(संदर्भ- चिंतलनार में 76 जवानों की निर्मम हत्या)
सुकमा के चिंतलनार जंगल में जो जवान परसों (6 अप्रैल, 2010) बर्बरतापूर्वक मारे गये - शोषक नहीं थे, बुर्जुआ नहीं थे, पूँजीवादी नहीं थे । जिन दरिंदे नक्सलियों ने उन्हें पीठ पीछे से वार किया, उनसे भी उनकी कोई जाति दुश्मनी नहीं थे । जानलेवा संकट की संपूर्ण संभावना के बाद भी जानबूझकर सीआरपीएफ की नौकरी में थे । ताकि देश में शांति और अमनचैन की निरंतरता बनी रहे । ताकि ख़ुशहाली का वातावरण बना रहे । ताकि आम आदमी अपनी गणतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर सके । उन्होंने बंदूक और बारूद की नौकरी का वरण इसलिए भी किया था ताकि उनके ग़रीब माँ-बाप की माली हालत सुधर सके । घर बैठी जवान बहनों के हाथों मेंहदी रच सके । रतौंदी से ग्रस्त बीमार बूढ़ी दादी का ईलाज हो सके । पूरे परिवार को दो वक़्त की रोटी नसीब हो सके। ये जवान कुछ दिन पहले तक जाने कहाँ-कहाँ किस किस आपदा से जूझ रहे थे पर कुछ दिन से वे आदिवासी जनता को आततायी माओवादियों से मुक्त करने के लिए बस्तर के जंगल-नदी-पहाड़ में भटकते-भटकते दिन-रात एक किये हुए थे । सच यही है कि अब इन 76 जवानों की केवल लाशें ही उनके घरों को लौटेगीं । वे कभी अपने गाँव नहीं लौट पायेंगे । और साबित हो चुका सबसे बड़ा सच अब यही है कि वे सारे के सारे हमारे प्रदेश के आदिवासी अंचलों में खो चुकी खुशहाली को बहाल करने के लिए कटिबद्ध थे। फिर भी, हम हैं कि, खून से लथपथ जवानों के चेहरे और उनके परिजनों के दुख पर आदतन मसखरी कर रहे हैं ।
यह हमारी कैसी संवेदना है कि इस महाहमले को भी स्थानीय मुद्दा मानकर व्यक्तिगत कुंठाओं के शिकार होकर तंत्र की मीनमेख निकाल रहे हैं। नागरिक सुरक्षा तंत्र से जुड़ी सुनी-सुनायी बातों पर चुटकियाँ लेकर उनके हौसलों को खंरोचने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं । कोई कहता कि राज्य और नागरिक सुरक्षा तंत्र के प्रमुख को इस्तीफ़ा दे दिया जाना चाहिए । कोई कहता है कि चुनी हुई सरकार को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू हो जाना चाहिए । जैसे उन्होंने ही इस महाहत्या की साजिश रची हो । जैसे उनकी किसी निजी चूक से इस कायराना वारदात का अवसर नक्सलियों को मिल गया हो । कोई नहीं कहता - प्रजातंत्र के इन हत्यारों से स्थायी रूप से निपटने के लिए उसे क्या त्याग करना चाहिए ? क्या संकल्प लेना चाहिए ? यह जागरूक नागरिक होने की भूमिका से बचकर औरों को कीचड़ उछालने जैसा हरक़त नहीं तो और क्या है ? यह अनपढ़ प्रादेशिक चेतना का प्रमाण नहीं तो और क्या है ? इधऱ पड़ोस में 76 जवान बेटे मारे जाते हैं और उधर बुद्धिजीवी किताबी दुनिया में सिर खपाये रात गुज़ार देते हैं । शर्म की बात है कि देश भर बारह महीनों जनअधिकारों की दुहाई देकर व्यवस्था के परखच्चे उड़ा देनवाले तमाम जनवादी संस्थाएँ और उनके मठाधीश भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर घुसेड कर कहीं दुबक गये हैं।
