुरस्कार

नई दिल्ली । प्रख्यात स्तंभकार व लेखक खुशवंत सिंह, हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह और मैथिली के जाने-माने लेखक चंद्रनाथ मिश्र अमर को साहित्य अकादमी ने फ़ैलो सम्मान से सम्मानित करने की घोषण की है। साहित्य अकादमी ने भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य को बढ़ावा देने के लिए इस वर्ष से 20 लेखकों को बाल साहित्य पुरस्कार देने की भी घोषणा की है। अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं के दस लेखकों को वर्ष 2009 के भाषा सम्मान के लिए चुना गया है आगे पढ़िये...

हलचल, (27) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 29 अगस्त 2010

हिन्दी विश्वविद्यालय में प्रो. मिश्र का व्याख्यान

प्रो. मिश्र ने कहा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘कविता क्या है’ में कविता का संबंध आदमीयत से जोडा है। धूमिल ने भी कविता को आदमी होने की तमीज़ बताया है। प्रेमचन्द के महाजनी सभ्यता का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सारे मानवीय व सामाजिक संबंध व्यावसायिक संबंधों में तब्दील हो चुके हैं। आज दुनिया बाजार में बदल रही है जो चुनौती औपनिवेशिक दौर में थी आज उससे भी भयावह हो गई है।
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हलचल, (21) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 29 अगस्त 2010

कहानी संग्रह का लोकार्पण

पटना । 'वातायन' के तत्वावधान में आयोजित एक कार्यक्रम में कथाकार सिद्धेश्वर द्वारा लिखित कहानी संग्रह 'ढलता सूरज : ढलती शाम' का लोकार्पण किया गया। लेखिका उषा किरण खान ने संग्रह का लोकार्पण करते हुए कहा कि 'लेखक ख़ुद अपने आपमें एक कहानी है। पुस्तक के लेखक सिद्धेश्वर बचपन से ही पत्रा-पत्रिाकाओं के प्रति समर्पित रहे हैं।' आगे पढ़िये...

हलचल, (18) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 29 अगस्त 2010

धरती को बचाने के लिए

आज संपन्न तबके की ताम-झाम को बढ़ावा देने के लिए यह सिलसिला चला हुआ है कि ग्राहक को फाँसने के लिए कई बार पैकिंग ऐसी बनाई जाती है कि लोग पैकिंग के चक्कर में सामान खरीदते हैं। डिजाइनरों के बीच ऐसी ख़ूबी खड़ी करने की होड़ लगी रहती है और ऐसी तमाम बेज़ा हरक़तों से धरती के फेंफड़े घुटते चले जा रहे हैं। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (17) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 28 अगस्त 2010
सुनील कुमार

मैदान में उतरा ‘गांधी’ !

वे सही मायने में एक सच्चे उत्तराधिकारी हैं क्योंकि उन्होंने सत्ता में रहते हुए भी सत्ता के प्रति आसक्ति न दिखाकर यह साबित कर दिया है उनमें श्रम, रचनाशीलता और इंतज़ार तीनों हैं।सत्ता पाकर अधीर होनेवाली पीढ़ी से अलग वे कांग्रेस में संगठन की पुर्नवापसी का प्रतीक बन गए हैं।वे अपने परिवार की अहमियत को समझते हैं, शायद इसीलिए उन्होंने कहा- ‘मैं राजनीतिक परिवार से न होता तो यहाँ नहीं होता। आगे पढ़िये...

राजकाज, (36) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 28 अगस्त 2010
संजय द्विवेदी

नहीं रहे ज्ञानपीठ सम्मानित रवीन्द्र केलेकर

नयी दिल्ली। 42वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित, कोंकणी भाषा साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार रवीन्द्र केलेकर का 27 कल 27 अगस्त मध्यान्ह गोवा में देहांत हो गया। उनकी अभी तक कोंकणी.हिन्दी व मराठी में विविध विधाओं के अंतर्गत बत्तीस से अधिक मौलिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। आगे पढ़िये...

हलचल, (22) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 28 अगस्त 2010

विश्वास
प्रेरक प्रसंग, (65) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 28 अगस्त 2010,
पंकज त्रिवेदी

गाँधीजी और हमारा समय

जोधपुर । महात्मा गांधी कालजयी विचारक हैं। आज मनुष्य जाति, हिंसा व भोगवाद के ख़तरनाक दौर से गुज़र रही है। आधुनिक सभ्यता के संकट से मुक्त होने का मार्ग गाँधी दर्शन में निहित है।' यह कहना है गाँधी शांति प्रतिष्ठान की राष्ट्रीय अध्यक्ष, सुविख्यात सर्वोदयी चिंतक व समाजसेविका राध बहन भट्ट का। उक्त बातें उन्होंने 12 जुलाई को जोध्पुर में 'गाँधीजी और हमारा समय' विषय पर व्याख्यान में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में कहीं। आगे पढ़िये...

हलचल, (24) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 28 अगस्त 2010

काव्य संग्रह ‘‘नई सुबह’’ का लोकार्पण

कोटा । श्रीमती रचना गौड़ ‘भारती’ के प्रथम काव्य संग्रह ‘‘नई सुबह’’ का लोकार्पण कोटा में तीसरे अखिल भारतीय नारी साहित्यकार सम्मेलन में हुआ । लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता की परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष बलवंत जानी ने ।  मुख्य अतिथि थे मानव मूल्यों के विश्वकोशकार डॉ. धर्मपाल मैनी । विशिष्ट अतिथि थीं देश की मानी हुई लेखिका एवं केन्द्रीय मानव समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष डॉ.मृदुला सिन्हा, परिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दयाकृष्ण विजय, प्रदेशाध्यक्ष डॉ. मथुरेश नन्दन कुलश्रेष्ठ । आगे पढ़िये...

हलचल, (23) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

बढ़ते जमींदार, घटते किसान

किसानों की ज़मीन जा रही है और यह बात सिर्फ ज़मीन जाने पर खत्म नहीं होती, किसान की ज़मीन के साथ-साथ उसका रोजगार हमेशा के लिए चले जाता है और उसकी ज़िंदगी ही तब्दील हो जाती है। एक बार मिला हुआ मुआवजा लंबे समय तक साथ नहीं देता और किसान लुट ही जाता है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (23) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
सुनील कुमार

वेद मोहला की पुस्तकों का विमोचन

लंदन । कम्‍यूनिटी आर्ट्स ने 23 अगस्त 2010 को वरिष्ठ शिक्षाविद् वेद मित्र मोहला, (एम.बी.ई.) की दो पुस्तकों ‘आई जी सी एस ई हिन्दी’ एवं ‘इक्कीसवीं सदी का बाल साहित्य’ का लोकार्पण नेहरू केन्द्र में श्री कैलाश बुधवार (भूतपूर्व अध्यक्ष बीबीसी हिन्दी विभाग) एवं ब्रिटेन में हिन्दी परीक्षक डा. अरुणा अजितसरिया के हाथों सम्पन्न हुआ। आगे पढ़िये...

हलचल, (33) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

‘संदली बूहे’ रिलीज

चंडीगढ़ । मालवा रिसर्च सेंटर द्वारा करवाए गए समागम में सुखपाल सोही की पुस्तक ‘संदली बूहे’ भाषा विभाग की डायरेक्टर बलबीर कौर के द्वारा पटियाला में विमोचित की गई । आगे पढ़िये...

हलचल, (21) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

हेमंत शेष को डॉ. द्घासीराम वर्मा साहित्य सम्मान

चूरू । हेमंत शेष को डॉ. द्घासीराम वर्मा साहित्य सम्मान   राजस्थान के चूरू में स्थानीय प्रयास संस्थान द्वारा प्रवर्तित सालाना डॉ. द्घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार इस वर्ष जयपुर के साहित्यकार हेमन्त शेष को दिया जाएगा। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने बताया कि वर्ष 2010 के पुरस्कार के लिए कवि हेमन्त शेष की पुस्तक 'जगह जैसी जगह' का चयन किया गया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (21) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

लेखकों के ख़िलाफ़ क्रिमिनल नोटिस

वर्धा । स्थायनीय ख़बरों के अनुसार जिला न्यायालय के फ़र्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, धनंजय निकम ने भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका “नया ज्ञानोदय” में छपे विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में लेखिकाओं को दी गयी गाली मामले में राय, रवींद्र कालिया और साक्षात्कारकर्ता राकेश मिश्र के ख़िलाफ़ क्रिमिनल नोटिस जारी की है। आगे पढ़िये...

हलचल, (64) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010

बदल गई चाहत

अलका आसमान को निहार रही थी। बारिश की बूंदें अब उसे अच्छी लगने लगी थीं। वह बुदबुदाई-‘‘मैं बेटी को जन्म दूँगी। आख़िर मैं भी तो किसी की बेटी हूँ। मेरी सास भी तो किसी की बेटी थी। आगे पढ़िये...

कहानी, (79) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010
अनीता चमोली ‘अनु’

‘राष्ट्रवाणी’ : कवि महेंद्रभटनागर विशेषांक

'महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे' ने अपनी द्वि-मासिक पत्रिका 'राष्ट्रवाणी' का, लगभग एक-सौ पृष्ठों का विशेषांक, लब्ध-प्रतिष्ठ कवि महेंद्रभटनागर के काव्य-कर्तृत्व पर, प्राचार्य सु. मो. शाह के सम्पादन में, प्रकाशित किया है। महेंद्र भटनागर हिन्दी प्रगतिवादी-जनवादी काव्य-धारा के चर्चित कवि हैं। उनका रचना-कर्म स्वतंत्रता-पूर्व प्रारम्भ होकर (सन् 1941 से) आज-तक निर्बाध रूप से गतिशील है। आगे पढ़िये...

