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‘बाजारीकरण
के दौर के हिंदी पत्रकारिता’
पर व्याख्यानमाला
बस्ती (उत्तर प्रदेश) ।
विगत दिनो दैनिक हिंदुस्तान की ओर से सेंट्रल एकेडमी सभागार में एक
व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया । व्याख्यानमाना में पत्रकारिता के मूल
स्वरूप पर तो चर्चा हुई ही, पत्रकारिता में हावी हो रहे बाजार पर भी
सारगर्भित बातें की गई ।
व्याख्यानमाला में
दैनिक हरिभूमि, रायपुर के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी ने कहा कि
पत्रकारिता के क्षेत्र में बाजारीकरण का प्रभाव पहले की तुलना में ज्यादा
बढ़ा है । 47 के पहले की पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन में देशवासियों को
जागृत करने के ध्येय को लेकर केंद्रित थी । अब ध्येय है पाठकों को ढेर सारी
सूचनाएं एवं विभिन्न बिषयों पर सामग्री उपल्ब्ध कराना । उन्होंने कहा कि आज
के अखबारों में भारी पूंजी का प्रवेश हुआ है । लाखों लोगों को रोजगार मिला
है । बाजार का दबाव है, जिससे पत्रकारिता एवं पत्रकारों के समक्ष काफी
चुनौतियां खड़ी हुई हैं । पहले निकलने वाले अंग्रेजी अखबार पहुंचते थे, अब
इनका दायरा बढ़ा है । हिंदी पत्रकारिता का मिशन बहुआयामी हो गया है । ढेर
सारे दायित्व पत्रकारिता के जिम्मे आ गए हैं । देश में 7 करोड़ 88 लाख
अखबार हिंदी व अन्य भारतीय भाषओं में रोज छप रहे हैं ।
यूरोप
भारतीय बाजार की ओर टकटकी लगए देख रहा है । बाजार की ताकत से हिंदी
पत्रकारिता को मजबूती मिली है । प्रसार संख्या बढ़ी है । चिंता इस बात को
लेकर है कि पत्रकारिता के नाम पर कुछ ऐसी चीजें भी परोसी जा रही हैं, जो
नहीं परोसी जानी चाहिए थी । यह रुक सकता है, बशर्ते पाठक हस्तक्षेप करें ।
इससे बड़ी बात और क्या होगी कि देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले समाचार
पत्रों में से 9 हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं के हैं जबकि अंग्रेजी का एक
मात्र अखबार इस कोटि में आता है । इससे यह स्वतः प्रमाणित हो जाता है
हिन्दी पत्रकारिता का न केवल वर्तमान यशस्वी है अपितु भविष्य भी सुंदर है ।
जरूरत सिर्फ इतनी है कि हमारी हिंदी पत्रकारिता में भारतीयता,
संस्कृति और परंपरा सदैव पल्लवित हो इसके लिए पाठकगण अपना
दबाव बनाएं । ऐसे अखबार नकारे जाएं जो देश की सभ्यता एवं समाज के नैतिक
मूल्यों का उल्लंघन करते हों । अंग्रेजी समाचार पत्रों में कुल मिलने वाले
विज्ञापनों का प्रतिशत जहां 54 हैं, वहीं हिन्दी का मात्र 24 प्रतिशत है ।
इसके लिए हमारे जेहन में भरी हुई अंग्रेजियत जिम्मेदार है । आज 100 भाषाओं
के अखबार निकल रहे हैं परंतु इनमें एक चौथाई ही हैं जिनकी प्रसार संख्या
संतोषजनक अथवा बेहत्तर कही जा सके । मीडिया को समाज को जागृत करना चाहिए ।
जागृति के लिए पत्रकारों और पाठक को अपनी भूमिका दोबारा तय करनी होगी ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता
हिंदी नई कविता के चर्चित हस्ताक्षर अष्टभुजा शुक्ल ने की जबकि विशिष्ट
अतिथि के रूप में शिक्षाविद प्रो, राघवेंद्र कृष्ण प्रताप रहे । कार्यक्रम
को पत््रकार दिनेश दुबे, प्रदीप पांडेय, जे. पी. तिवारी ने भी संबोधित किया
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