आजादी
के बाद के भारत के इतिहास पर लिखी गई पुस्तकों की सीमा रही है कि इनके लेखकों पर जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार की दृष्टि हावी रही। उन्होंने विपक्ष की विचारधारा को ऐतिहासिक विकास के आकलन में या तो लिया ही नहीं या फिर सरसरी तौर पर उल्लेख करते हुए उसका उपयोग अपने पूर्वग्रहों की पुष्टि के लिए किया।संभवत: इसका कारण रहा कांग्रेस के समांतर चली समाजवादी धारा द्वारा नेहरू की नीतियों का विरोध- खासकर राममनोहर लोहिया द्वारा- जिनका नेहरू से प्रभावित बुद्धिजीवियों ने तिरस्कार और बहिष्कार किया। यहां तक कि राजधानी के प्रमुख पुस्तकालयों और शोध केंद्रों में भी लोहिया का साहित्य या कांग्रेस के समांतर चली समाजवादी धारा का तीस वर्षों का साहित्य उपलब्ध नहीं रहा। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे विश्वविद्यालयों और शोध केंद्रों में शोध और इतिहास लेखन का स्तर क्या रहा होगा।
यह सही है कि इतिहास में अधिकतर शासकों का ही गुणगान हुआ है, मगर इसे ही सही मान कर निकाले गए निष्कर्ष कितने अधूरे होते हैं इस बात का अनुमान तभी लगेगा जब हम कांग्रेस के इतिहास को समाजवादी आंदोलन के इतिहास के साथ-साथ पढ़ेंगे। इस प्रकार के अध्ययन को संभव बनाने के लिए मेरठ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस गिरिजा शंकर ने अथक परिश्रम कर चार खंडों में समाजवादी आंदोलन का इतिहास प्रस्तुत करने की योजना बनाई है। इसके अलावा आचार्य नरेंद्र देव की रचनाओं के सात खंड, जयप्रकाश नारायण की रचनाओं के आठ खंड और राममनोहर लोहिया की रचनाओं के हिंदी और अंग्रेजी में नौ-नौ खंड उपलब्ध हैं। आशा है इस साहित्य के परिप्रेक्ष्य में स्वाधीन भारत के इतिहास पर नया प्रकाश पडेगा, जिसके आलोक में भविष्य की पीढ़ियां इतिहास का सम्यक मूल्यांकन कर सकेंगी।
वर्ष 1934 से लेकर (जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई) 1948 तक (जब सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस से अलग हुई) कांग्रेस और समाजवादी धाराएं मिल कर बह रही थीं, हालांकि दोनों का रंग संगम में गंगा-जमुना की तरह अलग-अलग दिखाई दे रहा था। दोनों के बीच मतभेद आजादी के निकट आने के समय उभरने लगे। जहां कांग्रेस के नेता संघर्ष से थक कर समझौते की मन:स्थिति में थे और किसी भी कीमत पर सत्ता अपने हाथ में लेना चाहते थे, वहीं समाजवादी नेता संघर्ष को जारी रख कर संपूर्ण आजादी प्राप्त करना चाहते थे। गांधीजी का झुकाव भी समाजवादियों की ओर था।
जब 1947 के कानपुर सम्मेलन में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस शब्द हटाया गया, तो कांग्रेस में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई, मगर गांधीजी ने जयप्रकाश से इतना ही कहा कि तुम लोगों के लिए मुश्किल होगी। नेहरू चाहते थे कि समाजवादी कांग्रेस में रहें, जिसकी एक वजह यह थी कि समाजवादी कांग्रेस में रह कर पटेल धडे के मुकाबले नेहरू के धडे को मजबूत करते थे। इसी इच्छा से प्रेरित होकर नेहरू ने जयप्रकाश नारायण पर कांग्रेस के साथ सहयोग के लिए जोर डाला, जो आगे चल कर समाजवादी आंदोलन की फूट का कारण बना। सोशलिस्ट पार्टी में लोहिया गुट और जयप्रकाश गुट का विभाजन कांग्रेस के नेताओं ने सोशलिस्ट पार्टी के कांग्रेस से अलग होने के बाद से ही मान रखा था। 21 जून, 1949 को पटेल को लिखे गए पत्र में नेहरू ने लिखा था: ‘सोशलिस्ट पार्टी में दो गुट हैं। एक बड़ा ग्रुप जो सरकार से सहयोग की दिशा में सोच रहा है और एक छोटा गुट जिसके नेता लोहिया हैं, जो समय-समय पर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करते हैं।’
स्वातंत्र्योत्तर इतिहास की एक विडंबना यह है कि कांग्रेस अपना नैतिक आधार खोती गई। इसकी शुरुआत 1949 में उत्तर प्रदेश जिला परिषद और कुछ विधानसभा सीटों के उपचुनावों में हुई, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के प्रोत्साहन पर कांग्रेसियों ने समाजवादियों के खिलाफ सांप्रदायिक भावनाएं भुनाने जैसे हथकंडों का प्रयोग किया। जब जयप्रकाश ने इसकी शिकायत नेहरू से की तो नेहरू ने पंत को लिखा: ‘‘जयप्रकाश नारायण कुछ अवसरों पर गुमराह हो जाते हैं और अक्सर गैरजिम्मेदारी से काम भी करते हैं। मगर जिन लोगों को मैं जानता हूं उनमें वे सबसे खरे और अच्छे लोगों में हैं। यदि सच्चरित्रता मायने रखती है तो उनका बहुत महत्त्व है। यह मुझे दु:खांत-सा लगता है कि उनके जैसे व्यक्ति परिस्थितियोंवश दिशाहीन हो गए हैं।’’
