सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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छंद

    देश का छंद (स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

    छंद

   माह का छंदकांरः चन्द्रसेन विराट

 

 

गीत

 गाँव को भूला कभी नहीं

 

जब से छूटा गाँव, गाँव को भूला कभी नहीं ।

वह पीपल की छाँव, छाँव को भूला कभी नहीं ।। 

 

चिड़ियों के उठने से पहले लिपा-पुता घर-आँगन

साँझ हुई चौपाल सजी, फिर शुरु हुई रामायण

केवट की वह नाव, नाव को भूला कभी नहीं ।

 

पहली बार मिले हम दोनों, बात नहीं हो पाई

कैसे शरमाई, मुस्काई, बौराई अमराई

अब भी वह ठाँव, ठाँव को भूला कभी नहीं ।

 

पता नहीं खेतों का राजा कैसे बना भिखारी

ख़ाक़ छानता शहर-शहर, ऐसी क्या लाचारी

हार गया जो दाँव, दाँव को भूला कभी नहीं ।

 

तरस रही है बूढ़ी माँ बेटा कब घर आएगा

साँस चैन की लेने का कब शुभ अवसर आएगा

माँ के दुखते पाँव, पाँव को भूला कभी नहीं ।

 डॉ. चित्तरंजन कर

गी

सृजन का स्रोत                 

          

प्रकृति की लीला विरोधों से ओतप्रोत है,       

आदिकालीन प्रलय ही सृजन का स्रोत है।       

ब्रह्मांड था अनंत गुरुत्वाकर्षण युक्त एक पिंड,

अनंत था उसका भार, परंतु आकार था शून्य;

था वह कल्पना की उडान का गुरुतम खंड,

परंतु कल्पनेतर था उसका रूप महासूक्ष्म।

 

उठीं एक दिन चिरनिद्रा मे निनादित उमंगें,

और लाईं उस महा-शांति मे उत्ताल तरंगें;

ज्यों गरजता हो ताण्डवमग्न शंकर का डमरू,

प्रकम्पित करे क्षिति, जल, पावक औ वायु।

 

विरल तरंगों ने कठोर पिंड खंड-खंड किया,

चतुष्कोण फैलाया द्रव्य और र्जा का धुँआँ;

ज्यों क्रोधित हो जाग पडा चिर-सुषुप्त आकाश,

महा-तिमिर मे फैला अनंत सूर्यों का प्रकाश।

 

बम-बम, बम-बम, डम डम डम करते हुए,

विखंडित पिंड दसों दिशाओं मे उड़ चले;

अग्निशिखा की अनंत जिह्वायें लपलपाते हुए,

तड़ित सम प्रज्वलित हो, तड़ित वेग से चले।

 

इन्हीं पिंडों मे से एक था जो सूर्य बना,

एक फुफकार मे अनेकों गृह छोड़ दिये;

जिनमे अब धरा समेत केवल नौ ही बचे,

शेष भस्म हुए, चिन्ह भी न छोड़ गये।

 

धरा ने समस्त ष्मा स्वगर्भ मे समेट ली,

फिर ष्मा से उपजाया ष्मा का विलोम है;

वायुमंडल को शीतल सुरभित बयार दी,

पर्वत को शीत, जहाकापे रोम रोम है।

 

समुद्र मे उपजा जल और जल मे जीवन,

फिर शनै: शनै: थल मेभी हुआ नवसृजन;

कैसी लीला? मत्स्य जल मे जीने को बाध्य है,

पर थलचर को वहा एक पल भी कष्टसाध्य है।

 

हर गहरे शांत जल का तल छिछला दिखे,

मथित मे नंहिं होता अंतस्तल का बोध है;

गम्भीर स्थिर व्यक्तित्व मे रहते झंझा छिपे,

क्षुद्र चंचल मे उफनाते व्यथा और क्रोध हैं।

 

प्रकृति की लीला विरोधों से ओतप्रोत है,

आदिकालीन प्रलय ही सृजन का स्रोत है।

महेश चंद्र द्विवेदी

ग़ज़ल

 

आप अपने को कुछ इस तरह छुपाया जाये

ख़ुद भी ढ़ूँढ़ें तो पता अपना न पाया जाये

 

धूप के दश्त में ठंडक तो मिलेगी कुछ देर

चलते जाएँगे जहाँ तक तिरा साया जाये

 

बेज़रूरत सही, पहचान तो कर लें अपनी

यानी ख़ुद को कभी आईना दिखाया जाये

 

हम भी मौजूद हैं अहसास करा दें सब को

यानी उस बज़्म में इक हश्र उठाया जाये

 

नोच लें चाँद को, सूरज को बहा कर रख दें

ये तमाशा भी ज़माने को दिखाया जाये

 

मुझ सा मुंकिर तू न मानेगा यूँ ही बातों से

वो अगर है तो उसे सामने लाया जाये

 

शेरगोई की है तारीफ़ बस इतनी पाशी

अपने अहसास को लफ़्जों से सजाया जाये

कुमार पाशी

नवगीत

उलझ गये यंत्रों में हाथ

 

उलझ गये यंत्रों में हाथ

तुम मुझे पुर्जा ही समझे

छोड़ दिया साथ !