पत्रिकाएँ, (69) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010

समय और समाज की अक्कासी

‘नचनिया राजा’ सहित संग्रह में सात कहानियां हैं। संग्रह की पहली कहानी ‘ठठेरे की मशीन’ की शैली ‘नचनिया राजा’ वाली है। कथावाचक के साथ-साथ पाठक न सिर्फ़ चलता है बल्कि कई बार पात्र भी बन जाता है। कहानी की यह बड़ी ख़ूबी है। बाज़ारवाद और ग्लोबलाइशन को केंद्र में रख कर लिखी गई कहानी एक व्यापक समाज से अपना नाता जोड़ती है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (31) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

शमशेर का कविकर्म

शमशेर पर बोलने-लिखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है, उनको पढ़ना । उनको पढ़ने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है, उनको गुनना। शमशेर को गुनते हुए आप व्यक्तिगत चेतना से निकलकर सार्वजनिक चेतना में प्रवेश करने का अवसर पाते हैं। नईम के गीत की पँक्ति का सहारा लेते हुए बात करूँ तो शमशेर के शब्द समाज में ठीक आदमजात जैसा कोई मिलता है। इस आदम के साथ टहलते हुए आपका सामना समय से होता है। समय जो तब था, समय जो अब है और समय जो आने वाला है। आगे पढ़िये...

मूल्याँकन, (34) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010
प्रदीप मिश्र

'लौ दर्दे दिल की' का लोकार्पण

मुंबई । 15 अगस्त 2010 को कुतुबनुमा एवं श्रुति संवाद समिति द्वारा आयोजित समारोह में श्रीमती देवी नागरानी के ग़ज़ल संग्रह "लौ दर्दे दिल की" का लोकार्पण मुंबई के आर. डी. नैशनल कालेज, कॉन्फ्रेन्स हाल में श्री आर. पी. शर्मा महर्षि की अध्यक्षता संपन्न हुआ। आगे पढ़िये...

हलचल, (22) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010

मरे हुए लोग
कविता, (42) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010,
श्रीप्रकाश शुक्ल

केदार-नागार्जुन की जन्मशती

पिथौरागढ़ । उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में 18 व 19  जून को दो दिवसीय सृजनोत्सव' का आयोजन हुआ । पिथौरागढ़ में आयोजित साहित्य, संगीत व कला के इस कार्यक्रम में केदारनाथ अग्रवाल तथा नागार्जुन कीकविताओं पर चर्चा-परिचर्चा के साथ उनकी कविताओं की रंगमंचीय प्रस्तुति भी हुआ। आगे पढ़िये...

हलचल, (33) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010

विष्णु प्रभाकर की कविताएँ

दिल्ली । साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के 99 वें जन्मदिवस, 21 जून पर उनके द्वारा रचित कविताओं के एकमात्रा संकलन का लोकार्पण अजित कुमार, डॉ. बलदेव वंशी, डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल, डॉ. हरदपाल, महेश दर्पण, सुरेन्द्र शर्मा, शमशेर अहमद, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, सुरेश शर्मा आदि ने हिन्दी भवन, दिल्ली में किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (35) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010

शैलेन्द्र चौहान पर क्रमशः

अनियतकालीन पत्रिका क्रमश का अंक कवि तथा आलोचक शैलेन्द्र चौहान पर केन्द्रित है । अंक में उनकी साहित्यिक परंपरा एवं अवदान को समस्त दायित्व बोध के साथ प्रस्तुत किया गया है । कानपुर से प्रकाशित इस पत्रिका का संपादन शिव बाबू मिश्र हैं । आगे पढ़िये...

पत्रिकाएँ, (44) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010

प्रभाकर माचवे स्मृति सम्मान

इन्दौर। मध्यप्रदेश के मराठी लेखकों को पुरस्कृत तथा युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए मध्यप्रदेश मराठी अकादमी इन्दूर ने स्व. डॉ. प्रभाकार माचवे स्मृति सम्मान स्थापित किये हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (27) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010

ज्ञानपीठ से पुस्तकें वापस लेने का सिलसिला जारी

अशोक वाजपेयी अपनी दो पुस्तकें ‘शहर अभी भी संभावना है’ और ‘कवि कह गया है’ ज्ञानपीठ से वापस ले चुके है। उन्होंने लेखकों से अपील भी की थी कि ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाषित उन सभी लेखकों को, जिन्होंने लेखकों के अपमान और इस बढ़ते छिछोरेपन की चिंता है, ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तकें वापस लेनी चाहिए। इस तरह हिंदी के सभी ऐसे लेखकों और बुद्धिजीवियों को हिंदी विश्वविद्यालय से तत्काल अपना संबंध तोड़ लेना चाहिए। हिंदी की दो शीर्ष संस्थाओं की ऐसी छिछोरी हरक़तों द्वारा पददलित किए जाने पर अगर हम चुप बैठते हैं तो यही साबित होगा कि अपनी भाषा और साहित्य के अपमान और अवमूल्यन की हमें कोई परवाह नहीं है। आगे पढ़िये...

हलचल, (37) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010

सस्ता रोए बार-बार, महँगा रोए एक बार

जो सांसद या विधायक ईमानदार रहने की हसरत रखते हैं उन्हें ईमानदार बने रहने देना भी समाज की ज़िम्मेदारी है। उन्हें एक ऐसा मौक़ा तो दें कि वे सवाल पूछने के पैसे लिए बिना भी अपने परिवार के साथ ठीक से रह सकें, ठीक से सामाजिक संबंध निभा सकें और अगले चुनाव के लिए अगर हो सके तो कुछ पैसे बचा भी सकें। सस्ते सांसद इस देश को बहुत महँगे पड़ेंगे, और ऐसी किफ़ायत नासमझी की होगी। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (30) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 24 अगस्त 2010
सुनील कुमार

विभूति-कालिया मसले पर साहित्य अकादेमी की परिषद में हंगामा

केंद्रीय साहित्य अकादेमी को गोवा के कलंगूट तट पर आयोजित सामान्य परिषद (जनरल काउंसिल) की बैठक अपूर्व हंगामे के साथ संपन्न हुई। बैठक में विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया के आचरण के विरोध में एक सदस्य ने निंदा का प्रस्ताव रखा। अकादेमी के नियमों में न होने की वजह से उसे स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन उपाध्यक्ष सतिंदर सिंह नूर सहित सदस्यों ने लेखिकाओं को ‘छिनाल’ कहने-छापने की अनौपचारिक रूप से भर्त्सना की। आगे पढ़िये...

हलचल, (44) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 24 अगस्त 2010

यह इस्लामी आतंकवाद क्या होता है विभूति नारायण राय!

विभूति नारायण राय ने ‘छिनाल’ पर तो माफ़ी माँग ली है। कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार के मंत्री कपिल सिब्बल ने उनके माफ़ीनामा को मान भी लिया है। लेकिन ‘इस्लामी आतंकवाद’ का इस्तेमाल कर इस्लाम धर्म को मानने वाली एक पूरी क़ौम के माथे पर उन्होंने जो सवालिया निशान लगाया है, क्या इसके लिए भी वे माफ़ी माँगेंगे या यह भी कि उन्हें अपने कहे पर माफ़ी माँगनी नहीं चाहिए। या कि कपिल सिब्बल उनसे ठीक उसी तरह माफ़ी माँगने के लिए दबाव बनाएँगे जिस तरह से उन्होंने ‘छिनाल’ के लिए बनाया था। क्या हमारा लेखक समाज विभूति नारायण राय के ख़िलाफ़ उसी तरह लामबंद होगा जिस तरह से ‘छिनाल’ के लिए हुआ था। आगे पढ़िये...

बाअदब-बामुलाहिजा, (58) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 23 अगस्त 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

हरिशंकर परसाई होने का अर्थ

परसाई ने विधा के परिचित दायरे तोड़े हैं। गद्य विधाओं का एक दूसरे में आंतरिक विलयन हुआ है। रूढ़ आलोचकों की यही परेशानी रही हैं। उनके लेखने का क्षेत्र असीमित है। जीवन जगत के अनेक बिंबों को छोटी सी परिधि में लाना संभव हुआ है। यही उनका औपन्यासिक औदात्य है। आगे पढ़िये...

हस्ताक्षर, (57) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 23 अगस्त 2010
कमला प्रसाद

ज़िंदगी: एक रिक्शा
कविता, (44) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 23 अगस्त 2010,
डॉ. राकेश कुमार बब्बर

गीत
छंद, (42) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 23 अगस्त 2010,
आर सी शर्मा ‘आरसी’

दो ग़ज़लें
छंद, (102) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 22 अगस्त 2010,
चंद्रभान भारद्वाज

एक अभियुक्त को समझने की कोशिश

किसी स्त्री को छिनाल क़रार देने भर से वह छिनाल नहीं हो जाती, उसी तरह मैं ऐसे विशेषणों से विचलित नहीं होता। विष्णु खरे की तरह मुझे भी पता है कि हिंदी जगत में आरोप लगाने के पीछे अक्सर किस तरह के इरादे होते हैं। जब मैत्रेयी पुष्पा पर अश्लीलता का इलज़ाम लगाया जा रहा था, तब मैंने उनके बचाव में लिखा था। जब अशोक वाजपेयी को दारूकुट्टा कहा गया था, तब मैंने पीने को नैतिकता या चरित्र से जोड़ने का प्रतिवाद किया था। न मैं मैत्रेयी की कृपा पर अवलंबित था न वाजपेयी की उदारता पर। आज भी अपनी जीविका के मामले में आत्मनिर्भर हूँ। आगे पढ़िये...

समांतर, (39) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 22 अगस्त 2010
राजकिशोर

कश्मीर में सिखों को धमकी, पिछली बेदखली याद रखें

भारत सरकार को कश्मीर से लेकर बस्तर और बंगाल-झारखंड तक के नक्सल इलाक़ों के बारे में यह सोचना चाहिए कि वहाँ की जनता के मन में लोकतंत्र के प्रति आस्था अगर बची नहीं रहेगी, अगर सरकारें जनता को उनका हक़ नहीं दिला पाएँगी, उनकी जान नहीं बचा पाएँगी तो पूरे अवाम का भरोसा सरकार पर से उठ जाएगा और जम्हूरियत पर से उठ जाएगा। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (26) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 22 अगस्त 2010
सुनील कुमार

त्रुटि का एहसास
प्रेरक प्रसंग, (50) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 22 अगस्त 2010,
जया केतकी

सार्थक संवाद ने किया कुलपति राय का विरोध

मुंबई। सांस्कृतिक मूल्यहीनता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली संस्था सार्थक संवाद ने महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय द्वारा हिन्दी लेखिकाओं पर अभद्र टिप्पणी तथा भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित "नया ज्ञानोदय" पत्रिका के संपादक रवीन्द्र कालिया के संपादकीय अविवेक के ख़िलाफ़ निषेध प्रस्ताव पारित किया। यह प्रस्ताव मुंबई में 17 अगस्त को हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में पारित किया गया। आगे पढ़िये...