हिंद किसान पंचायत के तत्त्वावधान में गेंदा सिंह के नेतृत्व में हुए किसान सत्याग्रह के अवसर पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने सत्याग्रह को अनुचित बताते हुए कहा था कि स्वतंत्र देश में सत्याग्रह का कोई औचित्य नहीं है। इस पर नरेंद्र देव ने लास्की, थोरो और गांधी के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि जब साधारण वैधानिक उपाय विफल हो जाते हैं तो शांतिपूर्ण अहिंसात्मक आंदोलन और सत्याग्रह का ही मार्ग शेष बचता है।
इस पुस्तक से एक तथ्य यह उभर कर सामने आता है कि अविभाजित सोशलिस्ट पार्टी में नेताओं के बीच पूर्ण मतैक्य न भी सही, काफी हद तक सहमति होती थी। पार्टी की विदेश नीति पर लोहिया की छाप स्पष्ट दिखती थी। संभवत: इसका प्रारूप तैयार करने का काम लोहिया को इसलिए सौंपा जाता था, क्योंकि आजादी से पहले वे कांग्रेस के विदेश विभाग में रहे और तब उसकी विदेश नीति गढ़ने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। लोहिया की विश्व पंचायत, विश्व सरकार और विश्व विकास प्राधिकरण योजनाओं के बीज भी सोशलिस्ट पार्टी के 1947 के पार्टी वक्तव्य में मौजूद हैं, जिस पर सभी समाजवादी नेताओं की सहमति थी। श्रम के प्रतिफल की समानता का सिद्धांत भी उसी नीति-वक्तव्य में शामिल था, जिसे लोहिया का विशेष योगदान माना जाता है।
ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में बने रहने के नेहरू सरकार के फैसले पर सभी समाजवादी नेताओं को आपत्ति थी। नेहरू ने 14 अप्रैल, 1949 के अपने पत्र में जयप्रकाश को लिखा था कि ब्रिटेन के साथ इस प्रकार जुड़ने से देश को बहुत व्यावहारिक लाभ होगा। इस पर जब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में (मई 1949) आपत्ति की गई तो नेहरू चिढ़ कर बोले, ‘सोशलिस्ट्स, वे तो प्रतिक्रियावादियों का समूह है’। बाद में नेहरू को इसका नरम शब्दों में स्पष्टीकरण जयप्रकाश को पत्र में देना पड़ा। नेहरू की राष्ट्रमंडल संबंधी नीति के विरोध में कमला देवी चट्टोपाध्याय ने एक पुस्तिका लिखी। इस सारी नोक-झोंक का परिणाम यह हुआ कि 1949 में लंदन में हुए राष्ट्रमंडल के प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में नेहरू ने इस शर्त के साथ राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वीकार की कि भारत ब्रिटिश ताज की निष्ठा से मुक्त सार्वभौम, स्वतंत्र गणराज्य के रूप में ही सदस्य रह सकता है। माउंटबेटन ने इसे ‘फैमिली अरेंजमेंट’ कहा। मगर पिछले साल संपन्न हुए राष्ट्रमंडल खेलों का इंग्लैंड के राजकुमार द्वारा उद्घाटन (राष्ट्रपति की उपेक्षा कर) राष्ट्रमंडल की वास्तविकता को सामने लाता है।
गोवा, नेपाल, तिब्बत और हिमालयी क्षेत्र के संबंध में भी समाजवादी नेताओं में पूर्ण मतैक्य रहा। नेपाल में राणाओं के निरंकुश शासन के विरुद्ध नेपाली कांग्रेस के लिए हथियार प्राप्त करने की खातिर जयप्रकाश ने भोला चटर्जी को पत्र देकर बर्मा के उपप्रधानमंत्री उफ बा स्वे के पास भेजा था और लोहिया ने पटेल से अनुरोध किया था कि इन हथियारों को बिना जांच नेपाल जाने दिया जाए। सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की 22 नवंबर, 1950 की नागपुर बैठक में तिब्बत नीति पर लोहिया द्वारा प्रस्तुत नोट को सर्वसम्मति से पास किया गया, जिसमें कहा गया था कि भाषा, लिपि, रहन-सहन, जमीन का ढलाव, इतिहास तथा लोकेच्छा, इन कसौटियों पर तिब्बत चीन का हिस्सा हरगिज नहीं है और तिब्बत चीन से अधिक भारत के नजदीक है। इस नीति पर सभी सोशलिस्ट नेताओं की सहमति थी, मगर अधिकतर इसे लोहिया के साथ ही जोड़ कर देखा जाता है। प्रमुख समाजवादी नेताओं के समग्र प्रकाशित होने और गिरिजा शंकर द्वारा समाजवादी आंदोलन का इतिहास प्रस्तुत किए जाने के बाद स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास का पुनर्मूल्यांकन जरूरी है।


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