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नक्सलवाद का मालकौंस व्हाया देशराग की अभिव्यक्ति

प्रकाशन :गुरूवार, 1 जुलाई 2010
जयप्रकाश मानस

र्धसत्यों के तर्कों पर कोई लेखक कुछ दिन किसी घाघ राजनीति-कर्मी की तरह पाठकों का मन बहला सकता है, किन्तु अपनी वाग्मिता के कोहरों से सच्चाईयों, वास्तविकताओं और यथार्थों को ढँक पाना नामुनकिन होता है । निजी ख़ुन्नस और अतिरेक अंहकार का दास बनके ऐसे अर्धसत्यों वाले अतिरंजित कथ्यों और तथ्यों की नैया पर सवार होकर भड़ास तो ज़रूर निकाली जा सकती है, कुछ हद तक उथले और सतही पाठकों (जनता) को बरगलाया भी जा सकता है किन्तु वहाँ सिर्फ़ अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के गुमानों की सिद्धि के अलावा कुछ और हासिल नहीं हो सकता, जो कि एक ईमानदार लेखक से सर्वथा अपेक्षित माना गया है । माओत्सेतुंग के शब्दों में – किसी समस्या पर विचार करते समय हमें वास्तविक स्थिति को आधार बनाकार शुरुआत करनी चाहिए न कि परिभाषाओं, मनगढंत और पारंपरिक सोच को आधार बनाकार ।” सच यह भी है कि ऐसे अभिमानों, व्यक्तिगत कुंठाओं को भी जनता (पाठक) भली-भाँति जान-समझ लेती है । यह सब कहा जाना इसलिए लाजिमी है कि कुछ विद्वान (लेखक, कानूनविद् या चूके हुए राजनीतिज्ञ भी कह सकते हैं) नक्सलवाद के मुद्दे पर न केवल अपनी तदर्थवादी सोच के कारण उलजुलूल ज्ञान और जानकारी का तड़का मारे जा रहे हैं बल्कि वे किसी दुष्ट नेता की शैली में भारतीय मनीषा को भी दिग्भ्रमित करने का दिवास्वप्न पाले हुए हैं । शायद ऐसे ही वक्तव्यबाज़ों, मार्गदर्शकों को विघ्नसंतोषी शब्द मौजूं है । ऐसे लेखक विभिन्न माध्यमों में जगह तो बटोर सकते हैं किन्तु वे एक विवेकवान पाठक (जनता) की अनुशंसा कदापि नहीं बटोर सकते ।    

