सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

E-mail-srijangatha@gmail.com   

 

 

 

अंक-3, अगस्त, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरणकथोपकथनभाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिक्शेष-विशेषपुरातनअंकअभिमत

अपनीबात

 

कविता केन्द्र में

 

माम भविष्यवाणियाँ झूठ सिद्ध होती रही हैं । सशंकित मन की कुशंकाओं से हर बार कवि (और पाठक/श्रोता भी) मुक्त होता रहा है । अपने एकांगी विचारों की तानाशाही में अव्वलों को मुँह की खानी पड़ती रही है । विविध विधाओं की चकाचौंध और तामझाम भी घुटने टेकती रही हैं । और कविता नेस्तनाबूद नहीं हुई । आज भी वह केन्द्र में है-कृष्ण की तरह और शेष विधाएँ उसके चारों ओर गोपिकाओं की तरह।

 

       आज का सच तो सुखद आश्चर्य का भी अवसर मुहैया कराता है- उत्तर आधुनिक समय और उसकी संश्लिष्ट प्रौद्योगिकी की बाँझ ज़मीन पर भी अंकुरित होकर कविता ने अपनी चिंरंजीविता को एक बार फिर प्रमाणित कर दिखाया है । अंतरजाल (internet) को ही लें । वहाँ कविता की हरियाली बगर रही है । मज़ेदार कि यह हरिताभ परंपरा या पड़ोस की आयातित छवि से भी मुक्त जान पड़ती है । शिविरबाजों के सीमित अनुभवों के अर्धसत्यों से विमुक्त और नयी भाषा से कथ्य की अर्थवत्ता को संपुष्ट करते शिल्पयुक्त । अंतरजाल की कविता नये संदर्भों में वैश्विक बनती हुई कविता है जहाँ उसके पाठक भी विश्व के कई देशों में फैले हुए हैं । इतना ही नहीं कवि के साथ अपनी प्रतिक्रिया के साथ जुड़ते हुए ।

 

       यह बिलकुल अलग कोण है कि कवि का मन मसोसता रहे कि उसकी रचनाओं के लिए पत्र-पत्रिका में जगह नहीं या फिर उसके मर्म तक आलोचक (?) जानबुझकर नहीं पहुँचता और उधर पाठक / श्रोता भी कि उन्हें जीवन के लिए मददगार कविताएँ मिलती नहीं । मिलती भी हैं तो वे बुझने में कठिन होती हैं, जटिल भी । कविता को लेकर हताशा चारों तरफ़ है, या रहेंगी भी । इससे कम से कम कविता को फ़र्क नहीं पड़ता । कवि, पाठक, प्रकाशक, आलोचक चाहें, न चाहें- कविता हर दौर में अपनी मौजूदगी दर्शाती रहेगी ।

 

मौखिक परंपरा, शिलालेख, ताडपत्र, काग़ज़, डिजीटल फार्म और अब जालपृष्ठ में कविता की मौजूदगी और विस्तार का मायने चाहे मनुष्य जीवन के लिए अनिवार्य एवं आनुषंगिक अस्त्र की सतत् अभिरक्षा न हो, मनुष्य और कविता के मध्य सतत् एवं परस्पर श्रद्धा-भाव अवश्य है । कविता के बगैर मनुष्य जी सकता है । वह जीवन का अनिवार्य शर्त भी कहाँ है ? गंभीरता से देखें तो कविता मनुष्यता का अनुशासन है । इस अर्थ में वह दंड भी है ।  कविता मनुष्य के बगैर शून्य है । मुझे प्राणी विज्ञान की सम्यक जानकारी नहीं फिर भी दावा के साथ कह सकता हूँ कि कविता का मनुष्य जैसा कोई और हितग्राही शायद ही होगा । स्वयं कविता के केन्द्र में मनुष्य ही रहा है । आदि से अब तक । भावी समय में वह मंनुष्य का अधिक अंतरग होगा।

