सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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ललितनिबंध

 

वंदे मातरम्- अमृत राय     

भारत होने का अर्थ- डॉ. युगेश्वर        

 

 

वंदे मातरम्


अमृत राय

 

हा हा माँ, तू कैसी सुजला है ! जिधर देखो, पानी ही पानी । आज घाघरा में बाढ़ आयी है तो कल सोन में । कभी गंगा हरहराती है तो कभी यमुना, कभी गोमती तो कभी सरयू- और फिर उत्तर-दक्षिण की भावात्मक एकता से परिचालित कृष्णा और गोदावरी  भी क्यों किसी से पीछे रहें । और ब्रह्मपुत्र तो जैसे ब्रह्मपुत्र ही है, उसमें क्या किसी से कम आवेग है ! फलतः प्रलय का ऐसा सुंदर दृश्य उपस्थित होता है जिसके बारे में ही शायद किसी उर्दू शायर ने कहा है- ये देखने की चीज है, इसे बार-बार देख ।

 

और माँ, तू ऐसी कल्याणी है, अशेष वरदानमयी, कि हर वर्ष और अक्सर तो वर्ष में दो-दो तीन-तीन बार हमारे लिए इसका आयोजन कर देती है । बरसात का तो कहना ही क्या, तुझे ही क्या, तुझे जाड़े-गर्मी की भी चिंता नहीं रहती । तेरा बस चले तो बारहों महीने देश में बाढ़ आयी रहे ! मगर तू भी क्या करे, बादल ही चुक जाते हैं, बरस-बरसकर, और तब चारों ओर, जहाँ तक नज़र जाती है और उससे भी आगे, सूखा ही सूखा नदी सूखी नाले सूखे, पेड़ सूखे पालो सूखे, कूप सूखे नलकूप सूखे, खेत और बावलियाँ सूखी, ढोर सूखे डंगर सूखे और उनके चरवाहे सूखे, कि जैसे आग ने सबको जलाकर राख कर दिया हो । धन्य है माँ, तू धन्य है, और आन की आन में बदलती तेरी दृश्यावली धन्य है अभी जहाँ सब कुछ बाढ़ में डूब-उतरा रहा था वहाँ देखते-देखते लंबा-चौड़ा एक रेगिस्तान निकल आया । हमारे कवि ने पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश की बात यों ही थोड़े ही कही है । दुनिया के पर्दे पर दूसरा ऐसा देश नहीं जहाँ सूखे-बूड़े में ऐसा चोली-दामन का साथ हो ।

 

        मैंने जब-तब लोगों का कहते सुना है कि इस आधुनिक विज्ञान के युग में सूखे-बूड़े दोनों को ही बचाया जा सकता है । बचाया तो सब जा सकता है मगर सवाल ये है कि हम क्यों बचायें । भूलिए मत, ये ऋषियों का देश है जहाँ हम सभी प्रकृति के पुजारी हैं । प्रकृति जो भी करती है हमारे भले के लिए करती है, उसके किसी काम में अड़ंगा डालना ठीक नहीं । जिस बाढ़ को या सूखे को हम अपनी छोटी और सीमित बुद्दि से अपने लिए बुरा समझते हैं, उसमें पता नहीं कौन-सा वरदान छिपा हो जो अभी हमारी समझ में नहीं आ रहा है । वैसे, इतना तो सभी जानते हैं कि बाढ के उतरने पर जो मिट्टी पीछे छू जाती है उससे धरती और भी उपजाऊ हो जाती है । उसी तरह सूखे से धरती के सब कीड़े-मकोड़े मर जाते है तपते सूरज से बढ़कर कीटाणु-नाशक सारी सृष्टि में दूसरा नहीं । अलावा इसके, मैं तो यह तक कहने को तैयार हूँ कि बहुत खुशहाली भी अच्छी नहीं होती । आबादी का हाल आप देख ही रहे हैं, बावजूद इतने सब सूखे-बुड़े के साठ करोड़ पर पहुँच गयी और जो कहीं इनका भी सहारा जाता रहा तो सत्तर-अस्सी पर पहुँचते कितनी देर लगती है । और तब हम-आप एक दूसरे को खाते नज़र आयेंगे । कुछ-कुछ तो अब भी खाने ही लगे हैं, तब तो उठाकर कच्चा ही चबा जायेंगे । इसलिए जनाब, प्रकृति के कारखाने में हाथ न डालना ही ठीक है । करने दीजिए उसको जो कुछ करती है । अपने को ऐसा अफ़लातून नहीं समझना चाहिए । इन सूखे-बुड़ों में सालाना दस-पाँच करोड़ टन गल्ले का नुकसान कोई नुकसान नहीं और न पचीच-पचास हजार लोगों की जान चली जाने से देश का कुछ बिगड़ता है । ये साठ करोड़ आदमी तूने कुछ सोच-समझकर ही तो पैदा किये होंगे.......................

