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अंक-3, अगस्त, 2006   

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ललितनिबंध

 

वंदे मातरम्- अमृत राय     

भारत होने का अर्थ- डॉ. युगेश्वर     

 

 

भारत होने का अर्थ


डॉ.युगेश्वर

 

        भारत का अर्थ है प्रकाश की खोज। ज्ञान का अनुसंधान । इसीलिये वैदिक ऋषि की प्रार्थना है तमस नहीं ज्योति की ओर । ज्योति, प्रकाश श्रेष्ठ है । तम का ठीक उलटा । केवल रोशनी नहीं । चमकदार एवं तेजस्वी रोशनी । लगता है कहीं असंख्य दीप जल रहे हैं । सनातन, शाश्र्वत दीप । ऋषि इसी दीप ज्योति की ओर बढ़ने का संकेत करता है । तमस से ज्योति को ओर बढ़ना भारत का सनातन विचार है । बिना किसी माध्यम या भगवान के । स्वतः । अपनी स्फूर्ति से । इसीलिये भारत वस्तु की अपेक्षा विचार है । सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया है । नाम इसके दूसरे भी हैं । किंतु उन नामों में यह शक्ति नहीं है । स्वायंभुव मनु चार देशों की चर्चा करते हैं-ब्रह्मावर्त, ब्रह्मार्षिदेश, मध्यदेश आर्यावर्त । इन नामों को देखने से कई बातों पर ध्यान जाता है । ये नाम देश के नहीं क्षेत्र के हैं । मनु दक्षिण की चर्चा नहीं करते । इन चारों में कहीं भी दक्षिण और सरस्वती नही से पश्चिम की चर्चा नहीं है । जबकि भारत वर्ष में सरस्वती से पश्चिम और दक्षिण के देश भी हैं । मनु ने भारतवर्ष की चर्चा भी नहीं की है । वे केवल यज्ञी तथा कृष्णसार मृग के चरने वाले देश को छोड़कर शेष को म्लेच्छ देश कहते हैं । मनु की दिलचस्पी भारत के अन्य दूसरे नामों के प्रति भी नहीं है । उदाहरण के लिये भारत का पूर्व नाम अजनाभ खंड  है । इसका अर्थ है ब्रह्मा की नाभि या नाभि से उत्पन्न । मनु ने जंबूद्वीप आदि की भी चर्चा नहीं की है।  भागवत की पाँचवें स्कंध, चतुर्थ आध्याय में ऋषभदेव को अजनाभ खंड का राजा बताया गया है । ऋषभ के सौ पुत्रों में भरत सबसे बड़े थे । भरत  के नाम पर ही जनाभ खंड भारतवर्ष कहा जाता है । उनके छोटे भाई अलग-अलग देशों के अधिपति हुए । उनसे पता चलता है कि ब्रह्मावर्त, विदर्भ, कीकट, मलय आदि भारत वर्ष  से अलग थे । ऐसा लगता है बाद में सबका नाम भारत वर्ष हो गया । जैसे हिंद कभी सिंध प्रदेश को कहते थे बाद में दक्षिण, पूर्व और उत्तर आदि का संपूर्ण भारत हिंदुस्तान कहा जाने लगा। आज भी अनेक सूबों के लोग अपने को हिंदुस्तानी नहीं कहते हैं । भारत शब्द हिंदुस्तान से अधिक व्यापक है । भारतवर्ष में सभी क्षेत्रों और पहाड़ों के नाम गिनाए गए हैं । कोई भी दिशा छूटी नहीं है। एसे ही महाभारत ने सभी दिशाओं के पहाड़ों और नदियों के नाम गिनाए हैं । विष्णु पुराण में भारत को थोड़े में स्पष्ट रूप से बताया है समुद्र से उत्तर तथा हिमालय से दक्षिण स्थित देश को भारतवर्ष कहते हैं (2/3/1) विष्णु पुराण के अनुसार इस देश का पुराना नाम हिमवर्ष था।

 

