श्रेणियाँ

कुछ हाइकू

प्रकाशन :रविवार, 8 मई 2011
रचना श्रीवास्तव
उकडू बैठी
काश मिले छतरी
धूप सोचती
--------------------------
नदियाँ प्यासी
झरने मांगें पानी
जेठ की बेला
--------------------------
दिखा बादल
मिला न बूंद पानी
खूब निचोड़ा
--------------------------
तलाब सूखे
पंक्षी पीये ,नहाये
कटोरी पानी
--------------------------
गर्मी की रात
छत पर उतरा
घूँघट चाँद
--------------------------
मर्तबान में
रखा आम आचार
धूप दिखाने
--------------------------
माँ ने निकाली
सूती धानी सी साड़ी
गर्मी जो आई
--------------------------
मजे से खाए
बाल्टी में भीगे आम
गंदे कपडे
--------------------------
छिडक पानी
आँगन बिछी खाट
गर्मी की रात
--------------------------
माँ झले पंखा
बेटे को सारी रात
बत्ती जो गई
--------------------------
चैन से सोये
मिले आँचल छाँव
माँ जागे रात
--------------------------
बड़े बक्से में
फिनायल की गोली
रखे स्वेटर
--------------------------
सूखी कोख में
बीज चाहता पानी
अंकुरण को
--------------------------
मन तरसे
छत छिडके पानी
उठे खुशबु
--------------------------
गर्मी है यहाँ
पर चाँद उतरे
नहीं छत पे
--------------------------
फूले जो आम
महक उठे बाग
वो याद आये
--------------------------
कोयल कूके
मन भौरा सा डोले
मिले न ठौर
--------------------------
स्वयं का ताप
घबराया सूरज
ढूंढे बादल
--------------------------
पिया के संग
गुनगुनी शाम में
भला धूमना
--------------------------
झलक पाने
तपती दोपहरी
छाजे चढ़े वो
--------------------------
सूर्य का ताप
झुलसाये सपने
जले रात भी
--------------------------
आँगन छुप
जेठ की दुपहरी
छाँव ढूंढती
--------------------------
स्कूल है बंद
बच्चे हुए मगन
गर्मी जो आई
--------------------------
बस्ते की छुट्टी
न परीक्षा न टेस्ट
बच्चों की मस्ती
--------------------------
गन्ने के रस,
आम बिकते ठेले
गर्मी विशेष
--------------------------
चाकू उठाये
नौजवान पीढ़ी
डिग्री को फाड़े
--------------------------
आज के गीत
घर गाती बेटियां
शर्मिंदा पिता
--------------------------
अश्लील द्रश्य
बैठे रहते बच्चे
हटता पिता
--------------------------
बच्चों के लिए
माँ बनी बुढ़िया
पता न चला
--------------------------
तुम्हारे साथ
ख़त्म हुई जिंदगी
पता न चला
--------------------------
न कोई आस
बुढ़ापे का साथ
केवल प्यार
--------------------------
मरते चीते
उजड़ता जंगल
चेतो इन्सान
--------------------------
खून ही खून
ये दुनिया का हाल
रोता ईश्वर
--------------------------
मरते लोग
अपने जहर से
सोचो तो जरा
--------------------------
हारा इन्सान
अपने ही जाये से
शिकवा क्यों ?
  रचना श्रीवास्तव

 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)
लेखक की प्रविष्टियाँ

RoboForm: Learn more...