सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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कहानी

 

हानी

थैंक यू, अंकल- सतीश जायसवाल

 मरता हुआ पेड़- शंकर

 

थैंक यू, अंकल


सतीश जायसवाल

मदालसा का अर्थ ?

जो मदमाती हो । और जिसकी देह ने अभी निद्रालस्य को पूरी तह त्यागा नहीं हो, ऐसी नायिका ।

      पंजाब की तरफ के गाँवों में एक कहावत चलती है, एक तो बहू ऐसे ही सुन्दर, उस पर अभी-अभी सोकर उठी।

      जिस नायिका को लेकर बात चल रही है वह पंजाब की नहीं । कहाँ की है ? क्या बताएँ । जब तक यह पता न चले कि कहाँ से आ रही है या कहाँ को जा रही है, कुछ अटकल भिड़ाने के लिए जमीन भी तो नहीं बनती । सो, लक्षणों के आधार पर ही इस नायिका का नामकरण ठीक रहेगा-मदालसा ।

      मदालसा रात-भर खुली पड़ी सोई । एक चादर तक काया पर नहीं ली । सिवा, रात-भर पड़नेवाली, नीली बत्ती की रोशनी के । करवट कम, उतान अधिक सोई । हाथों को कम, गझिन जूड़े को अधिक सहारा बनाया । फूलदार गिलाफ से ढँका तकिया, बेवजह बगल में पड़ा जगह घेरे रहा । ऐसे में साँसों के साथ संगत करता निद्रित शरीर कविता रचता रहाः

 

क्या इस बीच तुमने गौर किया

तुम्हारी छाती पर खुली पड़ी किताब

साँसों के साथ एक मिनट में कितनी बार

ऊपर आती है, नीचे जाती है .....

 

बीच के स्टेशन में एक और यात्री इस हिब्बे में आया । इसके साथ 72 यात्रियों वाले शयनयान में जगह पूरी भर गई । 72 वें यात्री ने 58 नम्बर की अपनी बर्थ पर, जो बीचवाली पटिया है, भीलनियों के हाथ छापेवाली गहरे लाल रंग की चादर फैलाई । डक-बैक के हवावाले तकिए को फुलाकर सिरहाने रखा । पीने के ठंडे पानीवाले, मिल्टन के इंसूलेटेड फ्लास्क को हुक में लटकाकर सोने जा रहा था कि उसकी नज़र में काले रंग का वह तिल गड़ गया जो नायिका के ऊपरी ओठ पर दाहिनी ओर है । आश्चर्य की बात है कि बकाया के 70 मुसाफिरों में से किसी की नज़र इस तिल पर नहीं पड़ी ?

 

रात भर पड़नेवाली नीली बत्ती की रोशनी ने मदालसा के ओठों के नैसर्गिक रंग  के ऊपर एक रहस्यमय नीली झाँई फैला रखी है। यह एक रहस्य-सरोवर है । आधे चन्द्रमावाली रात में फैला हुआ यह सरोवर नील कमल की गझिन खेती से भरा-पूरा है । इसके बीचोबीच एक पूर्ण प्रस्फुटित कुमुदिनी अर्द्धचन्द्र के साथ अभिसार कर रही है।

सोने से पहले 72 वें यात्री ने ईश्वर का स्मरण किया । यद्यपि यह उसकी आदत नहीं लेकिन आज किया । 72 वें यात्री ने प्रार्थना की, ओ ईश्वर, मेरा निर्विकार अन्तःकरण याचना करता है, मुझे एक बार उस स्वप्न-सरोवर के तट पर पहुँचा दे जिसमें नील कमल की गझिन खेती के बीच पूर्ण प्रस्फुटित कुमुदिनी अर्द्धचंद्र के साथ अभिसाररत है और यह स्वप्न जो व्याप्त है- मेरे सामने मुँदी पलकों के नीचे, निद्रा- निमग्न शान्ति के सुरम्य प्रसार में....। अपने प्रार्थना के उत्तर में उसने सुनी एक आकाशवाणी जो निर्विकार अन्तःकरण तक ही सीमित रही- यह अतिक्रमण होगा । और अतिक्रमण सर्वत्र वर्जित है । इस ईश्वरीय निषेधाज्ञा के सम्मुख 72 वें यात्री ने सिर झुका दिया और आँखें मूँद ली । रात घटनाविहीन निकल गई ।

