तीन दिनों के बाद शाम को घर लौटने पर कोने
में बैठी बेटी से सहदेव ने पूछा, ‘‘कल चलेगी मेरे साथ ?’’
लड़की ने जब जिज्ञासा भरी निगाहों से अपने बाप की ओर देखा तो उसका बाप सहदेव मुस्कुराकर बोला, ‘‘वोही मेला में, आषाढ़ी नदी के वो पार। एक बार ते को बोला तो था।’’
सुनकर लड़की अवाक होकर रह गयी। क्या हुआ है उसके बाप को। तीन दिनों से भूख के मारे घर में बुरा हाल और उसे मेला देखने की पड़ी है।
‘‘इ झोला में चाउर हैं, उबाल ले......... तहरी माँ कहाँ है ?’’
इस वाक्य पर उदासी के गहन अँधेरे से निकलकर वह लड़की खड़ी हुई। फटे चिथड़े में खड़े होते समय उसकी देह कभी एक ओर से नंगी हुई तो कभी दूसरी ओर से, जिसे ढकने की उसने एक असफल कोशिश की।
बड़े चाव से बेटी का नाम लक्ष्मी रखा गया था। वही लक्ष्मी अब लक्ष्मीविहिन है। देह पर वस्त्र के नाम पर गमछे जैसा एक चिथड़ा, उससे थोड़ा-सा बड़ा। उससे पूरी देह नहीं ढकी जाती, इसलिए चैदह पार कर पन्द्रह वर्ष की होने को आयी लड़की पिता के सामने शर्म महसूस हुई और पिता ने भी संकोचवश दूसरी ओर नज़रें फेर लीं। इसी तरह कुछ क्षण बीत जाने पर अंधेरा चीरकर एक बुझी हुई रोशनी का आविर्भाव हुआ जब लक्ष्मी ने चूल्हे में आग सुलगायी। कई दिनों के बासी चूल्हे में फिर से आग जली है। ठीक उसी समय दुर्गा पानी लेकर लौटी। उसकी भी दशा बेटी जैसी ही है, हालांकि पांच बच्चों की मां बन जाने के कारण शर्म नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। कुछ वस्त्रों में ही वह संतुष्ट है। कपड़ों की कमी के चलते सूखी छाती को ढकने की अब उतनी आवश्यकता भी नहीं रही। चूल्हे में जलती आग पर माँ को जिज्ञासु भरी निगाहें डालती देख लक्ष्मी के मुँह से निकला, ‘‘बापू लाय हैं।’’
कहते हुए उसकी आँखों में एक चमक झिलमिला उठी। तीन नंगे बेटों और दसेक साल की नग्नप्राय बेटी के बगल में सहदेव बैठ गया। झोपड़ी का बुरा हाल था। छत के बाँस झुक जाने के कारण वह गिरने-गिरने को थी। इस बार की वर्षा में यह बच नहीं पाएगी, यह निश्चित था क्योंकि तेज धूप को भी यह अब कहाँ रोक पा रही थी ?
‘‘तीन दिन तक कहाँ रहा ते ?’’ दुर्गा अपने पति से पूछती है।
‘‘धंधा का खातिर डोलते-डालते आषाढ़ी के मेला तक चला गिया रहा। आज दिन तक तू लोग कुछ खइबे किया कि नाहीं ?’’
‘‘औरू दस दिन भूखा रहे देते।’’ दुर्गा बुझे स्वर में कहती है। शरीर अवसन्न, भूख से जर्जर। बोलने में भी कष्ट का अनुभव हो रहा था उसे।
‘‘आगे से अब कवनो दुख-तकलीफ नहीं रहेगा। रुपिया का जुगाड़ हुआ है। चाउर भी ले के आय हैं, राँध लो।’’
‘‘रुपिया के दिया ?’’ दुर्गा की जु़बान तीखी थी।
‘‘बस समझो हो गया कइसे भी। कल ते को और लक्ष्मिया को ले के मेला घुमाय लाँयगे।’’
‘‘काहे ?’’
