मानव के बढ़ते स्वार्थ अनियन्त्रित क्रियाकलापों से परेशान पशु -पक्षियों ने आखिर कोई न कोई रास्ता निकालने का निर्णय लिया। कब तक अत्याचार सहेंगे। प्रतिदिन हम लोंगो के खाने-पीने और रहने के स्थान कम होते जा रहे हैं। हम चुपचाप देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते हैं। इस सब पर विचार के लिए आने वाले रविवार को एक सभा करने का निश्चय हुआ। सभा में जंगल के सभी जानवरों -पक्षियों को बुलाया गया ।

रविवार के दिन जंगल के बिल्कुल मध्य में स्थित पीपल के पेड़ पर बड़ी चहल-पहल थी। सबके सब जानवर उसी के नीचे इकट्ठे हो रहे थे। सिन्टू खरगोश , भीमू सियार, झगड़ू शोर, चिंगाड़ हाथी, कलूटी बिल्ली सहित चटकू गोरैया, भोलू कौआ, अनार रानी, झरबेरी बहना आदि पेड़ और पक्षी इकट्ठे हुए थे। जंगल की इस सभा में जब सभी पहुंच गए; तो सिन्टू खरगोश ने सभा प्रारम्भ करते हुए कहा-

‘‘ भाईयों ,आज कैसा समय आ गया है, कि धरती मां का तापमान बढ़ रहा है। आसमान की ओर देखो तो काला धुंआ ही धुंआ दिखता है। जंगल में आग लगायी जा रही है। यही नहीं हम सबमे से कौन कब मानव के स्वार्थ की भेंट चढ़ जाये । कुछ कहा नहीं जा सकता।’’

‘‘ हां बात तो तुमने ठीक ही कही, सिन्टू, मुझे ही देखो, मैं उतना ही शिकार करता हूं जितनी आवश्यकता होती है। शिकार के बाद अपनी गुफा में पड़ा रहता हूँ । उधर मनुष्य है कि सभी कुछ अपने लिए इकट्ठा कर रहा है। वर्षों के लिए सुख-सुविधाएं अभी से जुटा रहा है। जंगल के जंगल नष्ट हो रहे हैं। और तो छोड़िए, हमारे अनेक साथियों को अपने स्वार्थ के लिए मार डाला है। फिर भी हम सन्तोष धारण किये हैं।’’ झगड़ू शेर ने अपने विचार रखते हुए कहा।

‘‘हमारी तो जान जाती है। उनको आनन्द आता है। हमने सोचा था कि मनुष्य उन्नति करेगा उतना ही हमें सुख शांति मिलेगी। लेकिन हो रहा है उल्टा। विज्ञान के विकास के बाद तो हमारे लिए खाने व रहने की समस्या उत्पन्न हो रही है। चटकू गोरैया को देखो-

‘‘अपना घोंसला बिजली के खम्बे पर बनाकर रह रही है। अनेक साथी जहरीले धुंए से बीमार हो रहे हैं ।’’ अनार रानी बोली।

‘‘ अनार रानी , आपने बिल्कुल ठीक कहा है, मैं फलों का राजा हूँ लेकिन ईंट- भट्टों से निकले धुंए से मेरे फल खराब हो रहे हैं। हमारी डालियों पर बसन्त ऋतु में गाना गाने वाली कोयल तो धुंए से सांस तक नहीं ले पा रही है। उसके कराहने को आज की पीढ़ी कूकना- बोलना समझ रही है?’’ आम का वृक्ष बोला।

‘‘ समस्या तो बड़ी गम्भीर है। हम सबको मिलकर कोई न कोई रास्ता निकालना ही पड़ेगा। रास्ता भी ऐसा हो ; कि कोई हानि न पहुंचे । पीपल दादा आप ही हम सबड़े बड़े और अनुभवी हैं। कोई न कोई उपाय सुझाएं।’’ चिंघाड़ हाथी की अनुरोध भरी बातों को सुनकर पीपल दादा पहले तो कुछ देर चुप रहे। फिर वह अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बोले-

‘‘साथियों , मैंने बहुत कुछ देखा व समझा है। कल का मनुष्य आज कितना बदल गया है। स्वार्थी हो गया है। विज्ञान के दुरुपयोग ने हमारी भोजन श्रंखला बिगाड़ दी है। हमारे प्राण वायु के उत्पादन के महान योगदान को भुला दिया है। ऐसे में हम सबको उसे सावधान करना होगा। उसे बताना पड़ेगा कि जो समस्याएं आज हमारे लिए हैं; वही कल तुम्हारे लिए भी हो सकती हैं। हमारे बिना तुम्हारा भी जीवन सुरक्षित नहीं रह पायेगा।

इसलिए उसे भी ध्यान रखना होगा। मान लो उसे एक वृक्ष की आवश्यकता है; तो एक नया पौधा भी लगाओ। सन्तुलन बनाये रखो और सुनिए-

मित्रों, हमारा यह सन्देश छुटकी तितली मनुष्य-मनुष्य तक पहूँचायेगी। उसको समझायेगी , कि जिस तरह मैं फूलों को हानि पहूँचाये बिना उनका रस ले लेती हूँ । वैसा ही तुम हम सभी का करो।

इसी के साथ आज की यह सभा समाप्त होती है।’’ पीपल दादा की सभा समाप्त होने की घोषणा के बाद सभी अपने-अपने घरों की ओर चल दिए।

छुटकी तितली भी मनुष्य-मनुष्य तक सन्देश पहुंचाने के लिए शहर की ओर निकल पड़ी। वह तब से आज तक अपना सन्देश सभी को सुना रही है।

 डॉ. शशांक मिश्र ‘भारती’
दुबौला-रामेश्वर-262529,
पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड)
shashank.misra73@rediffmail.com
 
         
टिप्पणी लिखें