पुराणों की राष्ट्र चेतना अत्यंत गहरी है । देवता भारत में उत्पन्न होना चाहते हैं । अकेला भारत भोग और कर्मभूमि है । यह देश स्वर्ग से महत्त्वपूर्ण है । नाना प्रकार  की प्रकृति और ऋतुओं वाला है । यह तपस्वियों का देश है । पुराण इसके निर्माता, शासक और प्रजावत्सल राजाओं की प्रशंसा करते हैं। किंतु इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेएषता इसकी सनातनता है । सनातन और नादि होने के कारण इस देश में किसी का भी जन्म नहीं, पुनर्जन्म होता है । प्रत्येक जन्म पूर्व संस्कार युक्त पुनर्जन्म है । यहाँ सभी व्यक्ति हैं । व्यक्ति का अर्थ है अप्रत्यक्ष का प्रत्यक्ष होना । जो है । किंतु प्रगट है उसका प्रगट होना ही व्यक्ति है । यह एक पूर्ण प्रक्रिया है ।  दर्शन है । शैव इसे ही उन्मीलन कहते हैं । जो मिल गया था वह प्रलय था। सृष्टि में उसी का उन्मीलन होता है । उन्मीलन । एक  ओर जो है सब मिथ्या है । नाशवान् है । दूसरी ओर सब सनातन है।  मानव जीवन मे कर्म और भोग का चक्र चलता है। ऐसे ही पूरी सृष्टि उत्पन्न होती है, रहती, बढ़ती, परिवर्तित, ह्वास और नाश को प्राप्त होती है। सृष्टि में जो कुछ भी इंद्रियगोचर है सब इस षट्चक्र में फँसा है । न केवल यह चक्र सनातन है बल्कि इस चक्र की कील वैसी ही उससे अधिक सनातन है । उस कील की सनातनता विचित्र है । वह इन षट् विकारों से मुक्त है । सभी विकारों और दृश्यों में रहकर भी वह सबसे अलग है । अन्य भी है। अनन्य भी है। यह एक आश्वासन है । यह चक्र कभी बिखरने वाला नहीं है । टूटनेवाला नहीं है । यह संपूर्ण विश्वविष्णुमय है । चक्रवत घूम रहा है। (चक्रवत् परिवतंते सर्व विष्णुमयं जगत् )।

 

सर्व विष्णुमयं का अर्थ है सभी वस्तुओं (जड़-चेतन) के कारण, कार्य उपादान एवं निमित्त भगवान् हैं । यह भगवान् अनिर्वचन हैं । केवल निषेध द्वारा जाने जाते हैं । ज्ञान के सामान्य साधन इंद्रियाँ हैं । इनसे विष्णु को नहीं समझा जा सकता । इसके लिये इंद्रियातीत और प्रकृतिपार जाने की आवश्यकता है । यहाँ व्यक्ति की दुहरी समझ चाहिए । पहले तो वह नदी, समुद्र, वन, पर्वत,पशु-पक्षी आदि सबको ईश्वर रूप में देखे । फिर ईश्वर को इन सबसे भिन्न देखे । मतलब कि निराकार और साकार दोनों की समान सत्ता है। निराकार आकार ग्रहण करता है । व्यक्त होता है । आकार प्रलय में लीन होकर निराकार बन जाता है । संपूर्ण जड़-चेतन को ईश्वर समझने की चेतना सामाजिक न्याय का महत्त्वपूर्ण आधार है । शोषण, उँच-नीच ,अधिक कम संग्रह आदि सबको ईश्वरी दृष्टि से देखो । मनुष्य, पशु या प्रकृति किसी का शोषण नहीं । किसी से  अधिक संग्रह नहीं । सबको जीने का अधिकार है । शोषण और संग्रह प्रभु की सत्ता के प्रति अविश्वास है। प्रभु का शोषण है । संग्रह और सुख उस शरीर के लिये है, जो नाशवान् है । अविनाशी को क्या चाहिए ? न संग्रह । न सुख । नाशवान् ही सबका नाश करता है । अविनाशी इससे बिलकुल उदासीन है । एक पेड़ पर बैठे दो पक्षियों का रूपक है एक खाता है । कर्मफल का भोक्ता है । दूसरा केवल देखता है । यह खाना अपने प्रभु और प्रभु की अभिव्यक्ति से संबद्ध है । इसीलिये भारत का चिंतन संयम की माँग करता है । भोक्ता और भोग्य के बीच एक प्रकार का संयम आवश्यक है । भोग न कर केवल देखने वाले की नज़र इसी संयम पर है । यह संयम बिगड़ने न पाए । भोग सीमित रहे । सीमा में रहे । असीमित भोग ईश्वर विरोधी है । संयम और सामंजस्य नष्ट करने वाला है। भौतिक विचारों ने इस संयम की उपेक्षा की है । शोषण को अपराध न मानकर विकास माना है।   जड़ प्रकृति भी विद्रोह करती है । नित्य फैलने-बढ़ने वाली बीमारियाँ, युद्ध,अशांति (मानसिक भी) और प्रदूषण इसी शोषण के परिणाम हैं । हरियाली कटती है और धुआँ बढ़ता है । हरे भरे सुरम्य दृष्टिवाले जंगल का स्थान विषैली धूल और धुओं को प्राप्त होता है ।