‘‘अब काहे का, अइसे ही। तू लोग मेला देख लेगा।’’ सहदेव नज़रें बचाते हुए कहता है।
‘‘इ हाल में भी मेला हो रहा है का ? कह रहे थे सब कि होबे नहीं करेगा।’’
इस बात पर कुछ पल की चुप्पी के बाद सहदेव कहता है, ‘‘हम खुदे देखके आय हैं। के कहता है कि नहीं होगा?’’
दुर्गा चुपचाप उसकी बातें सुनती है। वह आगे से कोई प्रश्न नहीं करना चाहती क्योंकि बगैर भोजन के रहने पर इनसान के सारे कौतूहल अपने आप लुप्त हो जाते हैं। भोजन के सिवा उसे कुछ भी नज़र नहीं आता।
सहदेव अपनी पत्नी को विस्तार से मेले के बारे में बताता है, ‘‘बहुत दिन से चल रहा है। हम वहीं थे। उहाँ से ही तो पइसा का जुगाड़ हुआ। का कुछ नहीं है उहाँ पर। दु का सब रंग-विरंगा। चूड़ी, साड़ी, मिठाई। मीठा का गंध पसरा है चहुँ ओर। कइसा-कइसा सब खेला। मौत का कँआ देखकर डर लगता है। सारा देह झुरझुरा जाता है। अँधेरा में उसका नीचा नहीं दिखाई देता। पगड़ी बाँध के एगो आदमी फट से कूदता है और हँसी-हँसिए में ऊपर तक आ जाता है। का सब जबर खेला है उहाँ । दु ठो बाघ और एगो भालू का साथ में सरकस भी अइबे किया है। तनिक-तनिक सा पोसाक में हूरपरी लोग का दल केतना हिम्मतवाला करतब सब दिखा रहा है। लक्ष्मी को तो बहुते आनंद आएगा। केतना सब मजा का खेला ?’’
दुर्गा गाँव के लोगों से इस बारे में कई बार सुन चुकी है। वह चुप है। जाने की इच्छा होती है, पर जाया नहीं जाता। उसने कहा, ‘‘लक्ष्मी को रहे दो। हम हीं चलेंगे साथ तोहरे।’’
‘‘अरे नाहीं, कई बेरा उससे कहा है। उहे को ही जाने दो। अगला बेरा तू चलना।’’
दुर्गा को बुरा लगता है। चुपचाप बैठी रहती है। फिर न जाने क्या सोचकर कहती है, ‘‘ठीक है, उहेको ही ले जाव। इ घर में अब कौ दिन रहेगी ? अबहिं से रिश्ता ढूँढना पड़ेगा।’’
सहदेव एक शब्द नहीं कहता। वातावरण में चारों ओर पाषाणनुमा अंधकार और निस्तब्धता है। दोनों के मेल से अंधकार और अधिक प्रगाढ़ व भयावह प्रतीत होने लगा था। कभी-कभी कहीं दूर से आता कंठस्वर सुनाई देता। बरामदे में गड़े एक खूंटे से पीठ टिकाये सहदेव अपलक आकाश की ओर निहारे जा रहा था। टूटे हुए चूल्हे में जल रही आग की रोशनी बरामदे में काँप रही थी। भूखे बच्चे चूल्हे के घेरे खड़े थे। वे अवाक होकर उबलते हुए चावल की खदबदाहट को देखे जा रहे थे। उसकी गंध चारों ओर बिखर रही है। शाम को यहाँ गाँव में रोशनी नहीं होती। लोग धीरे-धीरे पलायन कर रहे हैं, यहाँ की धूल पर अपने पैरों के निशान छोड़कर । जो रह रहे हैं, वे क्यों न रहें? उनके गोदाम में सारे गाँव का धान जमा है। भले लोग हैं वे। भूखे लोगों को जरूरत के समय