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संवेदनशील
मानव का विश्वसनीय
आश्रय स्थलः छांदस कविताएं
लालसालाल तरंग
....“नवगीत
वैयक्तिक प्रणयानुभूति की व्यंजना का विरोध नहीं है तथापि वह जिजलिजी
भावुकता का पक्षधर भी नहीं है । प्रीतितत्व के संदर्भ में उसकी दृष्टि
निषेधपरक नहीं है फिर भी वह
समकाली जीवन की विसंगतियों के चित्रण को
प्राथमिकता देता है”
नवगीतों में आंचलिक व्यंजना या लोकत्तव, वैज्ञानिक शब्दावली, सहज
संप्रेषणीयता के सात संपृक्ति होती है । गीतों-नवगीतों में तात्कालिक
घटनाओं का विवरण सहज उपलब्ध होता है । इनके विषय में यह कथन शत-प्रतिशत
मूरितरूप लेता है कि ‘वे
रचनाएं अधिक प्रभावशालीहोती हैं जिनमें कविता कोई बोझिल बयान नहीं देती
बल्कि केवल चित्र प्रस्तुत करती है जो स्वयं सवाक् होती हैं ।‘
दिनेश
कुमार शुक्ल छंदमुक्त कविता के लिए पहचाने जाते हैं परन्तु
‘नया
अनहद’
में उनकी बहुत सी कविताओंमें लयात्मकता तथा छंद की रिक्तता को भरने का
प्रयास बताता है । कि वे गीत या छंद से बिन्कु अलग नहीं हैं
–बल्कि
इनकी ओर अभिमुख भी हैं “जबरा
छीन रोटी पानी/पास पड़ी ना कौड़ी कानी /परदेसी पूंजी की नागिन/गरदन गरदन
रही लपेट/टेढ़ी चाल चले सो राजा /सीधी चले सो खाय चपेट/ प्रजातंत्र को उठा
ले गए पड़े से ठ के बड़े लठैत ।”
‘सब
गए समेट’
‘तिलिस्म
कीमालगाडी’
तथा ‘एक
व्यक्त चित्र’
आदि शीर्षक छंदकी ओर ही अभिमुख हैं ठीक यही स्थिति है अशोक वाजपेयी की ।
“शहर
अब भी संभावना है”
के पृ.-9 पर जो कविता है –वह
इसी उपर्युक्त जाती की “सिर्फ
मेरे हाथ हैं जो भाषा संभाले हैं । सिर्फ मेरे ओठ हैं जो कई गाल थामें हैं
।”
और साहित्य कोई ऐसा अनुशासन भी नहीं है जो जीवन की जिन्दा हकीकतों से बचकर
निकले । रचना अपने समय के सवालों से टकराती हुई अपनी हस्तक्षेपी भूमिका का
निर्वाह करती है ।
यदि
साहित्य में नवोन्मेष करने वाले अथवा नव्य चेतना संपन्न सर्जकों को पहचाने
में आलोचना विफल रहती है तो वह पिछड़ जाती है। पाठक और सर्जक आगे बढ़ जाते
हैं । (राजाराम भादू, ‘मधुमती’
जूल 2002 पृ.-9 ) मैं इस बात से सहमत हूं और आज नहीं तो कल आलोचक वर्ग अपने
पिछड़ने को महसूस करेगा और गीत/नवगीत की स्थायी, सबल, क्रांतिकारी और
मानवीय सरोकारों संवेदनाओं की भूमिका को स्वीकारेगा । अब तो डॉ. नामवर सिंह
भी मानते हैं कि”नवगीत
आन्दोलन नहीं है और न इसे आन्दोलन बनना चाहिए”
और ‘नवगीत
में सप्तक’
के द्विदीय संस्करण के लोकर्पण के समय उन्होनें कहा
‘नवगीत
में बड़ी शक्ति है । मसीक्षा होनी चाहिए । छंद लिखना खेल नहीं है । छंद की
समीक्षा और कठिन है । नवगीतकारों को इसमें आगे आना चाहिए’
। गीतों/ नवगीतों की वापसी को भी वे स्वीकारते हैं । उनका कहना अब कापी
प्रासंगिक हो गया है ।“अच्छी्
कवित की एक खूबी यह भी होती है कि वह जबान पर चढ़ जाय ।”
(मरुधर मृदुल की काव्य पुस्तक ‘आहट’के
लोकार्पण के समया कथनांश-जनसत्ता दिल्ली 12/10/001) ।
एक बात
बड़ी साफ है कि गीत/नवगीतों के विरूद्ध
–अपनी
बात को मनवाने की दृष्टि से-चाहे जितना तर्क दिया जाय गीत गीत ही हैं, और
रहेंगें । क्यों किसी भी समय की सच्ची और बड़ी कविता मनुष्य थे केन्द्रीय
प्रश्नों से जैसे प्रेम, सौन्दर्य ,प्रकृति आदि....दो चार होती हैं (अशोक
वाजपेयी इ. टुडे 23.1.02 पृ.-69 ) अशोक वाजपेयी ने गीत नवगीत के भावी
केन्द्र को समझ लिया । (मंधन रा.स. 16.02.02)। एक बात से मैं कतई सहमत नहीं
कि गीत/नवगीत या छांदस कविता स्मृति का अंश नहीं बन जाती तो रा.स. मंथन
22.12.2002 में प्रकाशित उनकी दोनों लंबी कविताओं के शीर्षक हटा दिए जाने
पर क्या वे सीधे-सीधे गद्य नहीं हैं
?