 

भागवत की स्पष्ट चेतावनी है - पेट भर से अधिक संग्रह करने वाला चोर है । संत कबीर साँई से मैं, मेरे कुटुंब और मेरे अतिथि की भूख मिटाने भर को माँगते हैं । कुटुंब (परिवार) और साधु की चिंता सामाजिक है । स्वार्थ रहित है । परमार्थ है । पश्चिम ने एक स्तर पर आकर मानव शोषण का विरोध किया । किंतु उसने यह मानव को संपूर्ण प्रकृति से अलग इकाई मानकर करना चाहा । मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता शब्द सुनने में अच्छा लगता है । किंतु ऐसा है नहीं । मनुष्य की चाहे जितनी प्रशंसा की जाय वह प्रकृति के अनेक उपादानों के समान ही एक उपादान है। हाँ, उसकी कुछ अपनी विशिष्टतता है । किंतु विशिष्टतता उसे प्रकृति से अलग न कर जोड़ती है । उसकी समझदारी, सद्भाव और एकात्मकता की ओर संकेत करती है । जैसे मनुष्य आग, बाढ़ और तूफान में नहीं रह सकता है, वैसे ही वह नष्ट, शोषित और दोहन भरी प्रकृति में जीवन को सुरक्षित नहीं रख सकता है । प्रकृति माँ है । अनादि और । परमेश शक्ति है ।   इस परमेश शक्ति का नाश ईश्वर मर गया संपूर्ण प्रकृति को रौंदना प्रारंभ किया । वह भूल गया कि ईश्वर के मरने का अर्थ है उन सब की मृत्यु जिनमें ईश्वर है । जो ईश्वर पर टिके हैं । जो नाश के बाद फिर ईश्वर में मिल जाते हैं । व्यक्त या व्यक्ति होना तो मात्र बीच की स्थिति है । यह कौन तय करेगा कि अत्यंत अज्ञानमूलक मानेंगे । किंतु प्रकृति के शोषण संबंधी दृष्टि वर्ण-व्यवस्था की छुआछूत जैसी है । इसने मनुष्य समाज के स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर विकास को बाधित किया है।  अपने विकास को पूर्ण सर्वश्रेष्ठ  और निर्विकल्पिक मानकर उसे ही सेना सहायता और साक्षरता द्वारा लादने की कोशिश की है। यह भी संभव है कि पश्चिम प्रकृति के सामने इतना लघु हो कि प्रकृति उसके विद्रोह की उपेक्षा कर दे । किंतु भारत जैसे देश में जहाँ प्रकृति और पुरुष का समान भाग है । प्रकृति का विद्रोह भयानक नाश होगा । कामायनी महाकाव्य में प्रकृति विद्रोह की कथा है कहा जा सकता है कि नाश तो अनिवार्य है । ईश्र्वर का नियम है । वह नाश करेगा ही । क्योंकि प्रत्येक अभिव्यक्त को अव्यक्त होना है । सब की आयु पुर्व निर्धारित है। मनुष्य तो मनुष्य । ब्रह्मा की भी आयु निश्र्चित है । किंतु इसके साथ ही पुनर्जन्म भी है। पुनः लौटना नहीं होगा तो चाहे जो करते । धर्मशाला छोड़ते समय हडिया फोड़ देते । किंतु पुनः यहीं लौटना है तो इसकी रक्षा एवं वृद्धि को सुरक्षित अपनी ही संतान के लिये रखिए । सारा बैंक बैलेंस खतम करने का आपको हक नहीं हैं । भविष्य निधि का धन आपके संतान का  है । सर्वभोग दृष्टि स्वार्थवाली है । भारत की प्रकृति दृष्टि नितांत भिन्न है । प्रकृति के नाश का अर्थ है अपना नाश । शिशु माँ को काट कर दूध नहीं पा सकता । माँ और शिशु का संबंध परस्पर का है। दूध पिलाती माँ को आनंद की एक विशिष्ट ऊर्जा मिलती है। यह ऊर्जा कहाँ है ? माँ में है । बच्चे में है । दोनों में है।     इसका निवाला अज्ञात में है । यह ऊर्जा मात्र कार्यानुमेया है । इससे महत्त्वपूर्ण है प्रकृति का तादात्म्य । बच्चा एक बार माता के दूध के बिना शायद जी ले। किंतु मनुष्य प्रकृति के अभाव में नहीं जी सकता । क्योंकि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है । विधाता ने प्रकृति और मनुष्य का युग्म बनाया है । जुडवाँ है । इनमें एक मरा कि दूसरा भी नष्ट हो जायेगा ।