धान देकर उपकृत करते हैं। और जब इच्छा होती है सूद समेत वापस ले लेते हैं। यही सूद तो आदमी को मारता है। सहदेव का घर दो महीने से खाली है। इस प्रखर ग्रीष्म में वह छाती के बल चलते-चलते सरीसृप हो गया है। मजदूरीविहिन अन्नहीन आदमी कितने दिन जी सकता है भला? हिस्से में आयी ज़मीन में ज़मीदारों के मजदूर। इसीलिए वह अब इस गाँव उस गाँव के दूरदराज के क्षेत्रों में अनाज की खातिर भटकता रहता है। आज अन्नहीन परिवार में बहुत दिनों के बाद अन्न जुटा था। उसके गंध से सहदेव की घरवाली, बेटा, बेटी सब हर्षित हैं। वे सभी लोलुप निगाहों से भात की सफेदी को देखे जा रहे थे।
‘‘कल मेले में हरेन भेंटा गया। उ वहाँ बीड़ी का कारोबार शुरू किया है। खूब कमाई हो रही है। उ तेरा खातिर एगो कपड़ा भेजा है।’’ कहते हुए सहदेव ने अपनी पत्नी के सामने लिपटा हुआ कपड़ा खोलकर रख दिया।
कपड़े में लाल धारियाँ थीं। दुर्गा आगे झुककर उसे देखती है। आग की रोशनी में उसके कपड़े में यहाँ-वहाँ लाल रंग के धब्बे नज़र आते हैं। कुछ स्पष्ट सूझता नहीं। उसे उलट-पलटकर तेज निगाहोंे से देखने के बाद वह उस अधमुड़े कपड़े को छाती से लगा लेती है।
‘‘इसको पहिनकर कल उ मेला चले। काहे, का कहती है ?’’ सहदेव अपनी पत्नी से पूछता है।
इस बात पर वह चैंक उठती है। हड़बड़ाकर खड़ी हो जाती है। वह कपड़ा पास ही गिर पड़ता है। सहदेव की ओर देखते हुए वह सोच में पड़ जाती है। अन्नहीन स्त्री के समक्ष पर्याप्त सुख हैं। चारों ओर उबलते चावल की गंध, शब्द। वह सिर नँवाकर सहमति प्रकट करती है। फिर भी औरतजात की सोच आसानी से समाप्त होने का नाम नहीं लेती। वह चूल्हे के समीप बैठी अपनी बेटी पर निगाह डालती है। अन्त में घबराकर पति से पूछती है, ‘‘तो इ हरेनवा अचानक एतना भला आदमी कइसे हो गया ? पैसा होवे तो का है, इन्सान का सुभाव तो नहीं बदलता।’’
सहदेव कोई उत्तर नहीं दे पाता। तेज निगाहों से बच्चों और उनकी माँ की ओर देखता है। दुर्गा अस्थिर थी। वह पुनः कहती है, ‘‘इतना तंगी का दिन में मेला रहे ही दो। पइसा बचेगा।’’
‘‘काहे, पइसा का अभाव तो अब रहबे नहीं करेगा।....... हरेन उ को देखे चाहता है। कह रहा था कि छुटपन में देखा है।’
इस बात पर दुर्गा चुप कर गई और दोनों हाथों से सिर के चिपके बालों को छुड़ाकर खुजलाने लगी। आगे कुछ सोच नहीं पायी वह। भूख से बुरा हाल था। इधर-उधर भात की गंध पसरती जा रही थी। सहदेव स्तब्ध बैठा हुआ था। चारों ओर अँधेरा गहराता जा रहा था। हवा बिल्कुल नहीं थी जैसे पेड़-पौधों ने उन्हें रोके रखा हो।