 

      ......... और कैसे साठ करोड़ ? काले-गोरे, भूरे-पीले; सबके रंग अलग, ढ़ंग अलग, जहाँ कोई किसी की बोली तक नहीं समझता और अपनी बात दूसरे तक पहुँचाने के लिए सबको सात समुंदर पार की एक विदेशी बोली का सहारा लेना पड़ता है । मगर इससे आप कहीं यह न समझ बैठिएगा कि हमारे अंदर एकता की कमी है । बिलकुल नहीं, हमारे अंदर जबर्दस्त एकता हैः हम लोग सदा एक दूसरे से गुँथे रहते हैं । एक दूसरे की टाँग खींचना हमारा सबसे चहेता खेल है । हम हिंदीदेशवाले बंगालियों की सड़ी मछली और पिलपिला भात कहकर पुकारते हैं, बंगाली हमको सत्तूखोर कहता है । महाराष्टवालों को हम कढ़ीचट कहते हैं और वो हमको राँगड़े कहते हैं । उधर सरदारों के बारे में तो इतने लतीफे चालू हैं कि उन्हें बाजार से हटा लो तो लोगों के पास पार्टियों में बात करने को ही कुछ न रहे । अपना यह खेल बहुत ही मजे का है, कहाँ तक बताऊँ आपको । शेखसादी के हवाले से कश्मीरी एक नंबर का बदजात मशहूर है ही, गुजरातियों के बारे में प्रसिद्ध है कि अगर तुम्हें रास्ते में एक साँप मिले और एक गुजराती और किसी एक को ही मारना हो तो गुजराती को मार दो । यही किस्सा हस्ब जरूरत कभी सिंधियों-मारवाड़ियों पर भी फिट कर दिया जता है । बंगाली मारवाड़ी की नौकरी भले करे मगर जब उसे याद करेगा तब बड़ी मीठी घृणा के साथ मेड़ो कहकर,  उसी तरह उड़िया उसके लिए उड़े है जो अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध है । ऐसी ही और भी न जाने जितनी बातें है, कहाँ तक गिनायें- और सच तो ये है कि यह पंचवार्षिक शोध का एक अलग ही विषय है जिस पर भावात्मक एकता समिति को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए ।

 

      हमारी यही एकता जब और बढ़ जाती है तब उत्तरप्रदेश और बिहार में, बिहार और बंगाल में, बंगाल और उड़ीसा में, उड़ीसा औ आंध्र में, आंध्र और तमिलनाडू में, तमिलनाडू और केरल में, केरल और कर्नाटक में, कर्नाटक और महाराष्ट्र में और इसमें और उसमें कभी ज़मीन और कभी पानी के बँटवारे को लेकर सूच्यग्र नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव !’ वाली स्थिति पैदा हो जाती है । दोनों तरफ से मोर्चे जमने लगते हैं, रणभेरी बज उठती है । पहले युद्धम् देहि वाले जुलूस निकलते हैं जिसमें अपर पक्ष के नेताओं के पुतले जलाना कार्यक्रम का आवश्यक अंग है। फिर दूकानों में आग लगाने का सिलसिला शुरू होता है । फिर यहाँ-वहाँ बिजली-तार के खंभे और रेल की पटरियाँ उखाड़ी जाने लगती है । फिर सीमा के इधर-उधर दोनों तरफ के लोगों में पथराव शुरू होता है- और सबके अंत में भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस की गोलियाँ हवा से सनसनाने लगती हैं ।

