सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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कविता

 

आदमी का चेहरा कुंवर नारायण        

पूर्वजों की अस्थियों में अशोक वाजपेयी  

मुर्गियाँ ध्रुव शुक्ल   

 कविता डॉ. बल्देव

 

 

शर्त सुधीर सक्सेना

वह मैं हूँ ओमप्रकाश वाल्मीकि

सुबहें सोनजुही रमाशंकर तिवारी

उसी मोड़ पर लालित्य ललित

 

माह के कविः लक्ष्मीनारायण पयोधि

प्रवासी कविः मोहन राणा

माह के कवि

लक्ष्मीनारायण पयोधि

 

 आखेटकों के विरुद्ध

 

सागवानी

सन्नाटे को तोड़कर

गूँजती हैं जब बन्दूकें

गिर पड़ता है हहराकर

कोई बेकसूर वनचर

 

आखेटक तब करते हैं अट्टहास

बंदूकों की नलियों से

निकलते धुएँ को

फूँक मारकर

इत्मीनान से

 

खुश होते हैं आखेटक

जीने का हक़ छीनकर

 

परंतु देख रहा हूँ मैं

अब जंगल में

माहौल को बदलते

वनचरों को

अपने सींग पैने करते

हाँ, देख रहा हूँ मैं

उन्हें एकजुट होते

आखेटकों के विरुद्ध

 

 

तोड़ने होंगे दाँत

 

सूरज पहाड़ी की तलहटी में

नाले के किनारे भरी धूप में

पत्थर कूटती सोनादेई के

तार-तार आँचल में

मुँह छुपा कर सो गया है

ठेकेदार

माँगता है रोशनी

मज़दूरी के एवज में

सोनादेई की आँखों में

उग आता है लाल सूरज

गुस्से से काँपते हैं उसके होंठ

निकलती है मुँह से भद्दी गाली

ठेकेदार मारता है झपट्टा

गड़ाता है अपने धारदार दाँत

भींच लेता है

सूरज को मुट्ठी में

सोचता है सोमारु

कि तोड़ने होंगे दाँत आदमखोरों के

ताकि फिर कभी

न छीन सके कोई

उसकी झोपड़ी का उजाला

 

कितने बरस और

 

धान की खनकती बालियों को

यत्न से काटतीं

वनवासिनें

डूबी है

सामूहिक गीतों के

आनंद में

मन में उत्साह है

फ़सल कटेगी

तो दोनों जून

पेज के साथ-साथ

मिलेगा भात भी

परंतु सोचता है सोमारु

पेकी के पेडुल में

साहूकार ने

दिया है जो क़र्ज

बदले में उसके वह

ले जाएगा फ़सल

पता नहीं

सूद का चुकारा भी

होगा या नहीं

खेत भर की मेहनत

सौंपकर

भरे मन से

जाना ही होगा घर

खाली बैलगाड़ी में

भर कर उदासी

पता नहीं

कितने बरस और

सोचता है सोमारु

बेटी की ब्याह में

 

 

हाट

 

हाट में

होती नहीं है

सिर्फ़

चीज़ों की खरीद-फ़रोख्त

 

 

हाट में लोग-

मिलते-बिछड़ते हैं

सोचते-विचारते हैं

खाते-पीते हैं

लौंदा या सल्फी

एकजुट होकर

 

 

हाट में लोग-

लड़ाते हैं मुर्गे

लड़ते हैं खुद

मानो

करते अभ्यास

 

 

सोचता है सोमारु

कि होती है हाट में ही

तैयारी हर लड़ाई की

 

 

चुप ही....

 

पहाड़

नहीं बोलते

चुप ही

रहते हैं पेड़ भी

अक्सर

 

आदमी तुम उन्हें

उकसाओं मत

मत दिलाओं ताव

 

पहाड़ बोलेंगे 

तो फूटेगा लावा

चिल्लायेंगे पेड़

तो

चलने लगेगी आँधी

या धधक उठेगा

दावानल !

 

 

सोमारु के बारे में

 

सोमारु

वह जंगल है

जो उगा है

अपनी मर्जी से

मगर

काटा जाता है हर रोज

जंगलखोर इरादों के चलते

 

एक मीठी

पहाड़ी नदी है सोमारु

जिसके अंतस्तल में

भारी हलचल है

उथल-पुथल है

 

काला - कठोर

पहाड़ है सोमारु

जिसकी ऊर्जा का

होता है उत्खनन

तस्करी के वास्ते

 

सोमारु वह आग है

जो फूटता है तो ज्वालामुखी

और धधकता है

तो बन जाता है दावानल

 

प्यार में पगा

कोमल लोकगीत है सोमारु

 

 

 

   'साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है।' - गणेशशंकर विद्यार्थी

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

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