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सिनेमा के शिखर

द लास्ट ग्लैमर गर्ल:बेगम पारा

प्रकाशन :बुधवार, 1 फरवरी 2012

1950 का दशक हिंदी फिल्मों के परवान चढऩे का दौर था। सिनेमा के प्रयोगों और प्रगति पथ पर कुलांचे भरने का काल था। यह वो वक्त था जब हजारों सपने फिल्मी दुनिया में आने को मचलते थे। पर वह जमाना इन अंखुआते सपनों को फिल्मी दुनिया में जाने से रोकता था। तब फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। फिल्म की दुनिया खराब दुनिया थी। नाचने -गाने वालों का क्षेत्र था ! वह एक मुश्किल दौर था। वह श्वेत-श्याम फिल्मों का दौर था। वह भारतीय सिनेमा का ऐसा समय था जब फिल्मी पर्दे पर दो फूलों का मिलना या किसी बलखाती नदी का मस्त हवाओं संग महकता किनारा ही सब कुछ कह देता था। वह नर्गिस, सुरैया, गीता बाली, बीना राय, मधुबाला के आसमान में छा जाने का दिन था। उन्हीं दिनों में बेगम पारा भी फिल्मी इण्डस्ट्री में कदम रखती हैं और श्वेत-श्याम फिल्मों में एक रंग -सा घुल जाता है।

वह रंग सिनेमा के विविध रंगों से जुड़ रंग -विस्तार बन जाता है । शालीमार और सोहनी महिवाल (1946), दुनिया एक सराय, लुटेरा , नील कमल , जंजीर (1947)..लैला मजनू , नया घर (1953), आदमी (1957), दो मस्ताने (1958) से सांवरिया(2007) तक बेगम पारा का अभिनय सिनेमा की सुन्दर कहानी है शालीमार और सोहनी महिवाल (1946), दुनिया एक सराय, लुटेरा , नील कमल , जंजीर (1947)..लैला मजनू , नया घर (1953), आदमी (1957), दो मस्ताने (1958) से सांवरिया(2007) तक बेगम पारा का अभिनय सिनेमा की सुन्दर कहानी है ।

ट्रेडिशनल हिरोइनों से थोड़ी अलग पहचान बनाने वाली बेगम पारा उस जमाने की ‘मॉडर्न गर्ल’ थीं जो स्टाइलिश थीं, सेक्सी थीं, और सनसनी से भरपूर जीवन को अपने ही बिंदास अंदाज में जीने वाली मानी जाती थीं। बेगम पारा संघर्ष के उन दिनों में चमकते सितारे का नाम है। बेगम पारा फिल्म-पत्रिकाओं के कवर पेजों पर छाया रहने वाला वह नाम है जो सोहनी बनकर महिवाल संग प्रेम की दरिया में डूब जाता है, जो लैला बनकर कई-कई मजनूओं को दीवाना कर जाता है।

बेगम पारा 1950 के दशक की प्रगतिशील लीड हीरोइनों में एक थीं। इनका जन्म एक संभ्रांत मुस्लिम परिवार में हुआ। इनके पिता एक सेशन जज थे। बेगम पारा अपने दस भाई-बहनों में एक थी। अपनी पढ़ाई इन्होंने अलीगढ़ से पूरी की। इनके भाई की शादी प्रतिमा दासगुप्ता के साथ हुई। प्रतिमा के साथ बेगम पारा भी फिल्म इण्डस्ट्री में जाने लगीं जहां इन्हें फिल्मों के कई ऑफर मिलने लगें। प्रतिमा उस समय की एक जानी-मानी ऐक्ट्रेस थीं जिनकी दो फिल्में ‘कोर्ट डांसर’ और ‘कुँवारा बाप’ आ चुकीं थीं। इस तरह17 वर्षीय पारा को निर्देशक डी. डी. कश्यप की फिल्म ‘चांद’ में काम करने का अवसर मिला। उनके माता-पिता फिल्मों में काम करने के विरुद्ध थे।

फिर भी इस शर्त पर कि पारा लाहौर में काम नहीं करेगीं पर वे राजी हो गए। इस तरह फिल्म ‘चांद’ में उन्होंने काम किया जो सफल रही। इसके बाद ‘सोहनी-महिवाल’ और ‘मेंहंदी’ जैसी दूसरी सफल फिल्में की। 1951 में एक्शन से भरपूर फिल्म ‘उस्ताद पेड्रो’ आई जिसमें बेगम पारा ने शेख मुख्तार के साथ काम किया। दोनों की जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया। आज भी मुख्तार-पारा की जोड़ी हिन्दी सिनेमा की नायाब जोडिय़ों में एक मानी जाती है।1958 में बेगम पारा ने नासिर खान, जो कि दिलीप कुमार के छोटे भाई हैं से शादी की और उसके तुरंत बाद ही फिल्मों में काम करना छोड़ दिया। अर्से बाद 2007 में संजय लीला भंसली की फिल्म सांवरिया में अभिनय किया। उनके दो में से एक बेटे ‘अयूब खान’ अब उनके प्रोफेशन को आगे बढ़ा रहे हैं। बेगम पारा अपने नाम के अनुरूप हमें सुवासित करती रहेंगी अपने किये के दम-ख़म पर।



 
         
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