फरि कविता
और गद्य में अन्तर क्या रहा ?
इस
पृष्ठ् पर राय देने वाले भी कौन हैं फिर वही बात कि तू मुझे पंत कह मैं
तुझे पंत रह मैं तुझे निराला । अन्तर्मुखी कविताओं का आस्वाद करने वाले भी
कौन होंगे गीत/ नवगीत गजल वाले ही होंगे ।
सर्वग्रासी अंधेरे में संवेदनशल मनुष्य का विश्वसनीय आश्रय स्थल और सबसे
पैना प्रतिरोध (हेमंत कुकरेती)क्या छांदस कविताओं में नहीं
?
वस्तु की
ठोस पहचान का विवेक और सरल की ओर जाने का आत्मविश्वास (देवी प्रसाद) गीत
नवगीतों में बखूबी देखाजा सकता है । देखा जाय तो अशोक वाजपेयी ने (आजकल
सितंबर -2001 में पृ.-32-33)बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा छंद को हमने जिस
बेरहमी और अज्ञान से परित्याग किया है वह आश्चर्यजनक है । पिछले 50 साललों
में हमने छंद को ऐसे छोड़ा है कि हमें यही मान लेना चाहिए कि मुक्तछंद ही
हमारा जातीय छंद बन गया है । नए लोगों को चाहिए कि वे छंद की तरफ मुड़े और
छंद में ही आधुनिकता और समकालीनता लाने का प्रयास करें । संसार में बहुत
सारी श्रेष्ठ कविताएं छंदों में लिखी गई हैं । डब्ल्यू.एच.ऑडेन, जोसेफ
ब्राडस्की ने छंद में लिखा । रूस की अधिकांश कविताएँ छंद में लिखी गई।
फ्रेंन्चमें भी काफी कविताएँ छंद में मिलती हैं । अगर थोड़ा और लिबरल होकर
खोजा जाय ते डॉ. रघुवीर की ये कविताएँ भी छांदरसता की ही ओर संकेत करती
हैं-
“राष्ट्र
में भला कौन वह/भाकत भाग्य विधाता
फटा
सुथम्मा पहने, जिसका
गुनना
गकटकना गाता / मखमल, टमटम बल्
तुरही/पगड़ी,छत्र, चंवर के साथ
तोप
छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय जय कौन
कराता है ?
”
(‘कुछ
पते कुछ चिट्ठियाँ’
में शीर्षक ‘आत्महत्या
के विरुध्द ’)
या
‘रामदास
’शीर्षक
में
.... “निकल
गली से तब हत्यारा
आया, उसने नाम पुकारा
हाथ तौलकर चाकू मारा
छूटा लोहू का फब्बारा।”
दुख होता है जब बड़े कहे जाने वाले कवि और आलोचक अपनी तथाकधिल महान कवित्व
एवं अप्रतिम योग्यता को पाठकों और आम जनता पर थोपते रहते हैं । एक शब्द है
प्रगतिशील। प्रगतिशील के किसी भी बिरादरीना शब्द से एसे विद्वान बिकते ,
जिहुंकते और गुस्से के इजहार में अनाप-शनाप बकते हुए गालियाँ देते चले जाते
हैं । डॉ.युगेश्वर का गुस्सा या योग्यता थोपना
‘बड़कवा
नारे रोवै न देय’
शायद ऐसा ही हैं ‘प्रगतिशीलता
ने अर्थ और भूख का सहारा लेकर’
साहित्य का स्तर गिराया । “इस
बुद्धि से काव्य संभव नहीं । प्रगतिशील और अश्लीलता दोनों में उत्तेजित भूख
है । दोनों का संबंध ऐन्द्रिक व्यापार से है । प्रगतिशिलता का संघर्ष
अश्लील साहित्य का बलात्कार अश्लीलता देह व्यापार है”
(डॉ. युगेश्वर-उत्तर प्रदेश, पृ.-27/28 अक्टूबर 1997) एसे ही विचार हैं डॉ.
