मेरे पिछले लेख का शीर्षक था ,”हिन्दी किसकी है”, ,इसका उत्तर खोजने पर यही लगा कि हिन्दी हम सभी भारत वासियों की है। हिन्दी भाषा के प्रचार और प्रसार के लियें हिन्दी भाषी राज्यों को पहला क़दम उठाना होगा। सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि हमारे बच्चे हिन्दी का सम्मान करे, इसके लियें अंग्रेज़ी का परित्याग करने की भी आवशयकता नहीं है, ,आवश्यक है तो यह कि शिक्षा और पाठ्यक्रम मे मूलभूत परिवर्तन किये जांये। हिन्दी भाषी राज्यों मे और अहिन्दी भाषी राज्यों मे पाठ्यक्रम निर्धारित करने के लिये मापदण्ड एक नहीं हो सकते, इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी क्षेत्रों की आवश्यक्तायें भी अलग अलग हैं।
उत्तर भारत के छोटे बड़े शहरों मे अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा देने वाले तथाकथित पब्लिक स्कूलों, इंटरनैशनल कहलाने वाले या कौनवैन्ट स्कूलों की भरमार है,, वंही ग्रामीण क्षेत्रों मे स्कूलों का ही अभाव है ,वहाँ शिक्षकों और बुनयादी सुविधाओं की बेहद कमी है। शहरों मे भी जो लोग मंहगे स्कूलों मे अपने बच्चो को नहीं पढ़ा सकते उनके लिये सरकारी स्कूल है पर वहाँ भी शिक्षा का स्तर सतोषजनक नहीं है।
हिन्दी भाषी राज्यों मे हिन्दी माध्यम के स्कूल हों, चाहें अंग्रेजी माध्यम के अक्षर ज्ञान हिन्दी से ही शुरू करना चाहिये। तीसरी कक्षा तक केवल अंक गणित और हिन्दी पढानी चाहिये। हिन्दी विषय के अंतर्गत ही थोड़ी बहुत सामाजिक ज्ञान और विज्ञान की जानकारी कुछ पाठों मे दी जा सकती है। चौथी कक्षा से अंग्रेजी भी पढानी चाहिये क्योंकि एकदम अंग्रेजी को हटा देने से छात्रों को आगे जाकर कठिनाई हो सकती है। अंग्रेज़ी पढाई जाये परन्तु मातृ भाषा का मूल्य देकर नहीं। पाँचवी कक्षा तक हिन्दी अंग्रेज़ी और अंक गणित के अतिरिक्त कोई और विषय इस स्तर पर पढाना ज़रूरी नहीं है। बच्चों का भाषा ज्ञान अच्छा होगा तो आगे चलकर सभी विषय समझना सरल होगा। भाषा सही हो, छात्र अपनी जानकारी को सही तरह अभिव्यक्त कर सकें, ,आरंभिक शिक्षा का यही उद्देश्य होना चाहिये।
माधयमिक स्तर पर हिन्दी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूल हिन्दी मे शिक्षा देंगे ही,,पर कम से कम आठवीं कक्षा तक अंग्रजी भी एक विषय के रूप मे पढाना फ़िलहाल अनिवार्य होना चाहिये जिससे ये छात्र चाँहें जो भी व्यवसाय अपनायें थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी लिख पढ़ सकें,, जिन छात्रों को कोई छोटा मोटा व्यवसाय करना है, कोई दुकान ग्रामीण क्षेत्र मे खोलनी है या चतुर्थ श्रेणी की नौकरी ढूँढनी है, ,वे अपनी क्षमता देखकर निर्णय ले सकते हैं कि वे आगे अंग्रेजी पढे या नहीं। अंग्रेज़ी के विकल्प के रूप मे उन्हे या तो कोई क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई जा सकती है या कोई व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा सकता है। हिन्दी भाषा(साहित्य नहीं) हिन्दी और अंग्रेज़ी माध्यम दोनो ही प्रकार के विद्यालयों मे बारहवीं कक्षा तक अनिवार्य होनी चाहये। कक्षा 11 और 12 मे हिन्दी साहित्य एक वैकल्पिक विषय होना चाहिये।
हिन्दी माध्यम से पढने वाले छात्रों को भले ही अंग्रज़ी अनिवार्य रूप से आठवीं कक्षा के बाद न पढाई जाय पर वैकल्पिक विषय के रूप में अंग्रज़ी भाषा और साहित्य पढ़ने का प्रावधान होना चाहिये जिससे हिन्दी माध्यम से पढ़ने वाले छात्र अपनी क्षमता के अनुसार उच्च शिक्षा से केवल इसलियें न वंचित रह जांय कि उनकी शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई थी। फ़िलहाल वख्त का तक़ाज़ा यही है कि हमे हिन्दी के साथ साथ अंग्रेज़ी की भी ज़रूरत है, इससे हमे कोई नुकसान भी नहीं है, ,बल्कि अतंराष्ट्रीय स्तर पर लाभ ही है,, पर जब विदेशी भाषा अपनी भाषा को निगलने लगे,, उसका रूप विकृत करने लगे तो भाषा की नीति पर विचार करना ज़रूरी है, अब वह समय आगया है।
