सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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छंद

    देश का छंद (स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

    छंद

   माह का छंदकांरः चन्द्रसेन विराट

 

 

.........।। देश का छंद ।।.........

 

आह्वान

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखायेंगे,

आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे ।

 

हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जु़ल्मों से,

तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे ।

 

 

बेशस्त्र नहीं हैं हम, बल है हमें चरखे का,

चरखे से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुंजा देंगे ।

 

परवा नहीं कुछ दम की, ग़म की नहीं, मातम की,

है जान हथेली पर, एक दम में गवाँ देंगे ।

 

उफ़ तक भी ज़ुबाँ से हम हरगिज़ न निकालेंगे,

तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे ।

 

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीक़ा,

चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे ।

 

दिलवाओ हमे फाँसी, ऐलान से कहते हैं,

खूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे ।

 

मुसाफ़िर जो अंडमान के, तूने बनाये, ज़ालिम,

आज़ादी ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे ।

 

अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ

 

नवीन कल्पना करो

 

निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए

तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,

                  तुम कल्पना करो ।

 

अब देश है स्वतंत्र, मेदिनी स्वतंत्र है

मधुमास है स्वतंत्र, चाँदनी स्वतंत्र है

हर दीप है स्वतंत्र, रोशनी स्वतंत्र है

अब शक्ति की ज्वलंत दामिनी स्वतंत्र है

लेकर अनंत शक्तियाँ सद्य समृद्धि की-

तुम कामना करो, किशोर कामना करो,

                  तुम कामना करो ।  

 

तन की स्वतंत्रता चरित्र का निखार है

मन की स्वतंत्रता विचार की बहार है

घर की स्वतंत्रता समाज का सिंगार है

पर देश की स्वतंत्रता अमर पुकार है

टूटे कभी न तार यह अमर पुकार का-

तुम साधना करो, अनंत साधना करो,

                  तुम साधना करो ।

 

हम थे अभी-अभी गुलाम, यह न भूलना

करना पड़ा हमें सलाम, यह न भूलना

रोते फिरे उमर तमाम, यह न भूलना

था फूट का मिला इनाम, वह न भूलना

बीती गुलामियाँ, न लौट आएँ फिर कभी

तुम भावना करो, स्वतंत्र भावना करो

                  तुम भावना करो ।

गोपाल सिंह नेपाली

जवानों से

 

बीज हुआ तैयार फ़सल कल निर्माणों की आयेगी

शायद है भंवरों की पीढ़ी अब तो सुर में गायेगी

 

यह सच है सपनों का सिंचन खून पसीना करता है

यह सच है शीतल बादल मिट्टी को मीना करता है

आग और पानी वाला ही बादल बादल कहलाता है

महाप्रलय और महासृजन का ऐसा ही कुछ नाता है

 

बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी, मर नहीं जाये पानी रे

ज़िंदाबाद तुम्हारी ज्वाला ज़िंदाबाद जवानी रे ।।

 

यह कैसी चुप्पी है बोलो यह कैसा सन्नाटा है

प्राणों में सरगम है लेकिन कण्ठ नहीं गा पाता है

कब तुम तोड़ोगे यह चुप्पी, कब तुम खुलकर गाओगे

कब तक इन ज्वालामुखियों को प्राणों में धधकाओगे

 

कब तक तुम स्वीकार करोगे मौसम की मनमानी रे

जिंदाबाद तुम्हारी ज्वाला, जिंदाबाद जवानी रे ।।

 

तुम ही तो लाये हो नवयुग तुम ही इसे सम्हालोगे

है मुझको विश्वास निरंतर इसको और उजालोगे

याद रखो लोहू का लावा जब ठण्डा पड़ जाता है

तब, जीवन का सब दर्प हवा में बन कपूर उड़ जाता है

 

तो पौरुष रहे प्रचण्ड तुम्हारा. उष्मा रहे सयानी रे

जिंदाबाद तुम्हारी ज्वाला, ज़िंदाबाद जवानी रे ।।

 

बालकवि बैरागी

 

 

एक तुम हो

 

गगन पर सितारे-    एक तुम हो,

धरा पर दो चरण हैं- एक तुम हो,

त्रिवेणी दो नदी हैं-  एक तुम हो,

हिमालय दो शिखर है- एक तुम हो,

                  रहे साक्षी लहरता सिंधु मेरा,

                  कि भारत हो धरा का बिंदु मेरा ।

 

       कला के जोड़-सी जग गुत्थियाँ ये,

हृदय के होड़-सी दृढ वृत्तियाँ ये,

तिरंगे की तरंगों पर चढ़ाते,

कि शत-शत ज्वार तेरे पास आते ।

 

तुझे सौगंध है घनश्याम की आ,

तुझे सौगंध है भारत-धाम की आ,

तुझे सौगंध सेवा-ग्राम की आ,

कि आ, आकर उजड़तों को बचा, आ ।

 

तुम्हारी यातनाएँ और अणिमा,

तुम्हारी कल्पनाएँ और लघिमा,

तुम्हारी गगन-भेदी गूँज, गरिमा,

तुम्हारे बोल ! भू की दिव्य महिमा

 

तुम्हारी जीभ के पैंरो महावर,

तुम्हारी अस्ति पर दो युग निछावर ।

रहे मन-भेद तेरा और मेरा,

अमर हो देश का कल का सबेरा,

कि वह काश्मीर, वह नेपाल; गोवा;

कि साक्षी वह जवाहर, यह विनोबा

 

प्रलय की आह युग है, चाह तुम हो,

जरा-से किंतु लापरवाह तुम हो ।

माखनलाल चतुर्वेदी

 

मेरे प्यारे देश

 

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?

मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?

किसको नमन करूँ मैं भारत !  किसको नमन करूँ मैं ?

 

भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?

नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं तू है ?

भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है,

मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है ।

जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?

 

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है,

एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है ।

जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है,

देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है ।

निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं ?

 

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से,

पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से,

तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है,

दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है ।

मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं ?

 

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं,

मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं,

घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन,

खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन ।

आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं ?

 

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है,

धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है,

तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है,

किसकी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है ।

मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं ?

रामधारी सिंह दिनकर

 

 

मातृ-वंदना

 

हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में शिर नवाऊँ ।

मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊँ ।।

 

माथे पे तू हो चंदन, छाती पे तू हो माला ;

जिह्वा पे गीत तू हो मेरा, तेरा ही नाम गाऊँ ।।

 

जिससे सपूत उपजें, श्री राम-कृष्ण  जैसे;

उस धूल को मैं तेरी निज शीश पे चढ़ाऊँ ।।

 

माई समुद्र जिसकी पद रज को नित्य धोकर;

करता प्रणाम तुझको, मैं वे चरण दबाऊँ ।।

 

सेवा में तेरी माता ! मैं भेदभाव तजकर;

वह पुण्य नाम तेरा, प्रतिदिन सुनूँ सुनाऊँ ।।

 

तेरे ही काम आऊँ, तेरा ही मंत्र गाऊँ ।

मन और देह तुझ पर बलिदान मैं जाऊँ ।।

राम प्रसाद बिस्मिल

 

 

देश की धरती

 

मन समर्पित, तन समर्पित

और यह जीवन समर्पित

चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

 

माँ, तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अंकिचन

किंतु इतना कर रहा फिर भी निवेदन

थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी

कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण

गान अर्पित, प्राण अर्पित

रक्त का कण-कण समर्पित

चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

 

कर रहा आराधना मैं आज तेरी

एक विनती तो करो स्वीकार मेरी

भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी

शीश पर आशीष की छाया घनेरी

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित

आयु का क्षण-क्षण समर्पित

चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

 

तोड़ता हूँ मोह का बंधन क्षमा दो

गाँव मेरे, द्वार, घर, आँगन क्षमा दो

देश का जयगान अधरों पर सजा है

देश का ध्वज हाथ में केवल थमा दो

ये सुमन लो, यह चमन लो

नीड़ का तृण-तृण समर्पित

चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

 

 

रामावतार त्यागी

 

वही हुआ करता है देश

 

ग्राम, नगर या कुछ लोगों का नाम नहीं होता है देश ।

संसद, सड़कों, आयोगों का नाम नहीं होता है देश ।

 

देश नहीं होता है, कोई सीमाओं से घिरा मकान

देश नहीं होता है, केवल सजी हुई ऊँची दुकान ।

 

देश नहीं क्लब जिसमें बैठे करते रहें सदा हम मौज़

देश नहीं होता बंदूकें, देश नहीं होता है फौज़ ।

 

जहाँ प्रेम के दीपक जलते, वहीं हुआ करता है देश,

जहाँ इरादे नहीं बदलते, वहीं हुआ करता है देश ।

 

हर दिल में अरमान मचलते, वहीं हुआ करता है देश,

सज्जन सीना तान चलते, वहीं हुआ करता है देश ।

 

देश वहीं होता जो सचमुच, आगे बढ़ता कदम-कदम,

धर्म, जाति, भाषाएँ जिसका, ऊँचा रखती है परचम ।

 

पहले हम खुद को पहचानें, फिर पहचानें अपना देश,

एक दमकता सत्य बनेगा, वहीं रहेगा अपना देश ।

                                                डॉ. शेरजंग गर्ग

 

बढ़े चलो, बढ़े चलो

 

न हाथ एक शस्त्र हो,

न हाथ एक अस्त्र हो,

न अन्न वीर वस्त्र हो,

हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

 

रहे समक्ष हिम-शिखर,

तुम्हारा प्रण उठे निखर,

भले ही जाए जन बिखर,

रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

 

घटा घिरी अटूट हो,

अधर में कालकूट हो,

वही सुधा का घूंट हो,

जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

 

गगन उगलता आग हो,

छिड़ा मरण का राग हो,

लहू का अपने फाग हो,

अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

 

चलो नई मिसाल हो,

जलो नई मिसाल हो,

बढो़ नया कमाल हो,

झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

 

अशेष रक्त तोल दो,

स्वतंत्रता का मोल दो,

कड़ी युगों की खोल दो,

डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

सोहन लाल द्विवेदी

 

चंदन है इस देश की माटी

 

चंदन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है, 

हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है ।

हर शरीर मंदिर-सा पावन, हर मानव उपकारी है, 

जहाँ सिंह बन गये खिलौने, गाय जहाँ माँ प्यारी है ।

जहाँ सबेरा शंख बजाता, लोरी गाती शाम है;

 

  

जहाँ कर्म से भाग्य बदलते, श्रम निष्ठा कल्याणी है,

त्याग और तप की गाथायें, गाती कवि की वाणी है ।

ज्ञान जहाँ का गंगाजल-सा, निर्मल है, अविराम है

 

जिसके सैनिक समर भूमि में, गाया करते गीता है,

जहाँ खेत में हल के नीचे खेला करतीं सीता हैं ।

जीवन का आदर्श यहाँ पर, परमेश्वर का धाम है ।

 

हरिमोहन विष्ट

 

 

 

 

 

 

 

'हिंदी विश्व की महान भाषा है।' - राहुल सांकृत्यायन

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