कमल किशोर गोयनका के “हमारे
प्रगतिशील साहित्यकारों ने दशप्रेम और चरित्र को भ्रष्ट कर दिया है । उनके
अन्दर स्टालिन बैठा रहता है । देश और राष्ट्रीयता को ये मानते हीनहीं ।
सुरा, सुन्दरी, पद, लाभ इनके लक्ष्य हैं और झूठी धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा
लगाए फिरते हैं ।”
(दैनिक जागरण, 26.5.002 “सांप्रदायिक
सौहार्द्र में साहित्य का योगदान”)
समकालीन कविता ने नाम पर अधिकांेश साहित्यकार और कवि जन का नाम लेते हुए भी
जन से दूर होतेगए हैं जिससे जन की वेदना, उल्लास, उत्पीड़न कीबावनाओं तथा
विचारों का सृजन नहीं हो पाता । ऐसे ही लोग प्रगतिशीलता, जनवादिता
प्रगतिशील या जनवाद जैसे शब्दों से बिदक या चिहुंक जाते हैं । उन्हें इन
शब्दों में मात्र साम्यवाद की ही गंध मिलती है जबकि कविता को किसीभी विधा
में समष्टिवादी, मुक्तिवादी ओर सर्वजन हिताय जैसी मूल भावनाएं होना कविता
की शर्त है और इन भावनाओं का संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त
शब्दों का प्रयोग यहाँ जरूरी है करना भी आवश्यक होता है । मैनेजर पांडेय भी
मानते हैं-“अच्छी
कविता होगी तो वह जनवादी ही होगी ऐसा मैं मानकर चलता हूं ....”(मेरे
साक्षात्कार पृ -55) गीतों/नवगीतों या छंदोबध्द कविताओं में स्पष्ट रुप से
देखा जा सकता है ।
जनवादी
गीतों ने हिन्दी गीतों के एक नवस्फुण, नई ताजगी नए मुहावरे और भावबोध दिया
है । चाहे मगही के जनगीतकार मथुराप्रसाद नवीन हों, हिन्दी में महेन्द्र नेह
हों या ‘जनगीत
’के
समर्थक कवि राजेन्द्र प्रसाद सिंह हों, याहे
‘मिट्टी
बोलती है’
के जनगीतकार रमेश रंजक हों, सुधीर सक्सेना हों या अश्वघोष हों, विनय, शलभ,
शील, डॉ. शांति सुमन, नचिकेता सभी इस दिशा में सक्रिय रहे हैं और आदमी तथा
वक्त को समझकर रचना करते रहे हैं।“पत्थरों
पर पत्थरों को मार, टिनदाकी उठेदी या खून स्याही में उबलने दें ,थम जरा सा
दिननिकलने दें ”
(रमेश रंजक) और “जुल्म
के इस ठाठ को बदले, घुन लगे इस काठ को बदलें
”(महेन्द्र
नेह) और “और
थोड़ी देर तू इस दर्द को ढोले , फिर बुझेंगे कोयलों उठ रहे शोले,”(अश्वघोष)“सिर
पे बची है छांव लेके भी चलो चलो लहूलुहान पांव लेके भी चलो।”
(दिसं. 98) महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1914 में हीरा डोम की भोजपुरी कविता
शीर्षक ‘अछूत
की शिकायत’
सरस्वती में चापी थी। डॉ. रामविलास शर्मा ने इस कविता को 1977 में सर्वसुलभ
कराई । यह गद्य कविता थी या मुक्तछंद था
?
सीताकांत महापात्र जब कहते हैं कि कविता
“मनुष्य
की जिन्द्गी को देखने का नजरिया देती है कविता मनुष्य को मनुष्य होने का
अर्थ समझाती है ।”
(रा.स. संथन 17.2.02) धूमिल ने भी तो कहा था कि
‘कविता
पहले आदमी बनाती है ।’
तब क्या यह फारमूला गीत/ नवगीत के लिए नहीं है
?
सीताकांत महापात्र ने शब्द और समय को जो महत्व दिया छादस कविता के लिए भी
यह सटीक वांछनीयता है जो उपलब्ध है। जो लोग छंद, गीत, नवगीत के कैनवास को
छोटा मानते हैं ,फालतू बताते हैं और बहुत सारे विरोधी अनापशनाप आरोप लगाते
हैं उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि शैलेन्द्र जैसे जनवादी गीतकार के गीतों
से आज भी सभी अपने किसी भी आन्दोलन को रंग देते हैं ।
‘हर
जोर जुल्म के टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है,’
किस आम संगर्ष का यह पंक्ति मूलमंत्र नहीं है
?
