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हिन्दी का भविष्य – भविष्य की हिन्दी

प्रकाशन :बुधवार, 1 सितम्बर 2010
जयप्रकाश मानस

हिन्दी का भविष्य : भविष्य की हिन्दी !

यह हिन्दी पट्टी में विमर्श का सबसे पुरातन किन्तु शाश्वत विषय रहा है । इस पर जाने कबसे विमर्श हो रहा है । और निष्कर्ष दिये जा रहे हैं । शायद आज़ादी के प्रथम दशक के बाद से ही । कदाचित् लेखक-बिरादरी और शिक्षक-चिंतक-अनुयायी समाज भी इससे सहमत हों । शायद अधिकांश हिन्दीभक्त भी सहमत हों कि वे उन सारे कारणों के बारे में भी भली-भाँति जानते हैं कि हिन्दी की अवमानना और अवहेलना के मूल में कौन-सी ताक़तें क्रियाशील हैं ? इसमें भी शक़ की गुंज़ायश नहीं हो सकती कि ऐसे सारे लोग उनके निदानात्मक उपायों से भी वाकिफ़ है । किन्तु सबसे बड़ी विडम्बना तो यही है कि ऐसे सारे लोगों में हिन्दी भाषा, शिक्षा, संस्कृति और संस्कार के प्रति तेज़ी से उदासीनता बढ़ती चली जा रही है। परिवर्तनशीलता की अकाट सत्यता के वाबजूद समूची हिन्दी-संस्कृति की दिशा आज अनजाने दिशा की ओर गतिशील है । यह मात्र हिन्दी का ही नहीं, इस महादेश के जीवन-मूल्यों के प्रति आस्थाओं के भोथरे होते चले जाने का भी संकट है ।

मैं यहाँ यह भी कहना चाहूँगा कि हिन्दी के समक्ष संकट, संकट से उबरने के उपायों और वांछित व्यवहारों का संज्ञान होने के बाद भी हममें से बहुतेरे हिन्दी के अलावा विदेशी-वाणी के शरण को वाज़िब क़रार देने लगे हैं । हो सकता है कि इसके मूल में अर्थशास्त्र या उपयोगितावादी दबाब हों । किन्तु यह हमारी गुलाम मानसिकता से पनपे द्वैध का प्रतिफल भी तो हो सकता है। जिसमें हम सार्वजनिक तौर पर तो भारतेंदु की उक्तियों का शाब्दिक स्मरण करते रहते हैं किन्तु उनके भावार्थों, निहितार्थों को आज भी अपने जीवन-व्यवहार में उतार नहीं सके हैं । यह गुलाम मानसिकता ना भी हो तो हमारी अकादमिक दरिद्रता तो है ही कि हम ज्ञान और विज्ञान के लिए हिन्दी को असमर्थ मानते रहे । परिणाम में आज हमें एक अच्छा तर्क मिल गया है - कि अँगरेज़ी के बिना विकास और प्रौद्योगिकीय उत्थान असंभव है । यदि यह सच भी है तो इसके चलते क्या हमने आज़ादी के बाद से आज तक, अपनी उच्च शिक्षित पीढ़ी को क्रमशः हिन्दी से परे ले जाने का षडयंत्र नहीं किया है ? जबकि इस बीच हम ज्ञान विज्ञान के सारे पाठ्यक्रमों को हिन्दी में रच सकते थे ।

बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है ।

क्या इससे हमारे देश के करोड़ों युवा, उनका घर-परिवार और संसार उस भाषा के परिसर में नहीं धकेल दिये गये जो मूलतः हिन्दी पर राज करनेवालों की भाषा रही है । हिन्दी ही क्यों, वह सारे विश्व में उपनिवेशवाद का विचार देने वाली भाषा भी रही है । वह बाज़ारवाद और पाश्चात्य जीवनशैली को विकसित करने वाली भाषा भी रही है । दरअसल पश्चिम की अँगरेज़ी आदि भाषा में पूर्व संसार की प्रमुख भाषा यथा हिन्दी की तरह मानवीय उदारता, सहिष्णुता और प्राकृतिक आध्यात्मिकता केंद्र में रही ही नहीं । वहाँ प्रजातांत्रिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा तो है किन्तु एकांकी विकास की अमानवीय चेष्टा के लिए उकसानेवाली दृष्टि भी बहुतायत है । वहाँ भौतिकता को सर्वोपरि माना गया है और यहाँ अध्यात्म को ।

