दिल्ली । इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने प्रदर्शन कला एवं चित्रकला के क्षेत्र में चार पूर्णकालिक एम. ए. कोर्स शुरू किए हैं। इग्नू के प्रवक्ता के अनुसार ये हिन्दुस्तानी संगीत, भरतनाटच्यम नृत्य, रंगमंच एवं चित्र कला के क्षेत्र में स्नातकोत्तर कोर्स हैं। आगे पढ़िये...
अब पहली वाली स्त्री उठी।
उसके हाथ में केले का छिलका था। कुछ क्षणों तक असमंजित-सी खड़ी रही फिर सीटों के आसपास बिखरे मूँगफली के छिलके, पोटेटो चिप्स और सिगरेट के टुकड़े बीनने लगी। ठीक तरह से बुहार कर पूरा कचरा उसने खिड़की से बाहर फेंक दिया। आगे पढ़िये...
मेरा ख़्याल है
कि फ्रांस और यूरोप के मामले में, यहाँ तक कि अमेरिका में भी धार्मिक भावना और धर्म के प्रति लगाव में आती कमी पिछले पचास बरस से तो देखी ही जा सकती है। रूस और विश्वभर में एक बड़ी हद तक कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभुत्वशाली दौर में यह यथार्थ है और समस्या भी। जैसे-जैसे मैं लोगों पर ग़ौर करता हूँ, इस विचार के क़रीब होता जाता हूँ कि उनमें धार्मिक विचारों और चिंतन के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है। आगे पढ़िये...
देसी दर्शकों को चूतिया समझते हुये विदेशी माल खींचने की कोशिश करती हुयी एक और दुखी करने वाली फिल्म . किसी विद्वान ने अभी कहा है कि इस फिल्म को देखने से बेहतर है कि आप घर पर कुछ पतंगें लाकर उड़ा लें . यह कहने के बाद मैं पतंगे लेकर छत पर उड़ाने जा रहा हूं . आप भी उड़ा ही लीजिये ।
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विदिशा । मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज में पुरातात्विक धरोहर को संरक्षित करने के लिए स्थानीय संग्रहालय स्थापित किया जाएगा। राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा स्थानीय संग्रहालय के निर्माण के लिए तैयार की गयी एक करोड़ 90 लाख रुपये की योजना को भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय द्वारा स्वीकृति दी गई है। आगे पढ़िये...
उर्दू मुशायरों पर वे लगातार 35 सालों से छाये हुए थे।
वे ख़ुद भी अदबी गोष्ठियाँ और मुशायरे करते रहते थे और हमेशा इस बात का ख़्याल रखते थे कि उसका मयार और संजीदगी क़ायम रहे। उनकी अपनी शायरी के क्या कहने। उसमें समाज और मुल्क के मुस्तक़बिल के चिराग़ रोशन थे। उन्होंने कुछ समय तक लक़ीर नाम से एक अख़बार भी निकाला। उर्दू ज़ुबान की जो ख़िदमत उन्होंने की, उसकी कितनी भी तारीफ़ की जाय कम होगी। आगे पढ़िये...
अशोक कुमार पाण्डेय, कवि होने के बावजूद, उन बिरले लेखकों में से हैं, जिन्होंनें साहित्य की चपेट में सिमटी हिंदी में ऐसे विषयों पर भी लेखन किया है जो समकालीन समय, उसकी चुनौतियों और संकटों को समझने-समझाने में मददगार साबित होता है। अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषय पर लगातार हिंदी में किया गया उनका लेखन कई दृष्टियों से प्रशंसनीय है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह लेखन पाठ्यक्रमीय लेखन नहीं है जैसा कि अक्सर होता है। आगे पढ़िये...
इस संग्रह
से गुज़रना जीवन की छोटी-बड़ी कई सच्चाइयों से रूबरू होने जैसा है जिनके प्रति सामान्यतया हमारा ध्यान नहीं जाता या जाता भी है तो प्रतिस्पर्धा के युग में हम तेज़ी से आँख मूँदकर आगे बढ़ जाते हैं। यों कहें कि बचपन की खिलखिलाहट से प्रौढ़ावस्था के गंभीर चिंतन तक, यौवन के अल्हणपन से प्रेम की पाकीज़गी तक और रिश्तों की शून्यता से परिपूर्णता तक जीवन के सारे रंगों को अपने में समेटे हुए है – ‘धूप से रूठी चांदनी’। आगे पढ़िये...
बोलना
, कम बोलना और नहीं बोलना ये तीनों बिलकुल अलग-अलग चीज़ है और तीनों का अपना महत्व है । मैं बोलने के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, मै कम बोलने का भी हिमायती नहीं हूँ और चुप रहने का समर्थक भी नहीं हूँ । ये चीज़े हमारे औजार और हथियार है इनका इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर करना होगा । आगे पढ़िये...
नक्सलियों ने अपने असली रंग अब रोज़ाना दिखाना शुरू किया है और किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नक्सलबाड़ी से जो आंदोलन शुरू हुआ था वह लंबे समय पहले ख़ुद पटरी से उतर चुका है और अब इसमें आर्थिक मुद्दों के नाम पर एक झांसा देकर लूटपाट, कमाई और हत्याओं का सिलसिला चल रहा है। इनके साथ जिस तरह की भी सख़्ती लोकतंत्र के तहत हो सकती है उसमें सरकार को देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि जनता को बचाना उसकी पहली ज़िम्मेदारी है। आगे पढ़िये...
बीकानेर । विस्मृत यथार्थ को उसी सघनता और शिद्दत के साथ जीवन्त करने का प्रयास आज के दौर की महती आवश्यकता है और ‘साहित्य की लोकधर्मिता’ पुस्तक का रचना संसार इसी प्रयास का उदाहरण बन कर पाठकों के समक्ष एक रूपाकार प्रस्तुत करता है । ये विचार ख्यातनाम राजस्थानी साहित्यकार और शिक्षाविद् डॉ. अर्जुनदेव चारण ने डॉ. मदन सैनी रचित निबंध संग्रह ‘साहित्य की लोकधर्मिता’ के लोकार्पण के अवसर पर विनायक सभागार में मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए व्यक्त किए । आगे पढ़िये...
किताबों के बीच , सपनों के बीच आदमी सोचता है , यही ठाठ हैं अपने , यही सपनों की यारी, यही मेरे अजीज़ मेरे हमनफ़स हमनवां । बड़े प्यार से बड़े जतन से किताबों को पोछता छूता है । ऐसी खुशी ऐसी ! जैसे मीठे शराब के नशे की धीमी दम तोड़ती नब्ज़ उतरती उदासी । नसीब में सपना है , किताब है , सपने का सपना है .. आगे पढ़िये...
बस
एक ही ख़्याल ही उसे हमेशा रहता था कि दिन में जासूसी उपन्यास मिल जाय और रात को रम की बोतल। इन दोनों कामों के लिये उसने अपनी जवानी में पैसे कमा कर इक्कठे कर लिये थे, जिनका ख़र्च करने का पूरा हिसाब करने पर सकी 80 साल की उम्र कट रही थी। जगत को पूरा यक़ीन था कि 80 साल से ज़्यादा ज़िंदा उसे दुनिया की कोई ताक़त नहीं रख सकती। इस प्रकार लगभग उसकी ज़िंदगी में मौत व भूख का कोई ख़ौफ़ नहीं था, जो इंसानी ज़िंदगी का सबसे ख़तरनाक पहलू होता है। आगे पढ़िये...
हम जानते हैं
कि जब समाज अपनी प्रारंभिक अवस्था में था तो परिवार की शुरूआती अवधारणायें और परिणतियाँ अपने मूल व्यवहार में तमाम आडंबरों से रहित थीं। उनमें खुलापन, आजादी और यायावरी थी। सामंती समाज तक आते-आते परिवार पितृसत्तात्मक हो गया और पुष्ट हो गये सामंती समाज ने ही उस बंद, कट्टर, सुरक्षित, रागात्मक परिवार की नींव डाली जिसकी चिंता आज की जा रही है। आगे पढ़िये...
(प्रो. स्वेतिस्लाव कोस्तिच से गीता शर्मा की बातचीत)
“मगर भारत सरकार ऐसे विद्यालयों को कैसे मान्यता देती है, जिनमें बच्चों को अपनी ही मातृभाषा में बोलने की छूट न हो। उन्हें एक विदेशी भाषा बोलने के लिए मजबूर किया जाता हो। उनसे दंड भरवाया जाता हो।” आगे पढ़िये...
(हृषीकेश सुलभ से संजय कुमार की बातचीत)
लेखक
का काम सृजन करना है, अत: जाहिर है कि उसकी भूमिका रचनात्मक ही होगी। कई बार पाठक स्थितियों पर लेखक की तत्काल प्रतिक्रिया चाहते हैं, पर यह सम्भव नहीं होता। पत्रकारिता और रचनात्मक लेखन में अंतर होता है। लेखक को महीनों-सालों तक अपनी रचना के साथ उसके रचे जाने से पहले जीना भी होता है। लेखक हर प्रकार की सत्ता के सामने प्रतिपक्ष की भूमिका में होता है। वह चारण नहीं हो सकता। आगे पढ़िये...
एक बात और बताऊँ। मैंने अपना ब्लॉग भी बना लिया है। आपने देखा। नहीं देखा। क्या बोले ब्लॉग नहीं देखते। भाई साहब ऐसे कैसे चलेगा। हिंदी वालों की यही तो दिक्कत है कि वे टेक्नॉलोजी से नहीं जुड़ते हैं इसीलिए तो हम पश्चिमी देशों से पिछड़े हैं। मेरी मानिए तो आप सबसे पहले एक कंप्यूटर ले लीजिए। क्या? आपके पास कंप्यूटर है फिर भी ब्लॉग नहीं देखते। आगे पढ़िये...
ज़रा तुलना करें
, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की पत्रकार-परिषदों से ! राजीव तो नए और अनुभवरहित थे लेकिन उनमें भी लीडराना अंदाज़ पैदा हो गया था। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की गद्दी पर 6 साल से इस तरह बैठे हुए हैं, जैसे राम की खड़ाऊ रखकर भरत अयोध्या का राज चला रहे हों। शायद यही उनके चलते चले जाने का रहस्य है। आगे पढ़िये...
डॉ. चरण दास महंत के जिस कोरबा लोकसभा सीट के तहत सबसे अधिक कोयला खदानें और बिजलीघर आते हैं, उन्हीं की कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली सरकार दिल्ली में है लेकिन कालेधन की ताक़त इतनी अधिक है कि डॉ. चरण दास महंत की इस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं चलती। छत्तीसगढ़ की राजनीति से लेकर कोयले के धंधे तक के जानकार लोग यह जानते हैं कि छत्तीसगढ़ या दिल्ली में चाहे जिस पार्टी की सरकार हो, कोल माफ़िया को कोई छू नहीं सकता। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली । पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई में रविवार 23 मई के दिन हिन्दी ब्लॉगरों की एक बैठक में लगभग 40 ब्लॉगर शरीक़ हुए । बैठक के आयोजक अविनाश वाचस्पति ने कहा कि ''हिन्दी ब्लॉगिंग को उन दोषों से दूर रखने का प्रयास करेंगे जो टी वी, प्रिंट मीडिया और अन्य माध्यमों में दिखलाई दे रहे हैं। द्विअर्थी संवाद और शीर्षकों के ज़रिए सनसनी फैलाने से बचे रहेंगे। जो भाषा हम अपने लिए,अपने बच्चों के लिए चाहते हैं - वही ब्लॉग पर लिखेंगे और वही प्रयोग करेंगे। आगे पढ़िये...