आज चतुर्दिग देशराग वाली अभिव्यक्ति के मार्फ़त नक्सलवाद का मालकौंस गाया जा रहा है । जनपदों में दिल्ली, मुंबई से कानूनविदों-मानवाधिकारवादियों की खेप बुलाकर राजतंत्र को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है । अपने ही संविधान और क़ानून को जनविरोधी सिद्ध किया जा रहा है । शांति और अहिंसा के पहरूओं द्वारा नक्सलवाद का बौद्धिक प्रतिरोध में जुटे पुलिस प्रमुखों की हत्या का खुलेआम ऐलान किया जा रहा है । वह भी गणमान्य बौद्धिकों के अपने ठीहे में - बिना किसी भय के और बिना किसी लोकलाज के । आज दुर्दांत नक्सलियों के विरूद्ध लड़ने वाले जवानों और शहीदों के शोकगीत को पुलिस की विरुदावली घोषित की जा रही है । निहत्थों आदिवासियों की हत्या पर आम जन को मौन और चुप्पी का चालीसा पढ़ाया जा रहा है। प्रजातंत्र के हत्यारों के पक्ष में अनुशंसा के अनुवाद किये जा रहे हैं। माओवादियों के भाषा कौशल और शिल्प की हुबहू नकल करते हुए उन्हीं लोगों द्वारा उस तंत्र को गरियाया जा रहा है, जिसे वे अब तक दुहते रहे या दुहते हुए देखकर भी अनजान बनने का स्वांग भरते रहे । इसे प्रगतिशीलता का मोह कहें या क्रांतिकारी कहाने का फ़ैशन कि माओवाद के प्रवक्ताओं के कोटेशनों से अपनी पुस्तकों का सोहल-श्रृंगार किया जा रहा है । गांधीवाद के दुकानदारों द्वारा गांधी के पाठों को तोड़ मरोड़कर ख़ूनी क्रांति को भी जायज बताया जा रहा है। जो माओवाद से असहमत हैं, उन्हें राष्ट्र का धृतराष्ट्र कहा जा रहा है । ऐन हत्या, विस्फोट, ध्वंसीकरण के समय अराजक तत्वों के प्रलापों को देश-दुनिया में परोसे जा रहा है । इधर नक्सली विस्फोट में जान से खेल जाने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि दी जा रही है उधर इडियट बॉक्स वाले नक्सली कमांडरों का श्रीमुख दर्शन करा रहे हैं या उनके मुधर वाणी सुनाकर जले में नमक छिड़क रहे हैं । गोया यही मीडिया का धर्म हो । गोया यही मीडिया की गत्यात्मकता हो । पुलिस और अर्धसैनिक बलों के साथ बस और रेलवे यात्रा नहीं करने की विदुरनीति सिखायी जा रही है । ताकि माओवाद के शिकार जनता न हो, पुलिस या अर्धसैन्य बल हो तो कोई विशेष बात नहीं । जैसे वे नागरिक न हों । उनके माँ बाप न हों । उनकी कोई दीन-दुनिया नहीं । पुलिस के बहाने प्रजांतंत्र की जिरह तो ख़ूब होनी चाहिए किन्तु वह जिबह जैसा न हो, इसका ख़्याल आख़िर कौन रखेगा ?

नक्सलवाद के समाधान बताने की भावातिरेक और ओजस्विता में खुर्दबीन पकड़कर पुलिस, अर्धसैनिक बलों और तंत्र के पहरूओं की ही खामी गिनायी जा रही है । शोषकों की महाभीड़ में चोला बदलकर रहनेवालों का उवाच है कि पुलिस को नेताओं ने ख़ाकी वर्दी के रूप में शोषक में तब्दील कर दिया है । पुलिस का मुख्य कर्तव्य विमानपत्तनों, रेलवे स्टेशनों औऱ सार्वजनिक कार्यक्रमों से लेकर मंत्रियों के बंगलों में चाकरी करना है । उसे चौराहों, राज्य-सीमाओं पर चौंथ वसूलने का महारोग लग चुका है। आधे से ज्यादा पुलिस अधिकारी दौड़ नहीं सकते । एक चौथाई हृदय रोग, उच्च रक्त चाप, मधुमेह, तनाव, आदि व्याधियों से ग्रस्त हैं । और ऐसे में पुलिस नक्सलियों के गढ़ों को कैसे ध्वस्त कर पायेगी ?जैसे कहने वालों को सदैव निरोग और अज़र-अमर होने का वरदान प्राप्त है । प्रश्नकर्ता के पास प्रमाण नहीं हैं फिर भी वह है कि पुलिस और जवानों के बारे में वैज्ञानिकों की भाँति नित नयी उद्घोषणाएँ पेले जा रहा है । समाज का ‘स’ नहीं जाननेवाला नक्सलवाद का समाजशास्त्र लिख रहा है ।  लाठी-चाकू का नाम सुनकर काँप उठने वाला नक्सलियों से निपटने का का नया नया पैंतरा बता रहा है । एबूंस में उलझानेवाले, बम विस्फोट वाले, बारूदी सुंरग बिछानवाले अगम्य जंगली इलाक़े जैसे संसद का मैदान हो, विधानसभा की दर्शक दीर्घा हो, किसी शहर का जय स्तम्भ चौक हो और जहाँ जैसे सब कुछ पुलिस के नियंत्रण में हो । और यह भी कि जिस पुलिस को शहरी चौक, गली का चौकीदार माना गया है वह एक ही दिन में जंगल और गुरिल्ले युद्ध से पारंगत हो उठे । लाठी लहराकर गुंडे मवालियों को खदेड़नेवाली पुलिस के क़दम रखते ही नक्सली सिर छुपा कर भाग जायें । और यह भी कि यह सब सिर्फ़ किसी पुलिस प्रमुख के चाहने मात्र से संभव हो जायेगा, और वह भी पलक झपकते ही । अर्थात् जैसे वे यह भी कहना चाहते हों कि पुलिस ही जानबूझकर नक्सलवाद से नहीं लड़ रही है ।

