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सिनेमा के शिखर

कला की बहुरंगी छवि : अमोल पालेकर

प्रकाशन :गुरूवार, 24 नवम्बर 2011

मोल पालेकर। कह सकते हैं अनमोल पालेकर। कला की बहुरंगी छवि। थिएटर और सिनेमा के माफऱ्त जीवन की सुंदरता रचता कलाकार । वे अचानक ही फिल्मों में आ गए। थियेटर उनका पहला सपना और पहली पसंद था । प्रतिष्ठित कला संस्थान जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई में कला की पढ़ाई कर रहे कलाकार का मन, अभिनय की कला कर ओर आकृष्टï हुआ। मराठी रंगमंच की दुनिया में अभिनय को आकार देते अमोल ने इसकी सूक्ष्म बारीकियां जल्दी ही सीख-समझ लीं। ...और थियेटर की दुनिया में सफल अभिनेता और निर्देशक बने। सत्यदेव दुबे जैसे निर्देशक के साथ मराठी रंग में अनेक प्रयोग आजमाए । यही सिलसिला सिनेमा संसार में भी बरकरार रहा। अमोल पालेकर का कलाकार मन नित नई ऊंचाईयां छूता गया। अभिनय क्षेत्र में आने से पहले रंगकर्म की दुनिया में एक सफल सृजनात्मक निर्देशक के रूप में उनकी पहचान बन चुकी थी । ऋषिकेश मुखर्जी , बासु चटर्जी आदि अमोल के थिएटर से परिचित थे और उनके नाटक देखने देखने आया करते थे । विजय तेंदुलकर रचित चर्चित एवं लोकप्रिय नाटक ‘शांतता! कोर्ट चालू आहे ’ (हिंदी में ‘खामोश अदालत जारी है’ )की इसी नाम से सत्यदेव दुबे निर्देशित मराठी फिल्म (१९७१) से वह अभिनय में कदम रखे।

जिस किसी ने भी ‘गोलमाल’ देखी है वह शायद ही उनके किरदार को भुला सकता है। बिना किसी खिलंदड़पने के सहज-शांत चेहरे के भावों से हास्य-व्यंग्य रच देना निश्चित ही कठिन है। अमोल पालेकर ने अपने फिल्मी सफर में लीक से हटकर परिपक्व और सधी चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं से नये तरह के कला-किरदारों को जन्म दिया। व्यक्तिगत , पारिवारिक व सामाजिक किरदार व फिल्में रचते अमोल पालेकर हिंदी सिनेमा के अमिट हस्ताक्षर हैं।

अपनी पहली फिल्म ‘रजनीगंधा’ (१९७४) से ही वह दर्शकों के बीच छा गए। बासु चटर्जी की यह फिल्म अच्छी चली। अमोल की अदायगी खासी पसंद की गई। दर्शकों के बीच छा जाने को अहम पहलू उनका व्यक्तित्व भी था। एक साधारण मध्यवर्गीय आदमी की उनकी छवि आम दर्शकों के बीच से उठकर सिनेमा-जगत मेें छा गई-सी लगती है। इस तरह अमोल पालेकर के रूप में दर्शकों ने एक कॉमन भारतीय पुरुष छवि को पर्दे पर हंसते, रोते और विविध जीवन-रंगों में ढलते देखा। दर्शक उनकी कला के दिवाने हो गए। चमक-धमक और ग्लैमर से दूर अमोल पालेकर हौले-हौले दिलों में समा गए। फिल्मों और स्टेज के कलाकार अमोल पालेकर ने कला और समानांतर फिल्मों की चाहना को न सिर्फ बल ही दिया एक लंबे अरसे तक इसे बनाए भी रखा।

अमोल पालेकर ने करियर की शुरुआत मराठी स्टेज से की। सफल अभिनेता और निर्देशक अमोल का जन्म बम्बई में हुआ और वहीं जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की। पढ़ाई के साथ-साथ थियेटर की ओर भी रुझान था। थियेटर में करियर के लिए संघर्ष करने के साथ ही अमोल एक बैंक में क्लर्क का काम भी कर रहे थे। ‘रजनीगंधा’ की सफलता ने उन्हें इसी तर्ज की कई कम बजट वाली कॉमेडी फिल्में दिलाई। बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी की ‘चितचोर’ (१९७६), ‘छोटी सी बात’ (१९७५) तथा ‘गोलमाल’ (१९७९) ७०’ के दशक की सफल कॉमेडी फिल्में रहीं। ‘गोलमाल’ में अपने रोल के लिए अमोल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। अमोल पालेकर सशक्त और हल्के गुदगुदाते सभी भूमिकाओं में फिट जल्दी ही सिनेमा-जगत में जाना-माना नाम बन गए। भीमसेन की ‘घरौंदा’ (१९७७), श्याम बेनेगल की ‘भूमिका’ (१९७६) और कुमार साहनी की ‘तंरग’ (१९८४) अमोल के अभिनय बहुआयामी कला छवि को दर्शाती हैं।

अमोल एक अच्छे अभिनेता तो थे ही अच्छे निर्देशक भी हैं। उनकी पहली फिल्म निर्देशित फिल्म मराठी भाषा की ‘आकृएत’ (१९८१) थी। इस फिल्म में इन्होंने अभिनय भी किया। किसी मनोरोग से पीडि़त व्यक्ति जो हत्याएं करता फिरता है का अभिनय निश्चित ही चुनौतीपूर्ण भूमिका थी। उनकी पहली निर्देशित हिन्दी फिल्म ‘अनकही’ (१९८४) थी। इसके बाद क्रमश: ‘थोड़ा-सा रूमानी हो जाएं ’(१९८९), ‘दायरा’ (१९९६) और ‘कैरी’ (२०००) सरीखी उत्कृष्ट आलोचनात्मक फिल्मों का सफल निर्देशन किया। बड़े पर्दे के साथ ही छोटे पर्दे के लिए ‘कच्ची धूप’ और ‘नकाब’ जैसी धारावाहिकों का निर्देशन भी किया। दायरा, अनाहत, कैरी, समांतर, पहेली , अक्स ..रचनात्मकता के हर रंग -रूप में खास नजर आते हैं वह । भाषा , देश , संस्कृति , रिजनल ...वह किसी भी आधार पर सिनेमा के विभाजन को नहीं मानते।

बेहतरीन अभिनय और निर्देशन के लिए अमोल पालेकर को कई पुरस्कार और सम्मान मिले। इनमें शामिल है- फिल्म ‘दायरा’ (१९९६) के लिए पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पारिवारिक उत्थान के क्षेत्र में निर्देशित फिल्म ‘कल का आदमी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार। अमोल पालेकर कला के विविध क्षेत्रों में सक्रिय और सचेत हैं। भीड़ , बाजारू प्रतिस्पर्धा से दूर अमोल मुंबई नहीं पुणे में वास करते हैं । बाजार की परवाह से बेपरवाह . सृजनात्मकता के साथ जारी है कदमताल...।

  प्रमोद कुमार पांडेय
स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय
एएनएएच-58 , सुभारतीपुरम,
मेरठ-250005
journalism.subhartiuniversity@gmail.com
 
         
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