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पंजाबी
दावा
मुज़रिम
उसे ही ठहराया, हथकड़ी लगवा
कटघरे में
हाजिर करवाया, सरकारी वकील गरजा-
हजूर,
गुनाह इस का है, यह अंधी मछली-सी
शब्दों के
बुने जाल में बार-बार फंसती रही
इसने
लोगों को धरती से उठा आकाश पर रखा
और उनसे
बहुत कुछ मांगा
यह भूल
गयी कि इन्सान इन्सान है
कथाओं
कविताओं के पात्र नहीं
सच-झूठ की
इसे पहचान नहीं
मुनसिफ़
सफाई माँगता, पर वह चुप है
यहाँ उसने
कुछ नहीं कहना, लेकिन सजा भुगतने पर
तलाश
करेगी कोई ऐसी अदालत जहाँ दावा कर सके
उन
शब्दों, कहानियों, कविताओं पर
जिन्होंने
सत्य का भ्रम देकर उसे खूब भटकाया
हथकड़ी
लगवा मुज़रिम ठहराया
मूल रचनाः निरूपमा दत्ता
अनुवादः
योगेश्वर
कन्नड़
तेरे न रहने से
पता है
मुझे
इन
उद्यानों मैं फूलों का खिलना
रुकेगा
नहीं तेरे न रहने से
इस तरह एक
के बाद एक तितलियों का
फूलों पर
कुछ पल बैठकर उड़ना
रुकेगा
नहीं तेरे न रहने से
पता है
मुझे
इन
उद्यानों के फूलों का
बाजार में
बिकना
रुकेगा
नहीं तेरे रहने से
या
इन
तितलियों की मृत्युरूपी बिल्ली का
खाते हुए
आना
रुकेगा
नहीं तेरे होने से
फिर भी
फूल हवा
को बांटता हुआ गंध
मेरा
श्वास नहीं बनेगा
फूल रोशनी
को बिखराए रंग
मेरी
आंखों की नहीं भाएंगें
बाजार में
न मिलने
वाला एक भी फूल
इस दुनिया
में नहीं बचेगा
तेरे न
रहने से यह सबकुछ
कुछ भी
नहीं
मूल रचनाः
एच. एस. शिवप्रकाश
अनुवादः
मुकुंद जोशी
गुजराती
वर्षा
–मुक्तक
आज अब
जो खुल
गये दरवाज़े,
कसकर बंद
नहीं होते –
फूले नहीं
समाते थे
अतीत के
अरण्यों की याद में
मूल रचनाः
जयंत पाठक
अनुवादः
डॉ.वर्षा दास
उड़िया
हे
शताब्दी
गतायु
शताब्दी हे ।
सच ही
क्या तुम
बन जाओगी
इतिहास
आगामी कल
का
काल के
अनंत प्रवाह में
खो जाएगा
वर्तमान ।
बचे
रहेंगे
बेशुमार
स्वप्न और व्यर्थता की माथा
पूर्ण हैं
आकाश आज
बेमौसमी
मेघ से
घिरती
चारों और तूफानी विभीषिका ।
कहाँ है
चैताही पवन
चारों और
बम और बारूदी गंध
कहाँ है
चिड़ियों की चहकन
है भी
– तो
कहाँ उसमें
वह मधुर
सुर और छंद
चहू और
दीर्घ श्वास.......हाहाकार
तुम्हारे
लिए करती हूं मैं
अश्रु और
रक्त का तर्पण ।
समय की
यज्ञ का तर्पण ।
शताब्दी
को देती हूं पूर्णाहूति,
और
पूर्णाहूति देती हूं
एक अशांत
अतीत को ।
प्रतीक्षा
है मुझे आगामी कल की,
नूतन
सूर्य की,
प्रतीक्षा
है मुझे
तुरूलताओं
तले पल्लवित
हे आगामी
शताब्दी !
