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पापा जल्दी घर आना
छोड़ अकेले हमको मम्मी
बाहर कभी न जाना ।
ड्यूटी करके तुम भी पापा
जल्दी ही घर आना ।।
सूना-सूना घर लगता है

हमें न कुछ भी भाता ।
खेल-खिलौने पाठ पुस्तकों
से भी मन घबराता ।।
टीव्ही.,
टेप, रेडियो कुछ भी
मन बहला न पाते ।
खाने, गाने उछलकूद भी
तुम बिन नहीं सुहाते ।।
तंग न करेंगे पापा-मम्मी
भले न कुछ भी लाना
छोड़ अकेले हमको दोनों
बाहर कभी न जाना ।।
जीवन सिंह ठाकुर

नन्ही मुन्नी
चिल्लाती है नन्हीं मुन्नी
मम्मी-मम्मी
ओ री मम्मी
।
मैंने काटी नहीं चिकोटी
फिर भी भैया खींचे चोटी
।

अब देखो है मुझे चिढ़ाता
तान अँगूठा मुँह बिचकाता
।
मुझसे अपना काम कराता
संग अपने पर नहीं खिलाता
।
जल्दी से इसको समझाओ
चाहे तो इक चपत लगाओ
।
पर पापा से कुछ नहीं कहना
आखिर मैं हूँ इसकी बहना ।

रवि
बेचारा,
काम का मारा
सुबह होने को आई है
हल्की सी तरूणाई है
।
काला कंबल फैंक रवि ने
ली पहली अंगड़ाई है
।
अभी उठ कर मुस्काएगा
चाँद सा मुख दिखलाएगा
।
धुली धूप को धारण कर
काम पर फिर लग जाएगा
।
किरणों को बिखराएगा
रस्तों को चमकाएगा
।

देहरी-देहरी दस्तक देकर
घर-घर
में घुस जाएगा
।
ओस की परत हटाएगा
कलियों को महकाएगा
।
जीवन को जीवित रखने में
अपना कर्त्तव्य निभाएगा
।
जब पहर दूसरा आएगा
वो उकता कर झुंझलाएगा
।
नाक चढ़ा और भंवें सिंकोड़
धीरे-धीरे गर्माएगा
।
घूरेगा,
धमकाएगा
कहीं लू की चपत लगाएगा
।
धरती के रोने सुबकने पर
वो पिघल के कुछ नरमाएगा
।
मन ही मन अकुलाएगा
खिसियाकर आँख झुकाएगा
।
सांझ की मीठी घुड़की सुनकर
कोने में छिप जाएगा
।
हाय,
कोई न उसे मनाता है
थक कर वो घर जाता है
।
रत्ना सोनी

बादल
सेमल रुई
सा कोरा बादल
वर्फ़ सा
गोरा-गोरा बादल
श्वेत
अश्व सा छैला बादल
पर्वत की
श्रृँखला बादल
बंदर सा
फ़ुर्तीला बादल

दुल्हन सा
शर्मीला बादल
झील सा
गहरा-गहरा बादल
रेत सा
बिखरा-बिखरा बादल
बच्चे सा
सहम गया बादल
काजल सा
फैल गया बादल
दादी के
बालों सा बादल
दादा की
मूँछों सा बादल
कलफ़ लगी
पगड़ी सा बादल
रेशम की
चुनरी सा बादल
ऐंठे हुए
दूल्हे सा बादल
टूटे हुए
झूले सा बादल
हिरनी के
छौने सा बादल
लंबे से
बौने सा बादल
ले युद्ध
लड़ा लश्कर बादल
नासमझ और
नश्वर बादल
लो घिर
आया आकुल बादल
मुझ सा
झक्की व्याकुल बादल
दिव्या माथुर

चन्दा मामा
चन्दा
मामा हमें बुलाना
।
अपना सुंदर शहर दिखाना ।।

हमें
नहीं मालूम तुम्हारा,
कैसा सुंदर ठौर ठिकाना ।।
नदियाँ
पर्वत घाटी कैसी,
कैसा जीवन हमें सुनाना ।।
कुदरत
का तू बड़ा अजूबा,
सुब्बी तेरा गाती गाना ।।
अगर
कहीं बस्ती बस जाये, धरती का कुछ भार घटाना ।।
दादी
तुमको खूब चाहती,
बच्चों ने है मामा माना ।।
चट्टानों से ऐसा लगता,
वर्षों से है रहा बेगाना ।।
मानव के
अब पैर पड़े हैं, परी लोक
की सैर कराना ।।
कीर्ति कुसुम

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