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मरता हुआ पेड़
शंकर
जिस
तरह धूप सिर्फ नहीं थी, हवा सिर्फ हवा नहीं थी और पानी सिर्फ पानी नहीं था
। उसी तरह पेड़ भी सिर्फ पेड़ नहीं थे ।
यूँ ये
सभी एक ही जगह मौजूद थे ।
कुछ दिनों
पहले तक यहाँ बीस-पच्चीस छोटे-छोटे क्वार्टरों से घि रा हुआ एक रेल-कम्पनी
द्वारा चलायी जा रही छोटी रेल लाइन का लोकोशेड था । यहाँ इंजनें खड़ी रहती
थीं और धुलती थीं । आसपास कोयले के ढेर खड़े रहते थे । मोबिल की बूंदें एक
बड़े दायरे पर चिपचिपाहट बिखेरे रहती थीं । तब हवा में भी हर वक्त धुएँ के
छल्ले ही तैरते रहते थे और इस तरह धूप के लिये एक दीवार टंगी रहती थी । पास
के ताल का पानी भी तब काला ही काला बना रहता था । पास में खड़े पेड़ के
लिये तो ये हरापन और कालापन के बीच जद्दोजहद के ही दिन थे ।
छोटी रेल
लाइन के बंद होने के बाद सारी चीजों में तब्दीली आ गयी थी। छोटे-छोटे
क्वार्टरों में रहनेवाले कामगार दूसरे कामकाज की तलाश में जहाँ-तहाँ निकल
चुके थे । क्वार्टर कस्बे के एक दादा द्वारा हथियाये जा चुके थे । कोयले के
ढेर कब के गायब हो चुके थे । लोकोशेड की चद्दरें न जाने किन-किनके घरों के
पिछवाड़े को ढंकने के काम आ गयी थीं । रेल लाइनें टुकड़ों-टुकड़ों में
कबाड़ियों के यहाँ पहुंच गयी थीं ।हवा अब यहां मुक्त थी । ताल के पानी को
भी धीरे-धीरे अपना रंग मिल गया था। यहां बस अब एक खुला-खुला बड़ा-सा मैदान
दिखता था ।
सबसे बड़ी
खुशी पेड़ के हिस्से में आयी थी। उसके नीचे पूरे कस्बे में घूम-घूमकर ताबीज
और चमकीले पत्थर बांटनेवाले एक फकीर ने कहीं से आकर अपना डेरा डाल लिया था
और एक मेहनती जवान ने कहीं नौकरी नहीं मिलने पर एक छोटा-सा सस्ता खुला
स्कूल खोल लिया था। सुबह में कुछ ही देर बाद फकीर निकल जाता था और दस
बजते-बजते ही छोटे-छोटे बच्चे फुदकने लगते थे । शाम को फकीर कंधे से झूलते
चोंगे में बच्चों के कपड़े, टोपियाँ, जूते और किताबें लटकाये लौट आता था और
यहां उसका अपना डेरा फिर लग जाता था ।
मैदान
गिल्ली-डंडा, बिट्टो, रुमालचोर, कबड्डी आदि खेलों के लिये बच्चे-बड़ों के
काम आने लगा था। शाम को लड़के हवा में पतंगें उड़ाते थे । ताल में वे तल पर
गिदलियाँ दौड़ाते थे, पेड़ की टहनियों पर दोल्हापाती खेलते थे।यहाँ
जिंदगी की नयी परछाइयाँ थीं ।
रामनवमी
के दिन थे । दादा के संगी-साथियों और आसपास के मनबढ़े लड़कों ने बीच मैदान
में एक झंड़ा लाकर गाड़ दिया था। रंग-अबीर उड़ता रहा था । रंग-अबीर में
पुते लड़कों ने बीच में आ- आकर अपना शौर्य दिखलाया। कुछ ने लाठियों के
पैंतरे दिखलाये तो कुछ ने तलवारों की कलाबाजियाँ दिखलायीं । कुछ ने गतके
भांजे । तीर-धनुष जुटाये तो गये थे लेकिन जब किसी को विशेष कौशल नहीं सूझा
तो तीर सीधे पेड़े को निशाना बनाकर छोड़े जाने लगे थे । तीर पेड़ में
धंस-धंसकर गिरते रहे थे । जिन्होंने सबसे ज्यादा पैंतरे दिखलाये, उन्हें