पन्ना।
अखिल भारतीय बुंदेलखंड साहित्य एवं संस्कृति परिषद भोपाल की बांदा इकाई एवं भारतीय राष्ट्रीय निधि के तत्वाधान में दो दिवसीय बुंदेली साहित्य अधिवेशन का आयोजन 17 अप्रैल को बांदा एवं 18 अप्रैल को कालिंजर में हुआ। कार्यक्रम में बुंदेलखंड के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। आगे पढ़िये...
चूंकि पीटर साथ में था अत: आवश्यकता नहीं थी, फिर भी पेरिस की मेट्रो का नक़्शा व गाइड लेकर देखा तो एक बार देखने से ही पूरी पेरिस का सफर समझ में आ गया. न केवल गाइड में बहुत ही सरल तरीके से जानकारी दी गयी है, बल्कि हरेक स्टेशन पर इतने सहज दिशा संकेतक हैं कि नया व्यक्ति भी तुरंत सब कुछ समझ सके. यह सब इस्लिये कि पर्यटक यदि फ्रेंच भाषा नहीं भी जानता तो कोई दिक्कत नहीं . आगे पढ़िये...
चूंकि पीटर साथ में था अत: आवश्यकता नहीं थी, फिर भी पेरिस की मेट्रो का नक़्शा व गाइड लेकर देखा तो एक बार देखने से ही पूरी पेरिस का सफर समझ में आ गया. न केवल गाइड में बहुत ही सरल तरीके से जानकारी दी गयी है, बल्कि हरेक स्टेशन पर इतने सहज दिशा संकेतक हैं कि नया व्यक्ति भी तुरंत सब कुछ समझ सके. यह सब इस्लिये कि पर्यटक यदि फ्रेंच भाषा नहीं भी जानता तो कोई दिक्कत नहीं . आगे पढ़िये...
निविड़ की कविताओं में माँ,
बच्चे, धूप और प्रकृति बार-बार आते हैं। गाँव की मिट्टी की सोंध-सोंधी महक उनकी कविताओं में शिद्दत के साथ महसूस किया जा सकता है। शहर की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी का हिस्सा होने के बावजूद उनके भीतर एक गाँव अपनी पूरी ऊर्जा के साथ खिलखिलाता-चमकता दिखाई देता है। वे जब कहते हैं कि ‘आँखों में पानी है/दिल में है आग/खुली हवा की आवाज़ाही है/रोम-रोम खुली हैं खिड़कियाँ/बदन में मिट्टी की महक है/बाहों में आकाश का फैलाव/तो लगता है कि/अभी ज़िंदा हूँ’। आगे पढ़िये...
मांगी की ये बातें सुन कर मैं उसके भीतर छुपे उज्ज्वल इंसान के दर्शन करने की कोशिश करने लगा । मैं सोच रहा था कि परिस्थितियाँ और मजबूरियाँ इन्सान को किस क़दर बेरहम होकर बुराई की गर्त में धकेल देती है । कैसे एक सीधे-सादे-सच्चे इंसान को नकाब ओढने को बाध्य कर देती है ? भूख के थपेड़े आदमी की भावनाओं और इच्छाओं-आकांक्षाओं को किस तरह दमित और विगलित कर देते हैं ? आगे पढ़िये...
भारतेंदु हरिश्चन्द्र पुरस्कार योजना के अंतर्गत वर्ष 2009 के पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित हैं। 1 जनवरी, 2009 से 31 दिसम्बर, 2009 के दौरान निम्नलिखित विषयों पर प्रकाशित पुस्तकों/अप्रकाशित पांडुलिपियों पर पुरस्कार प्रदान किए जाएँगे आगे पढ़िये...
प्रश्न यह है कि स्वतंत्र भारत में क्या राममनोहर लोहिया जैसा कोई और नेता हुआ है? इसमें शक़ नहीं कि पिछले 63 सालों में कई बड़े नेता हुए, कुछ बड़े प्रधानमंत्री भी हुए, लेकिन लोहिया ने जैसे देश हिलाया, किसी अन्य नेता ने नहीं हिलाया। उन्हें कुल 57 साल का जीवन मिला, लेकिन इतने छोटे से जीवन में उन्होंने जितने चमत्कारी काम किए आगे पढ़िये...
आनर किलिंग की ऐसी घटनाएँ देश के अनेक भागों में होती रहती हैं। पंजाब का सिख समुदाय भी इससे अछूता नहीं है। सिखों में जाति प्रथा का खण्डन है और ऊँच-नीच की भावना का तिरस्कार किया जाता है। फिर भी सिख समाज न जाति प्रथा से मुक्त हुआ है, न ही ऊँच-नीच की भावना से। आगे पढ़िये...
सरकार के भीतर जो लोग हैं उनके बीच में राजनीतिक चेतना और सामाजिक सरोकार का खोखलापन काफ़ी अधिक है। यही हाल समाज के बाक़ी संपन्न और ताक़तवर तबक़े का है क्योंकि उसके तमाम हित दबे-कुचले और कमज़ोर तबके से दूर-दूर के हैं। ऐसे में सरकार में ऊपर बैठे कम से कम किसी एक जागरूक व्यक्ति को सरकारी मशीनरी संवेदनशील बनाना चाहिए क्योंकि हम छत्तीसगढ़ में होने वाले कार्यक्रमों की दर्जनों तस्वीरों में जब देखते हैं तो निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ सरकारी अधिकारियों का व्यवहार उस सम्मान का नहीं दिखता जो कि लोकतंत्र में होना चाहिए। आगे पढ़िये...
पटना । पटना की कला जागरण नाट्य संस्था ने मुंशी प्रेमचंद की कहानी लांछन का जीवंत प्रस्तुति 23 मई के दिन पटना के कालिदास मंच मंचन किया। चर्चित रंगकर्मी सुमन कुमार के निर्देशन में प्रस्तुत नाटक लांछन के माध्यम से एक परिवार और संबंध विच्छेद के बीच घटित घटनाओं को दिखाया गया। आगे पढ़िये...
रजनीकांत की
वाणी, उनकी शारीरिक भाषा, उनका कैमरा, उनकी लेखनी परिवर्तन दर्द और जीवन-मृत्यु को देखती है। इसलिए उनकी रचनाएं, उनके दस्तावेज, उनके फोटोग्राफ अधिक समकालीन और संवेदनाओं के पास हैं। उन्होंने ध्यानस्थ हो कर काम किया, वे शोर मचाते नहीं चले, उन्होंने अपनी कृतियां बाजार में नहीं बेंची। वे काल को लांघते हुए, भविष्य के संग्रहालयों और आगे की दुनिया के लिए काम कर रहे हैं। आगे पढ़िये...
‘स्माइल पिंकी’
सामाजिक संदेश तो देती ही है राजनीतिक संदेश भी देती है। भारत के गाँवों में आज भी ग़रीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बीमारी, स्वच्छ जल का अभाव, स्कूलों की कमी हो वहाँ ‘शाइनिंग इंडिया’ ‘भारत निर्माण’ और ‘आम आदमी’ का नारा महज छलावा भर लगता है। मूतिर्यों-पार्कों, स्मारकों और विज्ञापनों पर करोड़ों ख़र्च करने वाली सरकारें अगर इसका बहुत छोटा सा हिस्सा भी इन गाँवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेय-जल पर ख़र्च करे तो गाँवों में रहता हुआ ‘कैटल क्लास’ बेहतर जीवन बसर कर सकता है। आगे पढ़िये...
आज
की यह चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं कि चौबीसों घंटे फुँफकारते हुए रहने वाली ममता बैनर्जी जैसे लोग भी प्रधानमंत्री के तौर-तरीक़ों से शायद कोई नसीहत ले सकें, डीएमके के मंत्री ए.राजा जैसे लोग पारदर्शिता को एक कमज़ोरी मानना छोड़ सकें, शशि थरूर जैसे लोग आईपीएल जैसी भ्रष्ट धंधेबाज़ी में बेनामी भागीदारी जैसे चक्कर से बच सकें, और जयराम रमेश जैसे लोग अपनी ही सरकार को कोसना बंद कर सकें। आगे पढ़िये...
लढा की कविताओं
का मुख्य-स्त्रोत सहजता, सरलता, सौम्यता और मानवीय नैसर्गिकता है । इन कविताओं में ग्राम्य जीवन की सहजता-सरलता है, तो शहरी जीवन की ख़ुद में सिमटे रहने की तटस्थता और रचनाकार मन की ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की सदाशयी प्रतिबद्धता भी है । कवि का मन शब्द, कविता, कवि और प्रणय की गहराईयों में डूबता-उतरता रहता है । वह सागर के गोताखोर की तरह डुबकी लगाता है और जो कुछ भी उसे हाथ लगता है, हमें पकड़ाता चलता है । लढा की यही ख़ास ‘ऑरिजिनेलिटी’ है । आगे पढ़िये...
'राज' के पास मुशायरे की लाजवाब बयानात है | उसकी पेशकश सुनने के बाद लगे की "घायल" परंपरा का यह इंसान सच्चे अर्थ में ग़ज़लों का खिलाड़ी है | यही कारण से उन्हें नापना आसान नहीं | उसकी सीमाओं को भी कुछेक साक्षात्कार से नहीं जान सकते | आगे पढ़िये...
23 मई, मैंगलोर, हवाई-दुर्घटना में मृत मुसाफ़िरो को श्रृद्धांजलि आगे पढ़िये...
किसी भी लोक का इतिहास, परंपरा और संस्कृति उसकी बोली में ही सुरक्षित रहती है। हमारा देश इस दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ हज़ारों बोलियाँ बोली और समझी जाती हैं। जो लोग जिन बोलियों में अपने को व्यक्त करते हैं, उनके जीवन का उत्सव-उल्लास, उनका रस-रंग, उनके संस्कार, सुख-दुख, रहन-सहन, रीति-रिवाज, उनकी विजयगाथाएँ, उनका नेतृत्व कौशल और उनके प्रयोगधर्मी पूर्वजों द्वारा संकलित समस्त ज्ञान का भंडार उस बोली में सुरक्षित रहता है। आगे पढ़िये...
मुझे हिंदी कविता की एक कार्यशाला को देख कर.इसमें भाग लेने के लिए 882 लोगों के जवाब का अभी भी इंतज़ार था, 365 लोगों ने किसी न किसी मजबूरी के कारण भाग लेने से इनकार कर दिया था और 190 ने भाग लेने की संभावना व्यक्त की लेकिन इस सब के बावजूद 233 शायरों ने कहा के वे भाग ले रहे हैं हर हालत में. आगे पढ़िये...
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच आपदा-प्रबंधन के नाम पर बहुत सी फ़ाईलें चलती हैं और राज्यों को केंद्र सरकार प्राकृतिक विपदाओं से निबटने के लिए काफ़ी बजट भी देती है। हम ऐसे हर बड़े हादसे के बाद कुछ-कुछ महीनों में इस मुद्दे पर लिखकर सरकार को याद दिलाते हैं कि अगर तरह-तरह की मुसीबतों के मौक़ों पर निबटने के लिए सरकार एक योजना बनाकर नहीं रखेगी और उसे हफ़्ते-हफ़्ते ताज़ा नहीं करते रहेगी तो ऐसे किसी हादसे के बाद उस वक़्त के इंतज़ाम में देर होने से बहुत सी इंसानी जानें ख़त्म हो जाएँगी। आगे पढ़िये...