 

      ये सब झगड़ा-टंटा देखकर कभी-कभी विदेशी पत्रकारों और पर्यटकों को और सच पूछिए तो कभी-कभी अपने को भी- यह धोखा हो जाता है कि जैसे दो स्वतंत्र और बिलकुल अलग देशों के बीच लड़ाई हो रही है । मगर फिर जल्दी ही अपनी और सबकी समझ में आ जाता है कि यह तो अपनी छोटी-मोटी पारिवारिक खटपट है जो सभी भाइयों के बीच हुआ करती है और दो एक तरह से आपस की मुहब्बत और मेल-मिलाप का ही दूसरा नाम है । उसे एक तरह का गरबा नाच भी कह सकते है, डंडियों का आपस में टकराना ही जिसका छंद है । और दुनिया वाले हैं कि इतनी सी बात का अफ़साना बना दिया । हिंदुस्तानी कभी आपस में नहीं लड़ते 

 

      लड़ ही नहीं सकते, क्योंकि शांतिप्रियता हमें अपनी घुट्टी के साथ मिली है, जैसे और कहीं भी मुश्किल से ही देखने को मिलेगी । बीच सड़क दस लोग मिलकर एक किसी आदमी को मारते-मारते चाहे मार भी डालें, हम मुँह फेरकर शांति से अपने रास्ते चले जाते हैं । हमारी आँखों के सामने चार लोग किसी औरत को झोंटा पकड़कर उसे कुतिया की तरह घसीटते लिये जाते हों मगर हमारी शांति के कान पर जूँ भी नहीं रेंग सकती । मुहल्ले का परचूनी चाहे एक के तीन दाम लगाता हो, और डाँड़ी मारता हो सो अलग, लेकिन हम भुनभुनायें चाहे जितना अपनी शांति को कभी हाथ से नहीं जाने दे सकते। हमें मालूम है और सारा जिला जानता है कि अमुक सरकारी अफ़सर नम्बरी घूसखोर है, सबकी नाक में दम आ गया है दौड़ाते-दौड़ाते उसने सबकी हालत खराब कर रक्खी है और किसी का धेले भर काम नहीं करता जब तक कि अर्जी के साथ कुछ नामा न लगा हो (जभी तो उसे अर्जीनामा कहते हैं !)  दिल ही दिल में सब चाहते हैं कि हरामजादे का जनाज़ा निकले, मगर हम ऐसे विकट शांतिप्रेमी हैं कि अपने घर लौटकर एक लोटा पानी पीकर उस मरदूद को कोसते हैं और शांति से सो जाते हैं ।

     

      और कर भी क्या सकते हैं जहाँ भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं डोलता । जब जो होना होगा हो जायेगा, हम कुछ भी क्यों करें, क्या फायदा.....

 

      कैसे-कैसे रसायन तूने हमारी घुट्टी में घोलकर पिलायें माँ, हम कभी उबर थोड़े ही सकते हैं । बहुत बड़ा मातृऋण है तेरा क्योंकि वही तो चीज है जिसके चलते हम सब कुछ जो हम पर पड़ती है इतने मजे से हँसते-हँसते झेल जाते हैं और चूँ भी नहीं करते । ओ3म् शांतिः शांतिः शांतिः । सब तेरी ही करामात है जो इस देश का कारखाना इतने आराम से चल रहा है, कहीं कोई रगड़ा नहीं झगड़ा नहीं । जो बँगले-मोटर का आदी है वह अपने बँगले-मोटर में खुश है, जो झुग्गी में रहता है वह अपनी झुग्गी में खुश है । सेठ भी खुश, भिखमंगा भी खुश । पुलिस भी खुश और ब्लैकमार्केटियर-स्म्गलर भी खुश- और उनसे सोना और घड़ी और दुनिया भर के नायाब इंपोर्टेड सामान खरीदनेवाले हम-आप भी खुश ! और जिस घूसखोरी को लेकर देश में बेकार इतनी हाय-तौबा मची है, उसकी तो खास बात यही है, लेनेवाले भी खुश, देनेवाला भी खुश । बल्कि मैं तो कहूँगा कि देनेवाले की खुशी लेनेवाले की खुशी से बढ़कर होती है ।

