SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच



भारतीय संस्कृति का प्रमुख तत्व सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भावना रही है। सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव मात्र शब्द नहीं हैं,अपितु मानवीय भावना हैं। सद् माने सत्य या अच्छा और भाव माने विचार अर्थात सभी लोगों के प्रति अच्छा विचार रखना ही सद्भावना का प्रतीक है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक राष्ट्र एवम् पृथक-पृथक जातियों,सम्प्रदायों,भाषाओं व धर्मों की ख़ूबसूरत सतरंगी माला में पिरोया हुआ राष्ट्र है। इसकी संस्कृति एक है एवं सुजला,सुफला,शस्य श्यामला राष्ट्र के प्रति सबका समर्पण भी एक है। हमें सदैव से इस बात पर गर्व रहा है कि भारत के एक अरब से ज़्यादा लोग जिनमें हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई एवं अन्य जातियाँ व जनजातियाँ शामिल हैं,उनकी जड़ों में सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव पहले से ही मज़बूत पकड़ बनाये हुए है। यही कारण है कि सैकड़ों आक्रमणों के बावजूद भारतीय संस्कृति की अक्षुण्णता बरक़रार है। 

ऐसा नहीं है कि संस्कृति के पहरूये सिर्फ़ पुरूष वर्ग में ही हुए हैं,बल्कि महिलाओं ने भी लीक से हटकर इस क्षेत्र में ख्याति अर्जित की है। तमाम मुस्लिम महिलाओं ने जहाँ आज़ादी के आन्दोलन में राष्ट्रीय एकता से वशीभूत होकर सक्रिय भूमिका निभाई,वहीं आज़ादी के बाद भी हर क्षेत्र में उन्होंने प्रमुखता से नाम रोशन किया। इनमें से तमाम ऐसी महिलायें हैं,जो परम्परागत रूढ़ियों से परे हटकर समाज को नई राह दिखा रहीं हैं एवं सामाजिक सद्भाव की नई मिसाल कायम कर रही हैं। राज्यसभा की उपसभापति रही नजमा हेपतुल्ला,अभिनेत्री शबाना आजमी,लेखिका इस्मत चुगतई,कुर्रतुल ऐन हैदर- ये सभी नाम साझी संस्कृति की संवाहक परम्परा को दर्शाते हैं। साम्प्रदायिकता का उपचार ये सदैव साझी संस्कृति में ढूँढती रहीं। इन्होंने साझी संस्कृति के अंदाज़ को यूँ जिया- ‘‘बच्चा मुसलमान के घर होता है,गीत कृष्ण-कन्हैया के गाये जाते हैं,मुसलमान बच्चे बरसात की दुआ माँगने के लिए मुँह नीला-पीला किये गली-गली टीन बजाते हैं,साथ-साथ चिल्लाते हैं-‘‘हाथी घोड़ा पालकी,जय कन्हैया लाल की।कुर्रतुल ऐन हैदर ने तो बख़ूबी लिखा है कि मुसलमान पर्दानशीं औरतें जिन्होंने पूरी उम्र किसी गैर मर्द से बात नहीं की,जब ढोलक लेकर बैठती हैं तो लहक-लहक कर अलापती हैं- ‘‘भरी गगरी मेरी ढलकाई तूने,श्याम हाँ तूने। 