कबीर सी साफगोई, अक्खड़ता तथा निराला सी हुंकार एवं फटकार शैलेन्द्र के
जनवादी गीतों में मिलती है।
“तू
जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत पर यकीन कर/ अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार लो
जमीन पर”
ऐसी रचनाएं जो आन्दोलन का मूलमंत्र बने केवल गीत/नवगीत ममें ही संभव है
शाश्वत हैं । छंदमुक्त कविताओं में कदापि नहीं । वस्तुतः नवगीत का रचना
शिल्प लोकदर्मी है । कविता गीतात्मकता के बिना लूली, लंगड़ी, गूंगी और
वस्त्रहीना है ।
गीत वस्ततुः हृदयज होते हैं । भूमण्डलीकरण के चनौतीपूर्ण दौर में भी गांवों
का स्मरण इसी का प्रभाव है “मन
पर टंगे तगादों जैसे दुनिया के नक्शे में/ हम भी अपना गांव और तहसील लिखें
/सुरज चांद सितारों की तफसील लिखें।”
(बस्ते में भूगोल-हृदयेश्वर)
गीतों/ नवगीतों की तह में जाने पर ज्ञात होता है कि वे घेरते हैं ,संबोधित
करते हैं ,चुनौती देते हैं , आह्ववान करते हैं ,स्थायित्व देते हुए दूर तक
ले जाते हैं, समष्टिवादी ,लोकहितार्थ, मानवमुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते
हैं । इनमें कवि के अनुभव की सघनता और लोक या जन से कहने का माददा, समय को
समेटने की पूरी क्षमता होती है और ये सुखदुख और आर्थिक शोषण से जूझते भी
हैं । राजस्थानी लोकगीत
‘धूमर’
के दस लाख कैसेट बने ,बिके ,क्यों
?
आज मैथिली और भोजपुरी, पंजाबी गीत लोकगीतों की घूम क्योंहैं
?
पदमा सचदेला आज जहां हैं, उन्हें गीतों ने ही वहाँ तक पहुँचाया । उनका भी
मानना है
“....जीवन
के संबंधों ,घर-परिवार, समाज, देश, और फोर दुनियां में परिवर्तन होना है तो
तदनुकूल हमें स्वयं को भी ढालना होगा । छंदमुक्त कविता का भी एक समय था पर
शायद मसय ने उसे काफी सहन करना अस्वीकार कर दियाए। अब शाश्वतता की ओर
दृष्टि की क्योंकि गीत विधा ही शाश्वत रहेगी ।”
दुखद सिथित यह है कि विचार दोष,भाषण दोष, साक्षात्कारदोष, सिर्फ तातकालिक
प्रचार का माध्यम हो सकता है । इसमें जबरदस्त चेन का काम मीडिया का है ।
जिसके टच में जितनी धनिष्टता के साथ मीडियाहोगा वह दिन को रात ,रात को दिन
कहने में अस्तायी प्राथमिकता तो पा ही जाएगा ।
गीतों/
नवगीतों में समकालीन सत्ता, सांस्कृतिक व्यवस्था तथा किसी भी प्रकार के
बाहरी आर्थिक-राजनैतिक फतवा की अवज्ञा का माद्दा है ।
‘लोक
चेतना के आवेगात्मक’स्वाभाव
को दबाने’
का दुष्चक्र सत्ता द्वारा तो चलता ही है पर कवि आलोचकों द्वारा भी चलाया
जाय यह खलनीय ही नहीं वरन् चिंतनीय भी है । स्वयं को
‘परफेक्ट’
मानकर उस
‘परफेक्ट’
को कैत्र दीसरो सहा
‘परफेक्ट’
को नकार देना बिल्कुल ओछी अवधारणा है ।
‘मैं
तुझे पंत कहूं, तू कह मुझे निराला
’
वाली बात मुक्तछंद के कवियों में अधिक प्रचलित है और संभवतः यही मंत्र
पुरस्कारों को भी प्रभावित कर रहा है ।
चिंता यह
भी है कि आज जितनी भी तथाकथित लघु (पर हैं वे व्यावसायिक और बड़ी
भ)पत्रिकाएं हैं वे भी अपनी महानता सिद्ध करने में वृत्तिवादी बुखार से
पीड़ित हैं । हर पत्रिता इसी साहित्यिक आतंक की शिकार है । ये लघुकथाओं और
निबंधों की तरह पूरी बडीबड़ी पंक्तियों या डेढ़ डेढ़ पंक्तियों के गद्य को
‘कविता’
धोषित कर पाठकों का सरदर्द बढ़ाती है । जो जितना ही बड़ा.....(सत्ताधीन,
आर्थिक, राजनैतिक, मीडियाधर्मी) होगा उसकी रचना नहीं,उसे बड़प्पन के मानदंड
से भी तौला जाता है । मैं यह भी मानता हूँ कि घटिया छंद लिखने वाले भी
ज्यों ही कुर्सी पर पहुँचते हैं एक महान कवि हो जाते हैं।
1,2.

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