आजकल जिस प्रकार से शिक्षा दी जा रही है उसमे भाषा का महत्व ही समाप्त हो गया है। अंग्रेज़ी माध्यम मे पढने वाले छात्रों का हिन्दी ज्ञान ही नहीं अंग्रेज़ी का ज्ञान भी अच्छा नहीं है, कारण यही है कि उन्हे हर विषय मे छोटे छोटे रटे रटाये उत्तर देने होते हैं। लीक से हटकर सोचने और लिखने की क्षमता का न विकास होता है न आज़ादी। सैम्पल पेपर के अनुसार सीमित परिधि मे उत्तर की अपेक्षा की जाती है। कुँजियो से वैसा का वैसा रटकर 90-95 प्रतिशत अंक यदि भाषा मे मिल जांय तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उस छात्र को अपनी भाषा पर अधिकार है, वह अपने विचारों को सही तरह से अभिव्यकत कर सकता है।
हिन्दी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों मे अधिकतर सरकारी या नगर निगम के स्कूल हैं , यहाँ शिक्षा के स्तर मे सुधार की बहुत आवश्यकता है। भाषा मे सबसे पहले सभ्यता लाना ज़रूरी है। भौंडे और अश्लील शब्द (गालियाँ) यदि छात्र प्रयोग मे लायें तो शिक्षक हर मुमकिन कोशिश करके छात्रों को सभ्य भाषा बोलने और लिखने के लियें प्रेरित करें।
हिन्दी भाषी राज्यों मे बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद छात्रों को सही,, सरल व व्याकरण सम्मत हिन्दी मे किसी भी विषय मे अपने विचार लिखने मे या दूसरों के विचार पढने मे कठिनाई नहीं होनी चाहिये, भले ही उन्होने श्रेष्ठ कवियों या लेखकों की रचनायें न पढी हों, पर मातृभाषा का व्यावाहरिक ज्ञान होना आवश्यक है।
अलग अलग क्षेत्रों की अलग अलग आवश्यकतायें और सीमायें हैं। हिन्दी के प्रचार और प्रसार के लियें पूरे देश मे एक से स्तर नहीं बनाये जा सकते। वैसे भी शिक्षा की नीतियाँ बनाना राज्य सरकारों के क्षेत्र मे आता है। हिन्दी के साथ साथ सभी प्रदेशों की भाषायें अपने अपने क्षेत्रों मे बोली जाँये व पढाई जांये। स्थानीय भाषा मातृभाषा की तरह और हिन्दी संपर्क भाषा की तरह पढाने पर ज़ोर होना चाहिये। अधिकतर राज्यों मे काम चलाऊ हिन्दी काफ़ी लोग जानते हैं जिसका अधिकतर श्रेय हिन्दी फ़ल्मों को जाता है। हिन्दी के प्रति कहीं भी विरोध के स्वर नहीं उठें यह ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की है, किसी को भी नहीं लगना चाहिये कि हिन्दी उनपर थोपी जा रही है, यदि किसी राज्य मे ऐसी संभावना नज़र आये तो हिन्दी को वैकल्पिक विषय ही रहने देना चाहये। धीरे धीरे हिन्दी का सम्मान और उपियोगिता नज़र आने पर सबका झुकाव उसकी ओर बढेगा।
सब अहिन्दी भाषी राज्यों मे लोग स्वेच्छा से हिन्दी सीखें और उन्हें हिन्दी सीखने के लियें अपनी मातृभाषा से भी कोई समझौता न करना पड़े। हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोग सही साफ़ सुथरी हिन्दी बोलें, पढें, लिखें और समझें ये बहुत ज़रूरी है। हिन्दी की भी कई विभाषायें और बोलियाँ है जिनमे बहुत मिठास है।बोलचाल की भाषा या साहित्य के लियें भी ये बहुत उपयोगी हैं। हिन्दी के विद्वानो ने खड़ी बोली को हिन्दी के मानक रूप मे मान्यता दी है, इसलिये हर क्षेत्र के लोगों को पढने के माध्यम या एक भाषा के रूप मे खड़ी बोली को ही अपनाना आवश्यक है।
हिन्दी भाषी राज्यों के लोग सही व्याकरण सम्मत भाषा बोलें और लिखें, पर अहिन्दी भाषी राज्यों के लोगों से ये अपेक्षा नहीं की जा सकती। उनकी भाषा पर उनकी मातृभाषा का प्रभाव होना स्वाभाविक है ,वे हिन्दी सीखने का प्रयत्न करें, ,उसका सम्मान करें और उसे संपर्क भाषा के रूप मे स्वीकार कें यही बहुत है।