अँगरेज़ी अहम् की भाषा है । हिन्दी वयम् का संस्कार देनेवाली संस्कृत से दीक्षित भाषा है । यही हिन्दी और पश्चिम की भाषा का बुनियादी फ़र्क है । यह सच है कि औद्योगिक क्रांति और उससे जुड़े विकास में जो अधुनातन ज्ञान और विज्ञान सिरमौर बना वह अँगरेज़ी के मुखारविंद से ही उच्चरित हुआ था । औद्योगिक विकास के माड़ल को स्वीकार करने वाले देशों के समक्ष यह मजबूरी ज़रूर रही कि इसी भाषा से आने वाले विचारों, उपायों, टेक्नीक, निष्कर्षों को अपनाकर अपनी बहुसंख्यक आबादी को रोज़ी-रोटी दी जाये । किन्तु इससे परिणाम के प्रति शायद ऐसे देश जागरूक नहीं थे । और यदि थे तो भी लाचारी इतनी ज्यादा थी कि अँगरेज़ी के रूप में वहाँ एक विदेशी भाषा को गाँव- गली और घर-द्वार तक पहुँचने का रास्ता खुल गया और मातृभाषाओं में विकास की क्षमता न्यून होने का भावबोध पनपने लगा । अपनी पृथक और समृद्ध भाषा होने के बाद भी जिन देशों ने अँगरेज़ी को वरीयता दी उसके पीछे विकास और ज्ञान-विज्ञान का अध्ययन महत्वपूर्ण कारण रहा है । किन्तु वे अपनी मातृभाषा के प्रति उदासीन कहाँ हुए ? उन्होंने अपने राज-काज और काम-काज की भाषा के रूप में परायी भाषा को अंगीकार कदापि नहीं किया । वहाँ आज भी मातृभाषा ही सिरमौर भाषा बनी हुई है ।

यहाँ मैं यह भी कहना प्रांसगिक समझता हूँ कि अँगरेज़ी की निरंतर स्वीकार्यता में आधुनिकता मात्र से सांस्कृतिक-मोक्ष की थोथी तलाश की कामना भी रही है । आज़ादी से पहले से ही भारत के बुर्जुआ और तथाकथित पढ़े लिखे अमीरों ने अँगरेज़ी को सभ्रांत भाषा के रूप में मान्यता प्रदान करना शुरू कर दिया था । उसे सबसे पहले देश में ज़मींदारों, रियासतदारों, मनसबदारों ने गले लगाया । आम किसानों, कारीग़रों, मज़दूरों सहित आम भारतीय जन ने नहीं । यह ऐतिहासिक तथ्य है । शायद इसलिए कि वह शासन-अनुशासन व्यापार-वाणिज्य की भाषा प्रतीत हुई । शायद इसलिए भी कि वे स्वयं को आम भारतीयों के बीच विशिष्ट, सभ्य और आधुनिक दिखाना चाहते थे । यह भी सच है कि सबसे पहले देश के बड़े घरानों के लोग ही अँगरेज़ी शिक्षा के लिए विलायत के दास बने । आम आदमी नहीं । हुआ क्या कि अँगरेज़ी को सभ्यता की भाषा मान ली गई । इससे हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बौनेपन जैसी कृत्रिम मानसिकता को बल मिला और इससे न केवल भाषाओं का अनहित हुआ बल्कि उन भाषाओं में विन्यस्त सभ्यता की उज्ज्वलता भी प्रभावित होती चली गयी । जो आज भी बदस्तुर जारी है ।

हिन्दी की दयनीयता के लिए अधिकांशतः सरकारी उद्यमिता को कटघरे में खड़े करते हैं। उसके बिगडते स्वास्थ्य के लिए अन्यान्य भाषा को गरियाते हैं । हिन्दी ही नहीं, भाषा मात्र बहते नीर की तरह होती है । जब जल ही नहीं रहेगा तो नदी तो सूख ही जायेगी ना ! जब उसे हर मोड़ पर और अधिक जल मिलेगा नहीं तो वह कब तक बहेगी । दरअसल हमने हिन्दी के साथ ठीक वही बर्ताव किया जैसा हम गंगा के साथ करते रहे । उसे माँ जैसी पवित्र भी मानते रहे और उस पर मलमूत्र और क्षत-विक्षत शव भी प्रवाहित करते रहे । गंगा की सफाई के नाम पर घोषणायें और परियोजनायें तो बनती रहीं किन्तु स्वार्थगत राजनीति और कामचोरी से सब कुछ जस के तस है ।

