सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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लघुकथा

 

लघुकथा

हकदार- कमलेश भारतीय

टक्कर- मुकेशकुमार जैन पारस

ज़नाजे की भीड़ - डॉ. सुधीर शर्मा

बजट - डॉ.सतीश दुबे

माह के लघुकथाकार....... डॉ.किशोर काबरा  

 

             

 

 

हकदार

कमलेश भारतीय

      गेहू की ढेरी सामनने थी, मेरे और मेरे हलवाहे के सामने । उन्हीं आँखों में गेहूँ की ढेरी सपनों की ढेरी में बदल गयी थी। मैं घोर स्वार्थी होकर सोचने लगा था, काश ! यह ढेरी सिर्फ मेरी होती, सिर्फ मेरी...

 

      हालाँकि मैं अच्छी चरह जानता था कि मेरी सिर्फ जमीन थी और सारीमेहनत मेरे हलवाहे की । कैसा साँझा था, हमारा आपस में । मेरी किस्मत थी जो मैं जमीदार के घर पैदा हुआ था और उसका हल था जिसकी मूठ उसके बापू ने होश सँभालते ही उसे थमा दी थी । मैंने किस्मत थी जो मैं जमींदार के घर पैदा हुआ था और उसका हल था जिसकी मूठ उसके बापू ने होश सँभालते ही उसे थमा दी थी। मैंने इंजन भर लगवाया था जिससे फसलों को पानी सींचते-सींचत मेरा  लवाहा पसीना भी सीचता जाता था । मैं जिन खेतों मैं मेरा हलवाहा नंगे पैरों, फटी हुई चादर ओढे, ठिठुरती हुई रातों में रखवाली करने जाता  था । ऐसे मममें भी गेहूँ की ढेरी देखकर मैं ललचा गया था...कि ...सारे-के-सारे गेहूँ पर मेरा हक हो जाये तो कैसा रहे ! शायद मेरा हलवाहा अभी इस लायक नहीं हुआ...कहीं वह मेरी तरह सोचने लगे तो ....! इस तल्पना मात्र से मैं कांप उठा ! मेरे बेईमान मन की तरह बेईमान मौसम उसी समय बूंदें बरसाने लगा और मैं गेहूँ को अच्छी तरह ढँकने का, सँभालने का हुक्म सुनाता हुआ छत के नीचे पहुंच गया । किसी असली माँ की तरह, जिसने अपने बच्चे की जान के बदले अपनी जान देने की पेशकश कीथी , मेरा हलवाहा भी भगने की परवाह किये बगैर गेहूँ सँभाव रहाथा। मैं खुद से पूछ रहा था-बताओ, गेहूँ का असली हकदार कौन है ?

 

 

टक्कर

मुकेशकुमार जैन पारस

             हाय मार डाला मुझ सड़क पर करुण रुदन के साथ गूंजने वाली इस आवाज ने आसपास वालों का ध्यान आकर्षित किया और थोड़ी ही देर में वहाँ पर्याप्त भीड़ एकत्रित हो गयी ।

      अभी-अभी  सुखराम की साईकिल को सेठ दीनानाथ की गाड़ी ने टक्कर दे मारी थी। दीनानाथजी ने अपना कुसूर मानते हुए सुखराम को मरह्म-पट्टी के लिए दो सौ रुपये देने चाहे । हालांकि चोट कोई खास नहीं थी । मगर रुपये देखते ही सुखराम बिफर गया और आँय-बाँय बकने लगा,गाड़ी में बैठकर आँखें खो देते हैं । गरीब की जान की कीमत कागज के टुकड़ों से लगाते हैं । अरे, तुम्हें अन्दर नहीं करवाया तो मेरा भी नाम सुखराम नहीं ।

      दीनानाथजी पैसे बढाते-बढाते पाँच हजार रुपयों तक आ पहुँते, मगर सुखराम न माना । हारकर सेठजी ने अपना विजिटिंग कार्ड जेब से निकाला और सुखराम को पकड़ाते हुए बोले, आज शाम को मेरे यहाँ पार्टी है । तुम भी आ जाना । वहीं तुमसे बातें हो जायेंगी । गाड़ी का नम्बर तो तुम्हारे पास है ही। यह कहकर दीनानाथजी गाड़ी में बैठकर सर्र से निकल गये । जो दो-तीन पुलिसवाले तमाशा देख रहे थे वे पहले ही खिसक चुके थे।

      शाम को जब सुखराम सेठजी के यहाँ पहुँचा तो सेठजी उसे आमन्त्रित मेहमानों से मिलवान लगे-ये हैं हाई कोर्ट के जज श्री....