भोजन करते समय सहदेव लक्ष्मी से कहता है, ‘‘पेट भर के खा लियो। कल बहुते चलना पडे़गा।’’
‘‘तुम्हारा सब बात समझ का बाहर है। खाने को घर में जुटाता नहीं है और मेला देखने का पड़ा है।’’ दुर्गा कह उठती है।
‘‘तू चुप कर। खा रही है तो चुपचाप खा। दिमाग में कुछ ढूकता नहीं तुमरा।’’ सहदेव रूखाई से कहता है।खाते-खाते वह अपने पत्तल से लक्ष्मी के पत्तल में भात डाल देता है। दुर्गा देखकर भी कुछ नहीं कह पाती। हाड़-चाम में आबद्ध छाती धड़क उठती है। वह अपने सिर में भारीपन महसूस करती है।
सुबह होते ही वह बेटी के साज-सँवार में जुट जाती है। उसे लालधारी की साड़ी पहनाती है, बालों को सँवारती है। पुराने बक्से के एक कोने में चूहे का कुतरा एक पीला ब्लाउज था। उसे भी पहनाती है। दोनों पाँव में गहरा आलता और छोटे से माथे पर उसी आलता से एक लाल टीका लगा देती है जैसे पूर्व दिशा से गहरे लाल रंग का सूर्य लक्ष्मी के माथे का टीका लगा रहा हो। निहायत कोमल प्रकाश में लक्ष्मी प्रतिमा के मानिन्द दिखने लगी थी। सहदेव के टूटे हुए घर में छोटे माथे पर लाल टीका और दोनों पाँव में आलता लगाकर नये प्रकाश में दुखी लड़की धरती हो जाती है, सुबह की धरती।
‘‘लड़की केतना सुन्दर दिख रही है ?’’‘‘हाँ ।’’ सहदेव इतना भर कहता है।
‘‘विवाह के लायक हो गई है। सोलह-सतरह का दिखती है। उहे जबर बाढ़ में पैदा हुई थी। यहाँ मजिस्टरी साब आय रहे थे। चैदह साल होहिए गए होंगे।’’
सिर हिलाकर सहदेव दुर्गा की बातों का समर्थन करता है।भूखमरी से ग्रस्त इस इलाके में कितने लोग होंगे ? अपने पिता के साथ लक्ष्मी मेला देखने जा रही है। बरामदे के धूल पर उसके नर्म पाँव के निशान पड़ते जाते हैं। टेढ़े-मेढ़े पद्चिन्ह आगे बढ़े चले जाते हैं। नीम धूल के बाद बैशाखी आकाश के नीचे वे पद्चिन्ह।
‘‘पैदल चल सकेगी न ?’’ पिता के पूछने पर लक्ष्मी सर झुकाकर हामी भरती है। टूटी हुई झोपड़ी के सामने खड़े होकर दुर्गा उन्हें जाते हुए देखती है। उसका मन भर आता है। कुछ अजीब-सा महसूस होता है उसे। लक्ष्मी के माथे का टीका, संतरी रंग का प्रकाश पूरब दिशा में फैल रहा है। सूर्य देवता देर से ऊपर की ओर बढ़ें ताकि उसकी बेटी को कष्ट न हो। वह मेला देखने जा रही है।
दोनों ओर देर तक धान के खाली खेत, पानी के लिए आकाश की ओर नज़रें गड़ाए हुए। पूर्व के घने वन से सूर्य देवता लगभग एक हाथ ऊपर उठ चुके हैं। रास्ते में कहीं-कहीं विशाल वट और पीपल के पेड़ खड़े हैं। उसकी नरम छाया में पैदल-यात्रा। खेत में हल लेकर चले जा रहे हैं इक्का-दुक्का लोग। उनमें से एक पुकारता है, ‘‘अरे ओ सहदेव, कहां जा रहा है?.... ससुराल का ?’’
