सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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कृति-समीक्षा.....

 

आस्था को बल देता रचना कर्म/ कवि-एकांत श्रीवास्तव/ समीक्षक-रजत कृष्ण

 तल्ख संदर्भों की विश्वसनीय कहानियाँ/ कहानीकार- डॉ.विश्वमोहन/ समीक्षक-डॉ.बा.शे.तिवारी

प्रवासी /कवि- देवेंद्र नारायण शुक्ला/समीक्षक-वेदप्रकाश वटुक          

 

 

 आस्था को बल देता रचना कर्म


रजत कृष्ण

 

    मिट्टी से कहूँगा धन्यवादयुवाकवि एकांत श्रीवास्तव का दूसरा काव्य संग्रह है, जो पहले काव्य संग्रह अन्न हैं मेरे शब्द के ठीक पाँच साल बाद प्रकाशित हुआ है । इस नये संग्रह की कविताओं में डूबते चलें तो पहले संग्रह की कविताओं से काफी भिन्न अहसास हमें होता है । यह अहसास कहीं काव्य विषयों की भिन्नता का है तो कहीं दृष्टिकोण में आयी भिन्नता का । कहीं चीज़ों के रख-रखाव की भिन्नता आती है तो कहीं चरित्रों से जुड़ाव व संवाद की । अन्य शब्दों में कहें तो दूसरे संग्रह की कविताएँ पहले संग्रह की कविताओं की छाया से ग्रस्त नहीं है, जैसी कि प्रायः आज के युवा कवियों के दूसरे संग्रहों के साथ यह स्थिति एक बड़ी सीमा बनकर सामने आ रही है ।

 

एकांत की जो निजता और वैशिष्टय उन्हें देश के प्रमुख युवा कवियों की पाँत में बड़े ठसक के साथ खड़ा करती हैं उनमें मुख्य है अपनी मिट्टी के प्रति असीम लगाव, अपने पुरखों के प्रति अगाध सम्मान और श्रद्धाभाव, अपनी नदी, अपने रास्ते, अपने आकाश, अपने फूल-पान, पशु-पक्षी-आदि के साहचर्य से ध्वनित होते जीवन राग के प्रति बढ़ती ललक और जीवन के समृद्ध करती प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का जीवंत अहसास। अपने गाँव-घर, अपने जनपद, अपने चीन्हें पहचाने रास्तों में लौटने का प्रसंग एकांत के यहाँ बार-बार जो आता है वो उनके काव्य मर्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष है । जबकि लोग आज विकास और सुख-समृद्धि के लिए नगर महानगर को ही अपनी मंजिल मानकर उधर दौड़ रहे हैं तब हमारे यह कवि गाँव की धूल-माटी और अभाव भरी दुनिया में भला क्यों लौटना चहते हैं ! क्या उन्हें सुख-समृद्धि की चाह नहीं ? क्या वे विकास की दौड़ में शामिल नहीं होना चाहते ? क्या वे नहीं चाहते कि शहर पहुँचकर अपनी आल-औलादों के लिए सर्वसुविधायुक्त जीवन-मार्ग बनाएँ ? स्वाभाविक रूप से ऐसे और भी सवाल उत्पन्न होते हैं जिनके जबाब की तलाश हमे कवि की व्यापक जीवन-दृष्टि तक ले जाती है । जहाँ हम पाते है कि सुख-समृद्धि व सफलता कोई बाह्य उपलब्धि नहीं है, और ना ही इन्हें अर्जित करने के लिए अपनी जड़ को छोड़ने की जरूरत है । जरूरत है तो बस अपनी उस जातीय चेतना से जुड़ने की जो हमें सिखाती है कि

 

इस तपते भूखंड पर

उड़ते गरम रेत के बीच

जब मैं झुकुं नल पर

तब ओ प्यास

मुझे मत करना कमजोर

पियूं तो एक चुल्लू कम

कि याद रहे दूसरों की प्यास भी

खाऊँ तो एक कौर कम

कि याद रहे दूसरों की भूख भी

(इस तरह जीयुं एक जनम)

 

एक ओर दूसरों की प्यास का खयाल रख एक चुल्लू पानी कम पीने, दूसरों की भूख का खयाल रख एक कौर कम खाने की चेतना से भरे चरित्र की तलाश हमारा कवि इस दुनिया में कर रहा है तो दूसरी ओर ठीक तभी यहीं इसी दुनिया में हत्यारे, आततायी व दंगाई भाईयों से बहन को, पत्नियों से पति को, कण्ठों से गीत को, जल से मिठास को और पेड़ों से हरियाली को छीन लेने का षड़यंत्र कर पूरी धरती को अशांत करने में लगे हुए हैं। जो इस सदी की भयावह घटना के रूप में सामने आता है।

 

