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कवींद्र-रवींद्र और उनके विमर्श

प्रकाशन :शनिवार, 7 मई 2011
कृष्ण कुमार यादव

भारतीय संस्कृति के शलाका पुरूषों में रवींद्रनाथ टैगोर का नाम प्रतिष्ठापरक रूप में अंकित है। वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जो जीती-जागती किंवदंती बन गए। साहित्यकार-संगीतकार-लेखक-कवि-नाटककार-संस्कृतिकर्मी एवं भारतीय उपमहाद्वीप में साहित्य के एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता के अलावा उनकी छवि एक प्रयोगधर्मी और मानवतावादी की भी है। तभी तो शब्द और संगीत के इस विलक्षण साधक के लिए पं0 हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा कि - श्बड़ा आदमी वह होता है जिसके संपर्क में आने वाले का अपना देवत्व जाग उठता है। रवींद्रनाथ ऐसे ही महान पुरूष थे। वे उन महापुरूषों में थे जिनकी वाणी किसी विशेष देश या संप्रदाय के लिए नहीं होती, बल्कि जो समूची मनुष्यता के उत्कर्ष के लिए सबको मार्ग बताती हुई दीपक की भाँति जलती रहती है।श् वाकई रवींद्रनाथ टैगोर को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। उनकी रचनाधर्मिता का क्षितिज इतना विस्तृत है कि आज भी उनकी प्रासंगिकता जस-की-तस बरकरार है। कोई भी विधा उनकी लेखनी से अछूती नहीं रही। विभिन्न विधाओं में उन्होंने 141 पुस्तकें लिखीं, जो 27 खंडों में प्रकाशित र्हुइं। इनमें 15 काव्य-संकलन ;12,000 कविताएंद्ध, 11 गीत-संग्रह ;2000 गीतद्ध, 47 नाटक, 34 लेख-निबंध-अलोचना संग्रह, 13 उपन्यास, 12 कहानी-संग्रह, 6 यात्रा-वृतांत व 3 खण्डों में आत्मकथा शामिल हैं। रवींद्रनाथ की अधिकतर काव्य-रचनाएं ‘गीत-वितान‘ व ‘संचयिता‘ में संग्रहित हैं। यह एक अजीब संयोग है कि सभी विधाओं में समान अधिकार रखने वाले टैगोर को नोबेल पुरस्कार उनकी काव्य-कृ्ति 'गीतांजलि' पर मिला और आज भी साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे भारतीय उपमहाद्वीप के इकलौते साहित्यकार हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को बंगाल के जोरासांको में हुआ। वे एक ऐसे प्रतिष्ठित जमींदार परिवार से थे जिनकी योग्यता का डंका विदेशों में भी बजता था। तभी तो उनके दादा द्वारकानाथ ठाकुर की मौत पर लंदन के प्रतिष्ठित ष्द टाइम्सष् ने 3 अगस्त 1946 को लिखा कि- श् संभवतया भारत में द्वारकानाथ ठाकुर की टक्कर का कोई नहीं है, भले ही वह किसी पद या प्रतिष्ठा पर हो, जिसने अपने आस-पास खड़े लोगों की प्रगति और बेहतरी को इतनी उदारता से संरक्षण दिया हो। और हम यह भी विश्वास कर सकते हैं कि भारत व इंग्लैंड में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपनी वर्तमान सफलता और स्वतंत्रता के लिए द्वारकानाथ ठाकुर के अनुग्रह के प्रति कृतज्ञ न हों।श् इससे द्वारकानाथ ठाकुर की प्रतिष्ठा के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है। अरबी व फारसी के इस विख्यात अध्येता ने रूढ़िवादी मानसिकता से परे हटकर नए मानदंड विकसित किए और ऐसे समय में समुद्र्री यात्राएं की जब हिन्दू धर्म इसकी आज्ञा नहीं देता था। द्वारकानाथ ठाकुर के सबसे बड़े पुत्र देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने मात्र 18 वर्ष की आयु में गंगा-तट पर अपनी मौत के लिए प्रतीक्षारत दादी के सान्निध्य में रहते हुए जीवन के सत्य की प्राप्ति कर ली थी और उसके बाद भौतिक चकाचौंध से दूर वे अध्यात्म की ओर उन्मुख हो गए। इसके बाद वे ष्महर्षिष् नाम से विख्यात हुए। ऐसे ही महर्षि-मनीषी द्वारकानाथ ठाकुर और माता शारदा देवी की 14वीं संतान के रूप में रवींद्रनाथ का जन्म हुआ। रवींद्रनाथ ने एक ऐसे परिवार में जन्म लिया जहाँ परंपराएं व संस्कार थे तो आधुनिकता भी थी। भौतिकता की चकाचौंध थी तो अध्यात्म का परिवेश था, तभी तो उनकी आठवीं तक की शिक्षा घर पर ही हुई और आगे की शिक्षा के लिए वे इंग्लैण्ड भेजे गए। प्राचीन वैदिक साहित्य के साथ ही पाश्चात्य दर्शन का प्रभाव भी उनके खून में था। संगीत-कला-साहित्य की अनुगूंज वातावरण में सर्वत्र विद्यमान थी, यूँ ही सात वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने जीवन की पहली कविता नहीं रच डाली। स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि-श्मेरा परिवार हिन्दू सभ्यता, मुस्लिम सभ्यता एवं ब्रिटिश सभ्यता की त्रिवेणी था।