हलचल, (49) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 21 अगस्त 2010

चार नवगीत
छंद, (250) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 21 अगस्त 2010,
अवनीश सिंह चौहान

उपन्यास लेखन और केश कर्तन साथ-साथ

मेरी राम भरोसा जी से हमेशा चर्चा होते रहती है, इन्होने 3 उपन्यास लिखे हैं जो सामाजिक सरोकार से संबंधित हैं। समाज का कुरीति और बुराइयों पर इनकी पैनी नजर है, इनके उपन्यासों में आस-पास समाज की झलक दिखाई देती है। इनका पहला उपन्यास “लाल चुनरिया” है, दूसरा उपन्यास “मुसीबत” और तीसरा उपन्यास “विधवा विवाह” है। यह उपन्यास प्रकाशित नहीं है, इनकी पान्डू लिपियाँ राम भरोसा जी के पास सुरक्षित हैं, इन उपन्यासों को मैने देखा है, गांव में रहकर हजामत कार्य करते हुए, लेखन करना एक अद्भुत कार्य है। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (40) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
ललित शर्मा

विभूति के कमेंट सुनने का साहस चाहिए- मैत्रेयी पुष्पा

हमारे समाज में तो लड़कियों को सच बोलने से डराया जाता है, बचपन से ही। परिवार के बारे में सच, रिश्तों के बारे में सच। आत्मकथा वही लिख सकता है जो सच बोलने से न डरे। आगे पढ़िये...

समांतर, (78) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
रेयाज उल हक़

ग़ज़ल संग्रह का विमोचन

बिजनौर । सुपरिचित कवि, गीतकार और गज़लकार आर. सी. शर्मा "आरसी" के दूसरे काव्य संकलन और पहले ग़ज़ल संग्रह "पानी को तो पानी लिख" का लोकार्पण स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, उमरावमल पुरोहित सभागार में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बिजनौर से आये साहित्यकार अनमोल शुक्ल "अनमोल" ने इस अवसर पर कहा कि हिंदी में ग़ज़ल लेखन की परंपरा में आर. सी. शर्मा "आरसी" ने प्रभावी दस्तक दी है। आगे पढ़िये...

हलचल, (38) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

आईने पर पत्थर चलाने के पहले चेहरा तो देख लें...

आज भी भारत में काफ़ी पढ़े-लिखे डॉक्टर ऐसे हैं जो एँटीबॉयोटिक जैसी साधारण दवा की खुराक को मरीज़ की ज़रूरत के मुताबिक तय नहीं कर पाते और आधे-अधूरे डोज से मरीज़ के भीतर बैक्टीरिया की अगली पीढ़ी ऐसी बन जाती है जो कि सिर्फ़ महँगी दवाईयों से ख़त्म हो पाती है या फिर जिसे ख़त्म करना मुश्किल होता है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (26) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
सुनील कुमार

मर कर जीना
कविता, (65) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 21 अगस्त 2010,
सुभाष राय

नाई का ज्ञान
प्रेरक प्रसंग, (96) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 20 अगस्त 2010,
पंकज त्रिवेदी

मौन
कविता, (98) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 19 अगस्त 2010,
शशि पाधा

बदला अपना लाल!
छंद, (144) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 19 अगस्त 2010,
अवनीश सिंह चौहान

बाज़ार बनाना आसान गौरवशाली देश बनाना मुश्किल

भारतीय समाज भ्रष्टाचार के बहुत बड़े-बड़े सनसनीखेज़ मामलों की चर्चा में डूबने की ऐसी आदत का शिकार हो चुका है कि यहाँ पर अब ज़िंदगी के दूसरे पहलू कम मायने रखने लगे हैं और लोकतंत्र में सरकारी सत्ता अपने-आपमें इतनी अधिक ताक़तवर और हावी हो गई है कि उसके विचार प्रभावित कर पाना बहुत मुश्किल हो गया है। जब देश-प्रदेश और शहरों के अधिकांश फ़ैसले सत्ता चला रहे लोगों की निजी पसंद और नापसंद से होने लगे हैं तो फिर दुनिया के अलग-अलग दायरों के विशेषज्ञों, जानकारों और विद्वानों की इस समाज को ज़रूरत ही नहीं रह गई है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (34) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 19 अगस्त 2010
सुनील कुमार

अचार
कविता, (45) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 18 अगस्त 2010,
श्रीप्रकाश शुक्ल

ग़ज़ल
छंद, (87) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 18 अगस्त 2010,
प्राण शर्मा

तीन तिलँगे

इस केम्प में रहते हुए मंगरी को एक लम्बा समय बीत गया । केम्प में अब एक भी घायल नहीं था । ठीक होकर सब चले गये थे । उनकी जगह नये लोग आ गये थे । अब जो लोग थे, बारूदी सुरंग बनाने, बिस्फोट करने की ट्रेनिंग लेने आये थे । मंगरी और विजय को भी शामिल कर लिया गया था । यह सब सिखाने वाले लोग किसी दूसरे देश से आये लगते थे । आगे पढ़िये...

कहानी, (189) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 18 अगस्त 2010
सुरेश कुमार पंडा

प्रख्यात मराठी कवि नारायण सुर्वे का निधन

ठाणे । प्रख्यात मराठी कवि नारायण सुर्वे का लंबी बीमारी के बाद 16 अगस्त को ठाणे में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे। उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्श्री से नवाज़ा गया था। जन्म के कुछ दिनों के बाद ही मशहूर कवि सुर्वे के माता-पिता का निधन हो गया था। उन्होंने यह मुकाम अपने दम पर हासिल किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (39) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 18 अगस्त 2010

दो कविता संग्रहों का लोकार्पण

दिल्ली । रमणिका फाउण्डेशन द्वारा साहित्य अकादमी सभागार में आयोजित डॉ. सुधीर सागर का कविता संग्रह 'बस! एक बार सोचो` तथा श्रीमती कुन्ती की 'अंधेरे में कंदील` का लोकार्पण सुश्री रमणिका गुप्ता, साहित्य अकादमी, श्री एस. एस.नूर एवं सुश्री अनामिका के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। आगे पढ़िये...

हलचल, (35) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 18 अगस्त 2010

सांसदों की वेतन बढ़ोत्तरी - सस्ता रोए बार-बार...

हम सांसदों को जो प्रस्तावित वेतन है उससे भी काफ़ी अधिक वेतन देने के पक्ष में हैं क्योंकि हमारा यह सोचना है कि अगर एक सांसद अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर ईमानदारी के साथ काम कर पाएगा तो वह अपने निर्वाचन क्षेत्र या अपने प्रदेश के हज़ारों करोड़ के ख़र्च पर एक बेहतर नज़र रख सकेगा और अगर वह ईमानदार रहना चाहेगा तो उसके वेतन से उसे इस बात के लिए मदद भी मिलेगी। किसी को बेईमान न बनने देना संस्थान की ज़िम्मेदारी होती है और फिर यह संस्थान कोई दफ़्तर हो या लोकतंत्र का कोई स्तंभ हो। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (32) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 18 अगस्त 2010
सुनील कुमार

ब्रह्माण्ड भैंस सुंदरी प्रतियोगिता

मास्टर जी बोले अख़बार में एक समाचार है वो तुम्हारे ही काम का है काका, तुम्हारी डेयरी में 50-60 भैंस हैं एक एक सुंदर, और बम्बई में एबीसीएल ब्रह्माण्ड भैंस सुंदरी प्रतियोगिता आयोजित करवा रहा है, तुम भी अपनी एक भैंस उस प्रतियोगिता में साज संवार कर बतौर प्रतियोगी भेज दो। तुम्हारी जमना भैंस बहुत सुंदर है और उसका फ़िगर भी प्रतियोगिता के लायक है। जमना अगर जीत जाएगी तुम्हे बहुत लाभ होगा, पेपर और टीवी में तु्म्हारी फ़ोटो आएगी,डेयरी का मुफ़्त में प्रचार-प्रसार होगा, तुम्हे घर-घर दूध बेचने जाने की जरुरत नहीं है, जिसे दूध चाहिए वह डेयरी से आकर ले जाएगा और इनाम में लाखों रुपए नगद मिलेंगे, उसके बाद तो जमना टीवी में विज्ञापन करके लाखों कमाएगी। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (89) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 18 अगस्त 2010
ललित शर्मा

बटन खुला आहे

समाज में चाहे जितना खुलापन आ जाए। बटन रहे न रहे। मगर काज सांकेतिक रूप से हमेशा रहेगा। काज यानी बटन को बांधे रखना। घर में, स्कूल में, कार्यालय में, खुले मैदान में आज भी कुछ ऐसा है, जो हमे जानवर नहीं होने देता। परिवार में, पड़ोस में, दोस्तों में, बिरादरी में, समाज में, देश में ही नहीं समूची धरती में कुछ ऐसा है जो बटन का ही पर्याय है, जो हमें बांधे रखता है। जिस दिन ये ‘ऐसा कुछ’ काज से बाहर हो गया, तो मनुष्य की मानवता और नैतिकता ही खिसकी समझो। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (73) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 17 अगस्त 2010
मनोहर चमोली ‘मनु’

आज़ादी की लंबी फ़ेहरिस्त

हर पाँच बरस में इस एहसास को दुहराने की पूरी आज़ादी है कि देश आज़ाद है और लोकतंत्र विकसित होते जा रहा है। इस एहसास के लिए हर पाँच बरस में साँप और बिच्छू में से अपने मनपसंद को छांटने की पूरी आज़ादी इस जम्हूरियत में है। यह दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत है और ऐसे ही चुनाव पर यह फ़ख्र करने की पूरी आज़ादी हर वोटर को है। बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी को पूरी आज़ादी है यह देखने की कि किस तरह क़ानून बनाने वाले क़ानून को तोड़ते हुए करोड़ों में जीत ख़रीदते हैं, और फिर बेल्लारी की तरह लूट को देखने की भी पूरी आज़ादी हर किसी को है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (28) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 17 अगस्त 2010
सुनील कुमार

राजस्थानी काव्य पाठ आयोजित

चितौडगढ़ । मेवाड़ के बहुत गहरी समझ वाले राजस्थानी के सादे विचारों वाले साहित्यकार महाराज शिवदान सिंह के दोहों को लेकर चित्तौडगढ में सें थी स्थित डॉ। सत्यनारायण व्यास के निवास स्थान पर पंद्रह अगस्त की शाम नगर के प्रबुद्ध लोगों के बीच शिवदान सिंह का एकल काव्य पाठ आयोजित किया गया। डॉ। व्यास और डॉ। ओमा आनंद सरस्वती ने शिवदान के व्यक्तित्व पर कहा कि वो गाय द्वारा पांतरे दिए जाने वाले देशी घी की तरह हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (45) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 17 अगस्त 2010

शिल्प तो रचना की अपनी विशिष्टता है-सत्यनारायण

आज हिन्दी में ग़ज़लों की बाढ़ आई हुई है। युवा मानस ही क्यों, अनेक बुजुर्ग-गीत कवि भी ग़ज़लों को लोकप्रियता का शार्टकट मानकर अपना पाला बदल चुके हैं। फिर भी ऐसे ढेर सारे युवा कवि हैं जो पूरी निष्ठा से गीत लिख रहे हैं। उनका गीत-विवेक, उनकी गीत-भाषा बहुत आश्वस्त करती है। आगे पढ़िये...