शायद इसलिए कि मरनेवाले पुलिस या अर्धसैनिक सेवा से थे और जैसे ये जन नहीं होते किसी देश के । पढ़े लिखे, वकील और न्यायप्रिय लोग इस घटना के टीव्ही फुटेज़ देखने को ही अपना परम कर्तव्य मान लेते हैं । उद्योगपति, व्यापारी, अफ़सर, चिकित्सक, अध्यापक, इंजीनियर आदि नक्सली वारदात की दुखदायी सूचना का दर्द ठड़ी बीयर्स के गिलास टकराकर मिटा देते हैं । सारी दुनिया को अपने सिर पर उठा लेनेवाले मानवाधिकारवादी ऐसे मौक़े पर तो गायब ही हो जाते हैं । किसी की आँखों में आँसू नहीं छलकता । देश की सुरक्षा के लिए जान पर खेल जानेवाले शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए हम एक मौमबत्ती भी जुटाना उचित नहीं समझते। शायद इसलिए कि मारे जाने वाले शहरी नहीं है । शायद ऐसा होता तो हममें से कुछ शहरी आयोजक 9-11 की तरह राजधानी के लोगों को जोड़कर श्रद्धांजलि देने से पहले फोटोग्राफर को ज़रूर याद कर लेते । मरा तो गाँव का बेटा है ना । क्या इतने अंसवेदन हो गये हैं हम ? कहीं हम मृतक के भूगोल के हिसाब से अपनी सहानुभुति तय तो नहीं करने लगे हैं ? हममें से कोई प्रश्न नहीं करता - आख़िर इन कायराने हमलों से डेमोक्रेसी को बचाने में वह क्या योगदान दे सकता है ? क्या सारी कुर्बानी नौकरी पेशा वाले जवान ही देंगे ? क्या सारे समाज को सुरक्षित रखने की अंतिम भूमिका पुलिस, सेना और पैरामिलेट्री फोर्स का ही है ? यदि हम ऐसा सोचते हैं तो हम तदर्थवादी सोच के शिकार हो चुके हैं ।
हम असरकारी लोग अपने घरों में बैठे-बैठे कोला-कोला की चुस्की लेते रहें और सरकारी सिपाही हमारे दुश्मनों से लड़ते-लड़ते अपनी जान गँवाता रहे ? क्या हम अपने नागरिक बोध से पल्ला झाड़ चुके हैं ? दंतेवाड़ा का हमला, सिर्फ़ हमारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हतोत्साहित करने का संकेत नहीं, यह समूची भारतीयता, व्यवस्था और नागरिकता पर हमला है । यह हमला छत्तीसगढ़ के नक्सलविरोधी अभियानों को चुनौती नहीं, सिर्फ़ छत्तीसगढ़ की चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उस देश को नेस्तनाबूद करने नापाक इरादों का परिणाम है । यह नक्सलियों का सिपाहियों से मुठभेड़ नहीं, माओवाद का जनतंत्र से मुठभेड है ।
ऐसे संकटकालीन समय में होना तो यह चाहिए कि लोग अपने एसी रूम छोड़कर निकल पड़ते । हर किसी के चेहरे पर हिंसावादियों के ख़िलाफ़ एक आक्रोश होता, और छाती तनी हुई और गलियों में ख़ूनी इरादों से लड़ने का संकल्प गूँज उठता । हर कोई एक दिन की कमाई का कुछ अंश ऐसे शहीद जवान के परिजनों के लिए स्वेच्छा से भेजने को लालायित हो उठता । हर जवान के सीने में नक्सलवादियों के द्वारा जनता, जनआस्था, जनतंत्र के विरूद्ध झेड़े गये युद्ध के विरूद्ध एक नैतिक गुस्सा फूट पड़ता । और यह गुस्सा तब तक नहीं थमता जब तक ऐसे विध्वंसक तत्वों से छत्तीसगढ़ सहित सारे नक्सली प्रभावित जनपदें मुक्त नहीं हो जाते । आख़िर ऐसा क्यों नहीं होता है ? क्या अब हमारा समाज अब ऐसा नहीं रहा ? क्या हम सारे के सारे माओवादी और नक्सलवादियों से सहमत हैं । क्या प्रजातांत्रिक संवेदना का अंत हो चुका है हमारे देश-समाज से । क्या हम ऐसे नागरिक हैं, जिसकी संवेदना पथरा गई है ?
जयप्रकाश मानस
आवासीय परिसर पेंशनवाड़ा, विवेकानंद नगर,
रायपुर, छत्तीसगढ़-492001
srijangatha@gmail.com

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