 

      लेकिन, रात की तरह सुबह घटनाविहीन नहीं निकल पाई । कुछ घटित हो गया। जो घटा उसकी अश्लीलता ने भरे हिब्बे में एक औरत के बदन से उसका एक-एक तागा तक उतारकर रख दिया। सुबह, सबसे पहले मदालसा सोकर उठी । घर की आदत और बचपन के ब्राह्मणी संस्कार । उसने देखा कि बेटा अपने मामा के साथ सो रहा है । दोनों को सोए रहने दिया कि अभी से उठकर क्या करेंगे ? अभी तो रात का अँधेरा भी पूरी तरह नहीं छँटा है। फिर उसने सामने देखा। वर्थ नम्बर 58 को देखा। जब वह सोई थी तब यह खाली थी । अब खाली नहीं । 72 वाँ यात्री अभी सो रहा था। बाकी सभी सो रहे हैं ।

 

      मदालसा उठी और किसी के उठने से पहले तैयार हो गई । लेकिन दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस दुर्घटना ने मदालसा के मन को क्षतिग्रस्त कर दिया । लेकिन इसका असर सीधे उसके दिमाग पर पड़ा । उसे देर तक ऐसा लगता रहा कि अपने बदन के सारे कपड़े वह भारतीय रेल के दूसरे दर्जे के शयनयान के उस संडास में छोड़कर वैसे ही बाहर निकल आई है । और अब किसी भी समय उसका बेटा जाग सकता है, भाई और इस डिब्बे के बाकी सभी यात्री जाग सकते हैं । जब सब उसे देखेंगे तो क्या होगा ? अब एक साथ सात-सात रजाइयाँ भी उसे नहीं ढाँक पाएँगी

      वहाँ मदालसा के साथ ऐसा क्या घट गया जिसने उसे इस हद तक विचलित किया ?  इसे एक मात्र 72 वाँ यात्री ही जान पाया । और वही समझ पाया कि कोई एक दुर्घटना जीवन को इतना अपरूप नहीं कर सकती जितना कि मदालसा भयभीत हो उठी । मदालसा ने बेटे को मामा के पास से उठाया । और अपनी छाती के साथ लगाकर खूब दुलराया । ऐसा लगा जैसे कई सदियों से दूर रहा, उससे उसका बेटा । या एक छोटी-सी दुर्घटना ने समय को ही सदियों से भी लम्बा कर दिया । धूप दिखी और उसके बेटे ने, जिसे प्यार से वह बेटू कहती है, पूरी तरह आँखें खोल दीं और माँ की छाती से स्वतन्त्र होकर उसने धूप को छूने के लिए खिड़की की छड़ों से बाहर अपने नन्हे-नन्हे हाथ निकालकर हथेलियाँ फैला दीं । माँ ने अनुभव किया कि उसका बच्चा धूप में बाढ़ पा रहा है । और फूल की तरह खिल रहा है । माँ का क्षतिग्रस्त मन स्वस्थ हो चला । शिशु को दुलारनेवाली धूप ने माँ को भी छुआ । मदालसा धीर-धीरे संयत हुई।

 

      भारतीय रेल के दूसरे दर्जे के इस शयनयान के, संडास में भीतर से दरवाजा बन्द करते ही 72 वें यात्री ने देखा-फर्श से लेकर छत तक और खिड़की से लेकर दरवाजे तक सब वही बना हुआ है और लिखा हुआ है जो भारतीय रेल के किसी भी दूसरे दर्जे के डिब्बे के संडास में मालूम नहीं कौन बना जाता है और लिख जाता और अन्तर्धान हो जाता है । यह सब न तो देखकर बर्दाश्त किया जा सकता, न ही पढ़कर अपमानित महसूस किए बिना रहा जा सकता । फिर भी कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि वहाँ तो कोई होता ही नहीं है । ऐसे में करें तो क्या करें ?

