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माह के छंदकार प्रसंग गलत है
दिया गया संदर्भ सही पर अवसर और प्रसंग गलत है ।
भाव, अमूर्त और अशरीरी वह अनुभव की वस्तु रहा है
चित्र न कर पाया रूपायित
शब्दों ने ही उसे कहा है
उसका कल्पित रूप सही पर दृश्यमान हर रंग गलत है ।
जब विश्वास सघन होता तब संबंधो का मन बनता है गगन तभी भूतल बनता है भूतल तभी गगन बनता है
सही, प्रेम में प्रण करना पर करके प्रण, प्रण-भंग गलत है ।
संस्तुति, अर्थ, कपट से पायी जो भी हो उपलब्धि हीन है ऐसा, तन से उजला हो पर मन से वह बिलकुल मलीन है
शिखर लक्ष्य हो, सही बात पर उसमें चोर-सुरंग गलत है ।
गाओ कि जिये जीवन
गंधर्व, गीत के ओ ! कबसे पुकारता हूँ आओ कि मौत सहमे, गाओ कि जिये जीवन ।
यह निपट अकेलापन, मन की रुई न धुन दे यह मौत कहीं मुझको, दीवार में न चुन दे पाया मुझे अकेला, धमका दिया मरण ने ज़िंदा रखा अभी तक, बस गीत की शरण ने आओ न तुम अगर तो अवसर मिले व्यथा को
सब वक्ष के व्रणों की देगी उधेड़ सीवन ।
ईंधन बचा हुआ है, ब़ाकी अभी अगन है हम नित्य गा रहे तो यह ज़िंदगी मगन है वैसे मरण-महावर पर पाँव में रचा है मारा गया बहुत पर, जीवन अभी बचा है अनुपात यह हमेशा, यों ही बना रहे तो हो अश्रु-ताप पर अब चंदन-सुहास लेपन ।
गाओ कि गीत से ही, धरती, गगन, दिशा है स्वर शेष, साँस, स्पंदन, ब़ाकी जिजीविषा है देखो कि गीत वाला स्वर मंद हो न जाये यह द्वार खुला जीवन का, वंद हो न जाये जीते न मौत बाज़ी, हारे न कभी जीवन अर्थी इधर, उधर हो, नव-जन्म-थाल-वादन ।
संवाद नहीं होता
मिलते तो हैं लेकिन, संवाद नहीं होता कुछ उदासीनता-सी, छायी रहती ऐसी आह्लाद नहीं होता, अवसाद नहीं होता ।.
उठते ही जाते हैं दोनों के अहं शिखर शब्दों के शस्त्रों को करते हैं और प्रखर
संयोग हो गया तो, सम्मुख भी होते हैं दृष्टियाँ चुराते हैं, वे नतमुख होते हैं परिवाद रहे फिर भी, परिवाद नहीं होता ।
कुछ कहा नहीं जाता
कुछ सुना नहीं जाता
ऐसे तो अर्थों का- पट बुना नहीं जाता
शब्दों का चित्रों में या चित्रों का स्वर में शोलों का शबनम में, पानी का पत्थर में जब माध्यम एक न हो, अनुवाद नहीं होता ।
यह प्यार- घृणा वाला अद्भूत सम्मिश्रण है यह द्वंद्व, बुद्धि - मन का त्रासद संघर्षण है
है क्षोभ अनिर्णय का, निर्णय का भी डर है हाँ, ना की दुविधा में , हर प्रश्न निरुत्तर है यो प्राप्त प्रीति को तो, प्रतिसाद नही होता ।
अब भी बरसो
सावन में बरसे न झमाझम नभ में घन आये तो क्या ? बूँद न बरसी, धरा न सरसी उमड़-घुमड़ छाये तो क्या ?
घिर तो आये ऐसे जैसे कर देंगे पानी-पानी धरती ने मनुहार बहुत की मगर नहीं माने मानी
रीती ओक, अँजुरी रीती जल-घट भर लाये तो क्या बूँद न बरसी, धरा न सरसी उमड़-घुमड़ छाये तो क्या ?
अंकुर तो मुरझाये, पौधों को जैसे पीलिया हुआ दोनों में रस भरता लेकिन बूँदों ने ही नहीं छुआ
कृपण, कुबेर हुआ ? देने में दाता सकुचाये तो क्या बूँद न बरसी, धरा न सरसी उमड़-घुमड़ छाये तो क्या ?
अब भी बरसो तो मटमैली भू की चूनर धानी हो होते-होते कथा दुखद यह अब भी सुखद सुहानी हो
तानसेन झुलसे तब बैजू मेघ-राग गाये तो क्या बूँद न बरसी, धरा न सरसी उमड़-घुमड़ छाये तो क्या ?
तुझसे ग़ज़ल ग़ज़ल है
तू ही रदीफ़ इसकी, तू ही तो काफ़िया है तुझसे ग़ज़ल ग़ज़ल है, वरना तो मर्सिया है ।
जीना न चाहते थे थी मौत से न दूरी तू क्या मिला, हुआ है
जीना हमें जरूरी
तू है तो हम जियेंगे, ये फैसला किया है अहसान ज़िंदगी का, तेरे लिए लिया है ।
तू है, तो है, ये दुनिया वरना तो धूल हमको सब काइनात तू ले ज़र्रा क़ुबूल हमको
पूरा सफ़ा उमर का, तुझको ही दे दिया है काफ़ी हमें सफ़े पर, छोटा-सा हाशिया है ।
तू था न तो लगा था यह जिंदगी सज़ा है तू है तो जान पाये जीने का क्या मज़ा है
मत पूछ तेरे पहले, क्या-क्या ज़हर पिया है तू है तो ज़िंदगी को, तबियत से अब जिया है ।
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