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आध्यात्म साहित्य की एक विधा है तंत्र
पँ. गिरधर शर्मा
जाहिलो की बात क्या है, लुट गये आखिर यहाँ
तुझको जो सुझे सो कर, कहना अपना काम है।
तंत्र
क्या साहित्य है ?
शायद ही दो-चार लोग हाँ कहने वाले मिल जायें। डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी जी,
श्रीराम शर्मा आचार्य, महामहोपाध्याय कविराज पं. गोपीनाथ
जैसे साहित्याकाश देदिप्यमान नक्षत्र तंत्र साहित्य को पर्याप्त स्थान और
सम्मान देते रहे। इतना ही लही कर्मठ साधक तथा तंत्र,
द्रष्टा भी रहे, प्रसिध्द मासिक पत्रिका “कादिम्बिनी”
के यशस्वी संपादक डॉ. राजेन्द्र अवस्थी जी ने स्पष्ट रुप से कहा कि
“तंत्र- अध्यात्म
साहित्य की एक विधा है ।”
लेकिन इसको स्वीकारने वाले कितने लोग मिलेंगे ?
मैं उस प्रसंग को नहीं भूल पा रहा हूँ जब कुछ वर्ष पूर्व “अ.भा.
अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति”
वाले तंत्र की महिमा तथा भूत-प्रेत का
अस्तित्व बताने पर मेरे विरुध्द
पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा, गिरप्तारी के लिए जमीन आसमान एक कर रहे थे।
उस दल में दो चार वरिष्ठ साहित्यकार भी
शामिल थे । उन्हें यह नहीं मालूम कि तंत्र क्या है ?
तांत्रिक किसे कहते हैं ?
चमत्कार और अंधविश्वास की परिभाषा क्या है ?
तो तंत्र के
साहित्य मानने का प्रश्न ही नहीं उठता।
साहित्य किसी देश की सभ्यता, संस्कृति और प्रगति का
मापदणड होता है । साहित्य
शब्द का आशय केवल, नाटक, कहानी, गीत, गज़ल अथवा गद्य कृतियों से ही नहीं
बल्कि वाङमय के विभिन्न स्वरूपों और बौद्धिक विकास
के अनेक आयामों से है । साहित्य हमारे जीवन के विविधताओं
का शब्द
–कोष
है । इस प्रकार ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रो का साहित्य के माध्यम से
स्पर्श किया जा सकता है ।
अध्यात्म, व्याकरण, काव्य, दर्शन, राजनीति, चिकित्सा, विधि, और
प्रौद्योगिकी जैसे समस्त विषयों को “साहित्य
का आयाम”
स्वीकार किया गया है। वाणी के माध्यम से वायुमंडल में जो कुछ भी प्रसारित
किया जाता है वह सब प्रकारान्तर से साहित्य का स्वरुप माना जाता है ।
भगवान शंकर
देवादिदेव तो हैं ही, महान योगी, नाद शास्त्री, वनस्पति वेत्ता, मंत्र-तंत्र
दृष्टा, अलौकिक शक्तियों के आगार रुप में जाने जाते हैं और तंत्र शास्त्र
के तो प्रणेता ही हैं। साहित्य और व्याकरण की उत्पत्ति भी प्रकारान्तर में
उन्हीं के द्वारा व्याख्यायित होकर बड़े-बड़े द्रंथों के रुप में उपलब्ध
हुए।
तंत्र ग्रंथों
की सर्वाधिक रचना भारत तथा तिब्बत में हुई । भारतीय तंत्र शिव प्रणीत हैं
और तिब्बती तंत्र बुद्ध प्रणीत, इसीलिए सभी भारतीय गंथों में
“शिव उवाच”
तथा “तिब्बती
ग्रंथों” में
“बुध्द उवाच”
है ।
बौद्ध तंत्र की तरह जैन संप्रदाय में भी
तंत्र को अत्यंत श्रद्धा के साथ स्थान मिला और कई जैनाचार्यों ने तंत्र
साहित्य की रचना की। जस प्रकार शाक्त तंत्र में शाक्त
तंत्र की देवी दुर्गा, काली, तारा, चंडी, को महत्व दिया गया है उसी प्रकार
जैन-तंत्र में पद्मावती,अंबिका, चक्रेश्वरी आदि देवियों के रुप में शाक्त
तंत्र को मान्यता दी गई है । जैन संप्रदाय में मंत्र-तंत्र के साथ यंत्र को
भी बहुत स्थान दिया गया है । उदाहरण के रुप में ऐसे अनेक जैन तांत्रिक