प्रश्न यह भी क्यों नहीं उठ रहा कि नेताओं के संरक्षण में पुलिस के अलावा और कई वर्ग भी शोषक बन चुके हैं, इसमें कार्पोरेट घराने, उद्योगपति, व्यापारी, राज्य के विभिन्न विभाग के बड़े अधिकारी, अपराधी गिरोह, सट्टेबाज भी हैं । क्या इस सूची में एनजीओ के कार्यकर्ताओं, गांधीवादियों, लेखकों, छुटभैये राजनीतिज्ञों को राजनेताओं से गलबाहीं करते हुए जनता नहीं देख रही है ? सच्चाई तो यह भी है कि यह वही भारतीय समाज है जहाँ अधिकांश अपराधियों और दोषियों को दंड से इसलिए मुक्ति मिल जाती है क्योंकि तथाकथित बड़े वकील मुद्राराक्षस से वशीभूत होकर अपनी पोटली को और अधिक मोटी बनाने के लिए क़ानून और संवैधानिक का चीर-हरण करने से भी परहेज नहीं करते । गाँव देहात के मरीज़ दर्द से कराहते हुए मरते जाते हैं और बड़े बड़े सरकारी अस्पताल के चिकित्सक हैं कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं, क्योंकि उनपर सिर पर राजनीति गलियारों में विचरण करनेवाले आकाओं, बड़े भैय्यों, दादाओं का वरद हस्त है । इंजीनियर साहब घोटाले पर घोटाले करते चले जाते हैं क्योंकि इससे उनके संरक्षकों की तिजौरी भी भरती जाती है । ज़ाहिर है कई ऐसे प्रकरणों के पीछे राजनीतिज्ञों का ही हाथ होता है । जाहिर है वकीलों, चिकित्सकों, इंजीनियरों से लेकर सभी हितनिष्ठ समूहों का यह कृत्य भी ग़रीब और ग्रामीण भारत के ख़िलाफ गंभीर शोषण का मुद्दा है । किन्तु यह भी अर्धसत्य है । ठीक उसी तरह, जिस तरह हर पुलिस कर्मी भ्रष्ट नहीं। यदि गरीब से गरीब को यहाँ न्याय मिल जाता है तो इसके पीछे भी अल्प फ़ीस में सुख औऱ पुण्य बटोरनेवाले वकील और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं । यदि आदिवासी और पिछड़े इलाकों में सामान्य नागरिकों को न्याय नहीं मिल सका तो इसमें राजनीतिज्ञ, पुलिस से कहीं अधिक वे दलाल औऱ वकील भी उत्तरदायी हैं जिनके लिए वकालत सिर्फ़ रातों रात लखपति या करोड़पति बनने का मशीन था । इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं कि गरीबों का शोषण हुआ, किन्तु शोषण तो न्यायप्रक्रिया से जुड़े लोगों ने भी किया । सिर्फ़ पुलिस, पटवारी, शिक्षक, जंगल विभाग के या स्वास्थ्यकार्यकर्ता ने ही शोषण नहीं किया । शोषण उन स्थानीय जननायकों ने भी किया, जिन के छापों पर भोली भाली जनता पिछले कई चुनावों में मोहर मारती रही । निरीह और निःसहाय जनता के शोषण के कारणों में उन पढ़े लिखे समाज की आत्मकेंद्रिकता भी शामिल है, जिससे सारे समाज में वर्चस्ववादिता का अंधसमर्थन जारी रहा । प्रश्न यह भी उठाना चाहिए कि माओवादियों ने आख़िर इन पचास-साठ वर्षों में कौन सा शोषण नहीं किया ? क्या आज नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के नागरिक माओवाद के मानसिक और आर्थिक गुलामी को नहीं झेल रहे हैं ? जिस कार्पोरेट घरानों और ज़मीदारों को बस्तर में शोषक बताया जाता है उनके नामों की सूची आख़िर क्यों जारी नहीं की जाती । आख़िर इन घरानों के चंदे और सुविधाओं की ओर टकटकी लगाये क्यों शहरी बुद्धिकर्मी देखते रहते हैं ?