मैं यहाँ एक हालिया उदाहरण देना चाहूँगा । इसमें भाषायी विकास, भाषायी प्रेम और सरकार के मध्य संबंधों की असलियत का पता भी चलता है -

मैंने राज्य के सभी थानों को लिखा कि यदि कोई फ़रियादी अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी आदि भाषा में एफ़. आई. आर. लिखवाये तो उसे उसी भाषा में लिखा जावे । ना कि उसे हिन्दी में लिखवाने या स्वयं लिखने के लिए बाध्य किया जावे । जानते हैं - चार-छह माह गुज़र चुके हैं । मुझे आज तक कोई सूचना नहीं मिली कि अमूक थाने में किसी ने छत्तीसगढ़ी में अपना बयान नोट कराया। हो सकता है यह वास्तविकता का एक पहलू हो । किन्तु संकेत तो मिलता है कि कभी छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया के नारों में बह जाने वाला गाँव-घर का आम आदमी सरकारी कामकाज के अवसरों पर हिन्दी में ही अपनी बात रखना पसंद करता है ।

इस उदाहरण को लेकर मैं यह भी बात करना चाहता हूँ और वह यह, कि आज गाँव-देहात का आदमी भी छत्तीसगढ़ी या अपनी मातृभाषा के बनिस्पत हिन्दी में और वह हिन्दीभाषी है और अँगरेज़ी जानता है तो राजकाज में अँगरेज़ी भाषा में बतियाने में अपनी भलाई देखता है । क्या यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक कमज़ोरी भी नहीं है कि हम अपनी भाषा के व्यवहार क्षेत्रों में भी परायी भाषा को सिर्फ़ इसलिए तवज्जो देते हैं कि वहाँ हम पिछड़े ना समझ लिये जायें । दरअसल यह जो मनोवैज्ञानिक दबाब है यह भाषायी दासता का अनुसरण भी है । यह सिर्फ़ छत्तीसगढ़ी में नहीं, अन्य भारतीय बोली-भाषाओं के व्यवहारकर्ताओं का स्थायी भाव है । यह मनुष्य की आत्महीनता या भाषा की आत्महीनता, बेशक इस पर शोध होना चाहिए ।

हिन्दी भाषा में मिलावट को लेकर भी बहुत बहस होती है । हमें यह स्वीकारना चाहिए कि हिन्दी स्वयं में कोई विशुद्ध भाषा नहीं है । जिसे हम खड़ी बोली कहते हैं वह भी नहीं । कोई भी भाषा यदि वह भाषा तो वह बहता नीर भी है ।हिन्दी भी अपनी पूर्वी और पश्चिम हिन्दी के बोलियों और भाषाओं से लेती देती रही है । क्या ब्रज-अवधी—राजस्थानी-बघेली-छत्तीसगढ़ी आदि के बिना हिन्दी समृद्ध हो सकती थी ? जब आप तुलसी को हिन्दी का महाकवि कहते हैं तो आप हिन्दी नहीं दरअसल अवधी को ही स्मरण कर रहे होते हैं । यदि आप मीरा को हिन्दी की कवयित्री मान रहे होते हैं तो भी आप हिन्दी को नहीं राजस्थानी को भी स्वीकार रहे होते हैं । मुझे एक जिज्ञासा यह भी है कि आख़िर जिसे हम विशुद्ध हिन्दी मानते हैं उसमें ऐसा एक भी महाकाव्य क्यों नहीं लिखा जा सका और लिखा भी गया तो जो रामचरित मानस, सुरसागर या बीजक की तरह पूजनीय नहीं बन सका । यदि ऐसा होता तो खड़ी बोली के उद्भव से लेकर आज तक कम से कम एकाध ऐसी किताब तो अवश्य होती जो लोक के जुबां पर होती । हाँ, पढ़े लिखे और विशुद्धतः कहें तो साहित्यिक दुनिया में ऐसी कई किताबों का जिक्र किया जा सकता है । इससे कोई आपत्ति भी नहीं है ।

