श्रेणियाँ

आशा का दीप

प्रकाशन :रविवार, 23 अक्टूबर 2011
डॉ. शशांक मिश्र ‘भारती’

हुं ओर दीपावली की धूम थी। दीपों का पर्व पुनः आने वाला था। बच्चें अपने-अपने माता-पिता के साथ घरों की सफाई में लगे हुए थे। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी चारों ओर हर्षोंल्लास का वातावरण था। दूकानदार प्रसन्न थे। मोमबत्तियों, पटाखों, झालरों, मिठाईयांे व खील-बताशों की दूकाने सजने लगी थीं। हलवाई लोग भी पीछे न रहे; उन्होंने भी रंग-बिरंगी मिठाईयांे से दुकाने सजा दी। सभी को दीपावली की प्रतीक्षा थी।

इस सबके मध्य कुछ बच्चे कष्ट का अनुभव कर रहे थे। उनके कष्ट का कारण अपने आस-पास के बच्चों का यातना भरा जीवन था। जो दिन-रात अपने मालिक की डांट-फटकार सुनने को विवश थे। बीस-बीस घण्टे काम ऊपर से जूठा व बचा हुआ भोजन।

उनकी चिन्ता थी, कि दीपावली इनकी भी होती है। दीपावली का दीप यह बच्चे भी जलाते होंगे क्या? हम सब की भांति इनको भी छुड़ाने के लिए पटाखे और खाने के लिए खील-बताशें, मिठाईयां भी मिलती होंगी।

ऐसी सभी बातों पर विचार करने के लिए एक बैठक का आयोजन किया गया। बैठक छुट्टी के बाद विद्यालय के समीप लगे हुए बगीचे में बुलायी गई।

बैठक का आरम्भ करते हुए प्रेरणा ने कहा-

‘‘मित्रों हम सब आज यहां पर किसलिए इकटठे हुए हैं । यह लगभग सभी को पता है। फिर भी बता देती हंू- कि आज विश्व के इक्कीसवीं सदी में पहुंच जाने के बाद भी कुछ मित्र हम लोगों की भांति खुशियां नहीं बांट पाते।

उनको दीपावली कैसी है। जानने का अवसर नहीं मिलता। जब हम दीपावली मना रहे होते हैं। वह दीपावली के दिन भी सालों भर की भांति अपने काम मे जुटे होते हैं। उनको यातनाएं दी जा रही होती हैं। पढ़ाई-लिखाई तो दूर की बात है। पर्व-त्यौहार भी नहीं मना पाते।’’

यह सच कहा प्रेरणा, निश्चय ही हमारे सामने यह एक गम्भीर समस्या है। एक कटु प्रश्न है हम सबसे? कि हमारे कुछ मित्र दीपावली मनाना तो दूर उन्हें दीपावली कब आयी गयी पता भी नहीं चलता। इधर हम दीवाली मनाते हैं। उधर उन पर मालिक की डाँट-फटकार पड़ती है। जूठे बरतन साफ कर रहे होते हैं। उपदेश ने अपना पक्ष रखते हुए कहा।

भैया उपदेश ठीक कहते हो, कुछ बच्चों को तो आधी रात तक काम करने के बाद भी भोजन नहीं मिलता। जब हम लोग विद्यालय की ओर आ रहे होते हैं। तो वे विवशता से हमारी ओर देखते हैं। चेतना ने कहा,

ठीक कहा, चेतना दीदी, इस आने वाली दीपावली से पहले ही हम सबको कुछ करना होगा।

इन सबकी विवशता से भरी आंखों में आशा का दीप जलाना होगा। तभी हमारा दीवाली पर दीप जलाना सार्थक होगा। मिलन ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा,

इसके के बाद बनी योजना के अनुसार चार-चार बच्चों की टोलियां बनाई गईं। जिनका कार्य नगर के विभिन्न कल-कारखानों, होटलों, ढाबों ,दूकानों आदि पर काम करने वाले बच्चों की सूची बनाना था। इधर दीपावली का उत्साह तो था ही। इसलिए बच्चों की टोलियां नये उत्साह के साथ अपने कार्य में लग गयी थीं।

दीपावली के दो दिन पहले सभी बच्चों ने अपना कार्य पूरा कर लिया। प्रत्येक टोली की सूची बन गई। कोई बच्चा न बचा था, जो कहीं पर भी काम करता हो अथवा यातना भरा जीवन जी रहा हो।

अगले दिन बच्चे नगर के पुलिस अधीक्षक महोदय से मिले; उनको अपनी योजना समझायी। वह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने बच्चों का उत्साह बर्धन करते हुए कहा-

‘‘बच्चों, आज तुम सबने जिस बुद्धि कौशल का परिचय दिया है। वह प्रसन्नता और गर्व का विषय तो है ही। सच्चा दीपक तो तुम सभी ने जलाया है। इस देश के हर घर-शहर को तुम जैसों की आवश्यकता है।’’

अगले दिन दीपावली पर सभी के उत्साह का ठिकाना न था। प्रेरणा, उपदेश, चेतना, मिलन, शिखर, शिखा आदि उन सभी बच्चों से मिलकर बड़े ही प्रसन्न हुए; जिनको उन्होंने एस0 पी0 के सहयोग से छुड़वाया था। उनमें आशा का दीप जलाया था।

पहली बार खुले में सांस लेकर वह बच्चे भी दीपावली मना रहे थे। कई दिनो तक सभी ने मिलकर खुशियों को बांटा।

  डॉ. शशांक मिश्र ‘भारती’
दुबौला-रामेश्वर-262529,
पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड)
shashank.misra73@rediffmail.com
 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)

RoboForm: Learn more...