कथोपकथन, (153) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 17 अगस्त 2010
अवनीश सिंह चौहान

ग़ज़ल संग्रह ’पानी को तो पानी लिख’ का लोकार्पण

कोटा । गीतकार एव ग़ज़लकार आर.सी.शर्मा ’आरसी’ के ग़ज़ल संग्रह ’पानी को तो पानी लिख’ का लोकार्पण ’विकल्प’ जन सांस्कृतिक मंच कोटा द्वारा 14 अगस्त के दिन सम्पन्न हुआ । समारोह की अध्यक्षता साहित्यकार, रंगकर्मी एवं नाट्य लेखक शिवराम ने की । मुख्य अतिथि बिजनौर के ग़ज़लकार अनमोल शुक्ल ’अनमोल’ तथा विशिष्ट अतिथि बाल साहित्यकार डॉ. अजय जन्मेजय तथा अविचल प्रकाशन के संस्थापक डॊ. गजेन्द्र बटोही थे । आगे पढ़िये...

हलचल, (54) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 17 अगस्त 2010

ज्ञान से शिक्षा
प्रेरक प्रसंग, (54) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 17 अगस्त 2010,
जया केतकी

भाषा में वाक्य-विन्यास की भूमिका

शब्दों को जोड़ने के लिए नियमों को सीखने से वाक्यों की एक अनंत संख्या को बनाना संभव है, जो उस व्यक्ति के लिए अर्थपूर्ण है जो वाक्य-विन्यास को जानता है। इस प्रकार यह वाक्य निर्माण करना संभव है जिसके बारे में वक्ता ने पहले कभी नहीं सुना। आगे पढ़िये...

व्याकरण, (55) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 16 अगस्त 2010
डॉ. काजल बाजपेयी

श्रीलंकाई तमिल कनाडा की ओर

नक्सल मोर्चे पर जितनी जानकारी पकड़ाती है उससे कई बार पता लगता है कि नक्सलियों को ट्रेनिंग देने में लिट्टे के लोग शामिल रहे हैं। वैसे भी दुनिया भर में आतंकी संगठनों के लोग भाड़े पर भी उपलब्ध रहते हैं और भारत को परेशान करने के लिए बाहर की कुछ ताकतें ऐसे पेशेवर आतंकियों का इस्तेमाल कर सकती हैं। आज तमिलनाडु आतंकी घटनाओं से परे है। लेकिन कल अगर वहाँ श्रीलंका से आए तमिलों के साथ घुसपैठ करके लिट्टे के आतंकी आते हैं तो वे आज भारत में काम कर रहे किसी भी दूसरे आतंकी संगठन के मुक़ाबले अधिक ख़तरनाक हैं। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (31) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 16 अगस्त 2010
सुनील कुमार

अहंकार नहीं कर्म करो
प्रेरक प्रसंग, (81) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 16 अगस्त 2010,
पंकज त्रिवेदी

तपस्या में अलौकिक आनंद और असीम शांति है

लेखन, सरल शब्दों में कहें तो पठन और पाठन, अपने आप में तपस्या है। यह कइयों के लिए बेवकूफ़ी भरा कार्य होगा। आज के वैभवपूर्ण युग में जहाँ पैसा, पॉवर और लोकप्रियता हर बात का बैरोमीटर है तो उसमें यह बात प्रथम दृष्टि ठीक भी लगती है। तभी मन में कभी-कभी ख़्याल आता है कि अगर मैं पढ़ और लिख नहीं रहा होता तो क्या कर रहा होता? यह सवाल अमूमन पूछा भी जाता है। ऐसे बहुत से काम हैं जो मायावी दुनिया में सफल होने के लिए आवश्यक माने जाते हैं। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (83) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 15 अगस्त 2010
मनोज सिंह

लोककलाएँ और कारोबारी फ़िल्में

आज बिना कॉपीराईट के किसी इलाक़े की लोककथाओं पर अगर कोई किताब छपती है तो उसका प्रकाशक लेखक की रॉयल्टी की तरह उस इलाक़े के लोकजीवन के लिए उतना योगदान क्यों नहीं दे सकता? लोकतंत्र का असली विकास तभी होता है जब लोग अपनी न्यूनतम ज़िम्मेदारियों से ऊपर जाकर अपनी अधिकतम संभव ज़िम्मेदारी ख़ुद होकर लेना सीखें। लोकतंत्र के भीतर जब एक सभ्य समाज में ऐसी उम्मीदें होती हैं तो यह देखकर निराशा भी होती है कि लोग किस तरह किसी क्षेत्र, बोली, संस्कृति के हक़ छीनने में लग जाते हैं। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (27) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 15 अगस्त 2010
सुनील कुमार

असामान्य मेलजोल
प्रेरक प्रसंग, (48) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 15 अगस्त 2010,
जया केतकी

पंजाबी साहित्य की वेबसाइट का लोकार्पण

श्रीगंगानगर। उभरते हुए प्रतिभाशाली कवि गुरमीत बराड़ द्वारा तैयार पंजाबी साहित्य की ऑनलाइन पंजाबी पत्रिका लिखतम का लोकार्पण 'सीमा सन्देश' कार्यालय में विख्यात राजस्थानी कवि मोहन आलोक, श्रेष्ठ पंजाबी कहानीकार हरपाल सिंह लखियां, संस्कृत के विद्वान डॉ. सत्यव्रत वर्मा, मेजर रवि किंगरा, राजस्थान साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष विद्यासागर शर्मा, अली मोहम्मद पडि़हार, प्राचार्य अरविन्द्र सिंह, पंजाब से साहित्यकार महेन्द्रजीत सिंह बहावालिया, भारत भूषण शून्य, सीमा सन्देश के सम्पादक ललित शर्मा आदि की उपस्थिति में किया गया। यह राजस्थान की पहली पंजाबी साहित्य की ऑनलाइन पंजाबी पत्रिका है। आगे पढ़िये...

हलचल, (37) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 15 अगस्त 2010

साहित्य अकादमी द्वारा रायपुर में रचना पाठ का आयोजन

रायपुर । साहित्य अकादमी दिल्ली की अगुवाई में देशभर में हो रहे साहित्य समारोह के आयोजन कर रहा है । इसी सिलसिले में 3 अगस्त के दिन एक प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन में देश व प्रदेश के प्रतिष्ठित रचनाकारों को एक मंच पर कविता व कहानी पाठ के लिए आमंत्रित किया गया। प्रदेश की राजधानी में हिन्दी रचना पाठ का आयोजन राजधानी के जेल रोड स्थित हॉटल शारदा सभागार में किया गया। कार्यक्रमों को चार सत्रों में विन्यस्त किया गया था । महत्वपूर्ण बात यह कि समारोह में कई रचनाकारों ने श्रोताओं के रूप में शामिल होकर कविता, कहानी पाठ का भरपूर आनंद उठाया। आगे पढ़िये...

हलचल, (54) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 14 अगस्त 2010

पार्श्व में हिलता कोरा कैनवास
कविता, (93) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 14 अगस्त 2010,
अपर्णा भटनागर

भोपालः ‘धुएँ की नली का धड़ाका’
कविता, (81) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 14 अगस्त 2010,
मूल- वरवर राव
अनुवादकः आर. शांतासुंदरी

प्रचार के मुखौटे और सब जान रही पब्लिक

पर भला यहाँ चर्चा में कुछ तथ्यों को जिस आसानी से छोड़ दिया गया वह बात गले नहीं उतर रही। यह बात सारा देश जानता है कि चुनावों में भारी भरकम अख़बारों और बड़े बड़े चैनलों में फ़लां प्रत्याशी मज़बूत है और फ़लां जीत के क़रीब है जैसे समाचार पैसे लेकर छापे और दिखाए गए हैं। मै इस बात से सहमत नहीं हूँ जैसा कि सारे वक्ता एक सुर में कह रहे थे कि मीडिया ही अपने में सुधार कर लेगा। मरीज़ ही डॉक्टर भी है उसकी फ़िक्र बाहर वाले न करें। आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (38) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 14 अगस्त 2010
संजय शर्मा

यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है!

बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से ख़ारिज़ करता हूँ, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूँगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमज़ोर हैं कि “दुश्‍मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएँगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब मुंबई-पंजाब में बाढ़ ने तबाही मचा रखी हो, बस्‍तर के आदिवासियों का कत्‍लेआम जारी हो, खाप पंचायतें चुन-चुनकर युवाओं को फाँसी पर लटका रही हों, किसान हज़ारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएँ कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है और भर्त्‍सनीय है। आगे पढ़िये...

