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तल्ख संदर्भों
की विश्वसनीय कहानियाँ
डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी
कहानी
की साम्प्रत सक्रियता और प्रभावसत्ता से तो लोग अच्छी तरह परीचित हैं, वे
यह भी जानते हैं कि कहानी इस जमीन पर एकबारगी नहीं पहुँच गई है। इस विधा को
जीवन के स्तर पर, रचना के स्तर पर शिल्प के स्तर पर बेहद संघर्ष भरे रास्ते
पर चलना पड़ा है। लेकिन यथार्थ से टकराती हुई प्रश्नानुकूलता के साथ हिन्दी
कहानी ने आज के मानवूय अभियानों में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है। तभी
कहानी अपने पाठकों के सा थ
दौड़ती रही है और सही निष्कर्षों तक पहुँचाने का प्रयास करती रही है । यह
कौशल हिन्दी कहानी में पिछले दशकों में अतिरिक्त वैभव के साथ उपस्थित हुआ
है, जहाँ कहानीकार अपने आसपास की नई उभरती विसंगतियो को पूरी सप्राणता के
साथ उपस्थित कर रहे हैं । विश्वमोहन कुमार शुक्ल ने अपने पहले ही कहानी
संकलन ‘नहीं
लौटेगा नवल’
समसामयिक कथालेखन की इन बारीकियों को अपनाया है और परोसा है । तभी उनकी
कहानियाँ अपनी संवेदना और शिल्प के स्तर पर आकृष्ट करती हैं ।
‘नहीं
लौटेगा नवल’
कुल 18 कहानियाँ हैं, जिन्हें लिखने के लिए कथाकार ने अधिकतर लेखनी की जगह
शल्यचिकित्सक के औजारों का इस्तेमाल किया है । ‘अपनी
बात’
में कहानीकार ने बताया है कि आम आदमी को निगलने के लिए तैयार समस्याएँ ही
इन कहानियों की प्रेरक रही हैं। यही कारण हे कि विश्वमोहन कुमार शुक्ल की
इन कहानियों से गुजरते समय राजनीति, संस्कृति, शिक्षा, परिवार और व्यापार
के विभिन्न इलाकों में व्याप्त फिसलन की तस्वीरें अपने आप उजागर होने लगी
हैं । बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के कहानीकार ने बताया है कि मौजूदा समाज
में बुजुर्ग किस तरह क्रमशः ठूँठ बनते गए हैं और नवतर पीढ़ी की तेज चाल ने
कितनी तीव्रता से पुरानी पीढ़ी को अप्रासंगिक प्रमाणित कर दिया है ।
विश्वमोहन कुमार शुक्ल ने भले, सत्यप्रतिज्ञ, नैतिक मूल्यों के प्रहरी
पात्रों को बदलते परिदृश्य में असफल, निराश और हताश होते दिखाया है । अपने
शिष्य या पुत्र या बहू के सामने परास्त होने वाले बुजुर्ग इस संकलन में
बड़ी संख्या में हैं । बालगोविन्द पांडेय, कृपशंकर, रघुनाथ प्रसाद, बजरंगी
बाबू, योगेश बाबू, देवी बाबू, आदि ऐसे ही लोग हैं। ‘नहीं
लौटेगा नवल’
के नवल को पता चल गया है कि तुलसी चौरे पर दीपक जलाने से नौकरी नहीं मिलती
और नए गणित में दो गुना दो पाँच हो गया है । लेकिन उसके पिता बालगोविन्द
पांडेय पुराने दौर के मास्टर ही रह गए हैं । तभी अपने एक नालायक शिष्य का
मंत्री बन जाना उन्हें स्तब्ध कर देता है । इसी तरह ‘निर्णय’
कहानी का हरेन्द्र अपराधी से नेता बनकर अपने प्रोफेसर पिता को अवाक् कर
देता है, जैसे ‘नहीं
लौटेगा नवल’
में चन्द्रप्रकाश ने मंत्री बनकर बूढ़े शिक्षक को अवाक् कर दिया है ।
‘ये
पॉलिटिक्स है’
का मनसुख अपने पिता को जातीय राजनीति का नया अर्थ समझाता है ।
‘घुसपैठिए’