        मनुष्य कविता के बगैर रह तो सकता है पर कविता की उपस्थिति से मनुष्यत्व का फूल खिल उठता है । क्योंकि कविता अपने आप में जीवन का आलोचनात्मक मूल्याँकन है । अर्थात् गूढार्थ दृष्टि से आत्मपरीक्षण भी । विलियम वर्ड्सवर्थ कहते हैं- काव्य ज्ञान का जीवन और सर्वोत्तम रूप है । वह ऐसी भावनात्मक अभिव्यंजना है जो विज्ञान की परिधि को छूते हुए उसे काटती ही है । और उधर शैली ने कहा है- कवि मानवता के लिए विधान बनानेवाला विधायक है जो मोटे रूप में विधायक नही माना जाता (Poet is an unacknowledged legislator of Mankind) । वैसे यह नृतत्वशास्त्रीय विवेचनों एवं निष्कर्षों से भी सिद्ध है कि प्राचीन से प्राचीन जनजाति समाज में भी कविता किसी न किसी रूप में मौखिक परंपरा में विद्यमान रही है । जिसे लोककाव्य जैसे नामों से जाना जाता है । कविता का सानिध्य अपनी संस्कृति के प्रकाश-वलयों में संस्कारवान तरीकों का सानिध्य भी है । इसलिए कविता-कर्म को हर सभ्यता में मनुष्य के सांस्कृतिक कार्य-व्यापार में सूचीबद्ध किया जाता रहा है । उसे कभी भी अर्थशास्त्र या वाणिज्यिक विषय-सूची में डालने की कुचेष्टा नहीं की गई । यदि ऐसा नहीं होता तो और जैसा कि धनबली सतत् उद्यम करते रहे हैं, तो कविता उत्पादन की श्रेणी में चली जाती । वह सदैव सृजनात्मक गतिविधियों में ही शुमार की जाती रहेगी । जाहिर है मनुष्य रहेगा तो उसके साथ विध्वंस और सृजन का क्षण भी होगा । विध्वंस कितना भी शक्तिशाली और दूरगामी क्यों न हो मनुष्य उसी कशमकश में कविता रचते हुए अपने मनुष्य को चरितार्थ करता रहेगा । यह कम से कम अब तक का ऐतिहासिक सत्य है । मुझे जाने क्यों पर बहुधा लगता है कि प्रौद्योगिकी के उन्नत या चरम शिखर पर पहुँच जाने वाले समय में भी कविता मनुष्य के पड़ोस में होगी । उसका स्वरूप चाहे जैसा भी हो । क्योंकि उस दौर में मनुष्य यंत्रमानव से स्वयं को बिलगाने की जद्दोजहद में ज्यादा अस्मितावान् होने का उद्यम करेगा । और तब कविता आदि कला माध्यम उसके लिए रामवाण सिद्ध होगीं । ऐसे क्षणों में निराला की पंक्तियाँ बरबस जेहन पर छा जाती हैः अभी न होगा मेरा अंत !” निराला ने यह हुँकार तब किया था जब हिंदी में छायावाद-रहस्यवाद के प्रारंभिक चरणों को अपशकुन मानकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कविता के भविष्य पर चिंता व्यक्त की थी । उसी रामचंद्र शुक्ल ने आगे चलकर कविता के भविष्य पर कभी कहा थाः अंतःप्रकृति में मनुष्यता को समय-समय पर जगाते रहने के लिए कविता मनुष्य जाति के साथ लगी चली आ रही है और चली चलेगी । (कविता क्या है?) अब यह साफ-साफ दोहरायी जा सकती है कि जब तक मनुष्य स्वयं को मनुष्य होने इनकार नहीं कर देगा, तब तक कविता उसके आसपास होगी ही । और शायद मनुष्य ऐसे समय की नींव नहीं रखना चाहेगा ।