सहदेव मुस्कराकर रह जाता है। कोई उत्तर नहीं देता। लक्ष्मी सिर नँवाये चली जा रही है। जिनके पास हल है, वे बड़े घरों में काम करते हैं। पैसे की कोई किल्लत नहीं। सहदेव मन ही मन कहता है, शैलो होता तो हम भी दिखा देते। बड़े लोग शैलो पंप के जरिये पाताल का पानी ऊपर तक ले आते हैं और हरिणडांगी, मानिकपुर, चंदनपुर के अकालग्रस्त अन्न्हीन भूमिहीन लोगों का समूह अपने पीछे भूखे घर में भूखा परिवार छोड़कर भटकता फिरता है।
‘‘उ सब ताड़ का पेड़ देख रही है न, उसी के दूसरा तरफ मानिकपुर है। उहाँ पर जात्रा (नाटक) हुआ था, याद है?’’लक्ष्मी अपने आँखें उस ओर घुमाती है। बहुत दूर मैदान के पार धुँधली काली छाया ताड़ के पेड़ के पीछे फैली हुई है। इसी काली छाया से मानिकपुर की सीमा लगती है। वह चलते-चलते देखती है कि पीली धूप चारों ओर फैल गई है। वह कह उठती है, ‘‘याद है। मैं गई थी। ए बार भी जाऊँगी।’’
सहदेव तेजी से चलने लगता है। अतः लक्ष्मी को भी चलना पड़ता है।
सहदेव ने कहा, ‘‘जल्दी-जल्दी चलो जासे कि धूप तेज होने के पहिले लोआदा पहँुच जाँय। उहाँ से दू कोस और रास्ता है।’’
लक्ष्मी के चारों ओर पीली धूप है, हवा भी। अतः उसे अधिक कष्ट महसूस नहीं होता।
सहदेव ने कहा, ‘‘इ देखो, साल का खंभा गाड़ के गरमिंट ने इलिक्ट्री की तार लगायी है। लाइट तो अइबे नहीं किया। जाने कौन उ सब तार काट के ले गया।’’
लक्ष्मी ने देखा कि लम्बे-लम्बे साल के खंभे नंगे खड़े हैं।
यह सब देखते-देखते पिता की कदमों के पीछे-पीछे कभी लड़खड़ाती तो कभी अँचल सँभालती लक्ष्मी तेजी से बढ़ी जा रही थी।
‘‘इ देख मंदिर। माँ तालन्दा। शीतला माँ को प्रणाम करो।’’
रास्ते के किनारे जैसे जमीन फोड़कर निकला था एक बड़ा-सा मंदिर। उसके शिखर पर हमेशा धूप रहती है। लक्ष्मी ने गले से आँचल लपेटते हुए माथा टेका। सहदेव अपलक देवी को पूजकर दूसरी ओर देखते हुए बुड़बुड़ता है, ‘‘मन का सब इच्छा पूरा करती है इ देवी। जो माँगेगी उहे मिलेगा।’’
दोनों मंदिर से आगे बढ़ गए। बाजार में एक भी आदमजात नहीं थी। जो थे वो सिर्फ कुंडली मारकर सुस्ताते कुत्ते। धूप में चाँदी की चमक थी। बाप-बेटी ने पाँव की गति बढ़ा दी।‘‘इ देखे, इ है शीशगढ़ का पोस्टाफिस। यहाँ पे चिट्ठी एक बार डालो तो विलायत तक पहुँच जाता है, समझी। ऐसा करामाती मास्टरबाबू है। उ देखो खड़े हैं’, उँगली के इशारे पर लक्ष्मी हैरान होकर मास्टर बाबू की ओर देखती है। पोखर के घाट पर खड़े लुंगी बाँधते हुए वे इधर ही देख रहे थे। उसे शर्म महसूस होती है। दोनों हाथों छाती दबाए तेज कदमों से आगे बढ़ती चली गई।
पीले रंग का पोस्ट-आफिस पार कर वे बहुत दूर तक चले आए। चलते हुए लक्ष्मी अचानक खड़ी हो जाती है और अपने बाप को इशारे से दिखाती है, ‘‘उ देखो, पनियल साँप ने मछरी धर रखी है। ओह, कइसे छटपटा रही है ?’’