कुछ बुद्धिवाद के अजीर्ण से इतने ग्रस्त हैं कि रात-दिन प्रवचन देते फिर रहे है कि उनके अलोकतंत्रीय ‘एकवचन’ से ही लोकतंत्र का उद्धार संभव है । और वही 100 करोड़ जनता वाले देश की अमर वाणी है । देश के ‘बहुवचन’ को वे अपनी तानाशाही से कुचल डालना चाहते हैं – तरह तरह के आरोप लगाकर । यह कैसी बुद्धिजीविता है जहाँ संवेदनाओं की विविधताओं को भी कुतर्कों के सहारे चिढ़ाया जा रहा है । क्या यह माओवादियों की भाषा का अनुकूलन नहीं है जिसमें उनके ख़िलाफ़ उठनेवाली हर आवाज़ को पुलिसिया निरुपित करके कंडम किया जाता है, और उनकी रणनीतियों, नीतियों, तथ्यों के प्रोत्साहन को क्रांतिकारी और जनवाद क़रार दिया जाता है ? इसका साफ़ आशय है कि देश की पुलिस सिर्फ़ डंडा ही बरसाये । बंदूक ही चलाये । संवाद न करे । नक्सलवाद खूनी संघर्ष से जूझनेवाले एकमात्र सरकारी कर्मचारी – पुलिस के पक्ष में भी कोई दो शब्द ना लिखे । लिखे तो सिर्फ़ उनके कृष्णपक्ष की ओर । जैसे समाज के अन्य सभी वर्गों के चरित्र में शुक्लपक्ष का स्थायीभाव है । इसका एक आशय यह भी हो सकता है कि उनकी पुलिस कुंद और मतिमंद हो कर ही रहे । सोचिए तो भला - वे कौन लोग हैं, जो माओवादियों के हिंसक विचारों का जबाब देनेवाले इक्के दुक्के पुलिस कर्मी को भी बोलने के अधिकार से वंचित रखना चाह रहे हैं । आप अपने मन से यह भी प्रश्न करें कि आख़िर ये कैसा प्रजातंत्र चाहते हैं ? जाहिर है - ऐसा प्रजांतंत्र, जहाँ पुलिस सिर्फ़ गोलाबारी करे, शब्दों से दूर किसी चौकी में गूंगे, बहरे की मानिंद बैठा रहे ।

नक्सलवाद का हल तलाशने वाली बुद्धि यदि सिर्फ़ यह कहती है कि भारतीय पुलिस दफ्तरों में ही बैठी रहती है या शेष समय बैठकों, उद्घाटनों, समारोहों, क्लबों, पार्टियों तथा पत्रकारों व नेताओं की परिक्रमा करती है तो सफेद झूठ है । वैसे यह कार्य तो सभी करते हैं- बुद्धिजीवी भी । पुलिस घनघोर जंगलों में अज्ञात शव की रखवाली भी करती है ताकि चील कौव्वे ना नोच लें । समाज के संडाध और सफेदपोश की शिनाख्तगी में वर्षा, शीत, घाम की परवाह किये बिना दर दर भटकती है । और पुलिस के किसी प्रमुख के कार्यों में यह सब शामिल है कि वह बैठकों, उद्घाटनों, समारोहों और पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों के साथ बैठकर भी जनगणमन की गत्यात्मकता और रूढता की थाह लगाती रहे । तब तो ऐसा करना और भी लाजमी है जब उसका कार्यक्षेत्र में हिंसक और आंतककारी उपायों को बुद्धिजीवियों का एक चिन्हित वर्ग विकास के फैंटेसी उपायों के रूप में बहुप्रचारित करता फिरे ।