                पाठक गण यदि मुझे अपने अनुभव की बात रखने का अवसर दें तो मैं यही कहना उचित समझूँगा कि कविता मेरे लिए उस हद तक जरुरी है जिस हद तक श्वाँस-प्रश्वाँस । जब भी मेरे सामाजिक मन की परोपकारी आकाँक्षा अपूर्ण रह जाती है, मन अधूरेपन से भर जाता है, चारों तरफ अवसाद, उकताहट और व्यग्रता की जहरीली हवा व्याप्त हो उठती है । या जब भी कोई दृश्य, कोई पात्र, कोई घटना मुझे भीतर तक रोमांचित कर देती है कि दुनिया में अब भी शहद शेष है, मीठे पानी का स्त्रोत सुखा नहीं है तो मैं उसे शब्दों में सुरक्षित रखने के लिए बरबस उस ओर चल पड़ता हूँ जिसे कविता-कर्म कहते हैं । इस तरह से कविता मेरे लिए एक जरुरत भी है और उससे कहीं ज्यादा अपने को अभिव्यक्त करने की अनिवार्यता भी । ऐसे क्षणों में मुझे कभी भी इस बात का कोई ईल्म भी नहीं रहा कि मैं दुनिया को सुंदर बनाने के उद्योग में हूँ । पर उन्हीं क्षणों में सदैव इस बात का आभास होता रहा है कि मैं दुनिया में स्वयं को सुंदर बनाने के एक कुटीर उद्योग में जरूर हूँ । मुझे लगता है कविता कवि का निजी करतब या कर्तव्य है । करतब इसलिए कि कविता सबसे वश में नहीं । कर्तव्य इसलिए कि कविता आत्मसंधान प्रकारांतर से दुनिया की बेहतरी का मानसिक अनुसंधान है । एक मुकम्मिल तथ्य यह भी कि कविता अपने मौलिक परिप्रेक्ष्यों में कलात्मक संवाद है, न वाद न ही विवाद । इसमें भले ही कोई आलोचक किसी वाद या विवाद की सुराक ढूँढ़ ले । जब कोई कवि कविता लिखने से पहले यह तय करता होता है कि वह स्त्रीवादी रचना करेगा या दलितवादी, मार्क्सवाद तेवर का सहारा लेगा या जनवाद का, आधुनिकता को प्रोत्साहित करेगा या उत्तर-संरचनावाद को, तो वह एक तरह से व्याख्या की राजनीति का उत्पाद बनाता होता है सर्जन नहीं । मुझे इस बात से कतई कोई गुरेज़ भी नहीं कि ऐसी कविताओं में वे (कवि) किन्हीं माँगो की पूर्ति भी करते होते हैं । उनकी वे जाने । मैं ठहरा भावना का तरल इंसान । भावुकता तीव्रतम होकर जब-जब छलछला उठी तब-तब कविता कागज़ पर उतर पड़ी । कभी आधी, कभी पूरी । ऐसे क्षणों पर मुझे किसी वाद का पाठ या किसी आलोचक-गुरू का निर्देश याद नहीं रहता तो नहीं रहता । और अंततः मेरी कविता को कविता की ऊँचा पीढ़ा नहीं मिलता तो नहीं मिलता । इस सब के बावजूद एकाध पाठक से कोई प्रतिक्रिया मिल जाती है तो मुझे ख़ुद को कवि और रची गयी पँक्तियों को कविता कहने का मानसिक सुख भी मिल जाता है । मेरे लिए काव्यानंद की यही परिभाषा है और इस परिभाषा में मेरी कविताएँ मुद्रित रूप में मेरे सीमित पाठकों की है, मेरे पास-पड़ोस की है । कवि के रूप में यही मेरा समाज है और मेरी कविताएं उसकी सार्वजनिक संपत्ति भी ।

 

       पश्चिमी दुनिया (अब अपने देश और एशियाई मुल्कों को भी लें लें) में जैसे-जैसे मनुष्य का जीवन मशीन और कल पूर्जे के आत्मकलुष रंग में रंगता चला गया कविता प्रखरतम होती चली गई अपनी भाषा के तेज़ करते हुए । शब्दों में नया अर्थ भरते हुए । अपनी भूजाओं को और अधिक फैलाते हुए । समाजवादी खेमों के देशों में तंत्र की एकरसता को किसी ने ध्वस्त किया तो वह कविता ही है जिससे वहाँ लादी गई जीवनशैली से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सका । आज अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के छोटे-छोटे मुल्कों में ऐसी धारदार कविताएं रची जा रही हैं जिसे देखकर कहा जा सकता है कि बेहतर कविता वहाँ जीवित रहती है जहाँ समाज प्रतिकूल दौर से गुजर रहा हो और जनसंघर्ष तेज हो । कविता अब इधर प्रमुखतम् भाषाओं की कविता-क्षेत्रों में चले जायें तो वहाँ कविता की पहुँच नये-नये स्थलों तक संभव हुई है । अब तक के अनचीन्हें और संभावनारहित चीजें, दिनचर्या और उसके प्रसंग, घटनाएँ कविता के जद में आने लगी हैं ।

 