बुन्देली कलम अपने जीवन्त, उत्साही, गतिशील भाव को लाल, गेरुए, नीले, हरे, पीले, सिलेटी रंगों एवं वैविध्य पूर्ण विचारों एवं विश्वासों सहित आकर्षक झलक प्रस्तुत करती है, जो बुन्देली संस्कृति के विविध आयामों की व्याख्या भी करती है। यह उनके जीवन में जहाँ तक कभी-कभी सामाजिक नृतत्व शास्त्रियों के मतानुसार वैभिन्यता भी दर्शाती है। आगे पढ़िये...
अब यह साफ है
कि नक्सलवादी का मुख्य लक्ष्य केवल सत्ता हथियाना है। वे सैन्य ताकत प्राप्त कर, देश की स्थापित लोकतांत्रिक सरकार के विरूद्ध युद्ध छेडक़र देश पर काबिज होना चाहते हैं। और यह बात वे खुलेतौर पर कहते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक सत्ता पाना है और उसके लिए भारत की समस्त शक्ति को नष्ट करना चाहते हैं। आगे पढ़िये...
बाघ की कला
में अजन्ता के समान केवल धार्मिक विषय ही नहीं हैं, वरन् यहाँ पर मानवोचित भावों के चित्रण में वेगपूर्ण प्रवाह भी है। यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य ने चित्रकला में जो योगदान दिया है, उसके प्रत्यक्ष प्रमाण है यहाँ पर चित्रित विराट दृश्य। नदी, पहाड़, जंगल आदि के असीमित भू-दृश्य बड़े मनोहर हैं। आगे पढ़िये...
उन दिनों हम कुढ़ा करते थे कि और लोगों के यहाँ तो कई कई बिजली के पंखे हैं और हमारे यहाँ केवल हवा कम तथा आवाज अधिक देने वाला एक ही पंखा है और आज भी हमें कुढ़न होती है कि और लोगों के यहाँ तो एसी है और हमें अपने कूलर में बार बार पानी डालने की कवायद करना पड़ता है। उन दिनों से लेकर आज तक हम अपनी कुढ़न को सिर्फ यही कह कर दबाने की कोशिश करते हैं कि "रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चूपड़ी मत ललचाये जी"। आगे पढ़िये...
मधुर नज्मी ने ग़ज़लों
की रिवायतों का ध्यान भी रखा और उसकी शास्त्रीयता का भी। उन्होंने ग़ज़लों में प्रयोग भी किए लेकिन ग़ज़लों की सारी शर्तों का ध्यान भी ख़ूब रखा। वरना आज हिंदी में ग़ज़लों के नाम पर जिस तरह की चीज़ें कही जा रही हैं वह तुकबंदी ही ज़्यादा लगती हैं। आगे पढ़िये...
उत्तर तथा दक्षिण भाषाओं का अध्ययन विद्वानों ने प्रस्तुत किया है और उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ है कि उत्तर तथा दक्षिण की भाषाओं में समानता अधिक है । यह समानता व्याकरणिक रूपों में तथा वाक्य गठन में मिलती है । जिस नियम से हिन्दी में वाक्य संरचना की जाती है अर्थात पहले कर्त्ता फिर कर्म और अंत में क्रियापद का स्थान होता है । उसी नियम से कन्नड में भी वाक्य संरचना की जाती है । आगे पढ़िये...
संबंधों की मिठास की
ख़ुशबू के लिए स्वर्ग को खोना भी पड़ता है। बड़ों को बच्चों की गलतियों को नज़रंदाज़ भी करना पड़ता है। सभी के हिस्से आए हुए मीठे नहीं होते। धैर्य से उनके पकने का इंतज़ार करना पड़ता है। होठों पर मिठास रखनी होती है। चाहे कितना ही कड़वा घूँट पीने को मिले। जीवन में आपस की मिठास भरे जो पल जीने को मिल जाते हैं, उन्हें संजोकर रखना ही तो सुख की परिभाषा है। आगे पढ़िये...
दिल्ली के जनपथ
पर गोरी विदेशी लड़कियां जब आती हैं तो उनकी और सभी की नज़र खींच जाती हैं...कभी लिबास के कारण तो कभी इसलिए कि वो भीड़ से अलग नज़र आती हैं. इन सड़कों का भी कुछ ऐसा ही है...बला की ख़ूबसूरत हैं, कभी चिढ़ाती हैं कभी उम्मीदें जगाती हैं लेकिन अभी मिलन मुश्किल लगता है. आगे पढ़िये...
बद्री
नारायण के इस संग्रह में दलित समस्या पर कुछ ऐसी कविताएँ हैं जिन्हें किसी ग़ैरदलित साहित्यकार के यहाँ ढूँढना असंभव सा है। इतिहास पर किस तरह सत्ता का रंग चढ़ रहा है, उन्होंने किस तरह अपने यहाँ दलितों को जगह देने में धोख़ा किया है, इस पर दलित साहित्य के भीतर ही शहादत जैसी उम्दा कविता ढूँढना मुश्किल ही है। आगे पढ़िये...
यह ठीक है कि नक्सल मोर्चे पर देश को ऐसी बगावत से बचाने के लिए देश के हर नागरिक को शहादत का हौसला जुटाना चाहिए लेकिन जब नियमित रूप से सरकार को जनता से ऐसी ख़बरों की ज़रूरत हो तो उसे इसके लिए पर्याप्त भुगतान और मुआवज़े का इंतज़ाम भी करना चाहिए। आगे पढ़िये...
रेवती
पास में बैठकर सुन रही थी और दो छलांग मारकर घर के अंदर चली गई और माँ और दादी को "मैं पढूँगी, मैं पढूंगी" की ख़बर सुना दी। माँ ने कहा, "ठीक है बिटिया, तुम पढ़ोगी।" पर दादी ने कहा, "क्या पढ़ेगी रे ? औरत जात का पढ़ाई लिखाई से क्या ताल्लुक ? खाना बनाना सीख, रंगोली बनाना सीख, पीठा बनाना सीख, दही बिलोना सीख। पढ़ लिखकर क्या करेगी ?" आगे पढ़िये...
जन-गणना
में जाति का समावेश किसने किया, कब से किया, क्यों किया, क्या यह हमें पता है ? यह अँगरेज़ ने किया, 1871 में किया और इसलिए किया कि हिंदुस्तान को लगातार तोड़े रखा जा सके। 1857 की क्रांति ने भारत में जो राष्ट्रवादी एकता पैदा की थी, उसकी काट का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि भारत के लोगों को जातियों, मज़हबों और भाषाओं में बाँट दो। आगे पढ़िये...
पटना।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150वीं जन्मवार्षिकी के अवसर पर भारतीय रेल द्वारा चलायी जा रही संस्कृति यात्रा एक्सप्रेस के पटना आगमन के अवसर पर पूर्व मध्य रेल द्वारा भारतीय नृत्य कला मंदिर में आयोजित दो दिवसीय( 19-20 मई) संस्कृति एक्सप्रेस महोत्सव का उद्घाटन पूर्व मध्य रेल एवं दक्षिण पूर्व रेल के महाप्रबंध्क आदित्य प्रकाश मिश्र ने किया। आगे पढ़िये...
अरूण जेटली और भाजपा की यह बात पूरी तरह सच है कि नक्सल मोर्चे पर रमन सरकार तो पूरी तरह चिदंबरम-मनमोहन सिंह के साथ है, भाजपा पूरे देश में केंद्र सरकार के साथ है और दूसरी तरफ़ गृह मंत्री चिदंबरम अपने गठबंधन, अपनी पार्टी और अपनी सरकार के भीतर बंधे हुए हाथों से काम कर रहे हैं। आगे पढ़िये...
मिथिला और बंगाल की उपासना में भी साम्य है चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल में राधा कृष्ण की उपासना को प्रचलित किया लेकिन आधुनिक शोध के अनुसार चैतन्य महाप्रभु के पूर्वज मैथिल ही थे जिनका बंगाल में वैवाहिक संबंध हुआ स्वयं महाप्रभु विद्यापति के काव्य रसिक थे और मैथिल कवि विद्यापति ने बंगाल की वैष्णवोपासना को प्रभूत (बहुत) प्रभावित किया । आगे पढ़िये...
पोर्टब्लेयर। महान कवि रवीद्रनाथ टैगोर की 150 वीं जन्मशती पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में वर्ष भर चलने वाले भव्य समारोह का आगाज़ हुआ। अंडमान पीपुल थिएटर एसोसिएशन, आप्टा द्वारा आयोजित इस कवि गुरू नमन का उद्घाटन एम्फी थिएटर के खुले रंगमंच पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक एवं साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया। आगे पढ़िये...
विकास के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण के विनाश को अर्थव्यवस्था की अनिवार्यता मान लिया गया है । इस विभीषिका के मूल्यांकन की आवश्यकता है । विश्व के अनेक देश अपने सकल घरेलू उत्पाद में इसकी गणना करते हैं । भारत इस तरह की गणना न कर अपनी अर्थव्यवस्था को अत्यंत मजबूत बताकर सकल घरेलू वृद्धि दर में उछाल की कहानी कह रहा है । आगे पढ़िये...
इस देश और दुनिया को इस बात पर भी हैरानी हो रही होगी कि कल शाम से इन भयानक हत्याओं की ख़बर हर कहीं छा जाने के बाद भी उन मानवाधिकारवादियों के मुँह क्यों नहीं खुले, उनके ईमेल के रोज़ाना की तरह के कोई हमले क्यों शुरू नहीं हुए, टेलीफ़ोन और एसएमएस पर चलने वाला उनका अभियान चुप क्यों है, और नक्सलियों के अलावा क्या बाक़ी आम जनता के भी कोई मानवाधिकार इन मुखर आंदोलनकारियों की नज़र में हैं या नहीं? आगे पढ़िये...
वैसे तो
पांडे परिवार की संपन्नता ही गाँव के कुछ लोगों की आँखों की किरकिरी बनी हुई थी । गाँव में सफल और संपन्न जीवन जीने के लिए जो बातें आवश्यक हो गई हैं, पांडे लोग उनसे कोसों दूर थे । वे सीधी-सादी ज़िंदगी जी रहे थे । वह नहीं भाँप पाए लाला अमरनाथ श्रीवास्तव के मनोभावों को । लाला कुछ वर्षों से राजनीति में सक्रिय थे । आगे पढ़िये...
सब कुछ सब कुछ से जुड़ा है।
यही वेदों का मूल विषय है, जिसे दूसरे शब्दों में सृष्टि विद्या भी कहा जा सकता है। सृष्टि को संचालित करने वाला यह सिद्धान्त महासम्मिति का सिद्धान्त नाम से जाना जा सकता है। सृष्टि को संचालित करने वाले नियम क्या हैं और इन्हें संकेतों, प्रतीकों, रूपकों आदि की सहायता से किस तरह समझाया गया है, डॉ. सुभाष काक ने इसे ही अपनी गहन खोज के बाद रेखाँकित करने का प्रयास किया है। आगे पढ़िये...
हम सभ्यता
के विकास को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं। प्राचीनकाल आध्यात्मिक उन्नति का रहा है, मध्यकाल वैज्ञानिक उन्नति का, अब जो समय आया है वह वैज्ञानिक अध्यात्म का है। इसके समझने में आज की अत्याधुनिक मशीन कम्प्यूटर हमारी बहुत सहायता कर सकती है। इसका मनुष्य जीवन के साथ अन्यतम संबंध है। आगे पढ़िये...
इतिहास बड़ा ही निरपेक्ष और निर्मम है। इतिहास के गर्भ में यह सवाल इनके लिए सदैव जीवित रहेगा कि जब एक गीत इस लोकतंत्र के छद्म आवरण को गिरा रहा था, तब आपके टोपी-टोपी के खेल और प्रेमचंद के शतंरज के खिलाड़ियों में कितनी समानता/भिन्नता थी। आगे पढ़िये...
