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बुलबुल

प्रकाशन :बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
मूल कहानीकार: हैंज़ क्रिश्चियन एंडरसन
अनुवाद- द्विजेंद्र ‘द्विज’

चीन में, आप जानते हैं, सम्राट एक चीनी है और उसके आसपास के सब लोग भी चीनी ही हैं। कहानी जो मैं आपको सुनाने जा रहा रहा हूँ,वर्षों पहले घटी थी, इसलिए इसे भूल जाने से पहले ही इसे सुन लेना अच्छा रहेगा। विश्व में सबसे सुन्दर था सम्राट का महल । यह राजभवन समूचा चीनी-मिट्टी का बना था, और बेशक़ीमती था, परन्तु इतना नाज़ुक और भुरभुरा कि जो भी इसे एक बार छू लेता था, दूसरी बार के लिए सावधान हो जाता था। उद्यान में अत्यन्त अद्भुत फूल थे जिन पर आकर्षक चांदी की घंटियाँ बंधी हुई थीं जो बजती रहती थीं ताकि उधर से गुज़रने वाले का ध्यान फूलों की ओर अवश्य जाये । वास्तव में सम्राट के उद्यान में सब कुछ दर्शनीय था और यह इतना फैला हुआ था कि स्वयं माली को भी इसके दूसरे छोर का पता नहीं था । इसकी सीमाओं से आगे निकल कर जाने वाले यात्री जानते थे कि आगे विशाल वृक्षों वाला एक भव्य जंगल था जिसकी ढलान गहरे नीले सागर तक जाती थी और बड़े विशाल जहाज़ उन वृक्षों की छाया तले होकर गुज़रते थे । ऐसे वृक्षों में ही किसी एक पर एक बुलबुल रहती था जो इतना सुरीला गाती थी कि बेचारे मछुआरे, जिन्हें ढेरों काम करने को होते, उसे सुनने के लिए  रुक जाते, और कहते "क्या यह बहुत सुरीली नहीं है?" परन्तु जब फिर से मछलियाँ पकड़ने लगते तो अगली रात तक इस पंछी को फिर भूल जाते फिर अगली बार इसे गाते हुए सुनकर चकित होते, "कितना विलक्षण है बुलबुल का गाना !"

सुदूर देशों से यात्री सम्राट के शहर में आए; शहर, राजभवन और उद्यानों की प्रशंसा की परंतु जब उन्होंने बुलबुल को सुना तो यही कहा कि बुलबुल सबसे बढ़िया है। और अपने-अपने घरों को लौट कर अपने देखे हुए का वर्णन किया, विद्वान लोगों ने किताबें लिखीं जिनमें शहर, राजभवन और उद्यानों का वर्णन किया, परंतु वे बुलबुल का वर्णन करना नहीं भूले थे जो कि वास्तव में एक महान आश्चर्य था । कवियों ने गहरे सागर के निकट जंगल में रहने वाली बुलबुल के बारे में पद्य रचे । किताबें समूचे विश्व तक पहुँचीं और कुछ सम्राट के हाथ भी आईं; अपनी सोने की कुर्सी में बैठा सम्राट इन किताबों में अपने शहर, राजभवन और उद्यानों के भव्य वर्णन को पढ़ता हुआ, प्रशंसा भाव में झूमने लगा परंतु जैसे ही उसने पढ़ा " बुलबुल सबसे सुन्दर है" वह चकित हो कर बोला," यह क्या है। मैं तो बुलबुल के बारे में कुछ नहीं जानता। क्या ऐसा कोई पंछी मेरे साम्राज्य में है? और वह भी मेरे उद्यान में? मैंने तो कभी इसके बारे में नहीं सुना।लगता है कुछ किताबों से सीखा जा सकता है।

"तब उसने अपने एक सामंत को बुलाया जो इतना कुलीन था कि अगर उससे निम्न दर्ज़े का अधिकारी बात करता या कुछ पूछता तो वह कहा करता था "उँह" जिसका अर्थ कुछ भी नहीं होता। "इन किताबों में बुलबुल नाम के एक अद्भुत पंछी का वर्णन है।" सम्राट ने कहा, " कहते हैं मेरे विशाल साम्राज्य में पाई जाने वाली सर्वोत्तम वस्तु वही है।मुझे इसके बारे में क्यों नहीं बताया गया?"

"मैंने तो कभी नाम भी नहीं सुना" अश्वारोही सामंत ने उत्तर दिया, "उसे कभी आपके दरबार में प्रस्तुत ही नहीं किया गया।" "आज शाम को हम उसे अपने दरबार में हाज़िर चाहेंगे। "सम्राट ने कहा, "सारी दुनिया मुझसे बेहतर जानती है कि मेरे पास है क्या!" अश्वारोही सामंत ने कहा "मैंने कभी उसके बारे में नहीं सुना,फिर भी मैं उसे ढूँढने का प्रयास करूँगा।" परंतु बुलबुल मिलती कहाँ? सामंत सीढ़ियाँ चढ़ा-उतरा, राजभवन के गलियारों में घूमा; सबसे पूछा लेकिन बुलबुल को कोई नहीं जानता था । सामन्त ने वह वापिस लौट कर सम्राट को बताया कि बुलबुल तो किताब लिखने वालों की मात्र कपोल-कल्पना है ।" महाराजाधिराज को किताबों में लिखी हर बात पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिए; कई बार ये किताबें कल्पित होती हैं या काली कला।" "परन्तु जिस किताब में मैंने उसका वर्णन पढ़ा है," सम्राट ने कहा "मुझे जापान के महान शक्तिशाली सम्राट ने भेजी है और इसलिए इसमें झूठ तो हो ही नहीं सकता। हम बुलबुल का गाना सुनेंगे, उसे आज शाम हमारे दरबार में होना चाहिए। वो आज हमारी कृपा-पात्र है और अगर वह नहीं आई तो सारे दरबारी रात्रि-भोज के शीघ्र बाद कुचल दिए जाएँगे।"

