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 नईपीढ़ी जब बहकी हुई या विचित्र लगने लगे तब बुढ़ापे के पीड़ादायक होने की शुरुआत होती है। पुत्रवधू की सच्ची बात का भी जब स्वीकार न हो तब समझ लें कि बुढ़ापा नोंचने लगा है।
अंग्रेज फिलोसोफर हर्बर्ट स्पेंसर के जीवन में घटी एक भावपूर्ण घटना स्मरणीय है। वह दार्शनिक, बायोलोजिस्ट उपरांत एन्थ्रोपोलोजिस्ट भी था। वह जब वृद्ध हुआ तब किसी मित्र या स्वजन ने `सिंथेटिक फिलोसोफी ‘पर अपने अध्ययन के निष्कर्ष रूप स्वलिखित १८ ग्रन्थ उनकी गोद में रख दिए। तब स्पेंसर ने केवल इतना ही कहा कि :``काश! अभी मेरी गोद में इन ग्रंथों के स्थान पर बच्चे खेल रहे होते तो!’’

वृद्धत्व की सबसे मीठी संप्राप्ति क्या? अनुभव के परिणाम स्वरूप मुझे प्राप्त उत्तर इस प्रकार है।`संस्कारशील संतानें।’ मनुष्य अपनी धन राशि का निवेश ऐसी कंपनी के शेर में करती है,जिसे लोग `ब्लु चीप’ कहते हैं। ऐसा निवेश संसारी मनुष्य को ढलती उम्र में सलामती देती है।`ब्लु चिप’ में हो उससे भी अधिक उमदा निवेश कौन सा? बालकों को संस्कार मिले ऐसी जीवनशैली। यह एक ऐसा निवेश है,जो ढलती अवस्था में चक्रवृद्धि व्याज के साथ वापस मिलता है। मनुष्य का बुढ़ापा कमोबेश रुग्ण होता है। दवाई के सहारे जीना कौन चाहेगा? इंस्युलिन के इंजेक्शन लेना कौन चाहेगा? दांत,कान,आँख कमजोर हो जाये ऐसा कौन पसंद करेगा? सीटी-स्केन करवाने के लिए कहीं जाना कौन चाहेगा? MRI की जाँच करवाने के लिए कौन जाना चाहेगा? ७५ साल की अवस्था के बाद मानों एक नयी शब्दावली इन्सान के मत्थे मढ दी जाती है। सारी यंत्रणाओं के बीच मृत्यु नामक चट्टान की धार पर एक ऐसा नृत्य चलता रहता है,जिसमें प्रार्थना नामक औषधि बहुत राहत पहुंचाती है। विवेकशील संतानें उस स्थिति में प्रार्थना से भी बड़ा आश्वासन प्रदान करती हैं। संतानें अच्छी न हों ऐसी ही जब जीवनचर्या चलती रहे,तब जीवन सांध्य-वेला की वेदना मनुष्य की प्रतीक्षा करती रहती है। सावधान! पाप किसी को भी बक्षता नहीं है।

क्या बुढ़ापा अप्रिय भी होता है? भरेपूरे परिवार में दादा की प्रसन्नता मृत्यु को परास्त कर देनेवाली होती है। बुढ़ापे के आगमन की खबर कैसे होती है? कमीज के बटन पर दाल के दाग पड़ने लगे तब अवश्य समझ लें कि बुढ़ापा आ गया है। संतानों के सारे खर्च अनावश्यक तथा व्यर्थ और उड़ाऊ लगने लगे तब समझ लें कि बुढ़ापा आ गया है। बारबार चश्मे खोजने पड़े तब खोजनेवाला लगभग दिव्यांग होता है। नयी पीढ़ी विचित्र या बहकी हुई लगे तब बुढ़ापा बहुत पीड़ादाई हो जाये उसकी पूर्व तैयारी होने लगती है। पुत्रवधू की सच्ची बात का भी जब स्वीकार न हो तब समझ लें कि बुढ़ापा नोंचने लगा है। जीवनपर्यंत सेवित हठिला लोभ बुढ़ापे में अविरत परेशान करता रहता है। देने का आनंद जब समझ में न आये तब बूढ़े व्यक्ति की जेब सर्पदंशों से भरा रहता है।

लोभ,द्वेष और बैरभाव जब कमजोर नहीं पड़ता तब मानें कि हम फुल्ली नापास(अनुत्तीर्ण) हैं! क्रोधी पिता कभी सुखी नहीं हो सकते। गुस्सैल दादा कभी सुखी नहीं हो सकते। क्रिकेट या खेलकूद में जरा भी रूचि न हो तो क्या दादा सुखी हो सकते हैं?टी.वी.पर क्रिकेट देखनेवाले दादा अपने पोते से कहते हैं:``अरे अद्वैत! आज तो धोनी ने कमाल कर दिया! प्रत्येक मनुष्य को एक धुन (मस्ती/नशा) होनी चाहिए। वह मस्ती वृद्धत्व को भी सुन्दरता से सजा देती है। अन्य के लिए कुछ कर गुजरने के लिए जेब से पांच रुपये भी नहीं खर्च करे ऐसा कंजुसवीर यदि दु:खी होता है तो वह तो उसकी कमाई ही है और क्या कह सकते हैं।’’