देश में लोकतंत्र के हित में वह यूपीए गठबंधन सरकार बेहतर थी जिसने कि वामपंथियों के बाहरी सहयोग के दबाव में चाहे मजबूरी में ही बहुत से ग़लत कामों का मोह छोड़ा और उसकी आर्थिक नीतियाँ जनहित की बनी रहीं। देश और प्रदेशों में सरकारों का एकदलीय या बहुदलीय अनुभव कोई एक नतीज़ा पेश नहीं करता है। कई जगहों पर साझा सरकारें भ्रष्टाचार पर एकाधिकार से बचती हैं और उन्हें या तो मिल बाँटकर खाना होता है या फिर भ्रष्टाचार कुछ हद तक कम करना पड़ता है। आगे पढ़िये...
वैसे तो गंगापुर
गाँव में धर्म के धंधे का भविष्य चांद जैसा उज्जवल था मगर उस चांद पर मास्टर लखीचंद को धबा समझा जाता था क्योंकि उसका दोष सिर्फ़ इतना ही था कि वो ग़लत को सही नहीं कह पाता था। लखीचंद से मेरा कोई रिश्ता नही था क्योंकि वो आस्तिक था और मैं नास्तिक। आगे पढ़िये...
हिंदी के विस्तार के इस समय में, जहां हिंदी समाचार पत्रों की पाठक संख्या, उनकी स्थिति तथा हिंदी टीवी और फिल्मों के दर्शक वर्ग की संख्या बढ़ती जा रही है वहीं समकालीन हिंदी साहित्य की स्थिति दयनीय है । यदि गिनती के कुछ कथाकारों और कवियों को छोड़ दिया जाए तो साहित्य की इस महत्वपूर्ण विधा पर लिखने वाले ज्यादातर गुटबाज और संस्थान संरक्षित लोग ही दिखाई पड़ रहे हैं। आगे पढ़िये...
रिवर से सीवर को अलग रखने की बात कही है क्योंकि देश भर में यह देखने में आया है कि कारख़ानों से निकला प्रदूषण और शहरों से निकली गंदगी ने मिलकर गंगा तक को डुबकी के लायक नहीं रख छोड़ा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में कारखानों और शहरों के बोझ से नदियों को दूर रखना चाहिए क्योंकि राजेंद्र सिंह ने ही रायपुर के बगल में खारून नदी का हाल बताया कि वहाँ जिस जगह शहरी गंदगी पानी में मिल रही है वहीं पर रसायनों की मौज़ूदगी बढ़ जाने से जलकुंभी इतनी भयानक आकार की हो गई है कि उन्होंने ऐसी विकसित जलकुम्भी कहीं और देखी नहीं थी। आगे पढ़िये...
लोगों को
बेवकूफ़ बनाने का ख़्याल स्विट्जरलैंड के व्यापारी बनार्ढ बेवर के दिमाग़ की उपज है। बेवर ने न्यू सेवन वंडर्स फ़ाउंडेशन नाम से एक संस्था बनाई और इसका प्रचार ज़ोरदार ढंग से किया कि सात जुलाई 2007 को लिस्बन में दुनिया के सात नए अजूबों का एलान किया जाएगा। बेवर ने 21 नए अजूबों का एलान किया इनमें से इंटरनेट व एसएमएस के ज़रिये वोट डाल कर सात का चुनाव करना था। आगे पढ़िये...
उपन्यासकार
का यह कथ्य संकेत अंदाज़ ही उसे अन्य रचनाकारों से अलग खड़ा कर नए पाठकीय विमर्श की माँग करता है । विशेष समस्या का विशेष ढँग से चित्रण करके कई उपन्यासकार सफल हो चुके हैं परन्तु निर्विशेष रूप से भारत की सामान्य जनता का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने के लिए यायावर को याद रखा जाएगा । आगे पढ़िये...
स्वाधीनता
संपूर्ण जीवन को अभिव्यक्ति करनेवाली बौद्धिक और संवेदनात्मक सजगता है। इस सजगता में आत्मबोध और आत्म अतिक्रमण दोनों सन्निविष्टि हैं। आज हम जिस युग-संधि में जी रहे हैं, उसमें स्वाधीनता की यह पहचान बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है। आगे पढ़िये...
केवल मैक्समूलर ही नही, बल्कि विश्व के अनेक विद्वानो ने धीरे धीरे यह मान लिया है कि संस्कृत का व्याकरण संसार की सभी भाषाओ के व्याकरण से श्रेष्ठ और त्रुटिहीन है। विश्व के इस सर्वोत्तम भाषा के महान व्याकरण की रचना पाणिनि ने की थी तथा ऐसी मान्यता है कि उन्होने भगवान शिव के डमरु से निकली ध्वनियो के आधार पर इसका निर्माण किया था। आगे पढ़िये...
एक बूढ़े
अँगरेज़ ने छोटे से कुत्ते के साथ दरवाज़ा खोला। कुत्ते ने भौंकना शुरू कर दिया। मैंने उस वृद्ध को बताया कि लगभग 30 वर्ष पहले मैं इस मकान में किरायेदार था। इस तरफ़ से गुज़र रहा था तो पुरानी याद आ गई....।" इससे पहले कि मैं आगे कुछ कहता, बूढ़े ने बड़े रूखेपन से कहना आरंभ कर दिया, "यदि तुम इस मकान को ख़रीदने के विचार से आये हो तो एक दम वापस चले जाओ। इन दीवारों में केरी और चार्ल्स की यादें बसी हुई हैं।
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अब नर्मदा संकट में है।
जगह-जगह इस पर बांध बनाए जा रहे हैं। महेद्गवर में भी बांध बन रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन लंबे अरसे से संघर्षरत है। पर्यावरणविद् व प्रखयात समाज सेविका मेधा पाटकर कहती हैं यह विकास नहीं, विनाश है। ऊर्जा के कई और विकल्प हैं, उन पर विचार करना चाहिए। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली।
जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग के दो मौजूदा प्रोफ़ेसरों और एक अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर को हिंदी अकादमी की ओर से साल 2009-10 के पुरस्कार दिए गए हैं। प्रोफ़ेसर सैयद असगर वजाहत को सर्वश्रेष्ठ नाटक सम्मान और प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह को साहित्य सम्मान दिया गया है। आगे पढ़िये...
पुस्तक
की गुणवत्ता का आकलन यह है कि उसे पढ़कर लगता है कि हम मार्क्स और मार्क्सवाद की परिधि के केन्द्र में आकर खड़े हो गये हैं, जहाँ सहजता के साथ महान विचारक और उसकी विचार धारा का सिंहावलोकन कर सकते हैं। पुस्तक के शुरूआत में विचारों की शुष्कता के बीच, मार्क्स के अंतरंग जीवन-चित्रण की विरलता अवश्य खटकती है। आगे पढ़िये...
मैं शर्मसार था । उस लड़की के दिए लड्डुओं की मिठास मुँह से मिटी भी नहीं थी और डॉ. लाल..... उन्होंने मेरे माध्यम से काम करने गए दूसरे व्यक्ति का अपमान किया था .... और इस बार एक लड़की का । मुझे ऐसा लगा कि श्रीमती आवेल ने कुछ बातें छुपायी थीं । शायद इसलिए कि वह लड़की थी । आगे पढ़िये...
अज्ञेय
ने प्रकृति को लेकर बहुत कविताएँ लिखी हैं । इसी आधार पर माना गया है कि छायावाद के अवसान के बाद प्रकृति के प्रति जो नई सौंदर्य-चेतना, एक नया राग-संबंध विकसित होता है - उसकी प्रामाणिक अभिव्यक्ति अज्ञेय की कविता में हुई है । आगे पढ़िये...
विशेषकर
जब से मैंने विष्णु खरे द्वारा अनूदित ग्युन्टर ग्रास के एक उपन्यास की हिंदी में टाँग तोड़े जाने की पोल खोली है - हिंदी में "राजभाषा भारती" में तथा अँगरेज़ी में "ट्रांसलेटिंग एलियन कल्चर्स" (निबंध संग्रह) में - तबसे मुझ पर हमले और तेज़ हो गए हैं। अभी तक बहुधा पीठ में छुरियाँ भोंकी जा रही थी, अच्छा हुआ की आप खुल कर सामने आये। सार संसार के गत अंक (अक्तूबर-दिसंबर 09) में मैंने इस पर एक सम्पादकीय लिखा था, आपकी समीक्षा शायद उसी का परिणाम है।
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आतंक के
प्रति और आतंकवाद के प्रति हमारी सोच के दायरे का सीमित होना भी आतंक को तथा आतंकवाद को बढ़ावा देता है। यह तो शब्द से ही स्पष्ट है कि आतंक को किसी सिद्धान्त, किसी विशेष महत्व की तरह से लगातार पोषित किया जाता रहे तो वह वाद का रूप लेकर आतंकवाद की स्थिति में आ जाता है। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली। जाने-माने आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी साहित्य की दुनिया में आलोचना के नाम पर वर्तमान में जो लिखा जा रहा है, वह उचित नहीं है। इसलिए भविष्य में आलोचना का स्वरुप क्या होगा, यह आने वाली पीढ़ी को तय करना है। आगे पढ़िये...
भोपाल । गजेटियर की तर्ज पर अब प्रदेश के हर जिले का साहित्यिक इतिहास भी लिखा जाएगा। संस्कृति विभाग ने इसकी तैयारियाँ शुरू कर दी है। इसके लिए साहित्यिक रचनाओं का जिलावार संकलन कर प्रकाशित किया जाएगा। इस अनूठे कार्य की जिम्मेदारी संस्कृति विभाग साहित्य अकादमी को सौंपने जा रहा है। आगे पढ़िये...
'हिन्द स्वराज'
की रचना के बाद लगभग सौ वर्ष बीतने को हैं। जो सवाल 'सभ्यता के सन्दर्भ’ में तब उठाये गये थे, वे आज उससे कहीं ज़्यादा शिद्दत से महसूस किये जा रहे हैं। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में ही गाँधी ने देख लिया था कि यह 'आधुनिक सभ्यता’ व्यक्ति के व्यक्तित्व को ही खा रही है। वह सब कुछ के त्याग पर बस प्रदर्शन और भोग का हा चिन्तन करता है। आगे पढ़िये...
मंजु अरुण
का नाम साहित्य में बहुत परिचित नहीं है। हालाँकि उनकी रचनाएँ समय-समय पर देश के प्रतिष्ठति पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं लेकिन बावजूद इसके ताउम्र उन्होंने कभी इसका प्रचार नहीं किया। यहाँ तक कि अपने जीवनकाल में पुस्तक के प्रकाशन पर भी उन्होंने विचार नहीं किया। उनके निधन के तीन साल बाद उनकी पहली और शायद अंतिम पुस्तक उनके साथियों-मित्रों ने परिवारवालों के साथ मिल कर प्रकाशित किया है। आगे पढ़िये...
दिल्ली । प्रवासी भारतीय समाज की ओर से पिछले दिनों त्रिवेणी सभागार, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में हिन्दी के वरिष्ठ कवि और जापान की तोक्यो यूनिवर्सिटी आफ़ फ़ारेन स्टडीज में कार्यरत प्रोफ़ेसर सुरेश ऋतुपर्ण के षष्ठिपूर्ति समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में अपने विचार प्रकट करते हुए भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के महानिदेशक श्री वीरेंद्र गुप्त ने कहा- 'डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण ने सन 1988-1992 के मध्य त्रिनीडाड में हिन्दी के प्रचार-प्रसार व शिक्षण के सन्दर्भ में जो कार्य किया वह मात्र भारतीय हाईकमीशन या वहाँ के विश्वविद्यालय तक ही सीमित न था वरन उन्होंने उसे विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर पूरे देश में फैलाया। आगे पढ़िये...