संग्रह की कई कविताओं में इस भयावहता के बीच घुट रही मानव जाति की धड़कन को मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं एकांत जो उनका काव्य कर्म का एक नया आयाम है। संग्रह के सबसे अंत में प्रकाशित कविता यातना शिविर में कवि के टकराहट और उसके दर्द की गहराई को बहुत अच्छे से महसूस किया जा सकता है। जो कवि के भीतर अनायास पैदा नहीं होता है बल्कि वो पैदा होता है, युद्ध में दम तोड़ते आदमी की कराह व दंगाईयों के पाँवों की आहटें सुनने के साथ-साथ प्रक्षेपास्त्रों के जन्म लेने की तीव्रता को भाँपने और बारूद की बढ़ती गंध को महसूस करने की क्षमता विकसित कर लेने से ।

 

लूट, हत्या, आगजनी, दंगा, निर्वासन, भूखमरी जैसी स्थितियाँ व्यक्ति को उदासी और अकेलेपन की सुरंग में धकेलने के साथ ही साथ समूची सृष्टि के प्रति नकार भाव की प्रवृति को भी जन्म देती हैं, लेकिन विवेकवान और दृष्टि संपन्न व्यक्ति बहुत देर तक इन नकारात्मक प्रवृतियों की जकड़ में नहीं रहते । अंततः जब मानव जातिका मूलभाव जीवटता तथा अस्तित्व रक्षा की आदिम चेतना उसे आंदोलित करती है तो सब कुछ के बावजूद वो जो राह चुनता है वह चुनौती का ही होता है........ संघर्ष का ही होता है । जिसपे चलते हुए वह खम ठोंक कर कहता हैः-

 क्या हुआ

जो हम हत्यारों की आँखों की सीध में हैं

क्या हुआ जो हम सामने हैं

एक हिंसक और आदमखोर भूख के

हम यहीं धूनी रमाएंगे

यहीं दीया जलाएंगे

यहीं बिछाएंगे अपने बिछौने ।

(निर्वासन)

 आदमी की कहानी पत्थरों से आग पैदा करने की कहानी है, पहाड़ो को काटकर रास्ता बनाने की कहानी है, नेपथ्य से उठती चीखों और सिसकियों की कहानी है । जीवन की यात्रा बीज से फूल तक की यात्रा है । विध्वंस के बाद पृथ्वी पर घर बनाने की यात्रा है । दुःख से टूटने की बजाय अपनी जड़ों को मजबूत कर देने और काली मिट्टी में कपास की तरह उगने की फितरत ही आदमी का असल बाना है । एकांत कविता दर कविता हमें यही सब अहसास कराते हैं । साथ ही एक ओर हमारी धरती को धर्म के नाम पर खून से भिगो देने का खेल चल रहा होता है तब दूसरी ओर हमारी आस्था को बल देते हैं वे, यह रचते हुए किः-

 

मेरे पसीने में तुम्हारी देह का नमक

तुम्हारे लहू में मेरे लहू का रंग

मेरी नींद में तुम्हारे स्वप्न का कौंध

शामिल है

देखो तो अरे ! कुरान की आयतों में

वेदों की ऋचाएं

वेदों की ऋचाओं

(धरती के दुःख-सुख में)

         तीन नदियाँ कविता भी इस क्रम में हमारा ध्यान खिंचती है और अपनी अंतर्वस्तु से यह सिद्ध करती है कि भले ही धर्म, जाति, संप्रदाय, भूमि व भाषा के नाम पर मानव जाति को बाँटने का इतिहास फिर दोहराया जा रहा हो, भले ही अपसंस्कृति और विखंडनवाद के प्रहार से हमारे राष्ट्र व समाज का आंतरिक ढ़ाँचा चरमराया हो, भले ही संस्कृति और कला क्षेत्रों के परस्पर संबंध गड्मड् हुए हों लेकिन हमारी समृद्ध संस्कृति और सभ्यता की कोख में अभी भी ऐसे अनेकों जीवंत अध्याय पल रहे हैं जो हमें अंततः एकता, अखंडता और समन्वयवाद की ओर ले जाते हैं। एकांत की कविता में कहीं आपाधापी के चलते सोई पड़ी आत्मा को जगाने का आह्वान है तो कहीं जागती हुई लौ और जागते हुए शब्दों से बंधी उम्मीदें । लोहे का गीत कविता संघर्ष दृष्टि और पक्षधरता को अभिव्यक्त करती एक प्यारी सी कविता है जो यहाँ याद आती हैः-

 लुहार के हाथों में घन बन जाना

माली के हाथों में खुरपी

बढ़ई के हाथों बन जाना बसुला

किसान के हाथों में कुदाल

पर ओ भैया लोहा

सेठ की संदूकची में

मत बनना ताला और चाबी ।

           पैसा का गीत कविता कवि के इस दुःख और पीड़ा को सामने लाती है कि दिन-ब-दिन पैसों की महत्ता इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि धर्म-ईमान, नाते-रिश्ते, कला-संस्कृति सब कुछ बिकाऊ होता जा रहा है जो एक पतनशील सभ्यता के अस्तित्व मान होने का संकेत है।

 