      अगर तुम चाहों तो अपने साथ घटी दुर्घटना की रिपोर्ट यहाँ कर सकते हो । पुलिस भी है, वकील भी हैं और जज भी हैं । दीनानाथ के यह कहने के साथ ही सभी ठठाकर हँस पड़े। सुखराम को काटों तो खून नहीं। उसे अपनेसामने खड़े चट्टान नजर आ रहे थे जिससे वो आज टकराते-टकराते बचा था।

 

 

बजट

       डॉ.सतीश दुबे

रमेश बाबू ने छाता एक कोने में रखा और रसोई में पत्नी के सम्मुख आसन पर जाकर बैठ गये । बड़े खुश लग रहे हैं आज, क्या बात है?’ रमा बैंगन की तरकारी पतीली में छोड़ते हुए मुस्करायी । छनन्......छनन्....छन्न ....पील पट्ट उसने सब्जी में पानी डाल दिया ।

      रमा के अधरों पर क्लिक ध्वनि पैदा कर पुनः आसन पर बैठते हुए रमेश बोले

बढ़ी हुई पे के आँडर्स आ गये ।

अच्छा ! एरिअर कब से मिलगा ?’

जनवरी से....

इस बार कपड़े जरूर बनवा लेना ।

हाँ,मैं भी यही सोच रहा हूँ, लोग यूँ ही मजाक उड़ाते हैं ।

एरिअर मिल गया शायद, कितना मिला है ?’

तीस रुपया खुशी के छाये बादल बरस पड़े ।

चलो अच्छा हुआ, मैं बड़ी चिन्तित थी,सोच रही थी, मुन्ने की तबीयत ज्यादा खराब है, क्या होगा  ? देखो शायद निमोनियाँ है, साँसें कितनी जोरों से ले रहा है ।

अरे, इसे तो बुखार भी है।

हाँ, थोड़ी देर पहले102 डिग्री था ।

चलो,प्राइवेट डॉक्टर को दिखा दें, सीरियस लगता है।

लेकिन डॉक्टर पन्द्रह रुपये तो....

तुम यह सब छोड़ो, चलो जल्दी।

रमेश बाबू ने उपेक्षित कुर्ता-पाजामा को चूमा तथा पहनते हुए पत्नी को पुनः पुकार लगायी ।

 

ज़नाजे की भीड़

डॉ. सुधीर शर्मा

वैसे तो जिंदा रहते उसे अनेक लोग जानते थे । इसलिए भी जानते थे कि वह रात दिन पच्चीस-पचास लोगों को सलाम ठोंका करता था । आख़िर उसका नाम सलाम जो था ।

    सलाम की एक आदत थी । कोई मरे या कोई पैदा हो, सबसे पहले पहुँच जाना । कुछ काम-वाम भी करना और नाश्ता-भोजन मिल जाए तो उसे अवश्य ग्रहण करना । छोटे-छोटे काम ने उसे छोटा तो बना ही दिया था । सलाम ने सुन रखा था कि आजकल बड़ों-बड़ों को होने वाली बीमारियाँ छोटों को भी घेर लेती है । उसे भी हार्ट-अटैक ने घेरा और वह चल बसा ।

    ज़नाज़े के लिए दो-चार रिश्तेदार आए । एक-दो मुहल्ले वाले जो निठल्ले थे । कुल जमा आठ लोकर लेकर निकले उसे । सलाम बड़ा होता तो सौ-दो सौ लोग आते ही । लेकिन सलाम का शहर बड़ा था, वह राजधानी में रहता था जो नई-नई बनी थी । सलाम का ज़नाजा जैसे ही मेन रोड़ पर पहुँचा सामने से आ रही मिनी बस के कारण ट्रैफिक जाम हो गया । देखते-ही-देखते ज़नाज़े के पीछे दो-तीन लोग हो गए । साइकिल, स्कूटर, जीप-कार और यहाँ तक ठेले-ठाले भी । इस ट्रैफिक ने तो ज़नाज़े की तस्वीर ही बदल दी । आख़िर में कतार लगाए एक स्कूटर वाले ने कह ही दिया कौन है यह जिसके ज़नाज़े में इतनी भीड़ है । किसिम-किसिम के लोग आए हैं ।

 

 

 

 

'भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है।' - टी. माधवराव

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

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