"जो आज्ञा" सामंत चिल्लाया,और वह फिर राजदरबार की तमाम सीढ़ियाँ चढ़ा-उतरा सभी कक्षों व गलियारों को फलाँगता हुआ; और उसके पीछे-पीछे भागे आधे दरबारी जिन्हें कुचला जाना पसन्द नहीं था। अद्भुत बुलबुल जिसे दरबार के इलावा सारा संसार जानता था  के बारे ज़ोरदार पूछताछ हुई।

अंतत: पाकशाला(रसोई) में उन्हें एक नन्ही निर्धन बालिका मिली, जिसने कहा, "हाँ,मैं बुलबुल को अच्छी तरह जानती हूँ; वह वास्तव में अच्छा गाती है हर शाम मुझे अपनी ग़रीब बीमार माँ के लिए मेज़ों  पर बचा हुआ खाना ले जाने की अनुमति है; वह सागर-तट पर रहती है । लौटते हुए मैं थक जाती हूँ और जंगल में विश्राम करने बैठती  हूँ और बुलबुल को गाते हुए सुनकर मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं यह मुझे अपनी माँ के चुंबन-सा लगता है।" "नन्ही नौकरानी," सामन्त ने कहा, " मैं तुम्हें रसोईघर में पक्की नौकरी दिला दूँगा तुम्हें  सम्राट को रात्रिभोज करते हुए देखने की अनुमति होगी अगर तुम हमें बुलबुल के पास ले चलो; क्योंकि बुलबुल को राजदरबार में गाने के लिए बुलवाया गया है।" वह जंगल को चल दी जहाँ बुलबुल गाती थी और आधा दरबार उसके पीछे-पीछे चल दिया। जैसे ही वे आगे बढ़े एक गाय के रँभाने की आवाज़ आई। "ओह!" एक युवा दरबारी ने कहा, "अब हमें बुलबुल मिल गई है, छोटे-से प्राणी में कितनी अद्भुत शक्ति है; मैंने अवश्य इसे पहले भी गाते हुए सुना है ।"

"नहीं, यह तो बस गाय के रँभाने की आवाज़ है" नन्ही बालिका ने कहा "अभी तो हमें राजभवन से बहुत दूर जाना है।"

तभी दलदल में कुछ मेढ़कों के टर्टराने की आवाज़ आई। "सुन्दर!" युवा दरबारी ने कहा, "अब मैं बुलबुल को गाते हुए सुन पा रहा हूँ, यह गिरजे की घंटियों की-सी टन-टन है।"

"सुनो,सुनो! वो रही बुलबुल," लड़की ने कहा "वो बैठी है बुलबुल, "टहनी से चिपके हुए धूसर रंग के एक पंछी की ओर इशारा करते हुए उसने कहा। "क्या यह संभव है?" सामंत बोला," मैंने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि छोटी-सी, सादा-सी साधारण-सी यह चीज़ बुलबुल होगी। ज़रूर इसने इतने राजसी लोगों को अपने आस-पास देख कर अपना रंग बदल लिया होगा।"

"नन्ही बुलबुल" ऊँची आवाज़ में लड़की ने उसे पुकारा " हमारे अत्यन्त कृपालु सम्राट चाहते हैं कि तुम उनके सामने गाओ।"

"मैं बड़ी ख़ुशी से गाऊँगी।" कहते हुए बुलबुल ने आनंदित होकर गाना आरंभ कर दिया।

यह तो छोटी-छोटी कांच की घंटियों के बजने की आवाज़ है।" सामंत ने कहा, "और देखो उसका छोटा-सा गला काम कैसे करता है। हैरानी की बात तो यह है कि हमने इसे कभी पहले क्यों नहीं सुना; आज दरबार में यह बहुत कामयाब होगी।"

"क्या मैं एक बार फिर सम्राट के सामने गाऊँ?" यह समझते हुए कि शायद सम्राट भी वहीं है, बुलबुल ने पूछा।

"मेरी श्रेष्ठ नन्ही बुलबुल," सम्राट ने कहा, "मुझे तुम्हें आज शाम को दरबारोत्सव के लिए आमंत्रित करते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। तुम्हें दरबार में अपने मोहक गाने से राजकृपा की प्राप्ति होगी।"

"मेरे गीत हरे जंगल में अधिक सुंदर गूँजते हैं।" बुलबुल ने कहा; लेकिन फिर भी वह राजदरबार में स्वेच्छा से गई जब उसे सम्राट की इच्छा का पता चला।

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  द्विजेन्द्र ‘द्विज’
द्विजेन्द्र द्विज
राजकीय पालीटेक्निक,
काँगड़ा-176001 (हिमाचल प्रदेश)
dwij.ghazal@gmail.com
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