के मास्टर कृपाशंकर को संतोष है कि उनके बेटे के पाप से छिटकी गंदगी को
दूसरे बेटे ने धो डाला है, लेकिन ऐसा संतोष सबके नसीब में नहीं है ।
‘कलियुग
का केशव’
नए दौर के ऐसे यावहारिक पुत्र की कहानी है जो अपने माता-पिता के बुढ़ापे की
लाठी बनने की अपेक्षा पत्नी के साथ स्वतंत्र जीवन बिताना पसन्द करता है।
‘नहीं
फूटेगी कोंपलें’
के बजरंगी बाबू अवकाश प्राप्ति के बाद क्रमशः निरर्थकता के पर्याय बनते गए
हैं । ऐसे पारिवारिक विघटन के चित्रों को उकेरने वाले कहानीकार ने ‘आशिष’
में बेटे-बहू का ऐसा यथार्थ भी सामने रखा है जिनकी निगाह माँ की मौत के बाद
उसकी चेन पर ही स्थिर है । ‘बिजनेस’
कहानी के लक्ष्मीचंद वास्तव में चतुर और सम्पूर्ण बिजनेसमैन हैं, जिनके लिए
मंदबुद्धि बेटे की मौत भी एक नए व्यापारिक लाभ का रास्ता खोज देती है । इन
सारी कहानियों के माध्यम से विश्वमोहन कुमार शुक्ल ने बदलते पारिवारिक
संबंधों के बीच विलुप्त होते मानवीय मूल्यों की वास्तविकताएँ ही प्रदर्शित
की हैं ।
इस
संकल की कुछ कहानियों का आस्वाद इनसे भिन्न है । जैसे, ‘मुंसिफ-मुजरिम’
कहानी पुरुष मानसिकता पर सीधा प्रहार है । लता और ललित के बीच पनपे
अविश्वास के बीच कहानीकार ने पुरुष की गंदी मानसिकता के समापन का एक रोचक
और बंधक रास्ता खोज निकाला है । ‘कम्बल
कल बँटेगा’
कहानी से व्यवस्था के छिद्र दीखते हैं और ‘हताशा’
के अकलू की हताशा वास्तव में हर शोषित की हताशा है क्योंकि उसके ही समाज से
निकले लोग इस हताशा के उत्प्रेरक हैं । ‘अपने
ही खून से रंगे हाथ’
अंजलि के भ्रूण परीक्षण और सुके बाद पुत्री के जन्म से उपजी हुई जुगुप्सा
की मार्मिक कहानी है, जो नवजात बच्ची की मौत पर समाप्त होती है । ‘ये
कारगिल से लौटे हैं’
का शिवेन्द्र मोर्चे पर बाहर के दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर लेता है,
लेकिन अपने ही गाँव की जातीय हिंसा का शिकार हो जाता है। ‘आभस’
कहानी की प्रज्ञा का आविष्कार तो अविश्वसनीय है, लेकिन पुरुष प्रधान समाज
के प्रति प्रज्ञा का आक्रोश अस्वाभाविक नहीं है।
अपनी कहानियों में
विश्वमोहन कुमार शुक्ल ने साहित्यकारों को अनदेखा नहीं किया है। जैसे,
‘निरीह’
कहानी में कहानीकार ने साहित्यकार को आसमान पर बैठा दिया है। ‘व्यथा
कथा के बाद’
एक लेखक की आदर्श कथा है, जिसकी रचना पाठकों को विश्वसनीय एवं प्रेरक लगती
है । इस कहानी में एक पाठिका कथाकार के पास दौड़ी चली आई है कि उसकी कहानी
में पाठिका के जीवन की तल्ख सच्चाई है । वास्तव में यही विश्वसनीयता
‘नहीं
लौटेगा नवल’
के कहानीकार की विशिष्टता और पहचान भी है ।
अपने
इस प्राथमिक संकलन के माध्यम से विश्वमोहन कुमार शुक्ल ने कथाकारी की
कलाकारी और विश्वसनीयता की संभावनाएँ इंगित की हैं ।
‘नहीं
लौटेगा नवल’
एक पठनीय और विशिष्ट संकलन है । कथा प्रयोगों और मानसिक विचलनों की दृष्टि
से बहुत सारी मौजूदा नव्यताएँ इस संकलन में नहीं हं, इसके बावजूद यह कथा
संग्रह विश्वसनीय और महत्वपूर्ण है ।

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