बनारस पूरे विश्व में अपनी धार्मिक आस्था के साथ-साथ साझी संस्कृति के लिए भी मशहूर है। यह बनारस की माटी का ही प्रभाव है कि प्रख़्यात शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान ने बनारस में गंगा तट पर अवस्थित मंगला गौरी मंदिर से शहनाई वादन की शुरूआत की और वे मुहर्रम के गमीं अवसर पर भी उतनी ही शिद्दत से शहनाई बजाते थे। इसी बनारस की डॉ. नाहिद आब्दी मुस्लिम धर्मानुयायी होने के बावजूद वेदों की ज्ञाता हैं और संस्कृत की सेवा में लगी हुई हैं। संस्कृत में मास्टर डिग्री लेने के बाद उन्होंने वेद जैसे कठिन विषय पर पीएच.डी. की है। प्रख्यात शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रसिद्ध मसनवी चिराग़े दैर,का वे देवालयस्य दीपःनाम से संस्कृत में अनुवाद कर चुकी हैं। रहीम की रचनाओं को वे संस्कृत में बिल्कुल अलग अन्दाज़ में पेश कर चुकी हैं। बनारस के ही महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ की छात्रा नाजनीन ने हनुमान चालीसा का उर्दू में अनुवाद किया है और रामचरित मानस को भी उर्दू में लिखना आरम्भ कर दिया है। नाजनीन का मानना है कि इतिहास ने उसे साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने हेतु यह कदम उठाने की प्रेरणा दी,जहाँ बादशाह अकबर ने रामायण व महाभारत का अनुवाद अरबी-फारसी में कराया था। इलाहाबाद की बिंते ज़हरा रिज़वी को गीता में दर्शन की पराकाष्ठा महसूस हुई और उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उर्दू अनुवाद किया। गौरतलब है कि पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल क़लाम जिस श्रद्धा से कुरान पढ़ते हैं उसी श्रद्धा से गीता भी पढ़ते हैं। इसी कड़ी में केरल विश्वविद्यालय की संस्कृत वेदांत की परीक्षा में एक मुस्लिम लड़की रहमत ने वर्ष 2009 में सबको पीछे छोड़ते हुए प्रथम स्थान हासिल किया। संस्कृत वेदांत पाठयक्रम शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन पर केन्द्रित है। देवासोम बोर्ड के एक कॉलेज की इस 21 वर्षीय छात्रा रहमत के मुताबिक संस्कृत राष्ट्रीय संस्कृति की प्रतीक है।  

मुस्लिम समुदाय में तमाम महिलाएँ अब लीक से हटकर नये आयाम रचने लगी हैं। जहाँ काज़ी का काम पहले पुरूष के बूते का ही माना जाता रहा है,एक नारी ने पुरूषों का वर्चस्व तोड़ दिया। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की काज़ी शबनम आरा बेगम भारत की पहली महिला काज़ी हैं।  

शबनम के काज़ी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काज़ी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काज़ी बना दिया। वर्ष 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काज़ी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काज़ी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काज़ी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुईं। अंततः धमकियों और मुक़दमों के बीच शबनम अपने को काज़ी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं।  

नवाबों का शहर रहा लखनऊ पूरे विश्व में अपनी तहजीब व नफासत के लिए विख्यात है। इसी लखनऊ में अगस्त 2008 में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की अध्यक्ष नाइश हसन और दिल्ली के इमरान का निकाह एक महिला काज़ी डॉ. सईदा हमीद ने पढ़ाया। गौरतलब है कि डॉ. सईदा हमीद योजना आयोग की सदस्य भी हैं। यही नहीं यहाँ के दारूल उलूम नदवा ने देश की मुस्लिम महिलाओं के लिए मुफ़्ती बनने का मार्ग भी प्रशस्त किया है। वस्तुतः मुफ़्ती बनने के लिए फ़ाज़िल होना ज़रूरी है और पहले लड़कियाँ केवल आलमियत तक ही पढ़ाई कर पाती थीं। फ़ज़ीलत के कोर्स में कुरान के बाद जो सबसे मान्य छः किताबें है जिन्हें हदीस कहा जाता है। बुखारी शरीफ़,मुस्लिम शरीफ़,अबू दाऊद शरीफ़,तिरमिजी शरीफ़,निसयान तथा इब्न ए माज़ा को पढ़कर उस पर शोध करना पड़ता है। इसके बाद एक साल का इफ्ताह का कोर्स होता है जिसे करने के बाद मुफ़्ती की डिग्री मिलती है। फ़ज़ीलत करने के लिए आलमियत होना ज़रूरी है। तो तैयार हो जाइये कि उत्तर प्रदेश में लड़कियां भी अब मुफ़्ती बन सकेंगी और इन्हें भी फ़तवा देने का हक़ होगा।