रवींद्रनाथ टैगोर पर अपने परिवार की सामासिक संस्कृति का बचपन से ही गहरा प्रभाव पड़ा। सांवले चेहरे के बीच उनकी आँखें मानो हर पल कुछ ढँूढना चाहती थी। कुछ आत्म, कुछ परमात्म और इससे भी परे जीवन की विसंगतियों को देखकर विचलित होने का भाव। यही कारण है कि उनका विलक्षण व्यक्तित्व एकांगी नहीं बल्कि बहुआयामी रहा। एक साथ ही उन्होंने साहित्य, संगीत, चित्रकला, नाट्य, शिक्षा सभी में महारत हासिल की। रवीन्द्र सिर्फ विधाओं के ही यायावर नहीं थे बल्कि जीवन में भी यायावर थे। उन्होंने 13 बार विश्व भ्रमण किया। ‘रवीन्द्र-संगीत‘ की गणना आज भी बंगाल की लोकप्रिय संगीत-शैलियों में होती है। रवींद्रनाथ के गीतों के अनुवाद जर्मनी फ्र्रांस, जापान, इटली आदि में किए गए हैं। इटली के कुछेक चित्रकारों ने तो उनके गीतों के आधार पर चित्र रचना तक की है। तभी तो कहते हैं कि रवींद्रनाथ जितना पढ़े गए हैं, उससे कहीं ज्यादा सुने गए हैं। खुद रवींद्रनाथ टैगोर ने ही एक बार कहा था-श् मैं निश्चित जानता हूँ कि भविष्य में मेरे कविता-कहानी-नाटक के साथ चाहे जो बीते, मेरे गीतांे को बंगाली समाज को ग्रहण करना ही होगा, मेरे गीत सबको गाने ही होंगे, बंगाल के घर-घर में सुदूर पथ पर, मैदानों में, नदी के तीर-तीर। मैंने देखा है मेरे गीत जैसे मेरे अचेतन मन से बरबस निकले हैं और इसीलिए उनमें एक संपूर्णता है।श् वाकई आज बंगाल में कोई भी अनुष्ठान या समारोह उनके गीतांे के बिना पूरा नहीं होता। उनके गीतों में माधुर्य भी है और ओज भी। यहाँ तक कि चासॅर के पूर्वजों की भांति उन्होंने अपने शब्दों को स्वयं संगीतबद्ध भी किया। नोबेल पुरस्कार विजेता आयरिश कवि डब्लयू0 वी0 यीट्स, जिन्होंने ‘गीतांजलि‘ की भूमिका लिखी, ने दर्ज किया कि-”ये गीत-काव्य कितने भाव-प्रवण, लयात्मक और अत्यन्त विदग्धतापूर्ण हैं। उनमें रंग, मौलिकता और विचार की इतनी सूक्ष्मता है कि उनको अनुवाद में व्यक्त नहीं किया जा सकता.......ये सदियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा के प्रतीक हैं, जहाँ काव्य और धर्म एकरूप हैं।” आज भी टैगोर की रचनाओं के पुनर्वेषण के स्वतरू स्फूर्त प्रयास निरंतर चल रहे हैं। उनकी रचनाएं कल भी मनुष्य को झकझोरती थीं और आज भी झकझोर रही हैं। सत्यजीत रे जैसे दिग्गज फिल्मकार ने उनकी रचनाओं पर चारूलता, घरे बाहिरे व तीन कन्या जैसी शानदार फिल्में बनाई तो राजा, रक्तकरबी, विसर्जन, डाकघर जैसी नाट्यकृतियों का मंचन आज भी उतना ही प्रासंगिक दिखाई देता है। यहाँ तक कि अपने रंग-जीवन के अंतिम वर्षों में हबीब तनवीर जैसे विख्यात निर्देशक ने भी ष्राजरक्तष् नाम से टैगोर के नाटक ष्विर्सजनष् की मंच प्रस्तुत की और उसे आरंभिक प्रदर्शन के बाद मांजते रहे। वाकई पीढ़ियों के अंतराल के बाद भी रवींद्रनाथ टैगोर की कृतियों का मंचन-संचयन यही दर्शाता है कि उनकी कृतियों की नई व्याख्याओं की गुंजाइश सदैव बनी रहेगी और वे अपनी प्रासंगिकता कभी नहीं खोएंगी। ऐसे में जो लोग रवींद्रनाथ टैगोर की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते है, उन्हें भी रवींद्रनाथ के पक्ष में बहने वाली बयार चकित-विस्मित करती रहती हैं। अगर आज भी रवींद्रनाथ के गीतों-कविताओं को गायक-गायिकाएं सजा-सँवार रहे हैं, उनके नाटक नए सिरे से खेले जा रहे हैं, ष्काबुलीवालाष् और अन्य कहानियाँ लोगों के मर्म को छू रही हैं, ष्गोराष् जैसे उपन्यास नए विमर्श और पाठ के लिए उकसाते हैं, उनका बाल-साहित्य बहुतों का मन मोहता है, उनकी कृतियों को लेकर डाक-टिकट जारी हो रहे हैं तो यह मानना पड़ेगा कि टैगोर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं एवं वे हर समय हमारे सम्मुख नित नए रूपों में अवतरित होते रहते हैं। यहाँ टैगोर के बाल-साहित्य पर लिखे डब्लयू0 बी0 यीट्स के शब्द गौर करने लायक हैं-”वस्तुतः जब वह बच्चों के विषय में बातें करते हैं तो निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि वह संतांे के विषय में भी बात नहीं कर रहे हैं।”