समाज में
कलाओं का विकास मनुष्य समाज के यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिये, उसे उच्च मानसिक धरातल पर ले जाने के लिए, उसकी संवेदना और विचारों को मूर्त रूप देने के लिये, उसके संघर्ष और स्वप्न को विरासत के रूप में अगली पीढ़ी को सौंपने के लिये होता है, किन्तु पूंजीवादी समाज में प्रतिक्रियावादी ताक़तें, उसे मनोरंजन या व्यवसाय का साधन बना देती हैं। आगे पढ़िये...
यह
कितनी अद्भूत बात है ! हम प्रतिदिन नियत समय पर किसी मार्ग से निकलते रहें, तब कोई दूसरी व्यक्ति भी हमारी तरह नियमित निकले तो क्या होगा? दिन-प्रतिदिन के इस क्रम के बाद हमारे शरीर से वाईब्रेशन निकलेंगे । जो उनके शरीर को कभी न कभी तो छुएगा ही ! बस यही वाईब्रेशन के कारण दो दिलों के तार जुड़ जातें है । अकारण ही दोनों में प्रसन्नता होगी । आगे पढ़िये...
भारतीय लोकतंत्र को हाँकने वाले जो ताकतवर चाबुकबाज़ हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि सबसे ग़रीब के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और बेजुबान जब बोलता है तो हाथों से बोलता है। यही वजह है कि आज नक्सल हिंसा कम होते नहीं दिख रही है और देश के सरकारी-कारोबारी तबक़े के तौर-तरीक़े अगर नहीं बदले तो वह कम होगी भी नहीं। आगे पढ़िये...
यदि मराठी जन चाहते हैं कि वहां की आबोहवा, मिट्टीपानी से जीवन का पोषण पानेवाले मराठी से प्रेम करें तो इस आग्रह में बुरा क्या है ? कभी हिंदी पट्टी में भी ऐसा उग्र आंदोलन चला था। आखिर बिहार (तब झारखंड के साथ) के सिंद्री में रहीं मीनाक्षी शेषाद्री और जमशेदपुर में रहे माधवन ने हिंदी सीखी या नहीं ? आखिर जमशेदपुर में रहनेवाले सी भास्कर राव और धनबाद में रहे बी जगदीश राव की हिंदी इतनी अच्छी क्यों हुई ? आगे पढ़िये...
शमशेर का
तीसरा कविता-संग्रह `चुका भी हूँ नहीं मैं´ यद्यपि सन 1637-38 तक की कविताओं को अपने में समेटे हुए है; तथापि उसकी कुछ रचनाएँ नये काव्य का बोध सम्यक् रीति से कराती हैं। कवि अपनी रचनाओं की प्रेषणीयता के प्रति जागरूक अवश्य है, पर लगता है उसके कार्यन्वयन में वह अपने को विवश महसूस करता रहा है। आगे पढ़िये...
बौद्ध ग्रन्थों में बुद्ध
को जिन उपाधियों से अभिषिक्त किया है उनमें दो विशेष रूप से आकर्षित करती हैं । वे हैं महाधीवर और महाभिषज् । विश्व दुखी है, सृष्टि बीमार है, सभी कामना के ज्वर से पीड़ित हैं, अतः भगवान् का अवतरण भिषज् या वैद्यरूप में हुआ है। “दुःख का करके सत्यनिदान, प्राणियों का करने उद्धार”! यही तथागत के आरण्यक-संवाद का उद्देश्य है । आगे पढ़िये...
सूरत ।
समकालीन गुजराती भाषा के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर गौरांग ठाकर के दूसरे ग़ज़ल संग्रह "वहाल वावी जोईए" का लोकार्पण 9 मई, 2010 को सूरत में हुआ । लोकार्पण गुजराती साहित्य परिषद् के अध्यक्ष भगवतीकुमार शर्मा ने किया । इस अवसर पर ‘साहित्य संगम’ के प्रणेता नानूभाई नायक, सूरत के साहित्यकारगण यथा रईश मणियार, रवींद्र पारेख, किरणकुमार चौहान और सुरेंद्रनगर से पंकज त्रिवेदी और बी. के. राठोड उपस्थित थे । आगे पढ़िये...
सास
का सहयोगात्मक रवैया देखकर चेतना निश्चिन्त हो गई थी। इधर आकाश भी बीच-बीच में बच्ची की देखभाल कर लेता था। दिन में जब आकाश आफ़िस चले जाता था। और उस की सास घर के कामकाज में व्यस्त हो जाती थी। तब वह अपनी बेटी को गले लगाकर ख़ूब लाड-प्यार करती थी। अपनी बेटी के साथ खेलने मे उसे ख़ूब आनंद आता था। बीच-बीच में उस की सास उसकी देखभाल कर जाती थी। आगे पढ़िये...
चाहे यह कांग्रेसी नेताओं की मनमानी हो या फिर कांग्रेस पार्टी के भीतर की राजनीति का हिस्सा हो, कांग्रेस जनता के बीच मखौल का सामान बनती चली जा रही है। सोनिया गांधी के पार्टी पर जिस काबू की जनधारणा बनी हुई थी वह भी इससे कमज़ोर हो रही है। आज जब न पार्टी के भीतर कोई चुनाव है, न पार्टी देश में कोई बड़ी चुनौती झेल रही है, उस वक़्त पार्टी के नेता और मंत्री गुटबाज़ी और आपसी हमलों में अगर जुटे हुए हैं तो यह या तो एक कमज़ोर हाईकमान का संकेत है या फिर हाईकमान की मूक सहमति इसके पीछे है। आगे पढ़िये...
इतने
लोकप्रिय और महत्वपूर्ण रचनाकार को जब १९९५ में नोबल पुरस्कार दिया गया तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि वे इसके सच्चे हकदार थे। नोबल पुरस्कार देते हुए उनकी प्रशस्ति में कहा गया कि उनका काम गीतात्मक सौंदर्य और उच्च नैतिक मूल्यों की गहराई से लबरेज है, जो रोजमर्रा की जिंदगी के अचरजों और जीवित इतिहास को शक्ति प्रदान करता है। आगे पढ़िये...
मोती लाल नेहरू
पहले बालक थे जिनके लिए इलाहाबाद में उस समय साइकिल ख़रीदा गया था। उनका पालन पोषण भी पाश्चात्य ढँग से हुआ था और बाद में उन्होंने अपने बेटे जवाहर लाल नेहरू और दोनों बेटियों विजय लक्ष्मी और कृष्णा की परिवरिश अँगरेज़ी ढंग के परिवेश में विदेशी गवर्नस द्वारा हुई। उनका निवास स्थान ऐसी पार्टियों का केन्द्र था जहाँ अँगरेज़ अफसर अक्सर आया जाया करते थे। उनके घर का पूरा वातावरण अँग्रेज़ियत से भरा हुआ था। आगे पढ़िये...
नार्थ कैरोलाईना । प्रतिष्ठित पत्रकार, कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार डॉ सुधा ओम ढींगरा का काव्य संग्रह 'धूप से रूठी चांदनी' का विमोचन समारोह अमेरिका और भारत में एक साथ हुआ। अमेरिका में हिन्दू भवन (मौरिसविल, नॉर्थ कैरोलाईना) के सांस्कृतिक भवन में हिंदी विकास मंडल और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की नॉर्थ कैरोलाईना शाखा के तत्वावधान में संपन्न हुआ। हिंदी विकास मंडल के संरक्षक गंगाधर शर्मा ने ज्योति प्रज्जवलित कर कार्यक्रम को आरंभ किया। आगे पढ़िये...
आज सोचता हूँ कि उनसे लड़ लूँ। कहाँ दिन का उजाला, कौशल्या का राजभवन, दास दासियों, अनुचरों और वैद्यों की भींड़ और कहाँ भादो के कृष्ण पक्ष के अन्धकार में जेल में बन्द माँ, कोई अनुचर आगे पीछे नहीं ! अंतर क्यों नहीं? होंगे राम कृष्ण एक लेकिन माताएँ? पिताजी उनमें कोई समानता नहीं ! आगे पढ़िये...
कोलकाता।
आल इंडिया कौमी एकता मंच की ओर से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को कौमी एकता सम्मान प्रदान किया गया। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आलोचक व भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.विजय बहादुर सिंह एवं उर्दू साहित्य में योगदान के लिए शायर मुनव्वर राना को सम्मानित किया गया। आगे पढ़िये...
शांतिनिकेतन।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में रविवार से विश्वभारती विश्वविद्यालय में रंगारंग कार्यक्रमों की शुरुआत हुई, जिसमें देश-विदेश से सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया। ज्ञातव्य हो कि विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 1921 में गुरुदेव ने की थी। आगे पढ़िये...
उच्च
जातियों की प्रभुता के जो मूलाधार थे, उन सबको संतों ने सिरे से ख़ारिज़ कर दिया। यहाँ तक कि उन्होंने भगवान को भी बाहर की दुनिया से भीतर घसीट लिया। उन्होंने कहा कि भगवान हर आदमी के ह्रदय में है और अगर तुम आदमी को सम्मान नहीं देते तो भगवान को भी सम्मान नहीं देते। आगे पढ़िये...
राज्यपाल को हटाना अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ख़ासा मुश्किल होगा इससे एक तरफ़ तो राजनीतिक तंग नज़रिए से राज्यपालों को बर्ख़ास्त करना रूकेगा लेकिन दूसरी तरफ़ जो राज्यपाल भ्रष्ट, मक्कार, बेईमान या औरतखोर हैं उन्हें हटाना भी मुश्किल हो जाएगा क्योंकि इन बातों को अदालत की तसल्ली की हद तक स्थापित करना आसान काम नहीं रहेगा। आगे पढ़िये...
पवन
करण की ये कवितायें समाज, राजनीति, धर्म, और प्रेम सहित समाज के तमाम कोनों में झाँकती हैं। इस प्रक्रिया में उन्हें दृष्टि अक्सर विचार से अधिक संवेदना से मिलती है। यही उनकी सीमा भी है और ताक़त भी। आगे पढ़िये...
मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2100 इलेक्ट्रानिक जर्नलों और 51 हज़ार इलेक्ट्रानिक किताबों को छात्रों को नि:शुल्क आनलाइन उपलब्ध कराने का फ़ैसला ठंडी हवा के झोंके की तरह है। ये किताबें इलेक्ट्रानिक फ़ारमेट में नेशनल लाइब्रेरी एँड इनफारमेशन सर्विसेज के सर्वर में रहेंगीं। जिसके जरिए छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं के इनका एक्सेस मिलेगा। ज़ाहिर तौर पर यह योजना सूचना प्रौद्योगिकी का एक सही दिशा में किया गया इस्तेमाल है और छात्रों को इससे बहुत सुविधा होगी। आगे पढ़िये...
रवीन्द्रनाथ टैगोर
के चित्रों में भौतिकता और ऐंद्रियता की विशिष्टताएं अमूर्त सौंदर्य के उन्हीं साहित्यिक सूत्रों के अधीन हैं जो स्वयं उनके काव्य को मनोरमता और भव्यता की कल्पनाओं से परिपुष्ट करती हैं। आगे पढ़िये...