एक सच सभी जानते हैं कि चाहे पुलिस कामचोर हो, चाहे भ्रष्ट, या बीमार, नक्सलियों से लड़ाई भी वही कर रही है । लड़ेगी भी वही । मोर्चे पर न जनता जायेगी, न ही शब्दजीवी । नेताओं का तो ख़ैर प्रश्न ही नहीं उठता । इस सच्चाई के बावजूद भी यदि बुद्धिजीवी युद्ध के मुहाने पर जान गँवाने के लिए बैठी पुलिस की कुछ कमजोरियों को गिनाने में मज़े लेना चाहता हो, उन्हें हतोत्साहित करना चाहती हो तो उसे इसका भी विकल्प तलाशना होगा कि आपदाओं और ऐसे नक्सली वारदातों से जनता को बचाने के लिए पुलिस या अर्धसैनिक बलों के अलावा क्या कोई आगे आयेगा ? नक्सलियों की ही नहीं हर हिंसा और अराजक गतिविधि की निंदा प्रजातांत्रिक लाजिमी है और यही जनता का स्थैर्य भाव होना चाहिए । यही गांधीवाद भी है । यही बुद्ध का दर्शन भी कहता है । यही भारतीयता भी है । जो प्रजातंत्र को नहीं मानता, जो संविधान के पन्नों को जला कर खिचड़ी पकाता हो, जिसके लिए भारतीय कानूनों का विरोध ही परम कर्तव्य हो, उसका भी तिलक और चंदन लगाकर सम्मान किये जाने की वकालत करना एक तानाशाही दुनिया की ओर जनता  को धकेलने जैसा भी है।

निंदा की निरंतरता से ही जनता हिंसा और अहिसा के मध्य फ़र्क़ करना सीखेगी और अपने लिए जान गँवाने वाली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों के प्रति फ़ख्र करना भी सीखेगी । किसी एक पुलिस अधिकारी से निजी ख़ुन्नस से यदि पुलिस की समूचे महकमे को कायर, भ्रष्ट और बेईमान कहने का अधिकार उसे कम से कम नहीं है जो राबिन्सन क्रुसो की तरह किसी निर्जन टापू में नहीं, अपितु किसी चहल-पहल वाले जनपद में रहना-बसना चाहता है । नक्सली समस्या के समाधान के रूप में पुलिस की भूमिका आख़रि क्यों देखी जा रही है ?, यदि पुलिस नसमस्या के समाधान में कोई रोल अदा नहीं कर पा रही है तो आख़िर उसके विकल्प हटाने की अनुंशसाएँ भी ऐसे बुद्धिजीवियों को करना चाहिए। और ऐसी अनुशंसाओं की सूची में उन बुद्धिजीवियों को भी अवश्य रखा जाना चाहिए जो केवल शब्दों के कोहराम से हल तलाशते हैं । उन्हें यह भी सुझाना चाहिए कि आख़िर हिंसा पर उतारू, संवाद से असहमत गोरिल्ला लड़ाकुओं से उनके अलावा समाज या तंत्र का और कौन सा विंग निपटेगा ? क्या इसके लिए जनता को गोरिल्ला लड़ाकूओं में तब्दील किया जाये, ताकि वे चुपचाप अपने मौत का वरण कर लें। क्या यह सब अन्य किसी विभाग का आदमी कर ले । यदि पुलिस के नाम तमाम दुष्कृतियों के तमगे जुड़े हैं तो वह सारी उपलब्धियाँ भी हैं जिनके बल पर आज भी सबसे पहले कोई फ़रियादी पुलिस के पास जाता है । क्योंकि पुलिस समाज का ही अंग है, किसी पराये समाज और पराये तंत्र का नागरिक नहीं है वह ।


  जयप्रकाश मानस
एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल,
आवासीय परिसर पेंशनवाड़ा, विवेकानंद नगर,
रायपुर, छत्तीसगढ़-492001
srijangatha@gmail.com
 
         
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