ऐसा सब लिखते समय मुझे अपने प्रिय मनोवैज्ञानिक अब्राहम मेस्लो का स्मरण हो रहा है। यह मनोवैज्ञानिक ही अपने जीवन में समय से पहले अवकाश ग्रहण करने के निर्णय के प्रेरक थे। उन्होंने संसार को सर्वप्रथम `Self –actualization’(आत्म सार्थक्य) जैसी मौलिक संकल्पना प्रदान की। अमरीका के ओहायो राज्य के क्लीवलेंड नगर की बोलडविन वोलेस कोलेज में मैंने दो घंटे की संगोष्ठी का आयोजन किया था। मेरी इस सभा में एक श्रोता के रूप में आदरणीय मोरारिबापू के परम भक्त नरेश पटेल बैठे हुए थे। मेरा विषय था:`अब्राहम मेस्लो की थियरी और उपनिषदीय विचारधरा।’ इस सभा में दो ऐसे अध्यापक थे,जिन्होंने अब्राहम मेस्लो के निदेशन में पी-एच.डी.की थी। मैं इस बात को लेकर कुछ चिंतित भी था।अभी इतना तो मुझे याद है।

अब्राहम मेस्लो भारी बीमारी से आक्रांत थे पर किसी तरह बच गये। खुद को जब नवजीवन प्राप्त हुआ तब प्राप्त बरसों के लिए उन्होंने कहा:``ये वर्ष मेरे लिए पोस्ट मोर्टम इयर्स’ (मरणोत्तर वर्ष) हैं। मैं अब हर मुद्दे को नितांत नयी दृष्टि से देखता रहता हूँ। अब पुष्प को,बरसात को,सूर्योदय तथा सूर्यास्त को तथा शीतकाल को नितांत अलग दृष्टि से देखता रहता हूँ।’’अब्राहम मेस्लो के ये शब्द किसी दादा या दादी,किसी बापा(वयोवृद्ध सम्मान्य व्यक्ति) या किसी जईफ बुजूर्ग के दिल में बैठ जाये तो उनकी जीवनशैली में अवश्य बदलाव आ जाये। ७५ से ८० वर्ष की अवस्था के बाद जीवन से क्या तात्पर्य है? मृत्यु नामक चट्टान की धार पर मानों हराभरा बुढ़ापा नर्तन कर रहा है और तुम किसी भी क्षण उपत्यका में फैले हुए विराट ब्लेक होल में विलीन हो सकते हो। ८० वर्ष व्यतीत कर लेने के बाद अब मेरा स्थायीभाव कुछ इस प्रकार है:

जीवन का यह वर्ष,आखिरी वर्ष हो सकता है।
आयुष्य का यह महिना आखिरी महिना हो सकता है।
आजका यह दिवस अंतिम दिवस हो सकता है।
यह घंटा अंतिम घंटा हो सकता है।
अभी लिखा जा रहा यह लेख आखिरी लेख हो सकता है।
छककर प्रेम कर लो और जो कुछ त्याज्य है उसे पूरी तरह सोच विचार करके छोड़ दो।
एक भला देवदूत बड़ी प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
वह देवदूत तुम्हारा शत्रु नहीं है। तुम्हारा परम मित्र है।
लोभ,मोह,बैर और इर्षा में सारा जीवन बीत गया!
अब तुम `डिलीट बटन’ दबाना चाहते हो या नहीं?
A शांति: शांति: शांति:!
प्रत्येक सूर्योदय को अंतिम सूर्योदय के रूप में देखना,यह भी एक `प्रार्थना’’’` ही है।
मेरी दृष्टि से सबसे श्रेष्ट प्रार्थना अर्थात परमात्मा को गदगद भाव से `थेंक यू’ कहना है। नास्तिक मनुष्य को परमात्मा का नाम देना आवश्यक नहीं है। उसे मात्र इतना ही कहना है कि `Thank you Existence।’ ईश्वर का अस्तित्व हो या न हो परन्तु `अस्तित्व का अस्तित्व’ तो है ही! भगवान हो या न हो परन्तु मेरे आँगन में सामने खड़े आम्रवृक्ष का अस्तित्व तो हाजिरनाजिर है! उस पर दिखनेवाली मंजरी का और उस पर से सुनी जा रही कूक के अस्तित्व के प्रति कैसे सशंक हुआ जाये? ऐसी मौलिक बात आइनरेंड नामक क्रान्तिकारी लेखिका ने की थी।उन्होंने कहा:``Existence Exists’’