 

प्रतिवर्ष प्रकृति वर्षा, बाढ़ तूफान, प्रचंड धूप आदि से उत्पात करती है। जाने कितनी चीजें अपनी कोख में छिपाये रहती है ।  परिश्रम से देती है । किंतु पुराणों का अनुभव है कि मनुष्य के आलस्य और असावधानी से प्रकृति इतनी विकराल हो उठी फिर उसका दमन करना पड़ा । राजा पृथु ने प्रकृति का दमन कर पृथ्वी बसायी । पुराण कहना चाहते हैं कि प्रकृति से भी सावधान रहो । वह प्रकृति ही तो है जो मनुष्य का अधिकतम काम, रति, क्रोध लोभ आदि को बढ़ाकर उसे पतित नष्ट करती है ।  साथ  में स्वयं भी पतित और नष्ट होती है । प्रकृति सुख भी देती है और विद्रोह भी करती है।  प्रलय में प्रकृति विद्रोह होता है ।

 

इसके साथ दो चीजें और हैं एक है स्मृति और दूसरी है परिवेश या आसन । भारत चिंतन, आसन और परिवेश पर अधिक बल देता है । कैसे बैठें, कहाँ बैठें, किस चीज पर बैठें, बैठने पर शरीर की क्या स्थिति हो, बैठने का परिवेश कैसा हो, बैठने की दिशा, बैठने की दिशा, बैठने का मसय आदि क्या हो ? इन बातो का विचार अत्यंत विस्तार से हुआ है। इनका पालन भी यथा साध्य होता है । इसी संदर्भ में यह अजनाभ वर्ष था । ब्रह्मा की नाभि से उत्पन्न । कमल भारत प्रतीक है ।  इसलिये कि यह देश ब्रह्म की नाभी से उत्पन्न है । और ब्रह्म कमल से उत्पन्न हैं । कमल जलज है ।  प्रत्येक देवता के अपने आसन हैं । भारत सभी देवों का आसन है। किंतु आसन की प्रतिष्ठा भी होती है । भारत देव प्रतिष्ठ आनादि आसन है। दूसरे देशों को इसके लिये प्रयास करना पड़ता है। इस प्रयास का मार्ग सब के लिये खुला है।

