शहादत दिलाने वाले

प्रकाशन :10/19/2010
मूल: उर्दू : सआदत हसन मंटो
अनुवाद: केवल गोस्वामी

मैं गुजरात काठियावाड़ का रहने वाला हूँ तथा मैं जन्म और व्यवसाय से बनिया हूँ। पिछले वर्ष जब इस उपमहाद्वीप के विभाजन की बात शुरू हुई तो कुछ देर के लिए मेरा धंधा ठप हो गया।

ठप नहीं हुआ, मैंने ग़लत कहा शायद, लगभग ठप हो गया कहना ठीक होगा, क्योंकि मेरी गुज़र-बसर अच्छी तरह से हो रही थी। गुप्त रूप से कोकीन का मेरा धंधा चल रहा था और उससे मुझे किसी क़िस्म का नुकसान नहीं था। आख़िर जब उन्होंने देश के विभाजन का निर्णय ले लिया और लाखों लोग सीमा पार करके जाने लगे तो मैंने ख़ुद से कहा-‘‘चलो मियाँ पाकिस्तान भी देख लें। वे इसे पवित्र भूमि कहते हैं, तुम्हारे जैसे सीधे सादे आदमी के लिए वहाँ कुछ-न-कुछ ज़रूर होगा।’’

मैं यहाँ बड़े पैमाने पर विचार करने के लिए आया था। लाहौर पहुँचते ही मैंने स्थितियों का जायज़ा लेना शुरू कर दिया और शरणार्थियों की सम्पति अलॉट कराने के बारे में सोचने लगा। प्रिय पाठको अगर बात आपकी समझ में नहीं आयी तो मैं समझाता हूँ। सीधे-सच्चे व्यक्ति ने ख़ुद को दबे कुचले शरणार्थी के रूप में पेश किया। जिसकी पीछे लाखों की सम्पति और नकदी छूट गयी थी, किन्तु सीमा पार करते समय उससे सम्बन्धित सभी कागज़ात भी गुम हो गये थे। इसलिए उस सबकी भरपाई के लिए सीधे सच्चे इन्सान ने पाकिस्तान सरकार से यह गुज़ारिश की कि उस अनगिनत सम्पति के एवज़ में उसे यहाँ पर कुछ ज़मीन-जायजाद दी जाय।

इस सबके लिए अफ़सरों की भरपूर चापलूसी की आवश्यकता होती है। और मैं इस प्राचीन कला में निपुण था। इसलिए मुझे ज़ल्दी ही एक अच्छा-ख़ासा मकान अलॉट हो गया। शीघ्र ही उसे बेचकर मैंने शुद्ध लाभ प्राप्त किया। दलित शरणार्थी की भूमिका से मैंने कई मकान, कई दुकानें अपने नाम अलॉट करायीं।

धंधा कोई भी हो कड़ी मेहनत ही सफलता की कुंजी होती है। और प्रिय पाठको मुझे यह बताने में कतई हिचक नहीं कि मैंने अपने इस नये धंधे में जी तोड़ मेहनत की। कभी रिश्वत, कभी नाइटक्लब और कभी-कभी नाच-गाने की महफ़िल। मुझे इस धंधे के सारे गुर मालूम थे और ज़ल्दी ही सभी अफ़सर और क़ारिन्दे मेरे तलवे चाटने लगे। मैं जहाँ भी जिस शहर में भी गया मेरी निगाह हमेशा उस शरणार्थी सम्पति की तलाश में रहती थी जो मेरे नाम अलॉट हो सके।

चलती का नाम गाड़ी है। एक वर्ष में मैंने दो सौ हज़ार रुपये जमा किये। मेरे पास वह हर चीज थी जिसकी मनुष्य कल्पना करता है- एक आलीशान मकान, लम्बा-चौड़ा बैंक बैलेंस, ढेरों नौकर-चाकर, एक ख़ूबसूरत कार, फ़ैक्टरियों और दुकानों से तो दिन-रात रुपयों की बारिश होती थी, उसकी चर्चा ही अलग है।

यह सब कुछ मेरे पास होते हुए भी दिल के किसी कोने में हल्क़ी-सी ख़लिश रहती थी। जिन दिनों मैं कोकीन का धंधा करता था तब भी रह-रहकर दिल में हल्क़ी-सी ख़लिश रहती थी, लेकिन अब तो इस दर्द की इंतहा हो गयी थी। छाती पर यही एक गूमड़ था। भारी वेदना। मैं समय-समय पर इसके बारे में गहरा सोच-विचार करता था-‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है?’