मैं इस बहाने कहना यही चाहता हूँ कि हमने हिन्दी में लिखा तो ख़ूब । हिन्दी को कई मोड़ दिये । कई नये कोणों से तराशा । शिल्पगत, रूपगत और विचारगत भी । किन्तु विश्व की दूसरी-तीसरी सबसे बड़ी भाषा होने के बाद भी हमारे हिस्से एक भी नोबुल नहीं है । इसका आशय हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ लेखन का नितांत अभाव नहीं । और पुरस्कारों से भाषा का मूल्याँकन भी नहीं । मैं ऐसा इसलिए कहना चाहता हूँ कि हम हिन्दी की वैश्विकता का मूल्याँकन करते वक़्त उन सारे आँकड़ों को दोहराते हैं कि कितने देश में कितने लोग हिन्दी बोलते, समझते और लिखते-पढ़ते हैं । हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि इतर भारतीय देशों में हिन्दी सिर्फ़ भारतीयों के मध्य मेलजोल की भाषा है । और यह उस पर निर्भर है कि वह हिन्दी में बतियाये या फिर वहाँ की भाषा में । यहाँ एक बात साफ़ तौर पर मानना चाहिए कि प्रवासी देशों की हिन्दीभाषियों में से अधिकांश अपने आर्थिक और व्यावसायिक हित संवर्धन के लिए प्रवास पर हैं । आशय यही कि ये सारे वे लोग हैं जिनके लिए हिन्दी या अन्य मातृभाषा रोजगारमूलक सिद्ध नहीं हो सकी । पीड़ा भले ही ज़रूर हो मातृभाषा की भूमि से दूर रहने की, किन्तु मातृभाषा की अक्षमता का एक बोध उनके मन में स्थायी रूप से घर किया हुआ है । इसे भी स्वीकारना होगा ।

हम हिन्दी के गुणानुवाद करते समय और एक आँकड़ा रखते हैं – 125 से अधिक विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन होता है । हम अक्सर यह बताना भूल जाते हैं कि दरअसल इनमें प्रतिवर्ष कितने छात्र-छात्रायें प्रवेश लेते हैं ? और पारंगत होने पर कितने घर-परिवार, कामकाज, राजकाज में हिन्दी ही बोलते हैं ? ज़ाहिर है कि ऐसे छात्रों के लिए हिन्दी शिक्षण का आधार अनुवाद का टूल्स मात्र है । न कि हिन्दी की संस्कृति का विस्तार्य । एक दर्द भरी सच्चाई यही भी कि आज भी हिन्दी संयुंक्त राष्ट्र संघ में अपना स्थान नहीं ले सकी है ।

हिन्दी के बहाने हिन्दी लेखक बिरादरी पर भी चर्चा करने से हमें गुरेज़ नहीं करना चाहिए कि विचारवाद के सम्मोहन से हिन्दी का विकास तो निश्चित रूप से हुआ है। हिन्दी के मनुष्य को भी नई दृष्टि और विचार-शक्ति मिली है । जीवन और जीवन में फैले चीज़ों को नये नज़रिये से देखने का अवसर मिला है । किन्तु हम लेखकों में शिविरबद्धता भी कम नहीं बढ़ी है। कभी-कभी तो बात इतनी बिगड़ जाती रही है कि हिन्दी सेवियों और पाठकों को हिन्दी के उद्धारक हिन्दी के पथभ्रष्टक नज़र आते रहे हैं । जितनी उठापटक हिन्दी में है उतना शायद अन्यान्य भारतीय भाषाओं और विश्वभाषाओं में नहीं । सच्चाई यही है कि हिन्दी और अँगरेज़ी दोनों में प्रवीण और पूर्ण संभावनाशील नया लेखक बहुत सोच विचार कर हिन्दी के बनिस्पत हिन्दी मातृभाषा होने के बावजूद अँगरेज़ी लेखन की ओर मुड़ जाता है । इस सबके बावजूद हमने पिछली शताब्दियों में अभिव्यक्ति के नये औजारों, विधाओं और प्रयोगों से उसे समृद्ध तो किया ही है । यह भी संतोष जनक स्थिति है ।