सहदेव ने गौर किया कि कीचड़ में से निकला एक काला पतला साँप सूखे में आकर मछली को निगलने की कोशिश कर रहा था। उसने कहा, ‘‘अरे तू इससे डर गई का? पोखर का साँप का कामे है मछरी पकड़ना।’’
लक्ष्मी सिहर उठती है। अगर इ मछरी टेंगरा होती न तो मजा चखा देती साँप को। अपन तेज काँटा से उसको घायल कर देती। इस तरह वे बहुत दूर तक निकल आए। सूरज के तेज प्रकाश में लक्ष्मी चारों ओर देखकर अचंभित होती है। इसके पहले ऐसा कभी देखा नहीं। एक-दो बार हरिणाडांगी मार्ग पर मैदान पार कर जात्रा देखने गई थी पर वह तो रात में। तब सब कुछ अँधेरे में था।
‘‘इ देख इ किलाब (क्लब) है।’’
लक्ष्मी को फिर से आश्चर्य होता है। ‘‘उहे रास्ता है का, पहिचाना ही नहीं जाता।’’
‘‘पहिचान कइसे हो। तब तो सब ही पानी में डूबे रहा।’’
‘‘ए बारी भी कुछ मिलेगा का बापू ?’’लक्ष्मी उत्सुक होकर पूछती है।
‘‘हाँ, बाढ़ तो अइबे करेगा। सो मिलेगा ही । उस नहरी का कटान करने से सब ही ठीक हो जाएगा पर गौरमिंट काटेगी नहीं।’’
लक्ष्मी का यह इलाका अपरिचित जान पड़ता है। दोनों ओर बगैर धान के खेत के बीच में ऊँचा डिस्ट्रिक बोर्ड का रास्ता। गाँव के लोग इसे बाँध का रास्ता कहते हैं। घुटने तक धूल, लगातार तेजी से बहता पसीना। सूर्य देवता ऊपर आ गए हैं। धूप तेज हो गई है। रास्ते के किनारे एक बड़े से मौलश्री पेड़ के नीचे ढेर सारे फूल बिखरे पड़े हैं। हवा में उन फूलों की गंध तैर रही है। यह हवा लक्ष्मी को अपने घर की याद दिलाने लगती है और वह उदास हो जाती है। तेज धूप से थकान उतर आयी है और सिर नीचे की ओर झुक-सा गया है। फिर भी वह आगे बढ़ी जा रही है। भूख से बेहाल देह सुस्ताना चाहती है।
सहदेव ने कहा, ‘‘बस कुछ कदम और। कांसाई पार होते ही लोआदा पहुँच जाएंगे।’’सहदेव कांसाई नदी के बारे में बतलाने लगता है। लक्ष्मी सम्मोहित-सी आगे बढ़ने लगती है। फिर नदी पर एक ऊँचा बाँध दिखाई देता है। सहदेव दूर की ओर अपनी तर्जनी से संकेत करता है, ‘‘उ जो रहा... नदी दिखाई देने लगी है। चल अब तो पहुँच ही गए।’’
लक्ष्मी उस ओर निगाह उठाती है। घने वृक्षों की ओट में ऊँचा बाँध दिखाई दे रहा था। नदी कितनी पास है। अचानक ‘राम नाम सत्य’ सुनकर वह चैंक उठती है और अपने बापू के बगल आकर खड़ी हो जाती है। तिरछे मैदान के किनारे-किनारे एक मृत महिला को रामसीढ़ी पर लिटाकर कुछ लोग पास से गुजरते हैं। लक्ष्मी दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करती है। महिला के पाँव रामसीढ़ी से निकलकर हिल रहे थे। लक्ष्मी ने देखा कि दोनों पाँव पर आलता के गहरे लाल रंग थे। वह अचानक अपने पाँव की ओर देखने लगती है और द्रवित हो उठती है। धूल धूसरित पाँव में उसके आलता का रंग लुप्तप्राय सा था।
‘‘किस गाँव से है ?’’‘‘नरहरिपुर की।’’
‘‘का हुआ था ?’’ सहदेव के इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने तत्क्षण नहीं दिया। वे तेजी से आगे बढ़ गए। फिर उनमें से एक ने कहा, ‘‘गले में फंदा डाल लिया था। एक अच्छी भली औरत को अभावग्रस्त दशा में मरना पड़ा। गले में रस्सी डालकर झूल गई।’’
लक्ष्मी अपने बापू का हाथ थाम लेती है। लोग शव का उठाये फिर से मैदान में उतर जाते हैं। कांसाई के किनारे रेत में उसे जलाएँगे।
सूर्य के गरमाने के कारण हवा भी गरम हो उठी थी। वे नदी के किनारे पहुँचते हैं। लक्ष्मी पूछती है, ‘‘बापू, और केतना दूर रह गया मेला?’’सहदेव चुप रहता है।
‘‘एगो फीता खरीद दोगे बापू, लाल फीता ?’’
सहदेव फिर भी चुप है। लक्ष्मी ने देखा कि उसके बापू का चेहरा रूखा होता जा रहा है। हर कदम पर देह झुकी जा रही है। वह झुका-झुका आगे बढ़ता है।
जहाँ पर राह नदी की छाती पर उतरती है वहाँ एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। सहदेव वहाँ रुक गया। वहाँ पाँच व्यक्ति बैठे हुए थे। एक ने मुस्कुराकर पूछा, ‘‘यही तेरी लक्ष्मी है न,
सहदेव ?’’