एक-एक लाठी और पचीस-पचीस रुपये मिले थे । जिन्होंने लगातार घंटे तक बिना
रुके तलवार भाँजी, उन्हें तलवार और पचीस रुपये मिले थे।
यह सब इस
मैदान के लिये अजनबी सी चीज थी किंतु किसी पर आक्रमण करने और उसे ध्वस्त
होते देखने का जो काल्पनिक सुख और रोमांच था, उसने इन बिगड़े हुए लड़कों
को कहीं न कहीं से आकर्षित किया था। यहां अब न सिर्फ इस मुहल्ले के, बल्कि
आसपास के मुहल्लों के भी छोकरे आने लग गये थे । मैदान अब सिर्फ मैदान नहीं
था, जश्न और जमावड़े का मुकाम था।
धूप निकल
रही थी । हवा अब भी मौजूद थी । ताल हिलोरें ले रहा था ओर पेड़ सबके साथ
खड़ा था । यह मौसम की ही उथल-थल थी कि धूप जितनी गर्म थी, हवा अचानक उससे भी
ज्यादा गर्म हो गयी थी । वह कस्बे के दक्षिणी छोर से एक छोटी-सी घटना से
उठी थी और सनसनाती हुई चारों तरफ फैल गयी थी । रशीद पाव-रोटीवाले की मोपेड
से एक रिक्शा उलट जाने और देवी स्थान के जा रही एक औरत के सीट के नीचे
गिरकर घायल हो जाने की खबर तो इसमें थी लेकिन पाव-रोटीवाले का बयान कि
मोपेड में बंधी पेटियों में अंडे भी थे और वह मोपेड को नीचे गड्ढे में उतार
नहीं सकता था क्योंकि तब सारे अंडे फूट सकते थे, इनकी तरंगों में कहीं भी
शामिल नहीं था ।
मैदान में
जुट आये लड़कों के बीच दादा ने हुंकार लगायी,
“और
मोपेडवाले का क्या हुआ ? ”
“वह तो
पिटते हुए किसी तरह भागने में कामयाब हो गया लेकिन उसकी मोपेड जला दी गयी,
बाबा । हमारे भाइयों ने एक कब्र को तोड़फोड़ दिया है और मजार पर लेटे हुए
एक आदमी को घसीटते-रगड़ते हुए परलोक पहुंचा दिया है । दुकाल-गुमटियों पर
हाथ साफ किया जा रहा है । आलमगंज, नूरनगंज में खपरैले मकान स्वाहा हो रहे
हैं । उधर के मुहल्लों में ठेले और रिक्शा उलटकर चकनाचूर कर दिये गये हैं ।
हिसाब बराबर हो गया है, बाबा...।”
एक लड़के
ने धाराप्रवाह बखान किया । “तो
तुम लोग खड़े-खड़े मुंह क्या देख रहे हो ?
जाओ....”
दादा ने फिर हुंकार लगायी ।
लड़कों
में खलबली मची । तभी इनमें से किसी को पेड़ की याद आयी । शायद फकीर आज
कस्बे में नहीं निकला हो और यहीं पकड़ में आ जाये । सभी पेड़ की तरफ दौड़े।
लेकिन फकीर वहां नहीं था। वह रोज की ही तरह शहर में निकल चुका था ।
किसी के होठों से शब्द उभरे, “अच्छा,
शाम को तो लौटेगा ।"
लड़के
मैदान से हटकर मुख्य सड़क की तरफ आ गये । अभी कुछ ही वक्त गुजरा होगा कि
इनमें से एक की नज़र स्टेशन की तरफ भाग रहे एक आदमी पर जा टिकी । उसने
गिद्ध की तरह आंखें गड़ायी । फिर अचानक दौड़ पड़ा,
“पकड़ो,
भागने नहीं पाये... ।”
देखते ही
देखते सारे लड़के दौड़ते हुए मैदान पार कर गये । हाथ में झोला लिये भाग रहा
आदमी कुछ दूर दौड़ा लेकिन प्लेटफार्म पर चढ़ने के पहले ही पकड़ में आ गया ।
उसे सभी खींचकर मैदान में पेड़ के पास ले आये।
“तुम्हारा
नाम क्या हुआ, अजनबी ? ”
एक ने
मुलामियत के साथ पूछा ।
“निरूद्दीन..”