हसरत मोहानी एवं गणेश शंकर विद्यार्थीके कानपुर से भला कौन अपरिचित होगा। क्रान्ति की धधकती ज्वाला में बेख़ौफ़ कूद पड़ने का अप्रतिम साहस,त्याग और बलिदान इस शहर में बख़ूबी देखने को मिलते रहे हैं,आगे भी मिलेंगे। नाना साहब और अजीमुल्ला खान ने यहीं पर 1857 की क्रान्ति की रूपरेखा बुनी थी। आज़ादी के आन्दोलन से लेकर आज तक यहाँ की माटी में नई लकीर खींचने का साहस दिखता है। इसी कानपुर की सगी छः मुस्लिम बहनों ने वन्देमातरम् एवं तमाम राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा क्रान्ति की इस ज्वाला को सदैव प्रज्जवलित किये रहने की क़सम उठाई है। गौरतलब है कि इस्लाम धर्म की मान्यता है कि अल्लाह के अलावा वे किसी की इबादत नहीं कर सकते। राष्ट्रीय एकता,अखण्डता,बन्धुत्व एवं सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव से ओत-प्रोत ये लड़कियाँ तमाम कार्यक्रमों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। इनके नाम नाज मदनी,मुमताज़ अनवरी,फ़िरोज अनवरी,अफ़रोज़ अनवरी,मैहरोज़ अनवरी व शैहरोज अनवरी हैं। इनमें से तीन बहनें- नाज मदनी,मुमताज़ अनवरी व फ़िरोज़ अनवरी तो वक़ालत पेशे से जुड़ी हैं। एडवोकेट पिता गजनफरी अली सैफ़ी की ये बेटियाँ अपने इस कार्य को ख़ुदा की इबादत के रूप में ही देखती हैं। 17 सितम्बर 2006 को कानपुर बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित हिन्दी सप्ताह समारोह में प्रथम बार वंदेमातरम का उद्घोष करने वाली इन बहनों ने 24 दिसम्बर 2006 को मानस संगम के समारोह में पं. बद्री नारायण तिवारी की प्रेरणा से पहली बार भव्य रूप में वंदेमातरम गायन प्रस्तुत कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। मानस संगम के कार्यक्रम में जहाँ तमाम राजनेता,अधिकारीगण,न्यायाधीश, साहित्यकार,कलाकार उपस्थित होते हैं,वहीं तमाम विदेशी विद्वान भी इस गरिमामयी कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। तिरंगे कपड़ों में लिपटी ये बहनें जब ओज के साथ एक स्वर में राष्ट्रभक्ति गीतों की स्वर लहरियाँ बिखेरती हैं,तो लोग सम्मान में स्वतः अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं। श्रीप्रकाश जायसवाल,डॉ. गिरिजा व्यास,रेणुका चौधरी,राजबब्बर जैसे नेताओं के अलावा इन बहनों ने राहुल गाँधी के समक्ष भी वंदेमातरम् गायन कर प्रशंसा बटोरी।  

वन्देमातरम् जैसे गीत का उद्घोष कुछ लोग भले ही इस्लाम धर्म के सिद्वान्तों के विपरीत बतायें पर इन बहनों का कहना है कि हमारा उद्देश्य भारत की एकता,अखण्डता एवं सामाजिक सद्भाव की परम्परा को क़ायम रखने का संदेश देना है। वे बेबाक़ी के साथ कहती हैं कि देश को आज़ादी दिलाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम क्रान्तिकारियों ने एक स्वर में वंदेमातरम् का उद्घोष कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया तो हम भला इन गीतों द्वारा उस सूत्र को जोड़ने का प्रयास क्यों नहीं कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं समरसता की भावना से परिपूर्ण ये बहनें वंदेमातरम् एवं अन्य राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा लोगों को एक सूत्र में जोड़ने की जो कोशिश कर रही हैं,वह प्रशंसनीय व अतुलनीय है।

निश्चिततः सामाजिक व साम्प्रदायिक सद्भाव के इससे अच्छे उदाहरण नहीं हो सकते। पर्दे की ओट से बाहर निकल समाज को नई राह दिखाने वाली इन महिलाओं ने सिद्ध कर दिया है कि जाति-धर्म की सीमाओं से परे हम सिर्फ़ एक मानव हैं। जब तक यह सोच रहेगी तब तक सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना कायम रहेगी। तभी तो कुर्रतुल ऐन हैदर ने बेबाकी से लिखा कि- ‘‘मिली-जुली संस्कृति किसी अख़बार की सुर्खी नहीं,जो दूसरे ही दिन भुला दी जाये। यह तो दुनिया के इतिहास का शीर्षक है जो अपनी जगह महफ़ूज़ भी है और दूसरी संस्कृतियों को अपनी ओर खींचता है। वर्तमान पीढ़ी में भी तमाम नाम ऐसे हैं,जिन्होंने साझी संस्कृति हेतु न सिर्फ़ प्रयास किये बल्कि समाज को एक नई राह भी दिखाई। इस साझी सद्भावना को ही मशहूर शायर मोहसिन काकोरवी ने इन शब्दों में सँजोया है- गंगा नहाए शेख,बेकार जुस्तजू।


  आकांक्षा यादव
  

 
         
टिप्पणी लिखें