 

मैंने यदि कल के संगीत सुने

इसका यह अर्थ नहीं

झरनों या नदियों की कल-कल को शाप लगा

मैंने यदि इस्पाती स्वप्न रचे

इसका यह अर्थ नहीं

खंजनी निगाहों या क्षितिजों को शाप लगा

 

मैंने तो एक और जोखिम के स्वागत में

मिला लिए ऊर्जा से हाथ

तुम मुझे कंप्यूटर ही समझे-

छोड़ दिया साथ !

 

तुमने यदि पेड़ फूल पत्तियाँ सजाई हैं

भला किया

मैंने भी एक नया बागवाँ सजाया है देख लो

तुमने तो पहचाने ऋतुओं के संवेदन

आओ अब विद्युत के तंत्र-मंत्र देख लो

 

इसीलिए तो मैंने

एक और दुनिया की खोज में

चंदा पर पाँव रखे सूररज पर हाथ

तुम मुझे सैलानी ही समझे

छोड़ दिया साथ !

प्रो.प्रेमशंकर रघुवंशी

रुबाई

एक

बेबसी  ये  कहर   हुई   जैसे

ज़िंदगी  भी ज़हर   हुई   जैसे

कोई मुझको तो जानता ही नहीं

अपनी  बस्ती  शहर  हुई  जैसे

 

दो

हँसतो गाते  शहर  में  खामोशियाँ मत  बाँटिए

ख़ौफ़ कोई  इन  घरों के  दरमियाँ  मत  बाँटिए

दे सकें  होठों को  कुछ  मुस्कान तो एहसान हो

वरना हमको ग़म में लिपटी सिसकियाँ मत बाँटिए

गुलशन मदान

दोहा

 

कवि-कर्म

 

नहीं ललित पद-योजना, नहीं स्वर्थ-रसपाक

जोड़-तोड़ बस गद्य की, कविता है कि मजाक ।

 

काव्य-विदूषक हों जहाँ, जहाँ बनें कवि भाँड़

कौन करेगा तब वहाँ, कविता का कल्याण ।

 

कवि के करुणाभाव का कविता है अनुवाद

जिसका शोक-विषाद भी,  बनता पूर्ण प्रसाद ।

 

चित्त-द्रवण जिससे न हो, और न दे आलोक

वह कविता कविता नहीं, जो न हरे दुख-शोक ।

 

क्या कहने हैं आजकल, किंकवियों के ठाठ

वर्षा के मंडूक सम,  करते   कविता-पाठ ।

 

शब्द-सुमन से रश झरे, पसरे अर्थ-सुवास

कविता है उल्लास का, एक दिव्य मधुमास ।

 

होकर के अद्वैत सब, भूले भव का भेद

एक दिव्य आनंद का, कविता है कल वेद ।

 

शब्द-अर्थ-रस के सहित, सहित लोकहित मंत्र

कविता है कल्याण की, देवी परम स्वतंत्र ।

 भानुदत्त त्रिपाठी मधुरेश

हाइकु

एक

भोर का तारा

उषा के भाल ज्यों

चमका हीरा

 

दो

मन की तृष्णा

रेगिस्तान में राही

है मृगतृष्णा

 

तीन

ज़मीन बँटी

जायजाद भी बँटे

अंततः माँ भी

 

चार

अपना बेटा

अपना न रहा तो

वो तो बहू है

कृष्णकुमार अजनबी

चुटकियाँ

 

उधार

 

ठंडी-ठंडी हवा लेकर

आई शरद बहार ।

एक जर्सी खरीदने को

चाहिए दो सौ रूपये उधार ।

 

बिल

 

फूल तुम्हें भेजा है ख़त में

ख़त नहीं ये मेरा दिल है ।

फूल अकेला नहीं,

साथ में शापिंग का बिल है ।

 

फ़र्क

 

सफेद साड़ी पे लाल बिंदी लगाती हो

किसी बड़े आस्पताल की एंबुलेंस नज़र आती हो ।

वो घायल को जे जाती है

और तुम घायल कर जाती हो ।

 

फ़र्ज

 

हम दोस्तों का फ़र्ज

यूँ ही निभाते रहेंगे ।

दुआ करो कि उम्र लंबी हो हमारी

नहीं तो भूत बनकर सताते रहेंगे ।

 

अगर तुम

 

अगर तुम मिल जाओ

जमाना छोड़ देंगे हम ।

फिर तेरा घर और एसी गाड़ी में

बैठेंगे हम ।

 

हरीराम महावर

 

 

 

 

'नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।' - गोपाललाल खत्री

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