       दरअसल कविता की यात्रा अंतहीन है । उसकी दिशाएँ भी अनंत हैं । चेहरा में बहुलता । भूमिका में बहुलता । फिर भी कविता । एक ही समय में एक ही भाषा की कविताएँ कई समाजों में भिन्न-भिन्न दिशाओं में गतिमान होती है । यानी कि गति में बहुलता । हरि अनंत हरि कथा अनंता की भाँति । उदाहरण के लिए भक्तिकाल की ओर निहारते हैं यहाँ सगुण एवं निर्गूण धारा एक साथ प्रवहमान हैं । उसमें भी कहीं कृष्णमार्गियों की चौपालें है तो कहीं रामाश्रितों की बैठकें । अभी हाल के दशक की कविता को देखते तो भारतीय मिट्टी और प्रवासी ज़मीन से उपजी कविताओं का स्वर एवं स्थापत्य दोनों भिन्न-भिन्न नज़र आता है ।

 

 कविता भले ही कुछ कालावधि तक एकाँगी प्रतीत होती है । वस्तुतः ऐसा होता नहीं । वह पुराने डगर पर चलते हुए भी नये राहों की फ़िराक में रहती है । कविता सदा-सर्वदा नवोन्मेषी गुणगाह्यता के लिए उद्यत होती है । क्योंकि मनुष्य और उस नाते कवि सदैव नयी गति का आग्रही होता है । और शायद यही वह रहस्य है, जिससे पाठक अपने तमाम उबासी, उकताहट एवं निरर्थकता के अभिज्ञान के बावजूद कविता के परिसर में खींचा चला आता है । जैसे मूसलाधार वारिश के बीच कोई छत हो कविता । जैसे कविता प्रचंड धूप में हरे भरे गाछ की छाँह हो । जैसे कविता बर्फीली सर्दी में अँगीठी ही हो ।

 

चलिए, हिंदी कविता को इन्हीं सब परिप्रेक्ष्यों में कसते हैं । हिंदी कविता का फलक समृद्धि की और है । हिंदी कविता गढ़ो एवं किलाओं के बंधन से मुक्त होकर जनपद तक जा पहुँची है । वह अब सिर्फ मेट्रोपेलोटिन शहरों या राजधानियों में ही नहीं लिखी जा रही, अपितु सुदूर आदिवासी अंचल यथा- बस्तर, झाबुआ, झारखंड, भवानीपट्टनम और जैसलमैर से भी अपने संपूर्ण सरोकारों के साथ खड़ी हो रही है । बिलकुल नये कवियों के साथ-साथ प्रतिष्ठित या स्थापित कवियों (वैसे मैं नहीं जानता कि कोई कैसे स्थापित होता है ? )के कविता संकलन छोटे-छोटे शहरों-कस्बों से भी प्रकाशित और चर्चित होते देखा जा सकता है । और उधर न केवल हिंदी संस्कृति से प्रभावित देशो- मारीशस, फिजी, सूरीनाम, वेस्टइंडीज में बल्कि इग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, आदि पश्चिमी देशो से भी हिंदी कविता के संकलन निरंतर निकल रहे हैं । इसमें प्रवासी भारतीयों की सक्रियता निःसंदेह महत्वपूर्ण है (जो आलोचकों के सूरदासत्व के कारण अब भी मूल्याँकन का बाट जोह रही हैं ।) पाठ, समीक्षा गोष्ठी, परिचर्चा, और संवाद के मामले में हिंदी कविता अन्य विधाओं को अब भी पीछे रखे हुए है । सबसे सुखद प्रसंग यह कि जिस उन्नत प्रौद्योगिकी के केंद्र-बिंदुः संगणक एवं अंतरजाल को साहित्य एवं अन्य कला माध्यमों के लिए गंभीर खतरा बताया जा रहा था वहाँ भी हिंदी कविता के पृष्ठों की संख्या अन्य विधाओं की तुलना में अधिक है । ऐसे समय में, जब चरम पूँजीवाद, बाजारवाद और उत्तरआधुनिक दृष्टि कलाओं और मनुष्यों के मध्य स्थापित अंतरगता संबंध एवं अवधि को लगातार छीन रही है, कम महत्वपूर्ण नहीं कि- तथाकथित कम महत्वपूर्ण लेखक और संपादक प्रिंट और इलेक्ट्रानिक कमप्यूटर मीड़िया पर लगातार कविता को प्रतिष्ठित कराने के उद्यम में सलंग्न हैं । यह हाईटेक समय के मानव विलोम होने की संभावना के विरूद्ध भी मात्र कवि-चेष्टा नहीं, एक मानवीय चेष्टा भी है । मुख्यधारा अर्थात् विगत वर्षों की मुद्रित कविताओं को बाँचने से एक बात साफ तौर पर कही जा सकती है और वह है- कविता का नये लोक में प्रवेश । लोक के साथ नया विशेषण इसलिए कि लगता है समकालीन कविता ने वृहत्तर होने की ठान लिया है । ठीक उस तरह जिस तरह प्रगतिशील कविता सामूहिकता की पक्षधर हैं पर ठीक उस तरह नहीं जिस तरह प्रगतिशील कविता को सीमित कथ्य और सीमित माध्यम के खाँचे रख छोडा गया । हिंदी की समकालीन कविता लोक-संवेदना की पुनर्यात्रा है । नई कविता और साठोत्तरी कविता ने गाँवो-कस्बों को तज कर महानगर की ओर रुख किया हुआ था जबकि आज आज की कविता महानगर की कूड़ा-करकट से दूर हटकर गाँव-खेत-खलिहानों-चौपालों की ओर वापस हो रही है । इसे मात्र कवि का फैशन नहीं कहा जा सकता । यह धरती के प्रति कवियों की वास्तविक चिंता भी हो सकती है । कहीं यह वैश्विक ग्राम के खतरों को भाँपकर स्वयं को वास्तविक रूप में वैश्विक बनाने की चेष्टा तो नहीं ?