उपभोक्तावाद, पूंजीवाद और अहमवाद के चलते अपनी जातीय परंपरा अपनी मूल मानवीय भावनाओं, अपने व्यापक जन सरोकारों, अपने गांव अपनी धरती से कटते जने की एक करुण कथा है महेन्द्र नहींकविता में । हमारे ही बीच के लोगों को जड़विहीन करने का मर्मान्तक उदाहरण हैं । सरदार सरोवर बांध के नाम पर बसे बसाए गांवों को उजाड़ देना। एक की गोद हरियाने दूसरे की गोद उजाड़ना, एक के घर रोशनी फैलाने के लिए दूसरे की देहरी का दीया बुझा देना कोई समझदारी भरा काम, विकास मार्ग नहीं है। इससे प्रभावित पक्षों की पीड़ा क्या होती है यह कोई मणिबेलीगांव के लोगों से पूछे, ऐसे लोगों की ओर से लड़ती मेघा पाटकर से पूछे और एकांत से भी जो उजाड़ की पीड़ा और उजड़े लोगों के संघर्ष को अभिव्यक्त करते हैं अपनी कविताओं में।

 

यों कलात्मक रूप से ये कविताएं कुछ कमजोर हैं, लेकिन ये कविताओं में से एक हैं जो समाज की उस संवेदनशीलता और रागात्मकता का सूत्र हमें देती है जिनकी व्याप्ति यह सिखाती हैं कि क्यों धरती को भूखण्ड मात्र नहीं बल्कि माता कहा जाता है। कि क्यों पशु-पक्षियों को जीव जंतु मात्र नहीं बल्कि अपना संगी साथी माना जाता है, और क्यों पेड़-पौधे वनस्पति मात्र नहीं बल्कि हमारी जड़ों को संभाले पुरखों-सा पूज्य होते हैं ! चीजों के प्रति आत्मीय भावना किसी राह चलते नहीं मिल जाती। यह विरासत में मिला एक जन्मजात गुण होता है। जो लोकमें रमने वाले हर उस व्यक्ति के रहने तक अक्ष्क्षुण्ण रहेगा जो जमीन के बिकने मात्र की पीड़ा को इस तरह महसूस करता हो किः-

 मैं जमीन नहीं बेचता

बेचता हूँ हृदय

अपनी छाती काटकर

... मैं जमीन नहीं बेचता

बेचता हूँ आँखें

जल और स्वप्न से भरी

अपनी दो अदद आँखें !

 

(दुनिया के हाट में)

       आज के इस बाजारवादी युग में जबकि सब कुछ बिकाऊ है, जबकि सब कुछ पे व्यक्तिवाद हावी है। जबकि सुख-समृद्धि और सौन्दर्य के मापदण्ड सिमट कर वस्तुओं की बढ़ती संख्या, बाहरी चमक-दमक और देह की सुघड़ता व लावण्य मात्र पर केंद्रित हो रहा है, जबकि सेवा के कार्य को समय की बर्बादी व परस्पर सहभागिता के संस्कार को पिछड़ापन करार देने की की प्रवृत्ति पाँव पसारती जा रही है, तब संग्रह की अनाम चिड़िया के नाम’ ‘आषाढ़’ ‘आसरा’ ‘परसहर झड़ाने वाली स्त्रियां’ ‘परदेश में बुखार’ ‘यात्रा’ ‘अब मैं घर लौटूंगामैं प्रेम करता हूँ आदि कविताएं हमारे उस मूल भारतीय जीवन दर्शन के प्रति हमें आस्थावान बनाती हैं जिसमें श्रम से श्रेष्ठ सौंदर्य कुछ नहीं होता, पसीना बहा उपजाए अन्न से अनमोल धन कोई नहीं होता, सामूहिकता से बड़ी शक्ति किसी के पास नहीं होती, घर-परिवार, गांव-जनपद से कटकर सुख-शांति किसी को नहीं मिल सकती और आग, पानी, हवा, मिट्टी से पूज्य देवता कहीं नहीं होते ! यहाँ कर्ज कविता याद आती है। जिसकी प्रथम पंक्ति को ही संग्रह का नाम दिया गया हैः-

इस मिट्टी से कहूँगा धन्यवाद

जिसमें बंधी रहीं मेरी जड़ें

और मैं वृक्ष रहा छतनार

उस दीये कहूँगा

जो जलता रहा एक देहरी पर

मेरे इंतजार में इतने बरस।

      संग्रह में कुल पैंसठ कविताएं हैं। जिसके बारे में कविवर केदारनाथ सिंह कहते हैं कि पूर्ववर्ती संग्रह की सारी अच्छाइयों को अपने भीतर समोए हुए वस्तुतः यह कवि का अगला कदम है जहाँ विकास के भास्वर संकेत दिखाई पड़ेंगे और वह वांछित परिपक्वता भी जिसे एक युवा कवि भी क्रमशः अर्जित करता है।

 

 

 

 

 

        'राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।' - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

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