      आश्चर्य है कि बकाया के 70 यात्रियों में से किसी का सामना इस सवाल से नहीं हुआ । 72 वें यात्री के सामने किसी नारी देह का बेहद घृणास्पद नंगा ढांचा चित्रित है जिसे मानूम नहीं कौन बनाकर अन्तर्धान हो चुका था।

      घृणास्पद सही फिर भी यदि नारी-देह है तो यहाँ स्तन भी हैं और कोख भी है । वह सब है जिससे कोई औरत किसी मर्द से अलग दिकती है या जिससे वह माँ बनने का गौरव हासिल करती है, यह बेटू की माँ हो सकती है, जिसका निद्रित शरीर रात-भर साँसों के साथ संगत करता और कविता रचता रहा ?’     फिर वह चिन्तित हो उठा । कहीं बेटू ने यह सब देख लिया और पूछ लिया और जवाब के लिए जिद पकड़ गया कि बताओ मम्मी क्या तुम ऐसी हो, तो क्या होगा ? तभी 72 वें यात्री की दृष्टि सामनेवाले आईने पर पड़ी और अटककर रह गई, वहाँ एक कोने में लाल रंग की छोटी सी बिंदिया चिपकी हुई है। बाहर आकर उसने मदालसा से पूछा, आप अपना कुछ वहाँ, टायलेट में तो नहीं भूल आई हैं ? ”

 

      क्या मदालसा एक अपरिचित व्यक्ति को यह बताती, हाँ, मैं वहाँ से बिना कपड़े के बाहर आई ? ’’ वह चुप रही । लेकिन इस अपरिचित  सहयात्री के पूछने में पता नहीं ऐसा क्या है कि वह अपनी जगह पर वैसी की वैसी बैठी न रह सकी । उठी । शिष्टाचारवश या एक शिष्ट व्यक्ति का मन रखने के विचार से, क्या मालूम ?  झूठ-मूठ ही सही, वहाँ किसी छूट गई चीज को देखने के लिए, टायलेट का दरवाजा खोलकर उसने भीतर झाँका भी । आईने के कोने में नज़र पड़ते ही उसे याद आया कि हाँ, यहाँ तो वह अपनी बिंदिया भूल गई थी। उसने देखा कि बिंदिया की जगह खाली पड़ी है और वहाँ कागज का एक पुर्जा तह किया हुआ रखा है। उसने पुर्जे की तह को खोलकर देखा तो उसे एक कविता मिलीः

 

वहाँ पहुँचकर

है, मुझे ही खोलना

दरवाजे पर पड़ा ताला,

जाला हटाकर

देखूँगा, जब सामने

आईने के कोने में

चिपकी रह गई बिंदिया

नहीं, वहाँ

होगा, मेरा चेहरा अपना

धूल-भरे शीशे पर...।

 

      72 वाँ यात्री जब यहाँ दाखिल हुआ था, एकदम अपरिचित, एकदम अकेला था। अब अपरिचित नहीं । ऐसा लगता है जैसे अपने साथ पूरा मेला लेकर चला था। अब जानपहचान के लोग उसके पास जुटने लगे । और छह पटियोंवाले इस इलाके में साँसत होने लगी।

      उन सबको ताज्जुब हो रहा था, आप यहाँ ?”

      हाँ, बीच से चढ़ना हुआ । रात थी, सब लोग सो रहे थे। यहाँ यह पटिया खाली मिली । सो, यहाँ पड़ लिये ।

उसने अपने परिचितों से फरमाइश की, अरे भाई, चाय-वाय का कोई जुगाड़ होगा ? और चाय का जुगाड़ हो गया।

इस तरह उसने अपना माया-जाल फैलाना शुरू किया । और शुरू किया, एक-एक करके अपने अड़ोस पड़ोस के लोगों को इस जाल में लपेटना।

रात में पड़नेवाली नीली बत्ती की रहस्यमयी नीली झाँई अब मदालसा के ओठों पर नहीं, और उसका नैसर्गिक रंग चमक रहा है । अब वहाँ नीलकमल की गझिन खेती नहीं, बल्कि आँच पकड़ते पलाश का वन है। खिलते हुए पलाश के रंगवाले ओठों पर काले रंग का तिल अब खूब गाढ़ा दिख रहा है ।

72 वें यात्री ने देखा, मदालसा की हथेलियों पर रचे मेहँदी के बेल-बूटे और पाँवों में खिंची महावर की धारियाँ।

उससे नहीं रहा गया और वह बोल ही बैठा, याद नहीं पड़ता कि कितना अरसा बाद महावर रचे पाँव देख रहा हूँ । अब तो हमारे अपने घरों से यह पाँवों में महावर रँगने का चलन ही खतम हुआ जा रहा है ।