 

        जरा-सी आँख खोलकर चलने की बात है, जब चाहे आज़माकर देख लीजिए । लेनेवाले का चेहरा अक्सर आपको बहुत गंभीर मिलेगा जब कि देनेवले का चेहरा हमेशा मुस्कुराता हुआ नज़र आयेगा और वह मुस्कुराहट भी ऐसी दीन-हीन, गिड़गिड़ाती हुई कि पत्थर भी पानी हो जाय, बेचारा लेनेवाला किस गिनती में है । कैसे वह किसी गरीब का दिल तोड़ दे । आखिर उसके सीने में भी तो इन्सान का दिल है, कैसे न पसीजे ! अपना ईमान गया भट्ठे में, वह देनेवाले की खुशी खयाल करके घूस लेने पर मजबूर हो जाता है ! और हमारी सरकार उसकी इस मजबूरी को समझती है, जभी तो उसने जगह-जगह अपनी जो तख्तियाँ टाँग रक्खी है उनमें घूस लेने और देने को एक ही पलड़े में रखकर समान रूप से पाप ठहराया है । लेकिन अगर इतने पर भी घूसखोरी नहीं बंद हुई तो यही समझना चाहिए कि आदमी को पाप करना अच्छा लगता ही है । वर्ना तो इस देश की मिट्टी ही कुछ ऐसी है कि यहाँ जो भी जो कुछ करता है, सब दूसरे की खुशी के लिए ।

 

        स्वार्थ की तो कहीं गंध तक नहीं । यह सब तेरा ही प्रसाद  माँ । लीडर जो विधान-सभाओं में और मंत्री की कुर्सी पर बैठता है, वह हरदम जनता की भलाई की चिंता से पीड़ित रहता है अगर वह पहले अपनी भलाई की बात सोचता है तो इसीलिए कि वह भी जनता का ही एक आदमी है, और आदमी को मंदिर से पहले अपने घर में दिया जलाना चाहिए । उसी तरह सरकारी अफ़सर जितने हैं सब हर समय जनता को सुंदर प्रशासन देने की चिंता में ड़ूबे रहते हैं और कौन नहीं जानता कि सबसे सुंदर प्रशासन वो होता है जो कहीं हैं भी इसका लोगों को बोध तक न हो, वैसे ही जैसे कि आदमी को अपने साँस लेने का बोध नहीं होता और बोध होता है तभी जब कि शरीर के लिए कोई संकट उपस्थित होता है ! रहा व्यापारी, उसका तो कुछ कहना ही नहीं यहाँ तक कि उसका नंबर दो का पैसा भी आखिरकार जनता के हित में उन्हीं के बीच तो घूमता रहता है, वर्ना सरकार के हाथ में पड़ जाये तो वह उसे भी अपने अनाप-शनाप खर्चों में फूँक-ताप बराबर करे !

      और सबसे अलग और सबसे ऊपर, लोकनिर्माण विभाग के इंजीनियर को लोकहितैषिता का तो जबाब ही नहीं- क्लब में बैठकर भी उसका मन अपने ब्रिज में ही रमा रहता है ।

 

      तू धन्य है माँ, और हम तेरे बेटे धन्य हैं ।

 

 

 

 

 

       'हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।' - वी. कृष्णस्वामी अय्यर

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