एक विद्वान ने कहा है,
"जब तक भय का कारण आ न पहुंचे तब तक उससे बचने का उपाय करते रहना चाहिए किंतु जब वह सिर पर आ ही पहुंचे तो उसे निडर होकर मार भगाना चाहिए।" स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था । बालक नरेंद्र एक दिन काशी में विश्वनाथ मंदिर के परिसर में खेल रहा था । तभी वहां बंदरों का झुंड आ गया । उस झुंड में छोटे-बड़े सभी तरह के बंदर थे । बालक नरेंद्र के पास थोड़े से चने थे । उन चनों को दिखाकर उसने बंदर के एक बच्चे को बुला लिया । छोटा-सा बच्चा चने खाने लगा। बालक नरेंद्र उससे खेलने लगा लेकिन जैसे ही नरेंद्र ने उसे पकड़ा कि वह चीं-चीं करके चिल्ला उठा । बंदरों का सरदार उसकी रक्षा के लिए दौड़ा । उसे देखकर नरेंद्र भागा । बंदरों के सरदार ने उसका पीछा किया । नरेंद्र मंदिर में छिप गया लेकिन सरदार वहां भी पहुंच गया । नरेंद्र फिर भागा और पानी में कूद गया । जब उसे लगा कि बंदरों का सरदार चला गया होगा तो पानी से बाहर निकला लेकिन बंदरों का सरदार फिर आ गया । अब नरेंद्र ने सोचा कि ऐसे काम न चलेगा, जो डर गया, वो मर गया। उसने नाव के चप्पू का मोटा डंडा उठा लिया और बंदरों के सरदार से लड़ने को तैयार हो गया । तब कहीं वह बंदर भागा ।
एक दिन स्वामी विवेकानंद अपने शिष्यों के साथ बैठे भय के विषय में चर्चा कर रहे थे । उन्होंने उपर्युक्त घटना की चर्चा करते हुए कहा, "भय ही पतन और पाप का मुख्य कारण है। भय से ही दुख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती है । इसलिए निर्भय बनो । जो निर्भय होते हैं, भगवान भी उनका ही साथ देते हैं। फिर उन्हें कभी भय नहीं सताता ।" इतना कहकर स्वामी विवेकानंद ने गोपाल नामक एक बालक की कहानी सुनाई ।
बालक गोपाल ने एक दिन अपनी मां से कहा - "जब मैं शाम को पाठशाला से लौटता हूं तो अंधेरा हो जाता है । रास्ता जंगल से होकर गुजरता है इसलिए मुझे अकेले रास्ते में भय लगता है ।" गोपाल की मां विधवा थी, गरीब थी पर भगवान में विश्वास करती थी । वह कृष्ण की पूजा करती थी । उसने उन्हें याद किया और समाधान मिल गया । वह गोपाल से बोली, "डरो नहीं । जंगल में मेरा एक दूसरा बेटा रहता है । वह गाय चराता है । उसका भी नाम गोपाल है । जब भी तुम्हें जंगल से गुजरते हुए डर लगे अपने उसी भैया को पुकार लेना । वह तुम्हारी मदद करेगा।"
अगले दिन पाठशाला से लौटते हुए जंगल में जब गोपाल को भय लगा तब उसने अपने चरवाहे भाई को पुकारा, गोपाल भैया ! क्या तुम यहीं हो ? मां ने कहा था, तुम मेरे भाई हो और मैं तुम्हें पुकार लूं। मुझे अकेले भय लग रहा है।" तभी पेड़ों के पीछे से आवाज आई , "डरो मत छोटे भैया। मैं यही हूं । निर्भय होकर घर चले जाओ ।"
इस तरह रोज गोपाल अपने उस भाई को पुकारा करता और रोज वही आवाज उत्तर देती । एक दिन मां ने कहा कि तुम अपने उसे भाई से सामने आने को कहना। अगले दिन गोपाल ने जब उस भाई को सामने आने को कहा तो उसने कहा, "आज मैं बहुत व्यस्त हूं भैया । नहीं आ सकता ।" पर गोपाल ने हठ किया तो पेड़ों की छाया से ग्वाले के वेश में सिर में मोर पंख पहने, हाथ में मुरली लिए वह भाई बाहर आया । दोनों गोपाल मिलकर बहुत खुश हुए । वे देर तक खेलते रहे । फिर वे रोज ही खेलते ।
पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों को फीस के रूप में कभी-कभी गुरुजी को कुछ देना पड़ता । एक दिन गुरुजी ने गोपाल से कुछ लाने को कहा पर उसकी मां तो गरीब थी । क्या देती ? तब गोपाल ने अपने मित्र चरवाहे गोपाल से समस्या बताई। चरवाहे गोपाल ने उसे मक्खन की एक हंडिया देकर कहा कि तुम यही उन्हें भेंट कर देना ।
गुरुजी ने गोपाल से मक्खन से भरी हांडी ली और उसका मक्खन एक बर्तन में उड़ेल दिया लेकिन आश्चर्य कि हांडी फिर भर गई । गुरुजी ने फिर मक्खन उड़ेला तो हांडी फिर भर गई। ऐसा कई बार हुआ तो गुरुजी ने गोपाल से हांडी के बारे में पूछा । गोपाल ने सब कुछ सच-सच बता दिया । गुरुजी ने कहा कि तुम मुझे जंगल ले चलो और उस भाई से मिलवा दो । गोपाल गुरुजी को जंगल में लेकर आया । उसने भाई को पुकारा लेकिन उस दिन कोई उत्तर नहीं मिला। गोपाल को लगा कि वह गुरुजी के सामने झूठा साबित हो जाएगा इसलिए उसने भाई को पुकारा कि वह सामने आए, वरना गुरुजी मुझे झूठा समझेंगे । तब बहुत दूर से आवाज आई, "गोपाल ! मैं तुम्हारी मां के प्रेम और विश्वास के कारण ही आता था । अब तुम निर्भय हो चुके हो इसलिए मेरे आने की जरूरत नहीं है । जब भी भय लगे, बस मुझे याद करना ।" गोपाल समझ गया कि जो निर्भय होता है उसका साथ भगवान देते हैं। गुरुजी ने कहा, "तुम भाग्यशाली हो गोपाल। भगवान ने तुम्हें निर्भय बनने का मंत्र बता दिया । यह मंत्र सब बच्चों को सीखना चाहिए ताकि सभी भय के भूत को भगा सकें ।" (नई दुनिया से)


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