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टैगोर और शिक्षा

प्रकाशन :बुधवार, 19 अक्टूबर 2011
विजय शर्मा

ज की हमारी शिक्षा पद्धति पश्चिमोन्मुखी है। हम शिक्षा के मूल उद्देश्यों से भटक कर एडूकेशन के उद्योग में खो गए हैं। आज हमारे देश में भी एडूकेशन एक उद्योग है। एडूकेशन इन्स्ट्यूशन्स फ़ैक्टरी हैं। जहाँ छात्र कच्चा माल है, शिक्षक कुशल मजदूर, अभिभावक, समाज स्टेक होल्डर, जिन्हें संतुष्ट करना एडूकेशन का ध्येय है। क्या है स्टेक होल्डर्स की संतुष्टि? मात्र सूचनाओं से लदा-फ़ँदा एक अदद आदमी जो नौकरी पाने की योग्यता रखता है। एक अच्छा तगड़ा पे पैकेज पा लेना जीवन की सार्थकता, पढ़ाई का ध्येय बन गया है। शिक्षा के सारे उद्देश्य – शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक – बस आर्थिक उद्देश्य में सिमट कर रह गए हैं। हमारे स्वप्नों को शिक्षा ने सिकोड़ दिया है। हमारे देश में यह उद्योग खूब फ़ल-फ़ूल रहा है। बात कम्प्लीट मैन, सम्पूर्ण आदमी गढ़ने की होती है और तैयार एक ऐसा आदमी करते हैं जो ज्यादा से ज्यादा उत्पादन कर सके। ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमा कर दे सके। नॉलेज कमीशन की बात होती है, सर्व शिक्षा अभियान चलता है, शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाता है और भी न जाने कौन-कौन सी योजनाएँ दिन-रात बनती रहती हैं पर नतीजा वही ढाक के तीन पात।

शिक्षा के लिए हम पश्चिम का मुँह जोहते रहते हैं। स्वतंत्रता के पश्चात हमारी शिक्षा का पूरा का पूरा ढ़ाँचा ब्रिटिश पद्धति पर आधारित था। चलो बात समझ में आती है। काफ़ी समय हम उनके गुलाम रहे और उन्हीं की शिक्षा को पा कर आंदोलन किए गए और स्वतंत्रता हासिल की गई। मगर जो शिक्षा स्वतंत्रता के दीवानों ने इंगलैंड से पाई थी वही शिक्षा भारत में लागू नहीं हुई। भारत में लागू हुई मैकाले की बनाई नीति। स्वतंत्र भारत की शिक्षा भी वही बनी रही। फ़िर जब विश्व पर इंग्लैंड का वर्चस्व कम हो गया और अमेरिका की चौधराहट बढ़ गई तो हमारे शिक्षाविद अमेरिका की शिक्षा पद्धति के मुरीद हो गए। एक-एक कर सारे फ़ार्मूले वहाँ से उठा कर यहाँ बिना जाने समझे रोपने लगे। अमेरिका का सामान्य बच्चा बिना कैल्कूलेटर के दो और दो जोड़ कर नहीं बता सकता है और हम उन्हीं की शिक्षा पद्धति अपनाते हुए प्राइमरी तक किसी बच्चे को फ़ेल न करने का निर्णय ले चुके हैं। हाई स्कूल में बोर्ड की परीक्षा लिखना अनिवार्य नहीं है। छात्र शिक्षक का मूल्यांकन करेगा यह विचार भी हॉट केक की तरह अमेरिका से ही आया है। क्या इस मूल्यांकन का सीधा संबंध छात्र-शिक्षक संबंधों पर नहीं पड़ेगा? क्या परीक्षा के नतीजे इससे प्रभावित नहीं होंगे? मगर यह अब सोचने-समझने की जहमत कौन उठाए। बना बनाया मॉडल विदेश से मिल गया उठा लाए। रोप दिया बिना मिट्टी-पानी-हवा की जाँच-परख के। बिना समाज और संस्कृति की विशेषताओं का ध्यान किए हुए।

