सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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व्यंग्य

नया मेघदूत / शरद जोशी

  

 बेताल कथा-1: राजधानी रिटर्न बंदर/ गिरीश पंकज

 

नया मेघदूत


शरद जोशी

 

    रामगिरि के पास से मेघ इस साल भी गुज़रा होगा । आषाढ़ के पहने दिन राम जाने कौन-सी तारीख़ थी पर यक्ष कोई ज़रुर वहाँ होगा जिसकी मलका किसी अलका में बैठी होगी । कुटुज अभी भी उगते होंगे, जंगली फूल हैं इन्हें कौन लगाता है, यह तो लगातार उगते चले जैते हैं । और भी काफ़ी बातें वैसी ही होंगी जो पहले थीं। हो सकता है, एकाध कॉलोनी बन रही हो। हो सकता है, यक्ष वहाँ ठेकेदार हो । हो सकता है, वहाँ कोई खदान निकल आयी हो और यक्ष अपनी आदत के अनुसार पैसा पीट रहा हो  । कालिदास ने मुझे यक्ष के मामले में प्रिजुडिस कर दिया है । एक तो यही कि इस जाति के लोग बड़े जोरू के ग़ुलाम होते हैं । जहाँ रहते हैं उसी की रट लगाते रहते हैं। दूसरा यह कि ये लोग अपना केस बराबर फ़ाइट नहीं कर पाते । कुबेर नाराज़ हो गया तो चुपचाप  राज्य से बाहर हो गये। और तीसरी बात कि बड़े कंजूस होते हैं। सन्देश भेजने का सामान्य खर्च बचाकर ये लोग बादल वगैरह से सन्देश भेजने की सोचते हैं । एक कविता ने उस ज़माने की सारी कम्युनिकेशन-फ़ैसिलिटी को बदनाम कर दिया । कंजूसी है । और क्या !

 

      विरहिणयों की भी क्या कहिए । आहें भरना मात्र जिनकी सोशल एक्टीविटी हो, आँसू बहाने में जो मुहल्लेवासियों के पुराने रेकार्ड तोड़ दें और डायटिंगसे दुबली रहें और कहें कि मैं तो ग़म की मारी हूँ। चील-कौवों से, हवा-बादल से जो सन्देशा पूछती फिरें । ग़ज़ब के लोग थे उस ज़माने के । जो काम करते थे बड़े पैमाने पर करते थे । आजकल के लोग मोहब्बत करते हैं, एक खबर नहीं बन पाती लोकल अखबार के लिए । पहले के लोग मोहब्बत करते थे, किताबें तैयार हो जाती थीं । पुरानी मोहब्बत की दास्तानें आज कोर्स में लगी हैं और आज जो प्रेम होता है उसे प्राचार्य महोदय एक्स्ट्रा-कैरिक्यूलर एक्टीविटी घोषित कर देते हैं ।

 

आजकल मेघदूत का कोई सिलसिला नहीं । ख़बर देना हो, खुद जाना चाहिए । बार-बार चिट्ठियाँ भेजो तो प्रेमिका पोस्टमैन के साथ चली जाए। माशूक़ और नामबर का रोमान्स शेक्सपीयर से चला आ रहा है । कालिदास के ज़माने में लोग शरीफ़ होंगे । मेघदूत भाभी की ओर बुरी नज़र नहीं डालता होगा। कविता कविता रह जाती, उपन्यास नहीं बन पाती कि जब यक्ष का सन्देश लेकर मेघदूत पहूँचा तो यक्षिणी को देख ठगा-सा रह गया । और क्यों न रहें साहब । जो उज्जयिनी की सुन्दरियों पर क़ुर्बान जा चुका हो, दशपुर में पगलाया हो, हर शहर और हर बस्ती में बड़ी-बड़ी आँखों वालियों ने जिसे नयनछाप बालों से क्षत-विक्षत कर दिया हो, बताइए अलकापुरी में वह क्यों चूकेगा । यूद्ध और प्रेम में काहे की ईमानदारी, सब ज़ायज़ है । फिर उसे यह पता है कि इसका पति कोसों दूर है, अभी आने का नहीं और यह अकेली है । कालिदादास ख़त्म कर अपनी कविता ब असल क़िस्सा मेघदूत शुरु होगा । मेघ कहेगा-अरी किस फेर में पड़ी है तू ! मैं देखकर आया हूँ, तेरा पति रामगिरि के क्षेत्र में रँगरेलियाँ मना रहा है । वह तुझे याद भी नहीं करता, सन्देश भी नहीं भेजता । तू अपनी यह चार दिन की चाँदनी क्यों वेस्ट करती है ?

 

       यक्षिणी के तेवर चढ़ जाते हैं , अच्छा, नुए की यह मज़ाल !

       बरसों बाद यक्ष आता है तो मोहल्लेवाले लम्बे हाथ कर-कर बताते हैं,   अरे, हमने तो तुझे पहले ही बोला था भाई,  तेरी घरवाली को साथ ले जा, पर तू नहीं माना । ले, वह किसी मेघ के साथ भाग गयी!”