लाखों
स्वप्न , लक्ष आशा लिये
बिह्वल
हैं मेरे साथ
तरूलता,
पृथ्वी व आकाश
कितने
स्वप्न,कितनी कामनाएं
जाग उठी
चेतनाएं ।
धरा से
हो रहा है
विदा सूर्य,
करूण-मधुर
इस विदा वेला की बेला में
प्राण
मेरा विह्वल-व्याकुल की
जीती हूं
जहां मैं लिये
करोड़ों
कामना
मन-ह्रदय
में मेरे
युगों की
आशा
जायेंगे
बीत दिवस, मास, वर्ष,
बीतेंगे
युग पर युग
है
शताब्दी ।
फिर तुम
बनोगी इतिहास
लिख जाओगी
स्वर्णक्षरों में
पते-पत्ते
पर
जाने
कितनी अनभूठी कथाएँ ।
हवाओं में
धरा पर
बहे झर-झर
स्नेह और
प्रेम का निर्झरा
कण कण में
भर दो तुम
नव
उन्मादना और नवीन प्रेरणा
मूल रचनाः
सीमा मिश्र
अनुवादः
शांतिलता वर्मा
बांग्ला
मेरा काम
मैं चाहता
हूँ बातों को
पैरों पर
खड़ा कर दूँ
मैं चाहता
हूँ हर परछाई
आँखें
खोल दे
मैं चाहता
हूँ जड़ चित्रों को
गतिशील कर
दूँ
मुझे कोई
कवि कहे
नहीं
चाहता
कंधे से
कंधा मिलाकर
जीवन के
आखिरी दिन तक
मैं चाहता
हूँ
चलता हूँ
मैं अपनी दिन तक
मैं चाहता
हूँ
चलता चला
जाऊँ
चाहता हूँ
मैं अपनी कल को
ट्रैक्टर
के पास रखकर
कह सकूं
अब मेरी
छुट्टी हो गई
भाई, मुझे
थोड़ी सी आग दो ।
मूल रचनाः
सुभाष मुखोपाध्याय
अनुवादः
करूणानिधान
छत्तीसगढ़ी
अंजुरी भर
घाम
चलो तो
भैया ज़रा गाँव चलें
छोड़
चकाचौंध वाले रास्तों को
याद करें
उस पुराने तालाब का सूरज
तौलें
धूंध-धूल के बीच फर्क
हाथी
की मस्ती में
धरती का
रखवाला चला आ रहा है
यह जो
किसान है
रोज बड़े
भोर से खेतों में सपने बो आता है
खाली बदन,
मन उज्ज्वल, मुसकाता हुआ
बताओ
छप्पर-छानी, पक्का महल के बीच फर्क
गाँव
फड़फड़ाता हुआ
मकड़ी जाल
जैसी राजनीति में फँसा पंतगा हो कोई
चलती हवा
के भभके में
भूखा
अँधेरा भी डरा रहा है
यहाँ
क्यों गिरफ़्तार है बपुरा अंजोर
अंजुरी भर
घाम के लिए
वृक्ष से
चटके पत्ते का क्या ठिकाना
आज नहीं, कल
तो गिरेगा ही
बकरे के
गले में बँधी है रस्सी
कितना दिन
खैर मनायेगा वह
नये राज
में शुक्रतारा कहाँ छिपा है
करम करते
देखो, अपने लाल रक्त को
मूलः चेतन
भारती
अनुवादः
कामिनी कल्पना
अमेरिकन अँगरेज़ी
कोहरा
नन्हें
बिल्ली-पैरों पर
चला आता
है
कोहरा
बैठता है
यह
खामोश
पुटठों पर
देखता हुआ
बन्दरगाह
और शहर
के पार
और फिर
चल
पड़ता
है.....
मूल रचनाः
कार्ल सैंडवर्ग
अनुवादः
विनोद शर्मा
वल्गारी
जाड़ा
जाड़ा
मेरी
खिड़की के शीशे पर
बुन रहा
है पाला एक नमूना चमकीला
पूर्णांश
की आकृति का
मैं अकेला
हूँ
भटक गया
हूँ तुम्हारे लिए
मेरे मन
में छाई है बसंत ऋतु
जबकि आँगन
में खड़े पेड़
जाड़े का
ऐलान कर रहे है
और इस
वक्त भी गिर रही है बर्फ
तुम कहाँ
हो
पाले पर
तुम्हारा नाम लिखती है
मेरी
उंगली
और दमकती
है
मूल रचनाः
ईवान वाज़ोव
अनुवादः
विनोद शर्मा

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