अमेरिका उपभोक्तावादी, उपयोगितावादी और व्यक्तिवादी संस्कृति का देश है। जॉन ड्यूवि का प्रयोजनवादी सिद्धांत वहाँ पनपा। वहाँ के लिए बहुत अच्छा और उपयोगी हो सकता है। कार्ल रोजर की शिक्षा वहाँ के लिए सार्थक हो सकती है। हमारे देश में यह कैसे सकारात्मक नतीजे देगी? जहाँ एक क्लासरूम में ६०-६५ बच्चे होते हैं। इन मॉडलों को यहाँ गाड़ने के कारण शैक्षिक-सामाजिक से ज्यादा राजनैतिक-डिप्लोमैटिक है। यदि हमने अमेरिका की चौधराहट को न स्वीकारा तो हमें विश्व बैंक, यूनेस्को जैसी संस्थाओं से अनुदान-उधार कैसे मिलेगा। शिक्षा के लिए मिली उधार-अनुदान की राशि कुछ लोगों के घर परिवार तक कैसे पहुँचेगी। स्विश बैंक में कुछ लोगों का बैलेंस कैसे बढ़ेगा।

भारत में शिक्षा विचारक नहीं हैं या नहीं हुए हैं ऐसी बात नहीं है। यदि हम याद करने का कष्ट करें और वैदिक, बौद्ध शिक्षा काल को छोड़ दे तो भी पाएँगे कि दयानंद सरस्वती, राजा राममोहन राय, विवेकानंद, रमण महर्षि, रवीन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गाँधी जैसे शिक्षा विचारक हमारे यहाँ हुए हैं। जिन्होंने भारत की संस्कृति- समाज को ध्यान में रखते हुए शिक्षा की रूपरेखा बनाई है। इसमें भी यदि हम चाहें तो सबको छोड़ दे सकते हैं। मगर दो महान व्यक्ति ऐसे हुए हैं जिन्होंने न केवल शिक्षा पर विचार किया वरन अपने आदर्शों को व्यवहार का जामा भी पहनाया। दोनों समकालीन थे। महात्मा गाँधी और रवींद्रनाथ टैगोर दोनों ने भारत के लिए व्यावहारिक शिक्षा का प्रतिपादन किया। दोनों की शिक्षा पद्धति में कई मूलभूत अंतर थे मगर दोनों का लक्ष्य एक ही था। मानव का सम्पूर्ण विकास। महात्मा गाँधी शिक्षा के अपने प्रयोग दक्षिण अफ़्रीका में प्रारंभ कर चुके थे। जिनकी पूर्णाहूति हुई वर्धा के सेवा ग्राम में। बुनियादी शिक्षा का स्वप्न साकार हुआ। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने अनुभवों और अविचारों को मूर्तिमान किया शाँतिनिकेतन में जो आगे चल कर विश्वभारती बना। दोनों कानून की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए। एक पढ़-लिख कर सफ़ल वकील बना। दूसरे को औपचारिक शिक्षा कभी रास न आई। कानून की जगह साहित्य से लगाव लेकर लौटा और कविताएँ करने लगा, विश्वकवि कहलाया।