मेरे बारे में यह कहा जाता है कि मैं बहुत क़ाहिल इन्सान हूँ, जब भी कोई सवाल मेरे मन में उठता है तो उसका जवाब ढूँढे बग़ैर मुझे चैन नहीं पड़ता। मुझे चिंता के साथ-साथ हैरानी भी होने लगी।

क्या यह कोई प्रेम-प्यार का रोग है? हाय, यह हो भी सकता है। मेरी कोई प्रेमिका जो न थी। मेरी पत्नी का देहान्त बहुत पहले गुजरात के काठियावाड़ में हो गया था, लेकिन जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है मुझे औरतों की कभी कोई कमी नहीं रही। मसलन माली की बीवी थी। हाय उसका क्या कहना। यह मेरे और आपके बीच की बात है, मैं ऐसी औरत चाहता था जो जवान होने के साथ-साथ सलीकेदार हो! काबलियत और नस्ल? धत्। मैं इन छोटी बातों पर कभी तवज्जो नहीं देता था।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा मैं एक तीव्र बुद्धि व्यक्ति हूँ समस्या की जड़ में जाये बग़ैर मुझे चैन नहीं पड़ता, फ़ैक्टरियाँ ज़ोरों पर थीं, दुकानें दौलत बरसा रही थीं। इसीलिए मेरे पास सोचने के लिए फ़ुर्सत-ही-फ़ुर्सत थी। जायक़ा बदलने के लिए मैंने चिंतन की चादर ओढ़ ली। आख़िरकार मेरी समझ में यह बात आ गयी कि मैंने हाल ही में कोई नेक काम नहीं किया।

उन दिनों गुजरात काठियावाड़ में मैंने कई नेक काम किये थे। मसलन जब मेरे दोस्त पांडुरंग की मौत हुई तो मैंने उसकी बीवी की दो साल तक ख़ूब देखभाल की। जब विनायक की लकड़ी की टांग टूटी तो मैंने चालीस रुपये में उसे नयी टांग ख़रीद दी। और जमनाबाई से सौदा पटा तो छह महीने तक मैंने उसके डॉक्‍टर की फ़ीस दी।

किन्तु यह सब बहुत पहले गुजरात काठियावाड़ में हुआ था। इस पवित्र भूमि पर आने के बाद मैंने कोई नेक काम नहीं किया था। अब मुझे यक़ीन हो गया था कि मेरी गुमनाम बीमारी का यही एक मात्रा कारण है।

सबसे पहले मेरे दिमाग़ में विचार आया कि ग़रीबों में ख़ैरात बाँटकर मैं इसका निदान करूँगा, लेकिन शहर की सैर करने के बाद मुझे लगा कि सड़क पर चलने वाला हर दूसरा आदमी भिखारी है- ‘‘इनमें से कितनों को मैं खाना-कपड़ा दे सकता हूँ?’’ मैंने ख़ुद से कहा।

फिर मैंने लंगर खोलने की बात सोची- ‘पर इस लंगर से क्या होने वाला है?’ मैंने ख़ुद को समझाया, इन चपातियों के लिए मैं इतना आटा कहाँ से लाऊँगा? अगर आटा मैं काले बाज़ार से ख़रीदता हूँ तो एक हाथ से मैं पाप करूँगा दूसरे से ग़रीबों को खाना खिलाऊँगा! नहीं, नहीं, सीधा-सच्चा इन्सान इन दोनों में से कोई काम नहीं करेगा।

बहुत माथा-पच्ची करने के बाद मैं इस नतीज़े पर पहुँचा कि सभी नाख़ुश हैं- पटरी में सोने वाला भी और बँगले में रहने वाला भी। पैदल चलने वाले इंसान को शिकायत है कि उसके जूते का तला घिस गया है और कार में चलने वाले आदमी के पास शिकायत है कि यह दो साल पुराना मॉडल है।

मैंने सोचना शुरू किया और ख़ुद को दुख दर्द के समुद्र में डुबो दिया। आप भले ही मुझसे सहमत न हों किन्तु क्या आप कभी किसी शरणार्थी कैम्प में गये हैं? मैं गया हूँ और मैं इस नतीज़े पर पहुँचा हूँ कि ज़्यादातर भूखे नंगे शरणार्थिर्यों को मुफ्त की रोटी ने तबाह कर दिया है। दिन भर जुआ खेलने और एक-दूसरे को गाली-गलौज करने के अतिरिक्त वे कुछ नहीं करते। इस प्रकार से निठल्लों का समूह भला सरकार के हाथ कैसे मज़बूत कर सकता है? मैंने मन-ही-मन कहा- ‘‘ख़ैरात बाँटना नेक काम कभी नहीं हो सकता।’’

हैजे की महामारी से अस्पताल भरे पड़े हैं। मेरे मन में विचार आया कि अस्पताल बनवाने चाहिये। इस सोच में मैं एक क़दम आगे बढ़ गया। मैंने पूरी योजना बना ली और अस्पताल की बिल्डिंग बनवाने के लिए टंेडर मँगवा लिये। मैंने तमाम अर्जियों की फ़ीस इकट्ठी करने की योजना बनायी और फिर अपनी एक छोटी-सी कन्सट्रक्शन कम्पनी खोल ली। अपना टेंडर ही पास कर दिया। आख़िरकार मुझे इस तर्क की वास्तविकता समझ में आ गयी। अस्पताल बनवाकर मैं बेकार ज़िंदगियों को जीवनदान दूँगा और इस प्रकार पहले से अधिक जनसंख्या की मारी कौम का बोझ बढ़ाऊँगा।