समांतर, (44) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 14 अगस्त 2010
राजेन्द्र यादव

सेहत के लिए जागरूकता की ज़रूरत

जिला स्तर पर ऐसे स्वास्थ्य केंद्र शहरों के अलग-अलग हिस्सों में शुरू करे जहाँ पर लोगों को मुफ्त में योग सिखाया जाए, पौष्टिक आहार के बारे में बताया जाए और जहाँ घरों में खाना पकाने वाली महिलाओं को यह बताया जाए कि अपने परिवार के लोगों की ज़रूरत के मुताबिक वे कैसे अधिक सेहतमंद खाना पका सकती हैं। बच्चों को शुरू से ही सिखाया जाए कि वे कैसे बैठकर काम करें, किस तरह साइकिल जैसी क़सरत की गाड़ी पर आना जाना करके अपने को चुस्त-दुरुस्त रखें। एक प्राकृतिक जीवनशैली को समाज इस हद तक भूल चुका है कि उसे एक बार फिर औपचारिक रूप से ज़िंदगी में दाखिल करवाने की ज़रूरत है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (47) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 14 अगस्त 2010
सुनील कुमार

दो कविताएँ
कविता, (117) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 14 अगस्त 2010,
अनीता चमोली ‘अनु’

आजकल

"प्रतिमा, जिसके साथ बंधन में बंधना नहीं चाहती हो उसका ये बंधन! कोख के अंदर तो बंधा है। जानती हो, माँ का सबसे पवित्र रिश्ता बच्चों से ही होता है, पर पवित्रता की मोहर शादी की रस्मों से ही लगती है। जिसकी पत्नी नहीं कहलाना चाहती हो, उसी के बच्चे की माँ कहलाने को तैयार हो और शादी कोई रस्म नहीं, एक संस्कार है, प्रतिमा। एक संस्कार संतान को जन्म देने के पहले का। उसके बग़ैर पत्नी नहीं, उपपत्नी ही कही जाओगी।" आगे पढ़िये...

कहानी, (80) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
डॉ. स्वाति तिवारी

मुझसे शादी करोगी?

प्रतीक से जब वो पहली बार मिली, उसकी आँखें चमकी थीं और ये चमक उसकी आँखों के स्वाभाविक पैनेपन से कतई मेल नहीं खा रही थी। वे दोनों खिलकर मिले थे और बड़ी शिष्टता से एक-दूसरे का मुआयना करते रहे थे। प्रतीक ने गहरी आँखों से उसे निहारा था, जूही के चेहरे पर मोहित हो जाने की सुर्खी थी और सभी की तरह मैं भी यही सोच रही थी, ये सजीला नौजवान और ये सुन्दर लड़की एक साथ कैसा ख़ूबसूरत जोड़ा हैं ! आगे पढ़िये...

कहानी, (106) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
इंदिरा दांगी

नक्सलियों से बंदूकें नहीं, मुद्दों को भी छीनना होगा

नक्सल माँगों और उनके नारों में से जो हिस्से लोकतांत्रिक हों और जनता के कम से कम किसी हिस्से का समर्थन उन्हें दिला रहे हैं, उनके बारे में देश की लोकतांत्रिक ताक़तों को समझना होगा। आज बिना नक्सलियों के भी पूरे देश में जिस तरह से ज़मीन देने के ख़िलाफ़ और कारखाने आने देने के ख़िलाफ़ गली-गली, गाँव-गाँव बेचैनी फैली हुई है, वह नक्सल एजेंडा में भी है। इसलिए सरकारों को बंदूकों के साथ-साथ, बातचीत की कोशिशों के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि जनता की ज़िंदगी जीने लायक रहने दी जा रही है या नहीं, और सबसे बेबस लोगों को उनका हक़ दिया जा रहा है या नहीं। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (28) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
सुनील कुमार

माहिया (पंजाबी लोकगीत)
लोक-आलोक, (49) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 13 अगस्त 2010,
प्राण शर्मा

देश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया

देश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया (1884-1968)और पहला उपन्यास है 'मतुराअ: कहनि'। उपन्यास प्राचीन मुंडारी में 1920 के आस-पास लिखा गया। हालांकि यह बीसवीं शताब्दी के पिछले दशक में यानी 1984 में प्रकाशित हुआ, लेकिन लिखा गया बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में। एक लंबा अंतराल लिखने और छपने के बीच। कारण, 1700 पृष्ठों का होना और भाषा मुंडारी। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (40) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 12 अगस्त 2010
संजय कृष्ण

क्रिया के वर्तमान और भूतकाल रूप की उत्पत्ति के लिए नियम
व्याकरण, (53) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 12 अगस्त 2010,
डॉ. काजल बाजपेयी

करूणा और विद्रोह का अविस्मरणीय दस्तावेज़

पक्षी-वास समाज के जिस यथार्थ पर आधारित है, उसकी समस्त असहायता करूणा और विद्रोह का अविस्मरणीय दस्तावेज़ है। मेरा विश्वास है कि हिन्दी के पाठक इसके माध्यम से न केवल डॉ. सरोजिनी साहू के महत्वपूर्ण कृतित्व से परिचित होंगे, बल्कि उड़िया भाषा की बढ़ती हुई ऊँचाई का भी उनको बोध होगा। यदि यह सब संभव हो सका हो तो इसका सारा श्रेय श्री दिनेश कुमार माली जी को जाता है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (63) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 12 अगस्त 2010
डॉ. दिनेश्वर प्रसाद

भूल का आभास
प्रेरक प्रसंग, (70) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 12 अगस्त 2010,
जया केतकी

सवाल दस रुपये का

’’जीता रह बिटवा। अगर हर कोई तेरी तरह जागरूक हो जाए तो क्या कहने। फिर कोई किसी को बेवकूफ़ नहीं बना पाएगा। पर एक बात तो है भतीजे। अगर मैं तुझे काली मेंहदी का पैकेट ख़रीदने की सलाह ने देता तो यह फ़ैसला तेरे हक़ में कहाँ से होता। न तू बालों को रंगता, न अदालत जाता और न ही इत्ता बड़ा फ़ैसला अदालत सुनाती। आगे पढ़िये...

कहानी, (91) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 12 अगस्त 2010
मनोहर चमोली ‘मनु’

लात-घूँसों से ज़िंदा देवियों का पुजारी देश

देश का सबसे आधुनिक और विकसित समझे जाने वाला शहर बैंगलोर जब श्रीराम सेना जैसे नाम वाले संगठन के हमलों से लड़कियों को सडक़ पर गिरते-पड़ते देखता है तो फिर इस देश के गाँव-देहातों में महिलाओं से कई दूसरे क़िस्म की बदसलूकी हैरान नहीं करती है। सच तो यह है कि पढ़े-लिखे लोगों की सोच, अनपढ़ लोगों की महिलाओं के बारे में सोच से परे हो इसके कोई सुबूत नहीं हैं। पढ़ाई या संपन्नता लोगों के मन में महिलाओं के बारे में बराबरी की सोच नहीं ला पाती। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (40) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 12 अगस्त 2010
सुनील कुमार

फिर एक सुहानी याद आई

वह बात थी कि तुम एक फ़ोन पहले नहीं कर सकती। जबकि मैं कागज़ पर अपना मोबाइल नंबर लिखकर तुम्हें दे चुका था। कभी-कभी तो मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आता। पर मेरी हालत यह थी कि मैं किसी से हम दोनों के मसले पर बात नहीं करना चाहता था। अब कई बार मैं मन ही मन सोचने लगा था कि कैसी लड़की से जीवन की डोर बंध रही है। मैं होता और मेरे पास तुम्हारा नंबर होता तो मैं आए दिन तुम्हें फ़ोन करता। एक तुम हो कि अभी तक एक कॉल तक नहीं की। इस तरह कई दिन नहीं कई सप्ताह यूं ही निकल गए। आगे पढ़िये...

संस्मरण, (78) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 11 अगस्त 2010
मनोहर चमोली ‘मनु’

झरोखा का विमोचन

रायपुर । छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर देश के दो मूर्धन्य रचनाकार अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठि का आयोजन किया। 2 दिन चले इस कार्यक्रम में देश-विदेश और छत्तीसगढ़ के भर के 600 से अधिक साहित्यकारों ने भाग लिया। एक राष्ट्रीय कवि संध्या का भी आयोजन किया।इस अवसर पर पंकज त्रिवेदी के निबंध संग्रह झरोखा का विमोचन वरिष्ठ कवि और आलोचक नंदकिशोर आचार्य के करकमलों से संपन्न हुआ । आगे पढ़िये...

हलचल, (101) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 11 अगस्त 2010

खेल, खुली लूट और सबक

भारत की हालत बहुत ही ख़राब है। खेलों के मामले में जहाँ यह उम्मीद की जाती है कि दूसरे कुछ जगहों के भ्रष्टाचार के मुकाबले यहाँ भ्रष्टाचार कुछ कम होगा तो वह उम्मीद धरी रह जाती है। एक तरफ़ तो खेल संघों की भयानक राजनीति के बीच फंसे हुए खिलाड़ी, दूसरी तरफ़ ठेठ सरकारी अंदाज़ में काम करते केंद्र और राज्य सरकारों के खेल विभाग, और फिर तीसरी तरफ़ बड़े-बड़े आयोजनों, बड़े-बड़े स्टेडियम जैसे निर्माणों से लेकर ख़रीददारी तक में खुला भ्रष्टाचार। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (63) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 11 अगस्त 2010
सुनील कुमार

दिनेश माली की किताब का विमोचन

रायपुर । विगत दिनों (31 जुलाई) छत्तीसगढ़ की राजधानी में रायपुर में दिनेश माली द्वारा अनुदित कृति पक्षी-वास का विमोचन वरिष्ठ कवि और आलोचक नंदकिशोर आचार्य के करकमलों से संपन्न हुआ । अवसर था – प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह का द्वितीय वार्षिक समारोह । कार्यक्रम की अध्यक्षता की जाने माने आलोचक डॉ. धनंजय वर्मा ने । विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे – दिविक रमेश, मधुरेश, ज्योतिष जोशी, डॉ. शोभाकांत झा, डॉ. त्रिभुवन नाथ शुक्ल और विश्वरंजन । यह ओडिया उपन्यास का अनुवाद है जो ओडिया की चर्चित कथाकार डॉ. सरोजिनी साहू द्वारा लिखित है, जिसे यश प्रकाशन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है । आगे पढ़िये...

हलचल, (117) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 10 अगस्त 2010

टेक्नॉलॉजी के साथ हमबिस्तर

क्या सोना शुरू होने से लेकर जागने तक लोग इस टेक्नॉलॉजी के बिना रह सकते हैं और अगर वे ऐसा कर भी सकें तो क्या बाक़ी लोग उनसे ज़रूरी काम की नौबत आने तक उन घंटों में उनके बिना रह पाएँगे? आज लोगों ने अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतें और सुख-दुख के मौकों पर एक-दूसरे के लिए उपलब्ध रहने का पूरा सिलसिला ऐसा बना रखा है कि मुसीबत के वक़्त के लिए लोगों के पास एक-दूसरे तक जाने के लिए बस ऐसे फ़ोन ही रह गए हैं। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (88) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 10 अगस्त 2010
सुनील कुमार

पत्रिकाएँ, संपादक, साहित्यकार ग़ैर ज़िम्मेदार हो गए हैं

साहित्य की पत्रिकाएँ और उनके संपादक, साहित्यकार ग़ैर ज़िम्मेदार हो गए हैं। साहित्य समाज के काम नहीं आ रहा है। साहित्य के पाठक कम हो गए हैं। संस्थाओं में एक तरह की मीडियाक्रिटी आ गई है, दोयमदर्जे के लोग हैं। संस्थाओं के गिरोह से बन गए हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जब ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ लिखा था तो उन्हें कितना समय लगा। अनेक साहित्यकार हुए, पर कितनों को याद रखा जाता है। आगे पढ़िये...