बाबू चंडीप्रसाद
ने अपने शब्दकोश की चर्चा करते हुए यह भी लिखा था कि मानवजाति के उपयोग में आने वाले सारे ही शब्द पिछली एक शताब्दी से झूठ की लंबी खूँटी पर उलटे लटके हुए थे, जैसे आपने देखा होगा कि पुराने घरों में चिमगादड़ें उलटी लटकी रहती हैं। मैंने और कुछ नहीं किया, बस शब्दों के अर्थों को उनकी खूँटियों पर सीधा लटका दिया है। चंडीप्रसाद ने यह भी लिखा है कि झूठ को एकदम सच की तरह बोलने की प्रयोगात्मक कला, जो वर्तमान आदमी की अद्भुत विशेषता बन गई है, गहरी शोध और अनुसंधान का विषय है। अगर यह अनुसंधान न किया गया तो शब्दों के असली अर्थ इसी तरह दिवंगत हो जाएँगे, जिस तरह मृत आदमी की आत्मा दिवंगत हो जाती है। आगे पढ़िये...
हमारा मानना है कि सांसदों को किसी तरह अपनी मर्जी से कोई धन या बजट आबंटन करने का हक़ नहीं मिलना चाहिए। लोकतंत्र की मूल भावना बहुत साफ़ है, उसमें संसदीय व्यवस्था के तहत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के काम अलग-अलग बँटे हुए हैं। सांसदों और विधायकों का काम संसद और विधानसभा में क़ानून बनाना है या मौजूदा क़ानूनों में संशोधन करना है। हमारा मानना है कि लोकतंत्र में अधिकारों का ऐसा दुहराव ठीक नहीं है और न ही किसी के विवेक पर इस तरह से रकम बाँटने का हक़ छोड़ देना ठीक है। लेकिन कल की दूसरी ख़बर से हम सहमत हैं। सांसदों का वेतन अगर एकमुश्त पाँच गुना भी कर दिया जाता है तो वह न्यायसंगत और तर्कसंगत होगा। आगे पढ़िये...
हलधर
बाजपेई चन्द्रशेखर आज़ाद और भगतसिंह के साथियों में थे और आज़ाद के बाद वह दूसरे क्रान्तिकारी थे जो दोनों हाथों से एक साथ पिस्तौल से दुश्मन पर गोलियाँ दागते थे । तो क्या तीसरी लड़ाई की शुरूआत नक्सलवादियों ने कर दी है । शायद यह बात सही नहीं है अन्यथा नक्सलवाद के पुरोधा कानु सान्याल को उनके दिग्भ्रमित होने की बात न कहनी पड़ती ।
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पाश की हत्या 1988 में कर दी गई।
वे अपनी कविता में जिन सवालों को उठा रहे थे, उनके कारण खालिस्तानी उग्रवादिओं की दिक्कतें बढ़ रही थी। उनकी हत्या के बाद 22 वर्ष गुज़र गए, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी जीवित हैं। वे केवल जीवित ही नहीं हैं, अगर उन्हें ठीक से पढ़ा जाए, तो उनमें उठाए गए सवाल माओवादी उग्रवादियों को भी दिक्कत में डाल सकते हैं।
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जिस देश में ’मेटशीप’ (दोस्ती) की अवधारणा में स्त्रियाँ तक शामिल न हों वह देश स्त्रियों को मताधिकार देने की पहल में अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर खड़ा हो जाय तथा जिस देश में लेबर या लिबरल सरकारों द्वारा 1975 तक “श्वेत ऑस्ट्रेलिया” की नीति चलाई हो किन्तु समाज में समानता के ऐसे आग्रह पैदा हो जायँ उसे कीचड़ से कमल खिलने की ही उपमा दी जा सकती है आगे पढ़िये...
बरसों पहले सुनी मौसी की चीखें । ऐसे ही एक बार मेरी इकलौती तोश मौसी अपनी बड़ी बहनजी के कलेजे में दुबक कर चिंघाड़ कर रोयी थीं जैसे घर में कोई मौत हो गई हो । उस दिन उन चीखों ने मुझे दहला दिया था। तब भी । और आज भी उन्हें याद करके, सीने में कुछ नसें सिकुड़ने सी लगती हैं ।
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बस्तर
के आदिवासियों पर केन्द्रित कविताओं का एक संग्रह ''उदास गीत नहीं हैं उनके पास'' जब छप कर आया तो इस पर एक बड़ी गोष्ठी भोपाल में हुई थी। इस गोष्ठी में आलेख पढ़ने के लिए उन्होंने मुझे बुलवाया था। इस संग्रह को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिये। एक संवेदनशील कवि जनजातियों की संस्कृति को किस तरह हृदयंगम करता है, इस संग्रह की कविताओं से पता चलता है।
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आस्था
और श्रद्धा के कुंभ में हमने अपने पाप के घड़े और घर को भरा। अपने चुनाव क्षेत्र में हमने मोटर साइकिलें बंटवाई। सरकारी ज़मीनों की औनेपौने दामों में ख़रीद-बिक्री करके अपने लड़के-बच्चों को विदेश पढ़ने के लिए भेजा। जिससे कि वे समाज में सिर उठाकर चल सकें। शराब के ठेकेदारों को नियम विरुद्ध जाकर लाइसेंस दिलवाये। रहवासी क्षेत्रों में उनकी दुकानें खुलवाईं। रामनाम की मदिरा के साथ असली मदिरा का भी हमने घरोंघर इंतजाम किया।
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भोपाल।
हिन्दी के चर्चित व्यंग्यकार और मप्र कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जब्बार ढाकवाला और उनकी पत्नी तरन्नुम का शुक्रवार को उत्तराखंड के पास सड़क हादसे में निधन हो गया। श्री ढाकवाला उत्तर काशी से चंबा की ओर लौट रहे थे, इसी बीच अपराह्न् साढ़े चार बजे उनकी कार गहरी खाई में गिर गई आगे पढ़िये...
दिल्ली । लघुकथाकारों को उचित मंच एवं मान देने के क्रम में हम सब साथ साथ द्वारा अनुमानतः अक्तूबर, 2010 में सहभागिता के आधार पर अ. भा. लघुकथा सम्मेलन व सम्मान समारोह का आयोजन प्रस्तावित है। इसमें ऐसे सभी लघुकथाकार शामिल हो सकेंगे जिनकी कम से कम 10 श्रेष्ठ/सराहनीय लघुकथाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हों। यदि किसी लघुकथाकार की पुस्तक भी प्रकाशित हुई होगी तो सम्मान हेतु उसे वरीयता दी जाएगी। आगे पढ़िये...
हैदराबाद । 6 मई को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के राजभाषा प्रभाग के तत्वावधान में आयकर निदेशालय के अंतर्गत देश भर में कार्यरत हिंदी अनुवादकों के लिए 'आयकर शिखर' में त्रिदिवसीय अखिल भारतीय सेमिनार संपन्न हुआ । दूसरे दिन विशेष वक्ता के रूप में पधारे प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने ''ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में हिंदी की भूमिका'' पर व्याख्यान दिया। आगे पढ़िये...
पुस्तक को
विभिन्न खंडों में बाँटा गया है और हर खंड में दुर्लभ तस्वीरें हैं। विश्वजीत राय चौधरी प्रकृति के बेहतरीन चितेरों में से एक हैं। पुस्तक में उनके लैंस की कलाकारी बिखरी पड़ी हैं। कुछ फ़ोटोग्राफ़ तो लाजवाब हैं। लेकिन प्रकृति के साथ-साथ खींची गई इंसानों की तस्वीरें भी शानदार हैं। एक झोपड़ी के बाहर बूढ़ी औरत को सिंदुर लगाते हुए देखना किसी कविता से कम नहीं है। आगे पढ़िये...
खंडवा जैसे छोटे से शहर में भी हजार से ज्यादा लोग अपनी बेघर जिंदगियां बिता रहे हैं. इसमें बड़े, बच्चे, बूढ़े , महिलाएं सभी शामिल हैं. एक तरफ रोजी रोटी का संघर्ष है तो दूसरी तरफ इससे भी बड़ी जंग है अपने सर छिपाने की. ठण्ड में ठिठुरकर मरना, लावारिस लाश बनना, परिचय के अभाव में चोर, डकैत और देशद्रोही करार दिया जाना या इनकी जिंदगी की रोजमर्रा कहानी है. महिलाओं और बच्चों की परेशानियाँ तो अनगिनित है. विविध प्रकार से शोषण सहते हुए ये जिन्दा लाश बन जाते हैं. सोनू (१६ वर्ष), रवि (१८ वर्ष), भोला (१२ वर्ष) और गोलू (१७ वर्ष) पिछले कई सालों से रेलवे दुर्घटनाओं में कटी लावारिस लाशों को ढोने का काम कर रहे हैं। आगे पढ़िये...
आज हक़ीक़त में हो यह रहा है कि राजा जैसे लोग या मायावती जैसे लोग या दलित आदिवासी तबक़े के आलाअफ़सरों की औलादें हर आरक्षित कुर्सी पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी क़ाबिज़ हुए जा रहे हैं और अगर यह देखा जाए कि आरक्षण का लाभ पाकर मज़बूत हो जाने वाली पहली पीढ़ी के बाद उनकी आल-औलादें किस तरह फिर आरक्षण की क़तार में सभी कमज़ोरों को धकेलकर सबसे आगे खड़ी रहती हैं तो समझ आएगा कि कमज़ोर तबक़ों के असल कमजोरों के साथ किस तरह बेईमानी हो रही है। आगे पढ़िये...
संयुक्त राष्ट्र की पहली ‘स्टेट ऑफ़ द वर्ल्ड्स इंडीजीनस पीपुल्स’ रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि दुनियाभर में छह से सात हज़ार तक भाषाएँ बोली जाती हैं, इनमें से बहुत सी भाषाओं पर लुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से अधिकतर भाषाएँ बहुत कम लोग बोलते हैं, जबकि बहुत थोड़ी सी भाषाएँ बहुत सारे लोगों द्वारा बोली जाती हैं। सभी मौज़ूदा भाषाओं में से लगभग 90 फीसदी अगले 100 सालों में लुप्त हो सकती हैं, क्योंकि दुनिया की लगभग 97 फ़ीसदी आबादी इनमें से सिर्फ़ चार फ़ीसदी भाषाएँ बोलती हैं। आगे पढ़िये...
मगर
अरुणाभ के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। भीतर ही भीतर दिव्येन्दु के इस तरह के व्यवहार से वह अपने आपको बहुत दुखी तथा अपमानित अनुभव कर रहा था। तब भी अपने क्रोध पर नियंत्रण करके एक अपराधी की तरह अपने कागज़-पत्र उठाकर ड्राइंग रुम के खटिया पर जाकर अपनी कहानी लिखना शुरू किया। मगर आंतरिक अंतर्वेदना ने उसको अस्थिर कर दिया था। तुरंत वह छत के ऊपर जाकर टहलने लगा। मन ही मन दिव्येन्दु के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का संकल्प लेते हुए आकाश की तरफ़ देखने लगा। लेकिन जब वह अपने कमरे में लौटा तो उसने देखा दिव्येन्दु सो चुका था। आगे पढ़िये...
बारिश के
थमते ही मैं अपनी खिडक़ी में जाकर खड़ा हो गया। सामने देखता हूँ कि मीतू भी खड़ी बच्चों के खेल को देखकर अपनी बीती बातें याद कर रही थी। शायद वह भी बड़ी देर से खड़ी होगी पर मुझे तो वह बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ी शायद तेज़ बारिश व कुहरे के कारण ये संभव हो सकता है। कुहरा छँट चुका था उसने मेरी ओर देखा मैंने उसकी ओर देखा। उसने घरौंदे बनाते हुए बच्चों की ओर इशारा करते हुए इंगित किया कि हम भी कभी ऐसे ही घरौंदे बनाया करते थे। आगे पढ़िये...