प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर हिन्दी या मातृभाषा के माध्यम से पाठ-पठन का अर्थ अपनी जड़ों की पहचान भी है । वह केवल अक्षर ज्ञान को सहजता से जानने-पहचानने का माध्यम मात्र नहीं । मातृभाषा के रूप में हिन्दी का अनुराग अपने होने की विशिष्टता के प्रति भी सतर्कता का परिचायक है । यह आज की कथित वैश्विकता के घटाटोप में राष्ट्रीय अस्मिता अर्थात् भारतीयता को बचाने की ज़द्दोज़हद भी है ।

किसी भाषा में उपलब्ध कार्मिक दक्षता और ज्ञानबद्धता से किसी को परहेज़ नहीं हो सकता किन्तु मनुष्य के लिए मात्र कार्मिक विकास ही सबकुछ नहीं । यदि ऐसा होगा तो सांस्कृतिक बहुलता का लोप हो जायेगा। सांस्कृतिक बहुलता के लोप का मतलब किसी भाषा में विन्यस्त अकूत ज्ञान-विचार-दर्शन-मूल्य का भी लोप होगा । इसलिए हिन्दी भाषा के विकास की दिशा में अब तक की सारी नाकामयाबी के बाद किसी रोज़गारमूलक भाषा के रूप में अँगरेज़ी आदि विदेशी भाषा में शिक्षा और ज्ञान को वांछनीय सिद्ध करने का मतलब मातृभाषा या हिन्दी भाषा का परित्याग नहीं ।

यदि हम हिन्दी के स्थान पर अँगरेज़ी या किसी अन्य भाषा को ही मन और मनीषा की भाषा बनाने पर तुले हुए हैं तो हम अपने संपूर्ण अतीत और ऐतिहासिकता को भी नकारने पर भी तुले हुए हैं । अँगरेज़ी या चीनी या कोई भी परायी भाषा में पारंगत होकर हम अपना अर्थशास्त्र तो सुधार सकते हैं किन्तु सिर्फ़ अर्थशास्त्र से संसार नहीं चलता । जहाँ और जिस भी स्तर पर ऐसा हुआ है वहाँ की सामाजिकी और सांस्कृतिकी ध्वस्त हो गई । वैभव के शिखर पर भी छुछापन पसरने लगी । शायद यही वह कारण रहा है – जिसके लिए आज भी बहुत सारे देश परायी भाषा के रूप में अँगरेज़ी शिक्षा और राजकाज में उसके प्रयोग से स्वयं को अलग रखे हुए हैं । इस रूप में भी क्या ऐसे देशों का विकास धीमा है या बाधित है । शायद कदापि नहीं ।

संचार साधनों से अपेक्षा की गई थी कि वे हिन्दी के विस्तार में मशीनी योगदान देगें । रेडियो, रंगमंच, टेलीविज़न, सिनेमा, अखबारों, पत्र-पत्रिकाएँ, इंटरनेट, ब्लॉगस् और वेबसाईट्स ने इसमें अपना ऐतिहासिक योगदान दिया भी है किन्तु आज का निजी इलेक्ट्रानिक मीडिया अँगरेज़ी के बाज़ारवाद से निर्देशित हो रहा है । यह इस महादेश की महाभाषा के साथ ही घालमेल नहीं, दरअसल यह अँगरेज़ी की वर्चस्ववादिता का सुनियोजित प्लान है जिसका एकमात्र उद्देश्य वैश्वग्राम के दर्शन के सहारे सारे देशों की चेतना और सोच को एक शिल्प में तब्दील कर देना है । ताकि सोचने-विचारने की जो मौलिक परंपरा और जीवन-दर्शन है वह अँगरेज़ी सभ्यता के इशारों पर तब्दील हो सके । यह किन्हीं अर्थों में भाषायी उपनिवेशवादी प्रवृत्ति का हिडन तरीका भी है ।

हिन्दी का भविष्य कैसा होगा और भविष्य की हिन्दी कैसी होगी ? शायद मैने जो कुछ अभी कहा है उससे कुछ संकेत आपको मिल सकते हैं । वैसे यह सब हम आप जानते हैं । और हम आप यह भी जानते हैं कि हम पढ़े-लिखे लगो कुछ करें या ना करें, हिन्दी का कुछ नहीं बिगड़ने वाला....


  जयप्रकाश मानस
एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल,
आवासीय परिसर पेंशनवाड़ा, विवेकानंद नगर,
रायपुर, छत्तीसगढ़-492001
srijangatha@gmail.com
 
         
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