 

भारत अनादिकाल से साधनाभूमि है और यहाँ व्यक्ति का पुनर्जन्म ही स्वीकृत है तो उसकी स्मृति भी आवश्यक है । भारत की स्मृति आधुनिक मनोविज्ञान की जातीय स्मृति से भिन्न है । स्मृति में जातीय शब्द का प्रयोग से केवल सामूहिक स्वरूप देता है। भारत की स्मृति सामूहिक से अधिक वैयक्तिक है । सामूहिक में अच्छे बुरे सब की चेतना है। किंतु स्मृति शब्द बुरे की चेतना से मुक्त हैं । बुरे की चेतना भी है। किंतु वह स्मृति नहीं  संस्कार है । अच्छे लोग इस संस्कार से मुक्ति चाहते हैं । यह मुक्ति का अर्थ आवागमन के भवचक्र से मुक्ति है। परम  सत्ता में विलीन । कर्तुम् अकर्तुम्, अन्यथा कर्तुम्, सर्वथा कर्तुम् से तदाकारिता । ऐसे को कोई भी संस्कार बाधित नहीं करता । वह स्वयंभू है । विभु है । स्मृति के अभाव में जीव भटकता है । अतद् में मद् की अनुभूति करता है। असत् में सत् देखता है। गीता की समाप्ति पर अर्जुन को स्मृति होती है ।  अभी तक अर्जुन (जीव) मोह में भटक रहा था। संदेहशील था। अनुस्मृति, प्रतिस्मृति, प्रत्यभिज्ञा जैसे शब्द स्मृति के पर्याय जैसे हैं ।

 

पश्चिमी जाति स्मृति एक स्थिति की उपलब्धि मात्र है वह मानव जीवन के मूल बदलाव में सहायता नहीं करती । यह उसका उद्देश्य भी नहीं है । क्योंकि पश्चिम के सारे अध्ययन सामाजिक जोड़-तोड़ के लिए हैं । एक ढंग से वे समाज शासकों के अनुचर मात्र  हैं । इसका उपयोग साधुता के लिये कम शासन के लिये अधिक होता है । किंतु भारत का चिंतन मूल परिवर्तन के लिये है । वह सृष्टि की प्रथम इकाई व्यक्ति से प्रारंभ करता है। इसीलिए आचार्य शंकर अत्यंत मौलिक प्रश्न उठाते हैं –‘इस बात को हमेशा ध्यान में रखो कि तुम कौन हो ? कहाँ से आया हूँ ? मेरी माता कौन है ? पिता कौन है ? विचार करने पर लगा किये सब मिथ्या है । किंतु हैं । इसलिये ये सम दृष्टि की माँग करते हैं । क्योंकि जब आदि अंत सम है तो मध्य को क्यों विषम किया जाय ? लोग कहेंगे वैषम्य के बिना कैसी सृष्टि ? सृष्टि तो वैषम्य में और वैषम्य को बढ़ाना पाप करना है । ईश्वर के साथ दगा करना है । अपने को ईश्र्वर से दूर करना है। हमारी प्रत्येक क्रिया जितनी अपने लिये है उतनी ही दूसरों के लिये । शंकर के प्रश्र में एक उत्तर भी है ये सब अलग नहीं एक हैं । अलगाव प्रतिभास या व्यवहार है। जिन्होंने इस प्रतिभास के विचार की स्थापना की उन्होंने संन्यास एवं उच्छ वृत्ति को भी आवश्यक बताया । जिन यज्ञों में अथाह सोना-संपत्ति बँटे । जिनका बड़े-बड़े मुनि-महात्माओं ने गायन किया । उन्हें एक नेवले ने छोटा बता दिया । सर्वस्व के रूप में एक सेर सत्तू का दान अश्र्वमेध यज्ञ से बड़ा दान हो गया । यह बात कोई ऋषि नहीं कह सका । एक नेवले ने कही । कथित मिथ्यावादियों का यह लोकतंत्र मनुष्य की सीमा को भी लांघ जाता है । युधिष्ठिर के यज्ञयश का गान करते विद्वानों के मुख पीले पड़ गये ।