दोस्तों के
सामने वह सीना तानकर असर कह उठता था ‘यू नो! सक्सेना का मतलब है सक्सेस....ऑनली सक्सेस ....नथिंग एल्स....अंडरस्टेंड!’ अपने आख़िरी शब्दों पर वह कुछ ज़्यादा ही ज़ोर देता था। दोस्त उसकी बात पर विश्वास कर लेते थे। न करने का कोई कारण भी नहीं था। अपना उदाहरण वह स्वयं ही होता। सफलता के साक्षात प्रतीक-सा। आगे पढ़िये...
यों देखा जाए
तो नेपाली कथा-साहित्य को तीन कालखंडों में बाँटा गया है। वे हैं - 1. आरंभिक काल (1770-1900) 2. माध्यमिक काल (1901-1934) 3. आधुनिक काल (1935 - आजतक)। तीन कालखंडों में से आधुनिक काल में ही लघुकथा की परंपरा शुरू हुई। 1935 से 1962 तक के 'यथार्थवादी युग' में लघुकथा का प्रारूप क्षीणकाय रूप में ही दिखाई दिया। आगे पढ़िये...
कोई
भी ऐतिहासिक निर्णय अनिवार्य नहीं होता। यदि बाद की पीढ़ियों को लगे कि किसी निर्णय से उनका विकास अवरुद्ध हो रहा है अथवा कोई निर्णय गलत कारणों से या गलत पक्षों के फायदे के लिए लिया गया था, तो उसे पलटना जरूरी होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है प्रथम महायुद्ध के दौरान जर्मनी के गलत विभाजन के बाद पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण। इसका एक अन्य उदाहरण है समस्त यूरोप का एकीकरण, जिसकी प्रक्रिया अभी भी चल रही है। आगे पढ़िये...
यह विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम आधारित हिन्दी सॉफ़्ट्वेयर उपकरण है, इसकी विशेषता यह है कि यह यूनिकोड आधारित है और इसे ऑफ़लाइन उपयोग करने की दृष्टि से तैयार किया गया है। यह दोनों अवस्थाओं अर्थात् हिन्दी से अँगरेज़ी व अँगरेज़ी से हिन्दी में कार्य करने में पूर्ण सक्षम हैं, तथा खोजे जा रहे अँगरेज़ी या हिन्दी शब्द के अर्थ के अलावा अन्य समानार्थी शब्द भी उच्चारण सहित तुरन्त दिखाता है व एक समान्तर कोश यानी 'थिसारस' की तरह भी उपयोगी है। आगे पढ़िये...
स्याह
रात में जब किसी पहाड़ से दिल पर उतर जाने वाली आवाज़ सुनाई दे और अचानक यह लगने लगे कि आसपास शहद टपकने की घटना होने लगी है तब समझिए कि कोई माँ अपने जिद्दी लाड़ले को सुलाने के लिए लालाजी का ही क़िस्सा गुनगुना रही है। गोली और बारूद की गंध के बीच लालाजी की एक कथा उदास माँ के चेहरे पर मुस्कुराहट ले आती है, और बच्चा तो उस दुनिया में पहुँच ही जाता है जहाँ टूथपेस्टों में घुसकर बाज़ार नहीं पहुँचता। आगे पढ़िये...
दरअसल,
मैं अपने बॉयफ़्रेड को ‘आप’, ‘सुनिये’, ‘जी’ जैसे पतिनुमा संबोधनों से संबोधित करती हूँ और सहेलियों के बीच बॉयफ़्रेड का ज़िक्र ‘वे ऐसे’, ‘वे वैसे’ वाले अदब-अंदाज़ में ही करती हूँ क्योंकि मेरे कॉलेज़ में लडकियाँ अपने प्रेमियों से इसी तरह मुख़ातिब हुआ करती हैं। गोया पत्नी होने का एक रत्ती सुख लड़कियों को इन संबोधनों में ही मिल जाता है। दूसरा फ़ायदा ये कि पत्नीनुमा फ़िक्र-इज़्ज़्त के सामने प्रेमी ऐसी भारी अनुभूति और विकट दायित्वबोध से दब जाता है कि नर्म लता-सी प्रेमिका के सहारे के लिए दृढ़ युवा पेड़ बन खड़ा हो जाता है। ......हॉस्टल में रहने वाली कई लड़कियाँ तो इन्हीं सहूलियतों के लिए प्यार में पड़ती हैं गोकि वे सब-की-सब एक जैसी नहीं होतीं। ......गणित, विज्ञान और कामर्स के बड़े कठिन सवाल सरल करने वाली लड़कियाँ प्यार के सरलतम प्रश्न को भूलभुलैया बना देती हैं। आगे पढ़िये...
चंडीगढ़।
पंजाबी साहित्य अकादमी के दो साल के लिए हुए चुनाव में प्रो गुरभजन गिल प्रधान और सुखदेव सिंग सिरसा जर्नल सेक्रेटरी चुने गए। प्रो. गिल ने बजुर्ग साहित्कार डॉ. एस तरसेम को 225 वोटों के बड़े फ़र्क़ से हराया जबकि जर्नल सेक्रेटरी के लिए डॉ. सिरसा ने इंजीनियर जसवंत सिंग झफर को सिर्फ़ 14 वोटो के फ़र्क से हराया । आगे पढ़िये...
कोई
भी ऐतिहासिक निर्णय अनिवार्य नहीं होता। यदि बाद की पीढ़ियों को लगे कि किसी निर्णय से उनका विकास अवरुद्ध हो रहा है अथवा कोई निर्णय गलत कारणों से या गलत पक्षों के फायदे के लिए लिया गया था, तो उसे पलटना जरूरी होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है प्रथम महायुद्ध के दौरान जर्मनी के गलत विभाजन के बाद पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण। इसका एक अन्य उदाहरण है समस्त यूरोप का एकीकरण, जिसकी प्रक्रिया अभी भी चल रही है। आगे पढ़िये...
टोरन्टो ।
24, अप्रैल 2010 को कथाकार तेजेन्द्र शर्मा के कैनेडा आने पर हिन्दी साहित्य सभा, टोरोंटो ने हिन्दी राइटर्स गिल्ड के सहयोग से ब्रैम्पटन लाइब्रेरी की फ़ोर कॉरनर्ज़ शाखा के सभागार में काव्य सम्मेलन का आयोजन किया। । कवि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिका दीप्ति अचला कुमार ने की। आगे पढ़िये...
शीला दीक्षित
ने प्रवासियों के लिए अपनी परिभाषा तय की है। देश के दूसरे हिस्से से आने वाले प्रवासियों को शीला दीक्षित बाहर निकालने पर तुलीं हैं और विदेशों में रह रहे प्रवासियों को आदर-सत्कार देकर दिल्ली में बुलाया-बसाया जा रहा है। वाह रे सरकार और सरकार का पैमाना।
प्रवासियों पर उनके बयान के बाद जो व्यक्ति सबसे ज़्यादा ख़ुश हुआ था, उस व्यक्ति का नाम था बाल ठाकरे। आगे पढ़िये...
अगर किसी को कविता पसंद नहीं आती वो अपनी सीट बदल लेता है या अगले स्टेशन पर उतर जाता है। तो भाई मुझे तो यही मंच अच्छा लगता है। मैं सुनकर ख़ुश हो गया कि चलो बिना दवाई के कवि महोदय की तबियत ठीक हो गई और इन्होने कविता पाठ के लिए इतना बड़ा मंच भी तलाश कर लिया। मैंने कहा "बाबा आपने तो बहुत बढ़िया काम किया है।
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यह कैसा सुखद संयोग है !
मैक डोनाल्ड के प्रदेश में भारतीय शास्त्रीय संगीत कहाँ से आन पडा ? यही सोचती रही .... जिसने मेरा ध्यान खींच लिया था, वह नाम था - उस्ताद अली अकबर ख़ान सा'ब का ! जो मन में ना जाने कितनी संगीतमय सुरीली यादें सरोद के तारों की खनकार की तरह जागा गया ।
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गुडगाँव । विगत दिनों साहित्यिक व सांकृतिक संस्था ‘हम कलम’ की मासिक गोष्ठी में ‘कहानी के विकास’ पर सारगर्भित विमर्श किया गया । गोष्ठी की अध्यक्षता साहित्यकार शेरजंग गर्ग ने की । कपूरथला से पधारीं आभा कुलश्रेष्ठ ने अपनी लघुकथा का पाठ किया, जिस पर उपस्थित साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार रखे ।
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एक
दिन उनकी स्थिति विशेष गंभीर हो गयी। वह कोमा की स्थिति में थे। वह कठिनाई से साँस ले पा रहे थे और उनमें साइनोसिस (Cyanosis) और फेफड़ों में सूजन के संकेत थे। पाँच डॉक्टरों ने विचार-विमर्श के बाद उनकी स्थिति को वास्तव में निराशाजनक पाया था। हमने मान लिया कि मृत्यु की वेदना किसी भी क्षण प्रारम्भ होने वाली थी।
और इस संकटकाल में यह अफवाह उड़ा दी गई थी कि न्यायिक कार्यालय से एक प्रतिनिधि निकट के क़स्बा मिस्खोर में इस निर्देश के साथ अड्डा जमाकर बैठा था कि तोल्स्तोय की मृत्यु के तुरंत बाद वह उनके सभी कागज़ात अपने कब्जे में ले ले
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ग़रीबी और अमीरी के बीच का यह फ़र्क़ देश की उदार और मुक्त अर्थव्यवस्था के चलते हुए कम नहीं होने जा रहा। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सबसे ग़रीब तबक़े के लिए अनाज में एक अभूतपूर्व रियायत से ग़रीबी की रेखा के नीचे वाले लोगों के बीच कुपोषण कुछ कम होने जा रहा है। लेकिन जब देश में ग़रीबी की रेखा के नए पैमाने तय हो रहे हैं तो आज इस रेखा से कुछ ऊपर भी जो लोग हैं वे भी इसके नीचे आ जाएँगे क्योंकि देश के आर्थिक विकास के साथ-साथ इसके इस विशाल ग़रीब तबक़े का विकास भी ज़रूरी समझा जा रहा है। आगे पढ़िये...
जापानी
दंतकथाओं के अनुसार, हज़ारों वर्ष पहले एक देवी ने जापान के दो प्रमुख पर्वतों से धरा पर अवतरित होने की अपनी इच्छा प्रकट की । सर्वोच्च शिखर वाले फूजी पर्वत ने देवी के आशीर्वाद की कोई ज़रूरत न समझते हुए अहंकार पूर्वक न कर दी जबकि स्कूबा पर्वत ने विनम्रता से देवी का स्वागत भोजन व जल के साथ किया। समय बीतने पर माऊंट फूजी अपने गर्व और ठंडे स्वभाव के कारण बर्फीला और बंजर हो गया जबकि स्कूबा पर्वत हरियाली और रंगों की बहार से आच्छादित बना रहा । आगे पढ़िये...
जब भी समाचार पत्रों को उठाकर देखता हूँ,
तब यही लगता है कि हमारा देश बहुत कमज़ोर हो गया है। ऐसा कमज़ोर कि वह न तो चल सकता है, न उठ-बैठ सकता है, न सो सकता है। पता नहीं एक अजीब प्रकार की कमज़ोरी से घिरा दिखाई दे रहा है। अख़बार में छपने वाले विज्ञापन तो यही बात बयां कर रहे हैं कि देश कमज़ोर है। वे यह भी बता रहे हैं कि एक ख़ास क़िसिम की कमज़ोरी से युवा वर्ग जूझ रहा है। आगे पढ़िये...