कथोपकथन, (76) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 10 अगस्त 2010
जया केतकी

प्रकृति और स्त्री देह के संयोजन का काव्यालोक

उनकी यथार्थवादी कविताओं के मुकाबले मुझे उनका रूमानी कविताओं वाला पक्ष कहीं ज्यादा सशक्त लगता है। ठेठ विचार से रचनात्मकता कुंद हो जाती है, तो रचनात्मकता के ह्रास की कसौटी पर यथार्थवाद का समर्थन उनके संदर्भ में सही नहीं लगता। जब भी उन पर रूपवादी अथवा रूमानी होने के आरोप लगे हैं लोगों ने उनकी यथार्थवादी कविताओं के संदर्भ में पक्ष लेने की कोशिशें की हैं। आगे पढ़िये...

मूल्याँकन, (56) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 10 अगस्त 2010
प्रेम शशांक

अपनी थाली की आधी रोटी

समाज के भीतर भी यह सोच विकसित होनी चाहिए कि कारोबारों का सामाजिक सरोकार कितना हो और उसे कैसे हासिल किया जाए। जो काम बिल गेट्स ने अमरीका में किया है भारत में भी टाटा जैसे कुछ लोग ऐसी पहल कर सकते हैं और किसी स्तर पर इस देश में एक बिस्किट के ब्रांड की तरह 50-50 की सोच लाने की ज़रूरत है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (30) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 9 अगस्त 2010
सुनील कुमार

छिछोरेपन का नया प्रतिमान

भारतीय ज्ञानपीठ अपने निदेशक-संपादक के साथ क्या करे, यह उसके अधिकार का मामला है। पर उसके द्वारा प्रकाशित उन सभी लेखकों को, जिन्हें लेखकों के अपमान और इस बढ़ते छिछोरेपन की चिंता है, ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तकें वापस ले लेनी चाहिए। इसी तरह हिंदी के सभी ऐसे लेखकों और बुद्धिजीवियों को हिंदी विश्वविद्यालय से तत्काल अपना संबंध तोड़ लेना चाहिए। हिंदी की दो शीर्ष संस्थाओं को ऐसी छिछोरी हरकतों द्वारा पददलित किये जाने पर अगर हम चुप बैठते हैं तो यही साबित होगा कि अपनी भाषा और साहित्य के अपमान और अवमूल्यन की हमें कोई परवाह नहीं है। आगे पढ़िये...

समांतर, (76) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 9 अगस्त 2010
अशोक वाजपेयी

अब भी अपने अंदर एक गाँव को जीता हूँ- नामवर सिंह

नामवर जी ने कहा, आपलोगों का कार्यक्रम तो बहुत अच्छा हो गया। फिर चिंतन की मुद्रा में बोले, ऐसा कार्यक्रम करना चाहिए। अपलोगों का और क्या सब चल रहा है। वे बिहार की साहित्यिक गतिविधि के संबंध में जिज्ञासा कर रहे थे। शिवनारायण जी ने कहा-सर! हमलोग यहाँ कुछ न कुछ साहित्यिक गतिविधि करते ही रहते हैं। अभी हाल में रामदरश जी अए थे, हिमांशु जोशी जी आए थे, केदार नाथ जी आए थे...। नामवर जी प्रसंशा की मुद्रा में सर हिला रहे थे। आगे पढ़िये...

संस्मरण, (59) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 9 अगस्त 2010
कलानाथ मिश्र

छिनाल का जन्म

छिनालPicasso शब्द बना है संस्कृत के छिन्न से जिसका मतलब विभक्त , कटा हुआ, फाड़ा हुआ, खंडित , टूटा हुआ , नष्ट किया हुआ आदि है। गौर करें चरित्र के संदर्भ में इस शब्द के अर्थ पर । जिसका चरित्र खंडित हो, नष्ट हो चुका हो अर्थात चरित्रहीन हो तो उसे क्या कहेंगे ? जाहिर है बात कुछ यूं पैदा हुई होगी- छिन्न + नार> छिन्नार> छिनार> छिनाल आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (78) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 9 अगस्त 2010
अजित वडनेरकर

गगनांचल का नया अंक

हमारे समक्ष है गगनांचल का मई-जून 2010 अंक । संपादक हैं जाने-माने व्यंग्यकार और लेखक श्री प्रेम जनमेजय जी । इस अंक में ख़ास सामग्री हैं - पक्ष विपक्षः प्रस्तुति राधेश्याम तिवारी, लालित्य ललित, पुरस्कार/ सम्मान: कितनी नीति, कितनी रणनीति, के अंतर्गत विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, रवींद्र कालिया,प्रभाकर श्रोत्रिय, राजेश जोशी,शिवनारायण, कृष्णदत्त पालीवाल, सुदर्शन वसिष्ठ तथा राजुरकर राज के विचार । विशेष स्तम्भ के अंतर्गत आप पढ़ सकते हैं अक्षरधाम पर मनोहर पुरी का आलेख । आगे पढ़िये...

पत्रिकाएँ, (117) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 9 अगस्त 2010

एक जनयुद्ध जिससे तबाह है बस्तर

सलवा-जुड़ूम के शिविरों की यातना और पीडा उन्हें दिख जाती है, लेकिन नक्सलियों द्वारा की जा रही सतत यातना और मौत के मंजर उन्हें नहीं दिखते। इस तरह का ढोंग रचकर वैचारिकता का स्वांग रचने वाले लोग यहाँ के दर्द को नहीं समझ सकते, क्योंकि वे पीड़ा और दर्द के ही व्यापारी हैं। उन्हें बदहाल, बदहवास हिंदुस्तान ही रास आता है। हिंदुस्तान के विकृत चेहरे को दिखाकर उसकी मार्केटिंग उन्हें दुनिया के बाज़ार में करनी है, डालर के बल पर देश तोड़क अभियानों को मदद देनी है। आगे पढ़िये...

प्रसंगवश, (49) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 8 अगस्त 2010
संजय द्विवेदी

सच्ची श्रद्धा से भजिए
प्रेरक प्रसंग, (70) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 8 अगस्त 2010,
पंकज त्रिवेदी

आप की पहचान संदिग्ध है

पूर्व में गाँव से निकलने वाला एक अनपढ़ देहाती कुछ कोस दूर पहुँचने के साथ ही अकेला और अजनबी हो जाता था। उसके लिए इतने में ही देश से बाहर जाने वाली स्थिति बन जाती थी। राह में लूटने वाले लुटेरे-डकैत तो तब भी होते थे मगर धर्मात्माओं की कमी न थी। राह में धर्मशालाएँ होती थीं, मंदिर थे और लोगों के दिल थे। किसी भी दरवाज़े को खटखटा लें तो अमूमन वह आपको एक वक़्त की रोटी ज़रूर खिलाएगा और साथ में आगे जाने में आपकी मदद कर आप से दो बातें भी करेगा। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (93) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 8 अगस्त 2010
मनोज सिंह

कवि-आलोचक सकलदीप सिंह के योगदान की याद

कोलकाता । प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से आयोजित शोकसभा में साहित्य की दुनिया से जुड़े लोगों ने कवि-आलोचक सकलदीप सिंह के योगदान को याद किया। उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन जनसंसार के सभाकक्ष में शुक्रवार की शाम किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विमल वर्मा ने की। आगे पढ़िये...

हलचल, (48) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 8 अगस्त 2010

स्त्री की छवियाँ

संग्रह की कविताओं में घर-परिवार का संसार तो है ही, बाहर की दुनिया का विस्तृत आकाश भी दिखाई पड़ता है। बाहर और भीतर की इस दुनिया में एक स्त्री के सुख-दुख, रिश्ते-नाते, प्रेम-वात्सल्य, शोर-एकांत भी मुखर होकर पाठकों से बोलते-बतियाते हैं। भाषा के स्तर पर भी निर्मला अपनी बात को बेहतर ढंग से हमारे सामने रखती हैं। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (75) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 5 अगस्त 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

शमशेर बहादुर सिंह : मन की बात

शब्दों की आपसी टकराहट के साथ ही उनकी सार्थकता का समावेश कविता के भावार्थ को मन के गहराई तक ले जाता है । शब्दों की रगड़ से जो स्पष्ट होता है वही वास्तविक भाव है । कविता में अभिधात्मक अर्थ की अपेक्षा व्यजनात्मक अर्थ ही प्रिय लगता है । जब कविता होती है तब शब्दों की भूमिका बदल जाती है और समय के बहते निरंतर बहाव से उसके प्रवाह में निश्चिंतता आती है । जिस काव्य में उत्तम ध्वन्यात्मकता हो उसे मधुर यानी मीठा काव्य माना जाता है । इस हिसाब से दृष्टिपात करें तो शमशेर की रचनाओं से इसकी और भी बेहतर पुष्टि होती है । आगे पढ़िये...

आलेख, (108) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 5 अगस्त 2010
पंकज त्रिवेदी

सावन में प्रेम की अनुभूति है कजरी

नगरीय सभ्यता में पले-बसे लोग भले ही अपनी सुरीली धरोहरों से दूर होते जा रहे हों, परन्तु शास्त्रीय व उपशास्त्रीय बंदिशों से रची कजरी अभी भी उत्तर प्रदेश के कुछ अंचलों की ख़ास लोक संगीत विधा है। कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी कजरी। बनारसी कजरी अपने अक्खड़पन और बिन्दास बोलों की वजह से अलग पहचानी जाती है। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का बखूबी उपयोग होता है, इसकी सबसे बड़ी पहचान ‘न’ की टेक होती है आगे पढ़िये...