 

भारत चिंतन दो बातें और कहता है करते समय तुम्हें कभी अजनबीपन की अनुभूति न हो । इसलिये ईश्वर साथ रखकर, उनकी प्रेरणा से उनके वचनों को करो । मनमाना नहीं । स्वेच्छाचार नहीं । ईश्वर वचन । कठिनाई उन्हें है जिन्होंने ईश्वर की अनुभूति नहीं की । या जिनका ईश्र्वर मर चुका है। इन्होंने चाहा तो था कि ईश्वर को अस्वीकार कर स्वयं ईश्वर बन जायँ । किंतु यह हो न सका । ईश्वर को हटाकर  नहीं बना जा सकता है । ईश्वर कृपा ही ईश्वर है ।

 

इस प्रकार आज की भाषा में भारत में राष्ट्रता, समता, समृद्धि और जनतंत्र की अपनी कल्पना थी। किंतु एक चौथा महत्त्वपूर्ण तत्त्व था ईश्वर का संग, उसकी कृपा, वह बनने का प्रयास और उसके आज्ञानुसार कर्म । पश्चिमी विकासवाद हीन या लघु से उच्चतर की और जाता है । मनुष्य के पहले के विकास जीवन स्पर्धा में हीनता के कारण नष्ट या व्यर्थ हो गये । स्पर्धा मुख्य है । जीना है तो शक्तिशाली बनों । दूसरों की शक्ति नष्ट करो । अपनी शक्ति बढ़ाओ । भारत सहयोग का विश्वासी है। सबके जीवन के साथ ही हमारा जीवन है। प्रकृति में कुछ भी हीन या लघु नहीं है। इसकी स्मृति बनी रहे । अपने मूल स्वरूप, भगवत्स्वरूप की स्मृति बनी रहे । क्योंकि स्वरूप विस्मृति ही माया है । इसलिये हर समय नारायण का ध्यान करो । जीवन के महाभारत में सारी सेना और सोना को छोड़ केवल वासुदेव को साथ रखो । तुम नर हो । कृष्ण नारायण हैं । नारायण की संयुक्त क्रिया ही सृष्टि का आधार है ।

 

विज्ञान और तकनीकी ने बड़ा विकास किया । वह सबका स्वामी है । किंतु उसमें सेवक बनने का भाव नहीं है । इसलिये उसका सारा विकास एक तरफा है । भीमकाय हाथी की दृष्टि छोटी है । फलतः चिंतन काल गणना और देशबद्ध है । अनंत की स्मृति का अभाव है । अनंत स्मृति के अभाव में वह हर क्षण अंत की पीड़ा से विकल है । सब कुछ रखकर भी भीत भय दूसरों को भी भय देता है । भय से मुक्ति के लिये और बड़ा भय तैयार करता है । वह महाभारत में अकेला है । विज्ञान और तकनीकी सुख नहीं, सुख के साधन-संकेत हैं । सुख तो और कुछ है । वह है स्व की पहचान । महाभारत जीत के बाद की भयानक निराशा में कृष्ण ही रक्षक होंगे । सोवियत का लौह आवरण टूट गया । विज्ञान और तकनीकी का लौह आवरण स्व की पहचान में बाधक है । एक निराकार, शून्य अदृश्य सत्ता से जुड़कर ही विज्ञान और तकनीकी रचनात्म्क, मानवी और आत्मकल्याणमूलक बन सकेंगे । भरत ने विज्ञान और तकनीकी को स्वामी नहीं सहायक का दर्जा दिया था । भारत एक भूखंड के साथ ही एक आत्मिक अनुभव है । विज्ञान और तकनीकी को इस आत्मिक अनुभव से जुड़ने की साधना करनी होगी । विज्ञान और तकनीकी पिछड़ेपन के मुकाबले आत्मिक चेतना का पिछड़ापन मानवता के लिये अधिक भयानक है ।

 

 

 

 

'इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है।' - महात्मा गांधी

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