यूं तो देश में पहले से ऐसी ख़बरें आती रही हैं कि किस तरह सेना और दूसरे सुरक्षा बलों से गोलियाँ चोरी होकर बाज़ार में बिकती हैं और आमतौर पर अपराधियों के काम आती हैं। लेकिन कल जब उत्तरप्रदेश के एक सीआरपीएफ कैंप के 6 लोगों को गिरफ़्तार किया गया तो यह एक बड़ी ख़बर इसलिए बनी कि पिछले दिनों सीआरपीएफ के इसी कैंप से छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में आए हुए जवान नक्सल हमले में मारे गए थे। सीआरपीएफ के पौन सौ लोगों की हत्या नक्सलियों ने की थी जिनमें से अधिकांश इसी कैंप के थे जहाँ के गिरफ़्तार जवानों के बारे में कहा गया है कि वे गोलियाँ चोरी करके नक्सलियों को बेचते थे। आगे पढ़िये...
जे कृष्णमूर्ति
ने किसी जाति, राष्ट्रयता अथवा धर्म में अपनी निष्ठा व्यक्त नहीं की ना ही वे किसी परंपरा से आबद्ध रहे। सन् 1922 में श्री कृष्णमूर्ति किन्हीं गहरी आध्यात्मिक अनुभूतियों से होकर गुजरे और उन्हें उस करूणा का स्पर्श हुआ जिसके बारे में उन्होंने स्वयं कहा ”वो करूणा सारे दुख, कष्टों को हर लेती है। आगे पढ़िये...
यदि
आप कंप्यूटरों का प्रयोग करते हैं तो आपने अनुभव किया होगा कि कोई प्रोग्राम चलते-चलते क्रैश हो जाता है, कभी कोई प्रोग्राम हॉल्ट हो जाता है, कभी कोई फ़ाइल करप्ट हो जाती है, कल अच्छी-ख़ासी चल रही सीडी आज डाटा पढ़कर नहीं देती है – कुल मिलाकर चलते-चलते वाहन में किसी ख़राबी की वजह से उसमें आई रुकावट की तरह की ही समस्या और वैसी ही परेशानी। इन समस्याओं की वजह से आप परेशान रहने लगते हैं, तनाव में रहने लगते हैं, आपकी दैनिंदनी आदतों में चिड़चिड़ापन और रेस्टलेसनेस आ जाता है। यही कंप्यूटर स्ट्रेस सिंड्रोम कहलाता है। आगे पढ़िये...
लोग अब पेड़
की छाँव से संतुष्ट नहीं होते, पूरा पेड़ हज़म कर जाते हैं। मैं जानता हूँ, कि तुम मन ही मन सोच रहे हो, कि ऐसा क्यों हुआ, तो सुनो, अन्दर की कहानी। हे राजन, तुम को पता होगा कि तुम्हारे इलाक़े में कुछ बुद्धिजीवी क़िस्म के जीव रहते है। बुद्धिजीवी लोग वैसे होते तो दिखते बुद्द्धिजीवी हैं लेकिन भयानक क़िस्म के जानवरों से कम नहीं होते। ये बुद्धिजीवी जन समस्याओं के बारे में समाज को जानकारी देने के लिए इन दिनों समाचारपत्रों का प्रकाशन करते रहे हैं। तुम्हारे पास आ कर अनुदान आदि प्राप्त कर अपना घर भी भरते रहे हैं। सत्ता के सामने नकली बुद्धिजीवी और साहित्यकार घुटने टेकते रहते हैं। आगे पढ़िये...
प्रतिवर्ष 1
मई का दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस’ अथवा ‘मज़दूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है। मई दिवस समाज के उस वर्ग के नाम किया गया है, जिसके कंधों पर सही मायनों में विश्व की उन्नति का दारोमदार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति एवं राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का प्रमुख भार इसी वर्ग के कंधों पर होता है। यह मज़दूर वर्ग ही है, जो हाड़-तोड़ मेहनत के बलबूते पर राष्ट्र के प्रगति चक्र को तेज़ी से घुमाता है लेकिन कर्म को ही पूजा समझने वाला श्रमिक वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है। आगे पढ़िये...
संस्कृति
मानव समाज द्वारा संचित नित-नवीन अनुभवों की उत्तरोत्तर संवर्धित पूँजी है । मनुष्य समाज में जन्म लेता है, समाज और उसकी परंपरा से सीखता है और पर्याप्त अनुभव प्राप्त करने के पश्चात् उस समाज के मूल्यों, मान्यताओं, कला, चिंतन में यथाशक्ति योगदान देकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर में अभिवृद्धि करता है । शनैः शनैः संस्कृति का क्रमशः विकास होता है, वह संवर्धित होती है । इस प्रकार मनुष्य विरासत में प्राप्त संस्कृति का उत्कर्ष और परिष्कार करता है । आगे पढ़िये...
ग्रीष्म की
छुट्टियों में माता-पिटा के साथ रहने और खेलने का मौक़ा बच्चों को नसीब से ही मिलता है । मगर जो समय मिलता है वही थोड़े दिनों की छुट्टियाँ होती है । बाक़ी तो आगे ज़िंदगी और पीछे हम सब भागते ही रहते हैं । घर के कोने-कोने में घोंसला बनाती चिड़िया और उनके बच्चों की चहचहाट सुनाने का यह उत्तम समय होता है । मगर हमारी दंभी व्यस्तता के बीच समय ही कहाँ? बच्चे पढ़ते हैं, वह विशाल केम्पस ग्यारह महीने तक छात्रों की चहल-पहल से ठाट-बाट में रहता है । सिवा, बारहवाँ महीना । ग्रीष्म की आलसी छुट्टियाँ । सख़्थ धूप से खौलती धरती और अकेला इन्सान भीतर से तरसता हुआ मानो पागल बनकर चींखने को मथता है.... मथता है... आवाज़ दबने लगे और फिर वही प्रयत्न के लिए इन्सान का दम भी घुटने लगे ! छुट्टियों में ख़ाली केम्पस भी इसी तरह घुटन महसूस करता होगा? आगे पढ़िये...
मुंबई । आफ़ताब आलम द्वारा संपादित पत्रकारिता कोश -2010 का विमोचन तथा हिन्दुस्तानी मीडिया डॉट कॉम नामक वेबसाइट का उदघाटन घाटकोपर पश्चिम स्थित हिन्दी हाई स्कूल में वस्त्रोद्योग राज्यमंत्री मो। आरिफ़ नसीम ख़ान तथा मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष श्री कृपाशंकर सिंह के हाथों संपन्न हुआ। हिन्दी साहित्य परिषद, आर.जे. कॉलेज द्वारा आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक श्री प्रेम शुक्ल ने किया। आगे पढ़िये...
दिल्ली ।
प्रतिष्ठित भारतीय लेखक अमिताभ घोष के अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पश्चिमी उपन्यास की परंपरा पर नए सिरे से उत्कृष्ट सर्जनात्मक कार्य के लिए प्रतिष्ठित डैन डेविड सम्मान दिये जाने का निर्णय लिया गया है। दस लाख डॉलर नकद पुरस्कार वाला यह सम्मान डैन डेविड संस्थान और तेल अवीव विश्वविद्यालय की ओर से संयुक्त रूप से दिया जाता है। आगे पढ़िये...
साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले लोग पिछले कुछ दिनों में कुछ बेचैन होंगे। जो दो नाम देश के साथ गद्दारी करके पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पकड़ाए हैं उनमें कोई भी मुसलमान नाम नहीं है। बाल ठाकरे से लेकर देश के बहुत से और उग्र हिन्दूवादी संगठन मुसलमानों के एक तबक़े को कभी खुलकर तो कभी गोल-मोल शब्दों में गद्दार, देशद्रोही या कम देशभक्त कहते आए हैं और जब उन्हें सावधानी की जुबान इस्तेमाल करनी होती है तब भी वे देशभक्त मुसलमानों की बात कहते हुए यह अहसास कराना नहीं भूलते कि मुसलमानों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो देशभक्त नहीं हैं। इस तरह की राजनीति करने वाले लोग कुछ निराश होंगे क्योंकि पाकिस्तान में अब तक की देश की सबसे बड़ी गद्दार दिखती जो अधिकारी पकड़ाई है वह माधुरी गुप्ता है। उसके साथ जिस दूसरे ख़ुफ़िया अफ़सर पर शक़ है वह एक शर्मा है। आगे पढ़िये...
विगत
सप्ताह एक बार फिर कोलकाता जाना हुआ। एयरपोर्ट से लेकर पार्क स्ट्रीट तक पहली नज़र में ही शहर बदला-बदला सा नज़र आ रहा था। सड़कें व्यवस्थित हुई थी और गड्ढे नदारद थे। तेज़ भागती महँगी और आलीशन गाड़िया देखकर आश्चर्य हुआ। सड़कों के किनारे ऊँची-ऊँची गगनचुम्बी इमारतें, कंक्रीट के बनाये गए माचिस के डिब्बेनुमा फ़्लैट के जंगलों को देखकर मैं हैरान था। आगे पढ़िये...
आज
बहुत कुछ बदल गया है। लेकिन जीवन आज भी इन रेलों में चलता-बढ़ता हुआ देखा जा सकता है। प्लेटफ़ार्म पर कई परिवार पलते हुए देखे जा सकते हैं। रेलवे का अपना एक संसार है। इनका अपना प्रशासन है। अपना बजट, अपनी पुलिस और न्यायिक व्यवस्था। इसमें कोई शक़ नहीं कि अँगरेज़ों द्वारा विकसित ये विभाग अपनी विशिष्ट पहचान आज भी क़ायम रखे हुए हैं। आगे पढ़िये...
आम पाठकों से नाटक का प्रथम परिचय पत्रिकाओं के माध्यम से होता है। जब ये पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं तब आम पाठक इनमें अपने आप को खोजकर किसी एक पात्र में अपना रूप देखता है। उसके पश्चात उसकी मंशा होती है कि इसे रंगमंच पर देखा जाए, उसे पढ़कर वह अपनी कल्पना में निर्मित रंगमंच पर उसे मंचित होते देखता है। आगे पढ़िये...
प्रकृति
का हर सृजन बेहद ख़ूबसूरत है। उसमें विविधता है। हमने एसी की कृत्रिम ठंडी हवा से गर्मी को दूर ज़रूर कर रखा है लेकिन जाने-अनजाने अपने शरीर को कमज़ोर बना दिया। इन एसी की ठंडक ने एक तरफ हमारे ख़ून को ठंडा किया है तो दूसरी ओर अपने बाहरी वातावरण को और अधिक गर्म करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। हम एक ग़लत चक्र में फँसते जा रहे हैं। यह हम भूल जाते हैं कि यही कृत्रिम ठंडी बिजली पी रही है जो फिर नदियों को सुखाकर पर्वतों को उजाड़ रही है।
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कविताओं का जन्म दिल से होता है।
अनायास। परिस्थितिवश। चंद शब्द, इनमें सौंदर्य भी होता है, जो गुनगुनाए जा सकते हैं, सारा संसार समेट लेते हैं। यही तो ख़ूबसूरती है लयबद्ध पंक्तियों की। फिर चाहे वो शायरी हो, गीत हो, ग़ज़ल हो। मैंने कविताएँ बहुत कम लिखी हैं। अपनी युवा अवस्था में उपरोक्त शीर्षक वाली कुछ पँक्तियाँ उभरी थीं। यह सत्य है कि चाहत ज़िंदगी का अनिवार्य अवयव है, और उन दिनों मैं, स्वयं को किसी न किसी नयी चाहत के चक्कर में पाता। आगे पढ़िये...