सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

E-mail-srijangatha@gmail.com   

 

 

 

अंक-3, अगस्त, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरणकथोपकथनभाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिक्शेष-विशेषपुरातनअंकअभिमत

हलचल

 

भारत से

बाजारीकरण के दौर के हिंदी पत्रकारिता पर व्याख्यानमाला

पत्रकारिता की पहली पाठशाला छत्तीसगढ़ मित्रः पंकज

अमेरिका से

एक गुजरात अमेरिका में

बिनीता सिंह को मिला 'न्यूजवीक' पुरस्कार

                        

 

 

बाजारीकरण के दौर के हिंदी पत्रकारिता पर व्याख्यानमाला


 

स्ती (उत्तर प्रदेश) । विगत दिनो दैनिक हिंदुस्तान की ओर से सेंट्रल एकेडमी सभागार में एक व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया । व्याख्यानमाना में पत्रकारिता के मूल स्वरूप पर तो चर्चा हुई ही, पत्रकारिता में हावी हो रहे बाजार पर भी सारगर्भित बातें की गई ।

 

    व्याख्यानमाला में दैनिक हरिभूमि, रायपुर के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी ने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में बाजारीकरण का प्रभाव पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ा है । 47 के पहले की पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन में देशवासियों को जागृत करने के ध्येय को लेकर केंद्रित थी । अब ध्येय है पाठकों को ढेर सारी सूचनाएं एवं विभिन्न बिषयों पर सामग्री उपल्ब्ध कराना । उन्होंने कहा कि आज के अखबारों में भारी पूंजी का प्रवेश हुआ है । लाखों लोगों को रोजगार मिला है । बाजार का दबाव है, जिससे पत्रकारिता एवं पत्रकारों के समक्ष काफी चुनौतियां खड़ी हुई हैं । पहले निकलने वाले अंग्रेजी अखबार पहुंचते थे, अब इनका दायरा बढ़ा है । हिंदी पत्रकारिता का मिशन बहुआयामी हो गया है । ढेर सारे दायित्व पत्रकारिता के जिम्मे आ गए हैं । देश में 7 करोड़ 88 लाख अखबार हिंदी व अन्य भारतीय भाषओं में रोज छप रहे हैं ।

   

    यूरोप भारतीय बाजार की ओर टकटकी लगए देख रहा है । बाजार की ताकत से हिंदी पत्रकारिता को मजबूती मिली है । प्रसार संख्या बढ़ी है । चिंता इस बात को लेकर है कि पत्रकारिता के नाम पर कुछ ऐसी चीजें भी परोसी जा रही हैं, जो नहीं परोसी जानी चाहिए थी । यह रुक सकता है, बशर्ते पाठक हस्तक्षेप करें । इससे बड़ी बात और क्या होगी कि देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले समाचार पत्रों में से 9 हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं के हैं जबकि अंग्रेजी का एक मात्र अखबार इस कोटि में आता है । इससे यह स्वतः प्रमाणित हो जाता है हिन्दी पत्रकारिता का न केवल वर्तमान यशस्वी है अपितु भविष्य भी सुंदर है । जरूरत सिर्फ इतनी है कि हमारी हिंदी पत्रकारिता में भारतीयता, संस्कृति और परंपरा सदैव पल्लवित हो इसके लिए पाठकगण अपना दबाव बनाएं । ऐसे अखबार नकारे जाएं जो देश की सभ्यता एवं समाज के नैतिक मूल्यों का उल्लंघन करते हों । अंग्रेजी समाचार पत्रों में कुल मिलने वाले विज्ञापनों का प्रतिशत जहां 54 हैं, वहीं हिन्दी का मात्र 24 प्रतिशत है । इसके लिए हमारे जेहन में भरी हुई अंग्रेजियत जिम्मेदार है । आज 100 भाषाओं के अखबार निकल रहे हैं परंतु इनमें एक चौथाई ही हैं जिनकी प्रसार संख्या संतोषजनक अथवा बेहत्तर कही जा सके । मीडिया को समाज को जागृत  करना चाहिए । जागृति के लिए पत्रकारों और पाठक को अपनी भूमिका दोबारा तय करनी होगी ।

 

    कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी नई कविता के चर्चित हस्ताक्षर अष्टभुजा शुक्ल ने की जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में शिक्षाविद प्रो, राघवेंद्र कृष्ण प्रताप रहे । कार्यक्रम को पत््रकार दिनेश दुबे, प्रदीप पांडेय, जे. पी. तिवारी ने भी संबोधित किया ।

 

 

 

         'हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये।' - बेरिस कल्यएव

आपकी प्रतिक्रिया   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरणकथोपकथनभाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिक्शेष-विशेषपुरातनअंकअभिमत

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