गाँधी ने अपनी शिक्षा में पश्चिम के मॉडल को लगभग पूरी तरह से नकार दिया और कुटीर उद्योग पर अपनी बुनियादी शिक्षा का ढ़ाँचा खड़ा किया। मगर टैगोर ने दोनों का सम्मिश्रण किया। दोनों की विशेषताओं को जोड़ा। कलकत्ते में ६मई १८६१ को एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्में रवींद्रनाथ को स्कूली शिक्षा कभी रास न आई। पिता समझदार थे, पुत्र की शिक्षा का प्रबंध घर पर ही कर दिया। रवींद्र ने जो थोड़े से कष्टकर दिन स्कूल में गुजाए वे उनकी पूँजी बन गए। अपने अनुभवों से सीख लेकर उन्होंने एक ऐसी शिक्षा की नींव डाली जो बच्चों के स्वाभाविक विकास पर आधारित है। एकाध शिक्षक ने उनकी प्रतिभा और रूचि को पहचाना था, वे उन्हें कक्षा के दमघोटूँ वातावरण से हटा कर कभी कुमारसंभवम कंठस्थ करने बैठा देते कभी मैकबेथ का अनुवाद करने। मगर शीघ्र ही उनके स्कूल के शिक्षकों ने उन्हें शिक्षा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। अच्छा ही हुआ वरना दुनिया एक प्रतिभा से वंचित रह जाती। उसे शाँतिनिकेतन जैसे अनोखे शिक्षा मंदिर का कभी पता न चलता। बालक रवींद्र की भाषाओं में सहज रूचि थी। वे बाँग्ला, संस्कृत, इंग्लिश के प्रकांड विद्वान थे। संगीत उसकी रगों में बसता था, कला उनका प्राण थी।

पारिवारिक वातावरण ने उन्हें संस्कृति की समस्त सम्मृद्धि को हृदयंगम करने का भरपूर अवसर दिया। बंगाल नवजागरण काल में उनका परिवार सामाजिक-धार्मिक और सांस्कृतिक नवीनता के लिए प्रसिद्ध था। इन्हीं नवीनीकरण के क्रियाकलापों के बीच उनका पालन-पोषण हुआ। यहीं उन्हें गत्यात्मक मुक्त शिक्षा का मूलमंत्र प्राप्त हुआ। आगे चलकर यही उनकी शिक्षा का आदर्श बना। इसी मॉडल को उन्होंने शाँतिनिकेतन में स्थापित किया। परिवार में ही उन्हें स्वतंत्रता क महत्व ज्ञात हुआ जो उनकी शिक्षा का आधार बना। उन्होंने संवेदना और तद्नुभूति के विकास के लिए कक्षा के महत्व को समझा और यह भी जाना कि अपनी संस्कृति तथा प्रकृति से अंतरंग संबंध होना कितना आवश्यक है। अपने परिवार में चलने वाले वैश्विक क्रियाकलापों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भागीदारी करते हुए उन्होंने सामान्य संकीर्णता को नकारना सीखा। विशिष्ट रूप से उन्होंने किसी भी उस संकीर्णता को नकारा जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है। उनके लिए शिक्षा अपनी संस्कृति की विशेषताओं की सराहना करते हुए अन्य संस्कृतियों के संपन्न आयामों की सराहाना करने का साधन है।

बीस साल की उम्र में रवींद्र का पहला कविता संग्रह आया और शीघ्र ही वे प्रसिद्ध हो गए। चालीस की उम्र में रवींद्रनाथ ने अपने पिता की खाली पड़ी भूमि पर दस बालकों के साथ अपनी शिक्षा की नींव डाली। उनके पिता ने यह जमीन आध्यात्मिक उन्नयन के कार्यों के लिए रख छोड़ी थी। शाँतिनिकेतन आश्रम १९२१ में विश्वभारती में परिणत हो गया। पूर्व-पश्चिम का अनोखा संगम उनके यहाँ देखने को मिलता है। अपने शिक्षा संस्थान की आर्थिक और प्रचार-प्रसार की खातिर उन्होंने ब्रिटेन, अमेरिका के साथ-साथ यूरोप और एशिया के कई देशों की यात्रा की। कई स्थानों पर भाषण दिए। दस बालकों से प्रारंभ यह विद्यालय हजारों के शिक्षा का इंतजाम करता है। वैसे आज का विश्वभारती वह नहीं है जिसकी टैगोर ने स्थापना और कल्पना की थी। आज उसकी उतनी ही खुशबू बची है जितनी किसी फ़ूल को यदि कुछ दशकों के लिए किसी किताब के पन्नों में दबा कर रखने से बचेगी।

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  विजय शर्मा
151 न्यू बाराद्वारी, जमशेदपुर 831001
मोबाइल :09430381718
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