एक सहमा
हुआ जवाब आया ।
“नूर
मियां, अब हाँफना बंद कीजिये और मन को स्थिर कीजिये ।”
किसी
दूसरे ने कहा ।
“हां,
बेटो...”नूर
मियां की डरी हुई पुतलियां खुशी में थम गयीं ।
नूर मियां
सांसें सहेजकर स्थिर हुए तो अचानक एक ने इशारा पाकर नूर मियां के दोनों हाथ
पकड़कर पीछे कर दिये और किसी दूसरे ने गमछे से उन्हें बांध दिया ।
“आप
जमीन के नूर बनेंगे या आसमान के, नूर मियाँ ?”
किसी तीसरे ने पूछा ।
“ज़मीन
के, बेटो, ज़मीन के ...”
नूर मियाँ हकलाये । उनके मन का डर अब उनकी आंखों में उतरा हुआ था। उन्हें
लगा, पहली बार उन्होंने जो कुछ सोचा था, शायद अब वही सच हो रहा है । अचानक
नूर मियां को अपना कंठ बंद होता हुआ सा लगा, “बेटो,
पानी....पानी ...।”
नूर मियां
ने पानी मांगा था । सामने खड़ा लड़का मुस्कराया,“हां
हां, आपको पानी जरूर देंगे, नूर मियां... जरूर पानी देंगे ।”नूर
मियां ने याचना भरी आँखों से बारी-बारी से हर एक को देखा । कौन जाने, किसी
को दया आ जाये । लेकिन उनकी आंखों के सामने काले-काले और उँचे पहाड़ ही
खड़े थे ।
“हम
इतने बेरहम नहीं हैं, नूर मियाँ कि आपको आखिरी क्वाहिश बताने का मौका न दें
और उसके पहले पानी न दें । आपकी आखिरी ख्वाहिश क्या है, नूर मियाँ ?
” एक
पुचकारती हुई आवाज फिर उछली । “बेटे,
यही कि मैं उपने परिवारवालों के बीच पहुँच जाऊँ । वे मेरा इंतजार कर रहे
होंगे ।”
एक मासूम सी आवाज उठी ।
तभी सवाल
पूछनेवाले ने कुछ इशारा किया । पीछे खड़े लडके ने गरदन पर हाथ देकर नूर
मियां को चक्करदार झटका देते हुए फेंका । नूर मियाँ अगले क्षण जमीन पर
लुढ़के पड़े थे । फिर...फिर पत्थर के टुकड़ों के बीच नूर मियाँ का सिर कुछ
ही लम्हों के लिये उठा और लुढका गया ।
अगले ही
क्षण ताल से एक आवाज उठी –छपाक
।
तभी
इन्हीं लड़कों में से एक ने सुझाया तो दूसरा दौड़ता हुआ गया और एक झंड़ा ले
आया । तीसरे ने पेड़ पर उछाल लगाई और झंडे को पेड़ की सबसे उंची डाल पर
बांध डाला ।
“अब
देखो,यह कितनी दूर से दिखायी पड़ता है”
एक ने खुशी में मुट्ठियां उछालीं सचमुच अब जीत का यह परचम बहुत दूर से भी
दिख सकता था ।
लडकों की
टोली ने कस्बे के कई चक्कर लगा लिये थे । अब कर्फ्यू........ का एलान हो
चुका था। पेड़ के नीचे खड़े लड़कों में से एक ने अपने तौलिये से पीतल का
बाजा निकाला और साँसें बटोरते हुए एक फूँक मारी, “सुलेमान
बैंड मास्टर के यहाँ से हाथ लगा तोहफा...।”
दूसरे ने अपनी पाकिट से नयी टोपी निकाली और पेड़ की तरफ उछाल दी । टोपी
पेड़ की टहनी में फँसकर झूलने लग गयी तो वह चिल्लाया, “शाहिद
ड्रेसेज से मिली निशानी ....वाह ...।”
तभी दो लड़के रिक्शा के दो चक्के लुढ़काते हुए ले आये । एक न चक्कों को
तेजी से लुढ़काया और छोड़ दिया । चक्के लुढकते हुए ताल में जा गिरे ।
एक
दूसरे ने झोले से फोटो कैमरा निकाला, उसे चूमा और खुशी में चिल्लाया,
“आफताब
स्टूडियो से हाथ लगी यादगारी । तुम जियो हजारों साल....।”
फिर उसने अपने कैमरे का ढक्कन खोला और पेड़ पर लहरा रहे परचम को रेंज में
ले लिया । और क्लिक .....।
अब शाम
उतर रही थी ।
पेड़ के नीचे हल्के अँधेरे में कुछ परछाइयाँ आपस में उलझी हुई थीं । एक
परछाईं को कुछ ने मजबूती से पेड़ से चिपका रखा था। दूसरी परछाईं जूझते हुए
खुद को छुड़ा लेने की जद्दोजहद कर रही थी।
“हम
इतने बेरहम नहीं हैं । लो, हम तुम्हें कुछ नहीं कर रहे है । आब बोलो,
तुम्हारा नाम क्या है, बेगम ?”