       यक्षिणी के तेवर चढ़ जाते हैं, अच्छा, मुए की यह मज़ाल !”

यक्ष दुहथ्थड़ मारकर रो देता है। और अपने जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा ग्रहण करता है, कभी सन्देश किसी अन्य पुरुष के हाथ न भेजो !”

 

मेरा दिमाग़ तो शक्की है । मैं कालिदास और उसके पात्रों-सा भोला नहीं हूँ । कण्व के आश्रम में एक साहब घुस गये । कहने लगे, मैं यहाँ का राजा हूँ । और शकुन्तला ने बात मान ली । न जान न पहचान शादी कर ली । ऋषि के आने तक भी सब्र न किया गया । यक्ष ने एक मेघ जाता देखा तो सन्देश भेज दिया । मैं और मेरे पात्र कभी ऐसा नहीं कर सकते । मेरा दिमाग शक्की है । मैं पूछता हूँ कि यक्ष को कुबेर ने अपने राज्य से कुछ वर्षों के लिए निकाला क्यों ? यह नहीं माना जाए कि बॉस कुबेर की यक्ष की पत्नी पर नज़र थी और वह किसी तरह यक्ष को अकालपुरी से खो कर देना चाहता था ? जवाब देंगे कालिदास क्या इसका ? अजी हमें तो तब पता लगा जब मेघदूत अलकापुरी पहुँचा । कहाँ का विरह और कैसा विरह ! यक्ष के घर में कुबेंर-यक्षिणी रोमांस कर रहे हैं । उसने सिर पीट लिया । उधर बेचारा यक्ष जंगलों की खाक छान रहा है और इधर यह कुलच्छिनी !

 

मेघदूत ! क्या कहने !  ऐसी पुस्तकें तो कोर्स में ही चल सकती हैं । ऐसी ही किताबें पढ़कर जब छात्र निकलते हैं तो दुनिया कहती है –“भाई, आजकल की पढ़ाई जीवन में काम नहीं देती । ऐसा विरह तो किसी पेशेवर अभिनेत्री को भी स्वीकार नहीं होगा कि वह मोटी से दुबली हो जाए । ऐसा हीरो कौन एक्टर बनना चाहेगा जिसमें सारी बहादुरी सिर्फ़ सन्देश भेज देने में है । एक लेटरपैड और एक स्याही की बोतल खरीदकर कोई भी प्रेमी बन जाएगा । पन्द्रह पैसे के टिकट से आप सोलह साल की लड़ी को बेवकूफ़ नहीं बना सकते भाई साहब ! ”

 

खैर, हटाइए । ज़रा कवि बन कर देखिए । प्रेम नौटंकी स्तर पर भी होता है । उसे भी आज़माइए । पर वह सब भी शादी के पहले तक । शादी के बाद अगर वह शहनाईवाला, वह घोड़ा सजानेवाला, वह ससुर अगर सड़क पर भी नज़र आ जाए तो आदमी पगला जाता है और पत्थऱ फेंकने लगता है । सारे नशे दूर हो जाते हैं । वे ही प्रेम के हिरन जो बैण्ड-बाजा सुन शादी के वक्त आ गये थे, बच्चों का रोना-चिल्लाना सुन कुछ साल बाद भाग जाते हैं । आदमी मानता है कि उसे इस अलकापुरी से दूर कहीं जाने को मिले । ब्रह्मचर्य आश्रम से संन्यास-आश्रम तक की यह चिल्ल-पों उसे खाने दौड़ती है । वह सोचता है, कोई ऐसी जगह हो, जहाँ कोई न हो (जैसे रामगिरि) और वहाँ वह शान्ति से रहे ।

 

और फिर आषाढ़ के पहले दिन जब मेघ सी.आई. डी. नज़रों से राम-गिरि के ऊपर से गुज़रता है, यक्ष कुटुज के फूल हाथ में लेकर कहता है-हे मेघ, उस यक्षिणी को मत बताना कि मैं यहाँ हूँ । मेरी मान कि तू अलकापुरी जा ही मत । पड़ने दे वहाँ सूखा । और अगर जाना ही है तो तू वहाँ उस यक्षिणी से मत कहना कि मैं रहाँ हूँ  । हे मेघ, यह शान्ति मुझे बड़ी मुश्किल से प्राप्त हुई है। जिस प्रकार अमुक वस्तु फ़लाँ बात हो जाने से सुखी हो जाती है उसी प्रकार मैं भी अलकापुरी से दूर यहाँ सुखी हूँ । जिस प्रकार ये वे जीव ऐसे-ऐसे कष्ट पाकर उसे भुलाने का प्रयास करते हैं , वैसा ही मैं भी कर रहा हूँ। इसी प्रकार वह कालिदास की टेकनीक से उपमाएँ देता हुआ मेघ से यही कहेगा कि हे मेघ, मेरी खबर किसी को नहीं देना ।

 

 

 

 

        'किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।' - निराला'

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

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