मिलेंगे जो उच्च स्तर की सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त लगभग सभी जाति
संप्रदाय में अनेंक साहित्य देखे जा करते हैं ।
वैष्णव तंत्र
के ग्रंथों में ईश्वर
संहिता, पौष्कर संहिता, ज्ञानामृत संहिता के नाम प्रमुख है। इसी तरह शैव
तंत्र में रुग्यामल, शारदा तिलक, वामकेश्वरर तंत्र,
ताण्डव तंत्र आदि प्रसिद्ध ग्रंथ हैं । जैन-तंत्र
में वर्धमान कल्प, नवकार मंत्र कल्प, तंत्र लीलावती, तंत्रप्रकाश आदि है
उसी प्रकार बौद्ध-तंत्र में काल चक्र तंत्र ,
श्री संपुट मूल तंत्र, मंजु श्री मुल कल्प, ज्ञान सिध्दि तंत्र, आदि काफी
प्रचलित रहे हैं ।
सभी ग्रंथों में मूल रूप से जो बताया
गया है, उसका सार यही है कि तंत्र सामान्य मार्ग हैं । ज्ञान योग, भक्ति
कर्म आदि सभी मार्गो व मतों की साधना का समावेश है । सभी एक दूसरे के
परस्पर पूरक हैं, विरुद्ध नही । साधना
याज्ञिक कार्य, आनुष्ठानिक कर्म है । आज के युग में व्यक्ति द्वारा
आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास असंभव है अतः प्रवृत्ति मार्ग में तंत्र की
उपासना सहज व सरल है । तंत्र भोग तथा मोक्ष
दोनों प्रदान करने में समर्थ हैं । समस्त तंत्र साधकों के लिए भगवान शंकर
ही आदि देव है जो भोग और मोक्ष दोनों के प्रदाता हैं । तंत्र उस परम तत्व
से साक्षात्कार
कराता है । तंत्र के द्वारा समस्त कामनाओं को प्राप्त किया
जा सकता है । तंत्र विश्वास का सूत्रपात कराता है । तंत्र के द्वारा
व्यक्ति की नही, समाज तथा राष्ट्र की उन्नति होती है । जो कल
था, वह आज नही है जो
आज है, वह कल नहीं होगा लेकिन तंत्र कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा ।
हमारे कवि बंधु जिस तुलसीदस जी को कविकुल
चूड़ामणि कहते हैं वही महात्मा तुलसीदास जी तंत्र शास्त्र को भी आधार मानकर
रामायण की रचना किये “नान
पुराण निगमागम सम्मतम यद्”
और इतना ही नहीं तंत्र के द्वारा कितनों को रोग, शोक, भूत-प्रेत से छुटकारा
दिलाये और प्रचार भी करते रहे, इतना ही क्यों ?
वे “हन्डरेड
परसेंट गारंटी और चैलेंज”
के साथ कह़ते आ रहे हैं । (रामायण के माध्यम से) कि
विद्याता ने आपको गरीब से गरीब, रोगी से रोगी, अभागा से अभागा बना दिया
हैं तो कोई बात नहीं । तंत्र-तंत्र में वह शक्ति है कि आपके सोए हुए किस्मत
को जगाकर भाग्य का पिटारा खोल देगा । आपको रंक से राजा, ऋणी से साहूकार,
अज्ञानी से ज्ञानी और यहाँ तक कि गूंगे बोलने लगेंगे, लंगड़े-अपंग हिमालय
की चोटी पर जा बिराजेगे । यथा-
मूक होंही बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन ।
मंत्र महामणि विषय व्याल के
मेटत कठिन कुअंक माल के ।
लेकिन यह सब बैठे ठाले संभव नहीं है आप तंत्र के शरण
में या तंत्र के देवता भगवान शंकर की शरण में जाएं तब । हमारे आज के
विद्वान साहित्यकार बंधु यदि संस्कृत वांग्डमय को साहित्य मान रहे होंगे
? तो इसमें “तंत्र
साहित्य” का अपना एक
विशिष्ट स्थान है जो अत्यंत विशाल है । भारतीय संस्कृति की परम्परा का
आधार विशेष रूप से पुराण है और उनमें तांत्रिक विचारों का वृहद रूप से
समावेश है जिनको संस्कृत का थोड़ा भी ज्ञान है और
श्रीमद्भागवत को
जिन्होंने पढ़ा सुना है, उनको मालूम है कि
वहाँ तंत्र की महत्ता के विषय में
क्या लिखा गया है ? और
श्रीमद्भागवत में ही क्यों ?