एक ने पूछा । परछाईं सम्हलते हुए खड़ी हुई ।
“हमें
तुम्हें छोड़ देंगे, बेगम और तुम्हारे सात वह जो आदमी है, हम उसको भी छोड़
देंगे ।”
दूसरी परछाईं हंसी।
“यह मेरा
शौहर है और मुझे मायके छोड़ने आया है । तुम लोग इंसानियत का कुछ ख्याल करो,
भाइयों...।”
परछाई ने मिन्नत की ।
“हम
तुम्हारी कद्र करेंगे, बेगम....।”
तीसरी
परछाई कुटिलता से हँसी तो चौथी परछाई लपकती हुई आगे बढ़ी।
“तुम्हें
दोजख में भी जगह नहीं मलेगी, दरिंदो । एक पाकीजा औरत को छूने की कोशिश
करनेवाला खुदा की सजा से बच नहीं पायेगा ।”
अगले क्षण अचानक इस परछाई ने कश्मकश करते हुए पेड़ से बंधी परछाई का हाथ
छुड़ा लिया । दोनों परछाइयाँ छूटते हुए लुढ़कते-गिरते स्टेशन की तरफ दौड़
पड़ीं । बाकी परछाईयाँ पीछे से दौड़ीं ।
क्वार्टरों के आसपास सन्नाटा पा एक लड़का भागते हुए पीछे की तरफ लपका,
“ये
टायर ...रेडियो.... न जाने किस-किस चीज की पेटियाँ...इनको जुटा लाने में
मेरी भी मेहनत लगी है । इतनी सारी यादगारियाँ अकेले-अकेले रखोगे, बाबा
?”
बाबा ने एक पेटी को पैर से लुढकाया तो लड़के ने उसे उठा लिया । फिर
पिछवाड़े से भागा ।
अभी बस कुछ ही क्षण गुजरे होंगे कि स्टेशन की तरफ से कंधे में लंबा चोंगा
लटकाये एक शख्त आता दिखायी दिया । जुट आये लड़कों में से एक की नजर गयी तो
वह चिल्लाया, “फकीर...।”
फकीर के
पास आते ही एक ने सलाम बजाय, आइये, आइये, फकीर बाबा । हम आपके स्वागत में
अड़े हैं । ”
“खुशी
खुशी जियो, बेटो।”
फकीर ने अपना हाथ उठाया ।
“आइये,
आइये, बाबा।”
एक लड़के
ने फकीर की आगवानी की तो बाकी सभी फकीर बाबा को घेरकर खड़े हो गये ।
“आज कितने
ताबीज और पत्थर आपने बेते,बाबा...।”
एक ने सबाल उछाला ।
“मैं
ताबीज और पत्थर बेचना नहीं हूं, बेटो । मैंतो यतीम और गरीब बच्चों के लिये
कपड़े, किताबें, जूते, टोपियां मांगता हूं और जो देते हैं, उन्हें ताबीज और
चमकीले पत्तरों से दुआएं देता हूं... । इस काम में तुम लोग भी कभी मेरी मदद
करो, बेटो ।”
फकीर का
निश्छल जवाब आया ।
“इस
तुम्हारी मदद करेंगे ,बाबा । हम घूम-घूमकर जुटायेंगे और तुम इनका अम्बार
लगाओगे और बदले में खुदा से लंबी उम्र पाओगे । है कि नहीं बाब ? ”
एक लड़के
ने आगे बढ़कर फकीर का चोंगा छीन लिए और उसमें रखे सारे सामान जमीन पर बिखेर
दिये ।
“नहीं...नहीं”
फकीर ऐसेकिसी मौके के लिये तैयार नहीं था। वह उन सामानों कीओर लपका । फिर
दौड़ते हुए पेड़ की तरफ गया और बेचैनी में उसके, खोढ़रे में हाथ डालकर
उसमें रखे सामान को टटोल-टटोलकर देखने लगा ।
“इधर
हम लोगों के बीच में आओ, बाबा...।”
एक लड़का बाबा को बांह पकड़े खींच लाया । दो लड़के पेड़ के खोढ़रे से सामान
निकालने लग गये ।खढ़रे में रखे हुए कपड़े पेड़ के खोढ़रे से सामान निकालने
लग । खोढ़रे में रखे हुए कपड़े, ताबें, पियां, ते जमीन पर बिखर गये।
एक
ने आगे बढ़कर एक किताब उठायी । फिर चिल्लाया,
“इसे
जो पढ़ सकता है, सामने आये और ले जाये। इनाम में एक टोपी या एक कपड़ा भी
ले जाये ।”
कई
झांक-झांककर अलग हो गरये । किताब एक तरफ फेंक दी गयी । फिर सभी सामान
सजाये जाने गले । नीचे जूते, उसके ऊपर कपड़े, र टोपियां ,सबसे ऊपर किताबें
।
“इसानियत
के वास्ते ऐसा मत करो,जालिमो । रुको, ठहरो...”