लोक-आलोक, (130) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 6 अगस्त 2010
कृष्ण कुमार यादव

महँगाई एक टापू नहीं

महँगाई को बाक़ी देश से, उसके बाक़ी पहलुओं से अलग करके देखना एक अदूरदर्शिता होगी जो राजनीतिक नारों के लिए तो कोई बुरी बात नहीं है लेकिन अगर देश को समझना हो और दिक्कत को सचमुच दूर करना हो तो बिना एक संतुलित नज़रिए से यह काम नहीं हो सकता। एक तरफ़ तो सत्ता से जुड़े तमाम तबके लूटपाट में लगे रहें और दूसरी तरफ़ अनाज-तेल के दाम न बढ़ें ऐसा कैसे हो सकता है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (44) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 4 अगस्त 2010
सुनील कुमार

पहाड़

मैं पसीने, धूल और मिट्टी से लथपथ बुरी तरह हाँफ रहा था। हथेलियाँ लाल हो गयी थीं और कंधों, कलाईयों और छाती में दर्द हो रहा था। साँस लेने में ताक़त लगाती पड़ रही थी ; पर मैं ख़ुश था। आख़िर ये पल आ ही गया। मैं काँपते पैरों से खण्डे पर खड़ा हुआ, डगमगाया। दिल बड़ी ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने पहाड़ की उभरी नोंक पकड़ी। हथेली गीला था, रिरकन-सी हुई। आगे पढ़िये...

कहानी, (97) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 4 अगस्त 2010
इंदिरा दांगी

बच्चे के प्रति रवैया

स्कूल में बच्चा पूरे पाँच छह साल के अनुभवों के साथ प्रवेश करता है। उसकी कल्पनाओं की कोई थाह नहीं होती है। उसकी जिज्ञासाएँ अनंत होती है। उसके अनुभवों, जिज्ञासाओं का सम्मान करते हुए उसके ज्ञान को आगे बढ़ाया जाना चाहिए जो सिर्फ़ रटाकर कर या दोहराकर नहीं होगा बल्कि उसे अपनी जिज्ञासाओं, कल्पनाओं के पंखों पर सवार होने दें। उसको उड़ने में सहायता करें। उसे टोके नहीं बल्कि उसको प्रेरित करें। उसको अजनबी भाषा थोपी न जाय बल्कि उसकी भाषा में संवाद किया जाय। बच्चे की मातृभाषा में ही सीखने की शुरुआत की जाय धीरे-धीरे बच्चा अन्य भाषाओं को भी सीखने लगेगा। लेकिन यह चंद घण्टों या दिनों में नहीं होगा। आगे पढ़िये...

बचपन, (98) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अगस्त 2010
जगमोहन चोपता

सूरज प्रकाश की 'दाढ़ी में तिनका'

सूरज प्रकाश की यह पुस्‍तक पूर्ण रूप से उनके उन सपनों का संसार है जहां रिश्‍तों के टूटने के बाद बचीं किरकिचें, टूटने की स्थिति से उबरने के सोपान, निराशा में भी आशा के बीज दिखते हैं। लेखक की ज़िंदगी के सभी रंग अपनी पूरी ईमानदारी से सामने आये हैं। अपने आप में खोये रहने वाले सूरज प्रकाश की यह पुस्‍तक उनके जीवन की, उनके सपनों की, उनके जीवन में उनके दोस्‍तों के साझेदारी का दस्‍तावेज़ है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (67) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अगस्त 2010
मधु अरोड़ा

प्रियतमा को पत्र

ये डर है कि आप कहीं अपनी क़ाबिलियत, क्षमता, उर्जा और सामर्थ्य को सीमित न कर दो। पर इस डर को आप ख़ुद ही दूर कर देती हो। मैं बड़ी सहजता से बता ही देता हूँ और दूसरे ही क्षण आप आ आती हो। मुझे छोटे बच्चे की तरह पुचकारती हो। मेरे बालों को सहलाती हो। तब मुझे लगता है कि ये जो पहला सपना; जो मुझे डराता है, उस पर दूसरा सपना अनायास ही मेरे डर को दूर भगा देता है। आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (120) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अगस्त 2010
मनोहर चमोली ‘मनु’

कश्मीर : स्वर्ग से नर्क तक

कश्मीर की नौबत आज एक कड़ाई की माँग भी कर रही है। भारत को एक लाचार देश की तरह नहीं रहना चाहिए और अगर कश्मीर में तोड़-फोड़ करने वालों की साज़िशें उसे पता हैं तो उसके लिए देश के भीतर घोषित तौर पर कार्रवाई करनी चाहिए और सरहद पार वह कोई अघोषित कार्रवाई भी कर सकता है जिसकी कि पूरी दुनिया में अनगिनत मिसालें हैं। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (52) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अगस्त 2010
सुनील कुमार

आधी आबादी का भयावह सच

लड़के मानो मुसीबतों का निवारण माना जाता है, यह सब हमारी पुरानी मान्यताओं के चलते है और ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे चिंताजनक बात यह है कि एक लड़के की चाह में महिलाएँ नीम हकीमों और स्थानीय चिकित्सकों के चक्कर काटती रहती हैं और इसी कारण वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाती और नतीज़तन अधिकतर कई मामलों में पैदा होने वाला बच्चे के सिर सामान्य बच्चे से भी बड़ा देखा जा रहा है। आगे पढ़िये...

धारिणी, (90) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अगस्त 2010
विपिन चौधरी

पोर्टब्लेयर में प्रेमचन्द जयंती

पोर्टब्लेयर । प्रेमचन्द जी की 131 वीं जयंती पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में हिंदी साहित्य कला परिषद् द्वारा आयोजित संगोष्ठी ‘भूमंडलीकरण का वर्तमान सन्दर्भ और प्रेमचन्द का कथा साहित्य’ में मुख्य अतिथि के रूप डॉ. कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि प्रेमचन्द के साहित्य और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिंदा हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (94) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अगस्त 2010

याद किये गये कथा सम्राट

पटना। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द को उनकी 130वीं जयंती पर पटना में 31 जुलाई को, विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा याद किया गया। बिहार आर्ट थियेटर ने कालिदास रंगालय में नाटक ‘‘सुभागी’’ का मंचन कर प्रेमचन्द को श्रद्धासुमन अर्पित किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (76) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अगस्त 2010

कबूतर तुम कब सुधरोगे
ब्लॉग गाथा, (48) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अगस्त 2010,
एम.वर्मा

एक दिन

पता नहीं कैसे गुलाबजामुन का बाउल मेरे हाथ से छूट गया... गुलाबजामुन लुढ़के और बाउल टूट कर पूरे किचन में बिखर गया.... मैं उस बिखरेपन को एकटक देख रही थी और मेरे अनजाने ही आँसू उमड़ आए थे.... सौम्य ने मेरे सिर को प्यार से थपथपाया.... कोई बात नहीं.... इसमें रोने की क्या बात है? चलो तुम बाहर जाओ... मैं सब ठीक कर देता हूँ.... मैं धुँधलाई आँखों से कभी सौम्य को तो कभी उस बिखरेपन को अवाक होकर देख रही थी। आगे पढ़िये...

कहानी, (149) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अगस्त 2010
डॉ. अमिता नीरव

कभी मैं रोता रहता हूँ
छंद, (140) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010,
चांद हदियाबादी

दलित क़िस्से-कहानियाँ

कुआँरे मि. ‘क’ को उस सवर्ण बहुल क्षेत्र में नौक़री करते हुए तीन वर्ष हो चुके थे, और इन वर्षों में उनकी किसी लड़की से कोई बात नहीं हो पायी थी। यहतो उस गाँव की परम्परा का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन था। ऐसा नहीं था कि मि. ‘क’ निहायत ही शरीफ़ आदमी थे। वास्तव में अपनी जातिगत हीन-भावना की ग्रंथि के कारण वे किसी कन्या से बात करने का साहस नहीं जुटा जाते थे आगे पढ़िये...

लघुकथा, (109) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
आलोक कुमार सातपुते

ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड

भारतीय पारंपरिकता में वृक्षों की महिमा कई तरीकों से बताई गई है, जरूरत पड़ने पर वृक्ष विशेष का नाम लेकर भी। जल स्रोत भी इसी तरह हमेशा से पूजित रहे हैं। ऋषि-मुनियों ने आम व्यक्ति को भले पुण्य के नाम से ही सही जल, प्रकृति और वृक्ष से हमेशा जोड़ा। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (59) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
निर्मला भुराड़िया

जीवन का तर्क : अर्थशास्त्र के रास्ते से

हार्फर्ड की इस दिलचस्प किताब का प्रस्थान बिन्दु यह विचार है कि इंसान इंस्ट्रुमेंटल रेशनलिटी (करणात्मक बुद्धिसंगतता) का इस्तेमाल करते हुए लागत और लाभ की गणना कर अपने जीवन के फैसले करता है। हार्फर्ड कहते हैं कि रेशनल लोग इंसेण्टिव्ज़ से परिचालित होते हैं। अगर उन्हें कोई काम महँगा लगता है तो वे उसे कम करते हैं और अगर सस्ता व अधिक लाभप्रद लगता है तो ज़्यादा करते हैं। जब कोका कोला की क़ीमत बढती है तो लोग पेप्सी ज़्यादा पीना शुरू कर देते हैं।
आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (56) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल

उम्मीद की किरन बाक़ी

सबको धन चाहिए। ठीक बात है।  मेहनत करो और कमाओ। ख़र्च करो या संग्रह करो, कोई नहीं पूछेगा। पर नहीं, बिना मेहनत के धन चाहिए। फिर क्या रास्ता है। ईमानदारी से तो नहीं मिल सकता। ईमानदारी से तो जीवन चलता रहे, इसी में प्रसन्नता अनुभव की जा सकती है। पर जीवन चलने भर से कोई भी प्रसन्न नहीं दिखता। वह शानदार ढंग से चलना चाहिए। बंगला होना चाहिए, आलीशान गाड़ी होनी चाहिए। इतना धन होना चाहिए कि ऐश्वर्य-वैभव की, विलासिता की, ऐश की ज़िंदगी जी जा सके। आगे पढ़िये...