वे सभी लक्ष्मी को घूरे जा रहे थे और वह भय से सिकुड़ती चली जा रही थी।
‘‘हाँ।’’
‘‘इतनी देर कर दी आने में ?’’
‘‘टाइम तो ठीके दिया था मैंने।’’ सहदेव ने धीरे से कहा।
‘‘आधे घंटे की देरी हुई है।’’ एक व्यक्ति ने कलाई घुमाकर घड़ी देखी। पाँचों लक्ष्मी को जौहरी की तरह परखते हैं। फिर वे आगे बढ़ते हैं।
अब लक्ष्मी आगे-आगे भाग रही है और उसके पीछे पाँचों व्यक्ति और उसका बाप। वह नदी की ओर उतर जाती है। नदी बैशाख का जलता आसमान लिए सपाट पड़ी हुई थी। निर्जल, शून्य, सूखी--रेत ही रेत। धूप में चुंधियाती रेत। ऊपर बरसती आग। भूखे इनसान की तरह नदी आकाश की ओर निगाहें टिकाये हुए थी। लक्ष्मी तेज कदमों से आगे बढ़ती है, ताकि जल्दी से मेले तक पहुँच जाय। गरम रेत में उसके पाँव धँसे चले जा रहे थे। बड़ी मुश्किल से वह आगे बढ़ पा रही थी। एक गहरे बादामी रंग का गिद्ध अपना पंख फैलाए चमकती रेत के एक कोने में उतर आता है। वहाँ कुछ और गिद्ध पहले से थे। पंख फैलाए कुछ गिद्ध छलांग लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। एक दूसरे को भगाने की कोशिश करते हैं और एक कर्कश चित्कार हवा में फैल जाती है। लक्ष्मी बदहवाश है, इसलिए न देख पाने के कारण अनायास उधर ही चली जाती है। उसका बाप बहुत पीछे छूट जाता है। वह गिद्धों का शोर सुनकर ठहर जाती है। घूमकर दाहिने ओर देखती है। रेत पर क्या है वह? एक बच्चे की देह किसी सियार ने रात को रेत से बाहर निकाल दिया था। वहाँ अब गिद्धों का पहरा था। जलती रेत पर छिन्न-भिन्न देह देखकर लक्ष्मी डर से भागना चाहती है तभी गर्म रेत में उसके पाँव धँसते चले जाते हैं। वह डर से चीखती है। उसकी चीख सुनकर सहदेव दौड़ा चला आता है। लक्ष्मी अपने बाप को जकड़ लेती है। डर से उसकी सारी देह नीली पड़ गई थी। थरथर काँप रही थी वह। सहदेव देखता है कि उसकी बेटी के पाँव में लगी महावर मिट गई है, माथे पर बिंदी भी नहीं है। सावधानी से सँवारे बाल धूल धूसरित होकर सारे चेहरे पर बिखरे पड़े हैं। आंचल रेत में पड़ी हुई है। अब हवा में असहनीय गर्मी थी। ऊपर प्रखर धूप और पाँव के नीचे तपी हुई रेत। चारों ओर दूर तक रेत ही रेत।
‘‘बापू अब हम मेला नाहीं जाएँगे। हमरा के घर ले चलो।’’ लक्ष्मी की चीख से सहदेव निरूत्तर है। वह मजबूरी में रेत पर खड़ा है क्योंकि कमर में उसने बीस रूपए खोंस रखे हैं और पिछली रात को खाये हुए चावलों का स्वाद अभी भी जिह्वा पर मौजूद है। वे पाँचों व्यक्ति रेत पर उछलते हैं। उछलते -उछलते उसके पास पहुँचते हैं।‘‘अरे ओ सहदेव, क्या हुआ ? तेरी बेटी रो क्यों रही है ?’’
मूल बांग्ला:अमर मित्र
अनुवादः रतन चंद ‘रत्नेश’
रतन चंद 'रत्नेश'
ratnesh1859@gmail.com


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