 अति हताशा से बचते हुए पुरानी पीढ़ी को सोचना होगा कि क्या कविता की लोकप्रियता यह नहीं है ? उत्तेजक बहसों की अतियों और थोथी निष्पत्तियों के तर्क को रखकर अन्य विधाओं के बरक्स कविता को केंद्र से परे देखना शायद एकांगी होगा । अब यह दीगर बात है कि न केवल कथित नामी पत्र-पत्रिकाओं से साहित्य गायब होता चला गया है बल्कि ऐसी कई प्रतिष्ठान ही ध्वस्त होते चले गये हैं । पाठक के मानस में कविता के प्रति तल्लीनता को मीडिया के धूमधड़ाकों ने अपदस्थ कर दिया है । स्कूली-महाविद्यालयीन पाठ्यक्रमों की स्थायी नीरसता ने नवशिक्षितों के मन में  हिंदी कविता के आग्रह को न्यूनतम् कर दिया है । नवसाक्षर समाज की मनोरंजनी मानसिकता के कारण इधर आये दिन मंचीय कविता का व्यापार खूब फला-फूला है पर उसने श्रेष्ट कविता के लिए वातावरण रचने के बजाय समूचे परिदृश्य को ही कलुषित कर दिया है । और तो और कविता का प्रभाव समाज पर कमतर हुआ है । इसे हम कविता की चुनौती के रूप में लेते भी हैं तो मुक्तिबोध के शब्दों में हम केवल साहित्य की दुनिया में ही नहीं, वास्तविक दुनिया में रहते हैं । इस जगत् में रहते हैं । साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा रखना मूर्खता है।”  जो भी हो, चाहे कला रूप में, चाहे भाषा सामर्थ्य के नाते, या फिर मनुष्य की अनंत स्वप्न-आकांक्षाओं की विविधवर्णी अभिव्यक्ति के रूप में कविता हर समय हर समाज में  अपनी आमद दर्ज कराती रहेगी । और कवि भी यह कहता हुआ किः

 

कवि हमेशा संसार का देनदार रहता है

व्यथाओं में व्याज और ज़ुर्माने अदा करता हुआ

मैं देनदार हूँ/ राजपथ की रोशनियों का

बगदादी के आसमानों का

लालफौज का / जापान के चेरीवृक्षों का

 

और उन सबका

जिनके बारे में मैं लिख नहीं सका

 

पर यह काव्यात्मक पक्षपात क्यों

कि तुकें लक्ष्य हों

और लयें विश्रृंखल हो जायँ

कवि के शब्द तुम्हारा पुनर्जीवन हैं

           (मायकोव्सकी)

जयप्रकाश मानस

 

 

 

 
 

       'भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है।' - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरणकथोपकथनभाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिक्शेष-विशेषपुरातनअंकअभिमत

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