आलेख, (75) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
डॉ. सुभाष राय

वैदिकी जाति जाति न भवतिः

ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था की नींव इतनी गहरी है कि इसका अंदाज़ा रेखा, प्रेमा आदि के साथ हुई घटना से लगाया जा सकता है कि वर्षों से जात के नाम पर राजनीति व शासन चलाने वाले लोग आज भी अपनी ज़मीन घिसकने नहीं देना चाहते ? कभी आरक्षण, तो कभी जाति जनगणना के सवाल पर देश-समाज के समक्ष बुद्विजीवी सोच की गलधोधरी करते है मिल जाते हैं ? और अंदर से अपनी जड़ता को मिटाने के लिए तैयार नहीं हैं। वो जो चाहेंगे वही होगा का ? उनकी दबंगता बरक़रार है। आगे पढ़िये...

आलेख, (66) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
संजय कुमार

भारतीय राष्ट्रवाद के भीष्म पितामह

तिलक ने कर्मयोग के सम्बन्ध में सर्वथा नवीन और क्राँतिकारी विचारों से ओत-प्रोत जिस ‘गीता रहस्य’की रचना की, वह गीता के उपदेशों को नए चेतना आलोक में जानने की अनुपम रचना है। गीता में बताया गया योग ही तिलक का कर्मयोग है और यह कर्मयोग मोक्षप्राप्ति के साथ-साथ निष्काम तटस्थ वृत्ति से कर्म करने का प्राचीन मार्ग प्रशस्त करता है। उनके अनुसार गीता कर्मों के सन्यास की शिक्षा नहीं देती अपितु कर्मफल के अहंवादी तथा स्वार्थयुक्त अभिविन्यास के त्याग पर बल देती है। आगे पढ़िये...

आलेख, (171) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
नरेन्द्र व्यास

गीत कहीं खो गए
छंद, (99) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010,
ओमप्रकाश यती

मृण्मय तन, कंचन सा मन

हम भारतीय परदेस जाकर लाखों की संख्या में आबाद हुए हैं । विश्व के हर कोने में आपको कहीं ना कहीं एकाध भारतीय अवश्य ही मिल ही जाएगा । गिरमीटिया मज़दूर होकर भारत से यात्री सूरीनाम, मारीशस, बाली द्वीप, जावा, सुमात्रा, वेस्ट इंडीज़, फिजी जैसे कई मुल्क़ों में अपना 'मृण्मय तन, कंचन सा मन' लिए पहुँचे थे । आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (74) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
लावण्या दीपक शाह

बूढ़ा चूड़ीहार

उसने अपनी आँखें बंद कर दी। जब आँखें खोली तो वही हाथ सामने दिखने लगे- परंतु हाथों में चूड़ियाँ नहीं थी। बूढ़ा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। बहू लौटकर चली गई। बूढ़ा आवाज़ देने लगा, "माँ, माँ।" उसके बाद उसके मुँह से कुछ भी आवाज़ नहीं निकली। गमछे में बड़े यत्न से लाई हुई चूड़ियों को ज़मीन पर पटक दिया। सारी चूड़ियाँ टूट गई। बूढ़ा बिना पीछे देख लौट गया। नौकरानी और मालकिन ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। आगे पढ़िये...

ओडिया-माटी, (116) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
लक्ष्मीकांत महापात्रा

प्रेम से परमात्मा की ओर

दृष्टि प्रेम की अभिव्यक्ति को देखती है, बुद्धि उसका पृथ्थकरण करके मन-ह्रदय तक जगत के सौन्दर्य को पहुँचता है। प्रेम का अंतिम लक्ष्य कौन-सा? जगत का प्रत्येक इंसान इन सवालों  में घिरा है । जावेद अख़्तर का ही  यह शेर प्रेम के अलग मिज़ाज़ को उजागर करता है आगे पढ़िये...

झरोखा, (99) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
पंकज त्रिवेदी

अनुवाद के नियम-अनियम

विष्णु खरे ने ग्युंटर ग्रास की पुस्तक “जीभ दिखाना” के अनुवाद में समानार्थक शब्दों के चयन में बार बार भूल कर के पाठ को हास्यास्पद बना दिया है, जैसे „langsame Bewegungen der Badenden“ को “स्नानार्थियों की मंद हरक़तें” बना दिया है, जबकि वह “स्नानार्थियों का धीमा अंग-संचालन” होना चाहिए था। ऐसे ही देवी दुर्गा के “अनुयायियों” को उनका “पार्षद” बना दिया गया है, “उत्कट अभिलाषा” को “फैली हुई अभिलाषा” बना दिया गया है। आगे पढ़िये...

व्याकरण, (181) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
अमृत मेहता

बुद्धिजीवी और बंदर

बुद्धिजीवियों की बैठक चल रही थी और उस बैठक में एक से बढ़कर एक बुद्धिजीवी बैठे थे। कोई अव्वल दर्ज़े का बुद्धिजीवी तो कोई परले दर्ज़े का बुद्धिजीवी । अपने चेहरे मोहरे, भाव-भंगिमाओं और बैठने के स्टाईल से सभी वाकई बुद्धिजीवी लग रहे थे। कुछ हालाँकि पैग-शैग लगाकर आए थे लेकिन उनके बुद्धिजीवी होने पर कतई शक़ नहीं था। गठबंधन सरकार की तरह वे अपना मानसिक व शारीरिक संतुलन बनाए हुए थे। कहीं से भी गिर नहीं रहे थे। कुछ पान चबा रहे थे तो कुछ सिगार पीते हुए लगातार धुँए के छल्ले उड़ा रहे थे। इससे साबित हो रहा था कि वे वाकई बुद्धिजीवी हैं। इस बैठक में कोई यूं ही मुँह उठाकर नहीं चले आए हैं। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (90) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
गुरमीत बेदी

आधुनिक काव्य-चेतना के प्रतीक-पुरुष - अज्ञेय

हमेशा नयी राहों के अन्वेषी अज्ञेय जी ने जब 1983 में वत्सल निधि की ओर से ‘जानकी-जीवन यात्रा’ की संकल्पना की, तो इस साहित्यिक यात्रा का एकमात्र उद्देश्य उन-उन स्थलों पर जाकर आंतरिक ऊर्जा प्राप्त करना था, जहाँ-जहाँ राम के पधारने की लोकस्मृति अवशिष्ट है। यह यात्रा ऐसे समय की गयी थी, जब अपने को आधुनिक चेतना से सम्पन्न माननेवाले अधिकांश भारतीय साहित्यकार देश के दो उपजीव्य महाकाव्यों की प्रामाणिकता को लेकर संशयग्रस्त थे। आगे पढ़िये...

संस्मरण, (64) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

कलात्मक सुगढ़ता व कथ्यात्मक औदर्य के कवि थे अज्ञेय

अज्ञेय जी संपादन के लिए वचनबद्ध हो चुके थे, किसी को स्वीकृति देकर वे उससे मुकरना नहीं चाहते थे। दूसरी खास बात अज्ञेय की कविताओं में व्यक्ति की सत्ता सर्वोपरि है। उसके हर्ष, विषदा, मनोकामनाएँ, उसका प्रेम, सब कुछ महिमामण्डित और चिन्तनीय है। व्यक्ति के मन में घटने वाली छोटी-से-छोटी उद्विग्नता सृष्टि और समाज की बड़ी-बड़ी घटनाओं से कत्तई कम नहीं। अज्ञेय की साधना व्यक्ति के रूप में सत्य को पाने की है। आगे पढ़िये...

मूल्याँकन, (56) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
डॉ.अभिज्ञात

अज्ञेय और उनकी पत्रकारिता

अज्ञेय जी संपादन के लिए वचनबद्ध हो चुके थे, किसी को स्वीकृति देकर वे उससे मुकरना नहीं चाहते थे। दूसरी खास बात यह थी कि वे हिन्दी पत्रकारिता के स्तर को उठाना चाहते थे। दरअसल वे इस क्षेत्र में नया प्रयोग करना चाहते थे। इसके अलावा एक और जबरदस्त कारण था कि ‘अज्ञेय स्वातंत्र्योत्तर भारत में अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का निर्वाह करने के लिए यह जरूरी समझने लगे कि ग़ैरपेशेवर राजनैतिक मत का सामने आना आवश्यक हो गया है। पेशेवर राजनीतिज्ञों के हाथ में देश को सौंपकर चुपचाप बैठ जाना जनतंत्र के लिए वांछनीय नहीं है।’ आगे पढ़िये...

मूल्याँकन, (75) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
डॉ. परमात्मानाथ द्विवेदी

हिन्दी में नयेपन का युगान्तर रचने वाले सर्जक

अज्ञेय की सर्जना में किसी विचारधारा का प्रभाव उतना नहीं है जितना कि स्वयं के आत्मअन्वेषण और अपने ही काव्यानुभव का। लेखक की अपनी अनुभूति और अनुगूँज की निजता को जीने की अज्ञेय ने साहित्य में कोशिश भी की। बड़ा सर्जक व्यक्तित्व जो युगान्तर उपस्थित करता है उसके पीछे अनुभव और अनुभूति की जो पूंजी होती है, उसमें कुछ परम्परा से भी आता है और कुछ नयेपन के बोध से भी आता है। आगे पढ़िये...

आलेख, (53) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
महेन्द्र गगन

हमने मंदी के दौर सहे
छंद, (72) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010,
आर सी शर्मा ‘आरसी’

वो एक अच्छी सी लड़की
कविता, (108) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010,
मंजु मल्लिक मनु

भूख का शोर जो नहीं सुनते!

हाँ, यह सब लिखते हुए अपने आप को भी इसी हमाम में खड़ा पाता हूँ क्योंकि मैं भी उसी मीडिया से जुड़ा हुआ हूँ जो आज हर स्तर पर स्याह को सफ़ेद करने में जुटा है। पर यह भी सच है कि जब अख़बारों से मेरा सरोकार हुआ था तो मीडिया का चेहरा इतना ग़लीज़ और बदनुमा नहीं था, जितना आज है। बाज़ार ने आज अख़बारों का चेहरा बदल डाला है और चैनलों ने इस बाज़ार को घरों में नए-नए तरीक़े से इस घरों तक पहुँचाया। आगे पढ़िये...

बाअदब-बामुलाहिजा, (58) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अगस्त 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

ग़ज़ल
छंद, (80) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010,
महेन्द्र वर्मा

मज़दूर सा सूरज
कविता, (34) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 26 अगस्त 2010,
सुबोध श्रीवास्तव

पीढ़ी का दर्द
कविता, (39) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010,
सुबोध श्रीवास्तव

गांधी की विरासत
कविता, (51) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 25 अगस्त 2010,
डॉ. सुभाष राय

   

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