एक जमींदार परिवार से होते हुए भी रवींद्रनाथ उदार दृष्टि के थे। 1891 में जब पहली बार वे जमींदार के रूप में शिलाईदह इलाके में गए तो बैठने के लिए की गई आसन व्यवस्था को हटाकर सभी के साथ समान स्तर पर बैठे। ग्राम-सुधार के वे प्रबल समर्थक रहे और किसानों के बीच रहकर स्वयं उन्होंने खेती की व उनके दर्द को महसूस किया। उनका कवि-मन जीवन की सहजता में विश्वास करता था। वे लोगों से घुलने-मिलने और उनकी जीवन-संस्कृति को समझने की कोशिश करते थे। फिर वह चाहे मुंडा आदिवासियों के मध्य रहकर उनकी संस्कृति को समझना हो, ग्राम हितैषी सभा के माध्यम से गाँवों में स्कूल, अस्पताल आदि की स्थापना हो, ग्राम संसद के तहत पंचायती राज को मूर्त रुप देना हो या नोबेल पुरस्कार में प्राप्त धन को शांतिनिकेतन को दान देकर उससे भारत के प्रथम कृषि बैंक की स्थापना हो। रवींद्रनाथ एक भविष्यदृष्टा थे। उनके कार्यो को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। उनका जीवन इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि मनुष्यता में उनकी अगाध आस्था थी। उन्होंने स्वर्ग-नरक से परे कहा कि देवता मंदिर में नहीं मनुष्यत्व में हैं। वे नारी-सशक्तिकरण के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ‘काव्ये उपेक्षिता‘ शीर्षक से एक बेहद धारदार निबंध लिखा, माना जाता है कि मैथिलीशरण गुप्त इस निबंध से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने साकेत, विष्णुप्रिया एवं यशोधरा जैसे अनुपम काव्य-ग्रंथों की रचना कर डाली और इनमें उपेक्षिता नारी को महिमामंडित कर उन्हें महत्वपूर्ण स्थान दिया। रवींद्रनाथ ने नारी-सशक्तीकरण, नारी शिक्षा, विधवा विवाह, दहेज प्रथा, बाल-विवाह, देवदासी इत्यादि को लेकर प्रखरता से कलम चलाई। रक्तकरबी, गोरा, श्यामा, चंडालिका, चोखेर-बाली, पुजारिनी, घरे बाइरे इत्यादि उनकी चर्चित रचनाओं को इसी क्रम में देखा जा सकता है। टैगोर की संवेदनाएं सिर्फ साहित्य-कला-संगीत तक ही सीमित नहीं थीं, वे उसे वास्तविकता के धरातल पर देखना चाहते थे। इसी कारण मानवीय गरिमा और और सम्मान के कवि रूप में वह सकल विश्व में विख्यात हैं। विज्ञान में वे विश्वास करते थे पर नैतिकता की कीमत पर नहीं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ उनकी मित्रता जगजाहिर है। संप्रदायवाद के विपरीत वे धर्मनिरपेक्षता के कायल थे। ईश्वर के संबंध में वे प्रभु-दास नहीं बल्कि प्रिय-प्रियतमा भाव की कल्पना करते थे। उनका मानना था कि-””मनुष्य को इच्छाशक्ति प्रदान करके ईश्वर ने अपनी सर्वशक्तिमत्ता को सीमित कर दिया है। उसने किसी हद तक मनुष्य को स्वतंत्र कर दिया है और इस स्वातंन्न्य के क्षेत्र में ईश्वर अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करता। स्वाधीनता के क्षेत्र में प्रभु और दास सम्बंध नहीें, वरन प्रियतम के साथ प्रेमी का मिलन है। यहीं ईश्वर की सबसे महान अभिव्यक्ति है।“

रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा पर बहुत जोर था। शिक्षा के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाकर वे उसे समग्र व्यक्तित्व-विकास से जोड़ना चाहते थे। उनके मत में शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमारी भाषा और जीवन के साथ हमारे हृदय में उठने वाले भावों का भी ठीक तरह से उचित समन्वय कर सके। 1901 में स्थापित शांतिनिकेतन रवींद्रनाथ टैगोर जी के जीवन दर्शन उनके अद्भुत कार्यो और शिक्षा के क्षेत्र में उनके अनोखे माडल को प्रदर्शित करता है। एक तरह से देखा जाय तो शांति निकेतन भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में तपोवन परंपरा की वापसी और मानवीय विचारधारा के समावेश की बानगी पेश करता है। एक ऐसे समय में जब बंगाल ब्रिटिश शासन और जातपात का दंश झेल रहा था उस समय रवींद्रनाथ टैगोर जी ने धार्मिक और क्षेत्रीय बाधाओं से परे शांतिनिकेतन नामक ऐसी शिक्षण संस्था का आधार तैयार किया जो मानवीयता, अन्तराष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों और मुक्त पाठ्यक्रम पर आधारित थी। गौरतलब है कि शांति निकेतन के हिंदू बहुल क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद सौ वर्ष पहले वहाँ प्रत्येक पाँच में से तीन शिक्षक ईसाई थे और महिलाओं को भी शिक्षण कार्य में प्रोत्साहित किया जाता था। टैगोर ने आमिर-गरीब के साथ लिंगभेद को भी दूर करते हुए आम आदमी को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया था। शान्तिनिकेतन की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्थापना के दूसरे वर्ष में ही इस शिक्षण संस्था को जापान से पहला विदेशी छात्र मिला और बाद में वैदिक, पुराण, इस्लाम, बौद्ध, जैन इत्यादि सम्बंधित विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। यही नहीं टैगोर ने स्कूल के संबंधों को स्थानीय समुदाय से भी जोड़ने का प्रयास किया और संथाल समुदाय में शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया। गौरतलब है कि मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा, 1948 से पहले ही शांति निकेतन में अन्तराष्ट्रीय मानवीय मूल्यों की आधारशिला रखी गई और वहाँ पर्यावरण संरक्षण के साथ ही महिला सशक्तिकरण और समावेशी पहल पर जोर दिया गया।

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  कृष्ण कुमार यादव
कृष्ण कुमार यादव,
निदेशक डाक सेवा,
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-7441.1
kkyadav.y@rediffmail.com
 
         
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