|
माह के लघुकथाकार
डॉ.
किशोर काबरा
पेड़ और बच्चा
पेड़
काटने वाले आ गए और हरा-भरा पेड़, छायादार पेड़, फलदार पेड़, मेरे घर के
आगे वाला पेड़ काटने लगे ।
चित्रकार ने कहा, ‘ज़रा
रुकना, मुझे इस पेड़ का एक चित्र बनाने दो ।’
कवि ने कहा, ‘ज़रा
रुकना, मुझे इस पेड़ पर एक कविता लिखने दो ।’
संगीतकार ने कहा, ‘ज़रा
रुकना, मुझे इस पेड़ के नीचे बैठकर एक गीत गाने दो ।’
पंडित जी ने कहा, ‘मुझे
इस पेड़ की पूजा करने दो ।’
चिड़िया ने कहा, ‘ज़रा
रुकना, मुझे मेरे घोंसले के तिनके यहाँ से ले जाने दो ।’
उसी समय मेरा बेटा दौड़ता हुआ
आया और उस पेड़ से चिपककर बोला, ‘मैं
पेड़ हुँ, मुझे काटो ।’
पुरस्कार
लोगों की पहली बार तब आश्चर्य
हुआ, जब राष्ट्रीय स्तर के कवि श्री किंकरजी को एक स्थानीय संस्था ने
अलग-अलग विभाग के कई पुरस्कार देकर सम्मानित किया ।
लोगों को दूसरी बार तब
आश्चर्य हुआ जब राष्ट्रीय स्तर के सभी पुरस्कार किंकरजी के विरोधियों को ही
प्राप्त हुए ।
लोगों को तीसरी बार तब
आश्चर्य हुआ, जब उन्हें पता लगा कि राष्ट्रीय स्तर की पुरस्कार योजनाओं में
किंकर जी इसलिए भाग नहीं ले सके;
क्योंकि उनकी सभी कृतियाँ
स्थानीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुकी थीं और नियम यह था कि पुस्तकें पहले
पुरस्कृत नहीं होनी चाहिए ।
लोगों को चौंथी बार तब
आश्चर्य हुआ, ज्ञात हुआ कि श्री किंकर जी की सभी पुस्तकों को स्थानीय
संस्था से पुरस्कृत करा देने की योजना उनके विरोधियों की ही थी ।
अहम्
सुब्बाराव को लोग प्यार से
‘सुब्बु’
कहते हैं । बड़ा प्यारा, बड़ा हँसमुख, बड़ा प्रसन्नचित्त व्यक्ति । दिनभर
आफिस में और शाम-सबेरे घर पर व्यस्त रहने वाला वह व्यक्ति रात को दो-दो बजे
तक अपने स्टूडियो में साउंड रिकार्डिंग करते समय भी उतना ही स्वस्थ एवं
प्रसन्न दिखाई देता, जितना सुबह-सुबह नहा-धोकर कोई दिखाई देता है ।
मैंने एक दिन उससे
पूछा, ‘दोस्त, सैकड़ों
प्रकार के सिरफिरे संगीतकार, दंभी गायक और बदमिज़ाज़ वादक इस स्टूडियो में
आते हैं । सबके अपने-अपने अहम् होते हैं । इन सबके बीच बिना विचलित हुए आप
कैसे अपने आपको बचा लेते हो और योगी की तरह मुस्कराते रहते हो ?’
उसने उसी मुस्कुराहट के
साथ जबाब दिया, ‘आपके
प्रश्न में ही मेरा उत्तर छिपा है, अर्थात्- सबके अपने-अपने अहम् होते हैं
। मैं उनकी रक्षा करता हूँ ।’
‘और
तुम्हारा अपना अहम् ?’
‘मेरा
अहम् यही है कि मैं दूसरों के अहम् की रक्षा करता हूँ ।’
उसने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया ।
अस्थि-विसर्जन
धार्मिक विधियों एवं रिवाजों
पर मेरा विश्वास नहीं है, फिर भी लोकलाज के भय से मैं अपनी माँ की अस्थियों
को लेकर हरिद्वार गया । अस्थियाँ पोटली में बँधी थी । साथ में रुपया-पैसा
भी था । जेबकतरों और चोर-उचक्कों की नज़र उस पर न पड़ जाए, इसलिए सब रुपये
पोटली में बाँधकर झोले में रख लिए ।
रेल गंगा के पुल पर
गुजर रही थी । अचानक विचार आया- हरिद्वार में पंडों से ठगाने के बजाए क्यों
न अस्थियों को यहीं गंगा की धारा में प्रवाहित कर दिया जाए ?
और मैंने पोटली खिड़की में से
गंगा में फेंक दी ।
पोटली हाथ से क्या
छुटी, जैसे मुझे बिजली का शॉक लगा ।
मैंने अस्थियों की जगह रुपयों
की पोटली गंगा में फेंक दी थी ।
मेरा ‘अस्थि-विसर्जन
हो चुका था ।’
प्रार्थना
नालायक बेटे से त्रस्त होकर
एक मरणासन्न सेठ ने वकील को बुलवाकर अपनी नई वसीयत लिखवाई- ‘मेरी
मृत्यु के बाद वह हवेली नगर की धार्मिक सस्था ‘सद्-विचार
परिवार’ को दान में दे
दी जाए । जब तलक में जीवित हूँ, मेरा बेटा इस हवेली में रह सकता है ।’
उस दिन से बेटे ने
शाम-सबेरे प्रार्थना शुरू कर दी- ‘हे
भगवान, पिताजी को लम्बी उम्र दे ।’
उसी दिन से संस्था ने
भी प्रार्थना शुरू की- ‘हे
भगवान, सेठजी को जल्दी उठा ले ।’
तीन चित्र
सबेरे का समय ।
दालान में झाडू लगाती हुई
लुगड़े-घाघरे में लिपटी-सिमटी श्रीमती शर्मा । श्री शर्मा अखबार पढ़ रहे थे
। एक वृद्ध सज्जन आए और श्रीमती शर्मा से बोले, 'अम्माजी, प्रणाम !'
दोपहर का समय ।
बैठक में नाश्ता सजाती हुई
साड़ी-ब्लाउज में सजी-सँवरी श्रीमती शर्मा । श्री शर्मा चाय पी रहे थे
। एक प्रौढ़ सज्जन आए और श्रीमती से बोले, 'भाभी जी नमस्कार ।'
शाम का समय ।
बगीचे में फूलों से खेलती
पंजाबी सूट में कसी-बसी श्रीमती शर्मा । श्री शर्मा सिगरेट फूँक रहे थे ।
एक नवयुवक आया और श्रीमती शर्मा से बोला, 'देल्लो, हाय !'

|