फकीर की हिचकियां हवा में तैर रही थीं। उने गिऱफ्त से छूटने की कोशिश की
लेकिन मजबूत हाथों ने उसे फिर दबोच लिया ।
“अब
हम सभी आखिरी बार अपना माथा नवायें । अवविदा...।”
दूसरी आवा उछली।
किसी दूसरे ने पाकिट से माचिस निकाली लेकिन इसके पहले कि कोई तीली जले किसी
अन्य ने आवाज दी, “रुको,
परचम को तो जलने से बचाओ।”
टोपियां,
किताबें ,जूते,कपड़े पांवों से घसीटे और फेंके जाने लगे । वे थोड़े फासले
पर ला दिये गये । अब लड़के ने माचिस आगे की और बारी से अलग अलग कोनों पर
तीलियां पकड़ायी । लपटें फिर... फिर घंटे बर के भीतर जूते, कपड़े किताबें
और टोपियों ने अपना वजूद खो दिया और उनकी जगह अब सिर्फ राख का एक ढेर
फकीर खड़े-खड़े बिलख रहा था । लड़कों ने उसकी बांह ढीली कर दी, “जाओ,
फकीर बाबा, हमने तुम्हें जीवनदान दिया । मस्ती से जियो... ।”
सुबह
जितने उजाले के साथ आ सकती थी, आयी । मैदान जमावड़ा जुटा । लेकिन जो चीज
पहली नजब में दिखी ,वह सबको सकते में डा गयी । सभी दौड़कर पेड़ की तरफ गये
। फकीर अपना डेरा उखाड़कर जा चुका था। पेड़े की जड़ के पास सिर्फ कुछ
चमकीले पत्थर पड़े थे । सामने पेड़ मुर्दा बनकर खड़ा था । पेड़ की पत्तियां
झड़ी हुई थीं और शाखें निर्जीव सी वनी हुई थीं । ऊपर ठूंठ पर सिर्फ परचम
लहरा रहा था ।
सबने पेड़ को छू-छूकर देखा । सिर्फ उसकी जड़ें ही वैसी थीं, बाकी तना,
शाखाएं या पत्तियां ... पेड़ ने, सभी आश्चर्यचकित थे।
“पेड़
धुएं से घुट गया । ”
एक ने कहा
।
“पेड़ की
इतनी हिम्मत कि उसने परचम बनने से इनकार किया?”
कोई दूसरी आवाज उठी।
“पेड़ यह
सब कुछ देख नहीं पाया....।”
तभी तीसरे
ने सांस छोड़ी ।
“धुत्त
कहो कि वह डर गया .... ।”
तभी किसी
एक ने ठहाका लगाया ।
“और
... जो डर गया, सो मर गया।”
कई आवाजें
एक साथ ठहाके में सामिल को गयीं ।
धूप पुरब
में क्षितिज से उतर रही थी। हवा अभी मौजूद थी । ताल उतर रही धूप को आंखे
फाड़कर देख रहा था । और पेड़े ...धुत्त ....अब उसका जिक्र करके क्या होगा
?
जो
डर गया, सो मर गया ।

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