मैंने मस्जिद बनवाने का विचार त्याग दिया। मैं सन्तोषजनक नेक काम न ढूँढ पाने के कारण निराश हो गया था कि खुदा ने मुझे रोशनी की किरण दिखायी। अचानक मस्तिष्क में यह महान विचार आया कि मुझे जनसंख्या बढ़ाने के बजाए जनसंख्या घटाने में अपना योगदान देना चाहिये। अब मुझे इस बुद्धिमतापूर्ण विचार को अमल में लाने की चिन्ता सताने लगी।

पहले मैंने सोचा एक-एक ग़रीब आदमी के पास जाकर उसे आत्महत्या के लिए उकसाना चाहिये। इससे कौम का भी भला होगा और उन्हें दुखों से मुक्ति भी मिल जायेगी। आपको विश्वास नहीं होगा कि मेरी यह नेक सलाह मानने के लिए एक भी तैयार नहीं हुआ।

मसलन इस पटरी पर हमारी एक पुरानी जानकार पड़ी है! वह शायद मेरा कोई भी तर्क सुनने के क़ाबिल नहीं थी, इसलिए मैंने उसे उठाकर कार में बिठाया और रेल की पटरी पर आती हुई गाड़ी के सामने लिटा दिया। जानते हैं यह भयानक बूढ़ी खूसट बिजली की फुर्ती से उठी और रात के अन्धेरे में मेरी ओर देखकर गुर्राती हुई भागने लगी। शुक्रिया का एक शब्द भी उसने नहीं कहा।

मैंने जी-जान से कोशिश की। नगर की पटरी पर केले और खरबूजे के छिलके इस हल्क़ी-सी उम्मीद के साथ बिछा दिये कि इन पर तो फिसलकर किसी भिखारी की हड्डी-पसली तो टूटेगी पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ।

केले और खरबूजे के छिलकों के साथ-साथ यात्रा करते-करते मुझे शहर की पुरानी बस्ती के दिल में एक खस्ता हालत बिल्डिंग दिखाई दी, सैकड़ों छोटे-छोटे कमरे। भुरभुरी दीवारें, टपकती हुई छतें शायद यही मेरे सपनों की मंज़िल थी। अब मैं तमाम नेकियों को दफ़नाता हुआ नेक काम कर सकता था। मेरी अनुभवी आँखों ने यह तुरन्त परख लिया कि चैमासे की पहली बारिश के साथ तमाम छतें गिर जायेंगी। इसलिए यह बिल्डिंग मैंने दस हज़ार रुपये में ख़रीद ली और एक हज़ार कम फटेहाल ग़रीबों से पाँच रुपये महीना किराये पर कमरे उन्हें दे दिये। मैंने दो महीने का किराया पेशगी लिया। अब आप लोग हिसाब करते रहिये।

इससे पहले कि दो महीने समाप्त हों। बारिश शुरू हो गयी। और मेरी बिल्डिंग की छतें गिरने लगीं। मलबे के नीचे सात सौ मर्द-औरत और बच्चे दब गये।

मेरा गुमनाम दर्द काफ़ी हद तक थम गया। मैंने सात सौ जीवों को शहीद बनाकर जनसंख्या कम कर दी थी और इस सौदे में मेरी कानी कौड़ी ख़र्च नहीं हुई थी! सिर्फ बनिये का बेटा ही एक हल्क़े से झटके के साथ यह सब कर सकता है।

उसके बाद जब भी जहाँ भी मुमकिन होता, मैं अपना खाली समय कौम की ख़िदमत में लगाता, प्रतिदिन मैं दो-तीन लोगों को शहादत पाने में मदद करता।

मैं एक विशाल भवन बनवा रहा हूँ। दो लाख रुपये का ठेका मेरी अपनी कम्पनी के पास है। जिसमें से पिचहतर हज़ार रुपये सीधे मेरी जेब में जायेंगे। मैंने इसका इन्श्योरेंस करवा दिया है। मेरी अनुभवी भविष्यवाणी है कि जब तक तीसरी मंज़िल बनेगी एक झटके के साथ पूरी बिल्डिंग नीचे आ जायेगी, आप जानते ही हैं। मैंने नकली सीमेंट का प्रयोग किया है। इस पर तीन सौ लोग काम कर रहे हैं और मुझे पूरा यक़ीन है कि उसमें से हर आदमी को शहादत मिलेगी। अगर कोई विरला उसमें से बच निकलता है तो वह महापापी होगा और खुदा ने अपने अनंत विवेक द्वारा उसे शहादत के योग्य नहीं समझा होगा। (कथादेश)


  केवल गोस्वामी
जे-363, सरिता विहार,
मथुरा रोड नयी दिल्ली-110076
kevalgoswami@gmail.com
 
         
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