देवी भागवत, पद्मपुराण, मुडुकोपनिषद, कुंडिया तंत्र, महार्णव तंत्र, रूद्रयामल तंत्र, गंधर्वतंत्र, दुर्गा सप्तशती और महाभारत तक में
तंत्र का वर्णन मिलता है
। इस प्रकार तंत्र शास्त्र का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है । इसकी परिधि में
दर्शन, योग ज्ञान कला साहित्य आदि विषयों का समावेश हो जाता है ।
आदि जगद्गुरू शंकराचार्य ने कहा है कि “दर्शनों
का तंत्र में समन्वय है ।”
प्रथम योग दर्शन है जिसके बिना साधना हो ही नहीं सकती क्योंकि तंत्र साधना
में ध्यान और जप प्रधान है । इस बात को भारतीय ही नही बल्कि विदेशी
विद्वानों ने भी स्वीकार किया है । साम्यवादी देश रूस के महान तंत्र साधक
“रासपुतिन महान”
का नाम आज भी संपूर्ण विश्व में लिया जाता है । हमारे पूर्व राष्ट्रपति
महामहिम वी.डी. जत्ती इन सभी विद्वान मनीषियों के तंत्र साहित्य और
इससे संबंधित विचारों से प्रभावित होकर अत्यंत प्रसन्नता के साथ बोले थे कि
“उड़ीसा
भी तंत्र विद्या का केन्द्र है ।
”
भारत में
ज्ञान की प्राचीनतम शाखाओं में से दो आगम और निगम कहलाती
है। निगम वेदों पर
आधारित है तो आगम तंत्रो पर । एक समय था जब तंत्र ग्रंथों का चौदह हजार की
संख्या में उपल्ब्ध होना बताया गया है । यह अलग बात है कि वर्तमान में
उनकी संख्या कम है ।
इस लेख के पीछे मेरा उद्देश्य मात्र
'तंत्र
क्या है ?'
की गंभीरता
की जानकारी देना है ।
क्योंकि तंत्र न जादूगरी है और न हौव्वा, न चमत्कार है, न अंधविश्वास,
बल्कि
किसी भी साधना का सर्वश्रेष्ठ विधान है । यह आध्यात्म विज्ञान की एक ऐसी
शाखा है जिसका अवलंबन करके सर्वथा सामान्य व्यक्ति भी सांसारिक स्तर से
उठकर क्रमशः उच्च जीवन में प्रविष्ट कर सकता है । तंत्र का उद्देश्य साधकों
को निम्नगामी प्रवृत्तियों में उलझाना नहीं है बल्कि उसे एक ऐसा
सुव्यवस्थित मार्ग सुझाना है जिससे जीवन में कुछ श्रेष्ठ तथा आदर्शवादी कार्य कर सके । तंत्र-शास्त्र के ज्ञाता आचार्यो का कथन है कि जिस प्रकार
वेद को समझने के लिए, बताए मार्ग का अनुगमन करने के लिए, उच्चस्तर की
बुद्धि और विद्याबल की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार तंत्र शास्त्र को
समझकर साधना की ओर उन्मुख हो सिद्ध तंत्र साधक बनने के लिए आत्मबन. शरीर बल
तथा उच्चस्तरीय बुद्धि बल की आवश्यकता है इसीलिए हमारे विद्वान मनीषियों
तथा गुरूजनों ने कहा है कि “तंत्र”
जगत् में प्रवेश करने के लिए प्रत्येक साधक को सवा लक्ष गायत्री मंत्र का
अनुष्ठान आवश्यक है । यह अलग बात है कि अनाड़ी. ढोगी, ठगों ने जादूगरी को ही
तंत्र घोषित कर रखा है । विश्व प्रसिद्ध जादूगर आनंद का विचार स्मरणीय है,
जिन्होंने एक समारोह में कहा था “तंत्र एक गोपनीय विद्या है और जादूगरी प्रदर्शन का । यदि जादूगरी को तंत्र कहा
जाता तो विश्व के सभी जादूगर कब के तंत्र सम्राट कहे जाने लगते”
जिस पश्चमी सभ्यता को अपनाकर “अति
समझदार”
बनने वाले लोग तंत्र को अंधविश्वास तथा चमत्कार की संज्ञा देते हैं उसी तंत्र को
पाश्चात्य जगत के लोग अपने जीवन में उतार रहे हैं । इस विषय पर विस्तार से
अनुसंधान कर रहे हैं । वे
इस तथ्य को स्वीकार चुके हैं कि तंत्र-मंत्र,
अनुष्ठान, तंत्र चिकित्सा, आयुर्वेद सम्मत है । वे इस बात को भली-भांति जान
चुके हैं कि जहाँ मानव है वहा इसका अस्तित्व है । इसकी उन्नति का
आधार अटूट, अखंड, विश्वास है जो अंधा नहीं बल्कि अडिग और अमिट है ।

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