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एक रूपंकर मौन की यात्रा – भोरमदेव इंदिरा किसलय
भोरमदेव वह शब्द है जो शिलाओं का मौन सह न सका । सरस शिल्प के बहाने अनेक होंठों पर ठहर गया । “सतपुड़ा” साक्षी है, उसने तीसरी आँख सेदेखा है यह “शिल्पीशब्द” । छेनी हथौड़ों का रेशमी आघात । समय की यह भंगिमा उसने अविकल सहेज कर रख ली है । तब से होते हुए परासंगीत के निर्झरण से वह भींगता रहा है । वन प्रान्तर के अनाघात, फूलों और अनछुई पत्तियों की ताज़गी का यही तो रहस्य है ।
एक रूपंकर मौन को मुखर होने में असंख्य कोणों, कटावों, वर्तुलों और रेखाओं
के सहारे ज़मीं पर उतरने में कई वर्ष लग गए । पत्थर,
सहजता से अपना
अन्तःकरण नहीं खोलते । नयनों की भाषा नहीं बोलते । 11वीं शती के
पूर्वार्द्ध में पाषाणों का यह रूप देखा गया । जब शिल्पी और पाषाणों के
अन्तर्मन की लय और कलासंवेग सधते हैं तब शिवालय साकार होता है। नागवंशीय
राजाओं का स्वप्नरंग है भोरमदेव । पूजा की थाली में अबीर गुलाल सा उड़ा।
हवाओं में समा गया । आज भी वहाँ की हवाओं में पूजागंध व्याप्त है । वह
केसरी है।
दक्षिण कोसल की मन्दिर वास्तुकला के चरम विकास का भाष्यकार ङोरमदेव अर्थात गोंडों के उपास्य ‘शिव’। किवदन्ती है कि नागवंशी गोड राज पातालवासी थे । शेषनाग ने मानवदेह धारण किया है-भोरमदेव के रूप में ।
यहाँ आकर नयन रूप की श्रृंखलाओं में जकड़ जाते हैं, यह शिल्प का अहं है, पर हक़ीकत में मन्दिर के मुख्य प्रवेश द्वार तथा अन्यत्र बनी “पत्थर की जंजीरें” तान्त्रिक प्रभाव से जुड़ा विश्वास मज़बूत करती हैं । शिखर से नीचे मध्य भाग में एक गुफानुमा गोलाकार शिल्प है । कहा जाता है कि तपस्वी यहाँ बैठकर तन्त्र साधना किया करते थे । उनकी हड्डियाँ और बारल वहाँ पड़े हए हैं ।
नवरत्नों के बारे में सुना था । पुजारी से ज्ञात हुआ, जिस पत्थर से मन्दिर बना है, वह दसवाँ रत्न है । यह सहसपुर से लाया गया था । इसे लोहे से छआया जाए तो चिंगारियाँ निकली हैं । अष्टसिद्धियां और नवग्रह मन्दिर को बुरी नज़र से बचाते हैं । मन्दिर पर अलग-अलग पैनलों में उत्कीर्ण हाथी, घोड़े, गायन-वादन, आखेट और नृत्य की खजुराहो सी कमकलांकित मूर्तियाँ, भोग से योग तक संक्रमण की बात समझाती हैं । कहने वाले इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहते हैं । फूलों में रंग और आकार दिखाई देता है, खुशबू नहीं । इसी तर्ज़ पर समझदार को इशारा काफी है । कोई स्थूल आँखों से देखकर कैमरे में कैद कर ले, खुश हो या कोई मनप्रण महका ले हमेशा के लिए, उसकी मर्ज़ी ।
मन्दिर का प्रवेश द्वार मकरांकित है । भद्रस्थ पर त्रिपुरान्तक वध, चामुण्डा महिषासुरमर्दिनी एवं मृत्त गणपति की प्रतिमाएँ खींचती हैं, लुभाती हैं । मन्दिर का ‘जंगाभाग’ तीन पैनलों में वैभव की गवाही देता है। देवी देवताओं, नायक-नायिकाओं, कृष्ण लीला, अष्ट दिक्पालों, युद्ध और मिथुन दृश्यों का मूर्तिमय अलंकरण मन को हज़ारों साल पूर्व स्थित कर जाता है । देहरूप ‘आज’विचरता हुआ, सूक्ष्मरूप में अतीत में घूमकर चला आता है । हज़ारों वर्षों की दूरी, पलक झपकते तय हो जाती है । मन से ज्यादा तेज़ कुछ भी नहीं ।
आम्रवृक्षों की डोलती परछाइयों में लिपटा भोरमदेव, धूप के पर्दे पर किसी अनिंद्य रूपसी के कमनीय विन्यास सा लगता है । जैसे वह मुँह पर झीना सा आँचल डाले चुपचाप खड़ी हो और धूप-छांह के पल-पल बदलते आकार उस अनगढ़ सौंदर्य को छू-छूकर निहाल हो जाए ।
जहाँ “शिव” हैं वहां मन चन्द्रमा तो होगा ही । ‘गंगा’ चिन्तक के उभयकूल भिगोएगी । भावुकता का तीसरा नेत्र खुलेगा । डमरु मौन को संस्कार देगा । त्रिशूल के तीनों कोणों पर सत्य शिव सुन्दर नाचेंगे । नीरव में ही अनन्त रव रही अर्थों में सुना जा सकता है ।
पर्वत की उपत्यका में, पुष्कर जल-तल, वन रंगों में, नीलाकाश की छांह तले, अघोषित शब्दों के ढूँढना और चहकना . एक भावुक मन नादान बालक सा यही तो कर सकता है ।
सांझ ढले, गरजती-लरजती समन्दर की आँखों से देखा था कोणार्क, चढ़ते सूरज के साथ चन्देलों का दर्प सहता खजुराहो । आज दोपहर में धूप मेरी गाईड है । भोरमदेव का चप्पा-चप्पा छान रही हूँ । गर्भगृह में बिजली की रोशनी नहीं । मिट्टी के दीये की पीत-प्रकम्पित उजास में इतिहास का हृदय मोम सा पिघलता है । तरल होकर, कतरा-कतरा टपकता है ।
हम शिल्पियों के हाथों से छूटी कलाकिरण का रेशा-रेशा बुनते हैं, चुनते हैं, खुश होतेहैं और घमंड करते हैं राजवंशों के नाम पर । कैसा विरोधाभास है । जगत जीवन का यही सत्य है – सृजन करता है कोई और सराहा जाता है गी । मैं भी न जाने क्या ढूँढ बैठी । इतिहास में शहंशाहों सम्राटों के पते दर्ज़ होते हैं, शिल्पियों, कारीगरों के नहीं ।
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'राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।' - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' |
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