मदालसा ने संकोच में अपने पाँव नहीं खींचे । न उन्हें साड़ी से ढाँका-मूँदा, वैसे के वैसे रहने दिया और कहा, हमारे यहाँ अभी यह चलन है । सुहागिन के पाँव बिना महावर के सूने-सूने लगते हैं ।

      हाँ, इसी पर तो कवि बिहारी ने लिखा है, पायन देव महावरी नावन बैठी आय, पुनि-पुनि जानि महावरी एड़ी मीड़त जाय ।

      मदालसा ने उमंग में भरकर बताया, हाँ, विदाई से पहले नाइन भी आई थी । उसी ने पाँवों में महावर रचाया।

      क्या आपके घर में अभी भी ढोलक बजती है ?

      हाँ खूब मन से । शादीब्याह, जचकी-जापा के मौकों पर जब हम सब बहनें और भाभियाँ घर में इकट्ठी होती हैं तो सबकी-सब मिलकर ज्योनार की गालियाँ गाती हैं या जच्चा-बच्चा की सोहर ।

      ताई चाचियाँ भी आकर साथ बैठ जाती हैं और बेटी-बहुओं के साथ सुर सजाती हैं ।

      तब तो सबको बुलाने के लिए बुलौवा भी भेजा जाता होगा ?

      हाँ, बुलौवा लेकर नाऊ जाता है और पर शक्कर के बताशे भी बँटते हैं।

और गले मिलकर भेंटना, फिर सुर लेकर रोना ?”

वो भी, मदालसा अभी सबसे भेंट करके ही तो मायके से चली है । और गले मिलकर रोई भी है । सुर लेकर ।

फिर तो आपके बेटू को, विदाई में रुपए भी मिले होंगे ?” 

हाँ, मिले हैं । अंकल को बताओ, बेटू तुमको कितने रुपए मिले ?”

बेटू ने बताया, इतने ।

 

 

फिर बेटू मचल गया, मम्मी, घर कब आएगा ?”

      मगालसा ने पुचकारा, बस बेटू, ब घर आता ही है । वहाँ बेटू के लेने के लिए उसके पापा स्टेशन पर आएँगे  ना ?”

            बेटू खुश हो गया, हाँ, बेटू को लेने के लिए उसके पापा आएँगे ।

      बेटू के मामा ने घड़ी देखी । फिर बाहर देखा और त/ किया कि अब सामान पेक कर लेना चाहिए ।

      मदालसा ने बेटू को तैयार करके राजा बेटा बना दिया । और भाई से कहा, तुम इसे थोड़ा सँभालो, अब मैं भी कपड़े बदल लूँ ।

      मदालसा कपड़े बदलकर आई तो 72 वाँ यात्री देखता ही रह गया। उसने खूब गाढ़ी माँग भरी हुई थी. माथे पर छोटी सी, लेकिन खूब चमकनेवाली, मधुबनी तरफ की टिकुली । अब उसने साड़ी का पल्लू भी सीधा ले रखा था जो महावर रँगे पाँवों को सोहे।

      अब रेलवे प्लेटफार्म, खिड़की की छड़ों के साथ लगकर पीछे की तरफ दौड़ ले रहा था । मदालसा उस दौड़ ले रहे प्लेटफार्म पर इकट्ठा भीड़ में से बेटू के पापा को ढूँढ़ने के काम में लग गई।

      बेटू के पापा मिल गए ।

      चलते-चलते मदालसा ने कहा, बेटू, अंकल को थैंक यू बोलो ।

      कहने को तो 72 वें यात्री ने बेटू की पीठ थपथपाकर कह दिया, शाबास बेटे।

और लेने को तो बेटू के दोनों ओठों को अपनी उँगलियों से छूकर पुच्ची भी ले ली और जाने दिया। लेकिन खुद चक्कर में पड़ गया कि, बेटू की मार्फत, बेटू की मम्मी ने उसे यह जो थैंक यू कहा है तो किसलिए कहा है ? वह चक्कर में पड़ गया । किसी से कुछ पूछ भी नहीं सकता, क्योंकि बेटू की मम्मी बेटू के पापा और अपने भाई के साथ निकल चुकी है । वापस जाकर, भारतीय रेल के दूसरे दर्जे के शयनयान के संडास में झाँककर देख भी नहीं सकता क्योंकि गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ दूर निकल चुकी है ।

 

 

 

 

'हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति।' - रामवृक्ष बेनीपुरी

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