हिन्दी और क्षेत्रीय भाषा के साथ साथ सब स्कूलों मे अंग्रेज़ी भी वैकल्पिक विषय मे पढाई जाती रहे। बारहवी कक्षा उत्तीर्ण करने तक सबको हिन्दी क्षेत्रीय भाषा और अंग्रज़ी मे से सुविधा,, योग्यता, ,क्षमता और आवश्यकता के अनुसार तीन मे दो भाषाओं का इतना व्यवाहरिक ज्ञान हो कि उन्हे इन भाषाओं को बोलने पढने लिखने मे कोई कठिनाई नहो।
यदि ऐसा होता है तो उच्च शिक्षा का माध्यम हिन्दी को बनाने मे दिक्क़त नहीं होगी।कुछ विश्वविद्यालय कुछ विषयों मे हिन्दी माध्यम से शिक्षा दे भी रहे हैं। अंग्रेजी का कम ज्ञान होना भी किसी की उन्नति मे बाधक न बने इसलियें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये भी भारतीय भाषाओं मे लिखित परीक्षाओं और साक्षात्कार देने का विकल्प होना चाहिये।
धीरे धीरे यदि हम हिन्दी की स्थिति को सुधार सके तो विज्ञान और तकनीकी शिक्षा भी हिन्दी माध्यम से देने मे समर्थ हो सकेगें।बस अपना दृष्टिकोण बदलना पडे़गा,, अपनी भाषा से प्रेम करना होगा उसे सम्मान देना होगा, तब ‘हिन्दी दिवस’ या ‘हिन्दी सप्ताह’ मनाने की आवश्यकता ही नहीं होगी हर दिन हिन्दी दिवस होगा।
नाम - बीनू भटनागर
पता - ए-104 अभयन्त अपारटमेंट, वसुंधरा एनक्लेव, दिल्ली - 110096
दूरभाष - 01147072765, 9891468905
इ-मेल – tanuja11@gmail.com
उत्तर भारत के छोटे बड़े शहरों मे अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा देने वाले तथाकथित पब्लिक स्कूलों, इंटरनैशनल कहलाने वाले या कौनवैन्ट स्कूलों की भरमार है,, वंही ग्रामीण क्षेत्रों मे स्कूलों का ही अभाव है ,वहाँ शिक्षकों और बुनयादी सुविधाओं की बेहद कमी है। शहरों मे भी जो लोग मंहगे स्कूलों मे अपने बच्चो को नहीं पढ़ा सकते उनके लिये सरकारी स्कूल है पर वहाँ भी शिक्षा का स्तर सतोषजनक नहीं है।
हिन्दी भाषी राज्यों मे हिन्दी माध्यम के स्कूल हों, चाहें अंग्रेजी माध्यम के अक्षर ज्ञान हिन्दी से ही शुरू करना चाहिये। तीसरी कक्षा तक केवल अंक गणित और हिन्दी पढानी चाहिये। हिन्दी विषय के अंतर्गत ही थोड़ी बहुत सामाजिक ज्ञान और विज्ञान की जानकारी कुछ पाठों मे दी जा सकती है। चौथी कक्षा से अंग्रेजी भी पढानी चाहिये क्योंकि एकदम अंग्रेजी को हटा देने से छात्रों को आगे जाकर कठिनाई हो सकती है। अंग्रेज़ी पढाई जाये परन्तु मातृ भाषा का मूल्य देकर नहीं। पाँचवी कक्षा तक हिन्दी अंग्रेज़ी और अंक गणित के अतिरिक्त कोई और विषय इस स्तर पर पढाना ज़रूरी नहीं है। बच्चों का भाषा ज्ञान अच्छा होगा तो आगे चलकर सभी विषय समझना सरल होगा। भाषा सही हो, छात्र अपनी जानकारी को सही तरह अभिव्यक्त कर सकें, ,आरंभिक शिक्षा का यही उद्देश्य होना चाहिये।
माधयमिक स्तर पर हिन्दी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूल हिन्दी मे शिक्षा देंगे ही,,पर कम से कम आठवीं कक्षा तक अंग्रजी भी एक विषय के रूप मे पढाना फ़िलहाल अनिवार्य होना चाहिये जिससे ये छात्र चाँहें जो भी व्यवसाय अपनायें थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी लिख पढ़ सकें,, जिन छात्रों को कोई छोटा मोटा व्यवसाय करना है, कोई दुकान ग्रामीण क्षेत्र मे खोलनी है या चतुर्थ श्रेणी की नौकरी ढूँढनी है, ,वे अपनी क्षमता देखकर निर्णय ले सकते हैं कि वे आगे अंग्रेजी पढे या नहीं। अंग्रेज़ी के विकल्प के रूप मे उन्हे या तो कोई क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई जा सकती है या कोई व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा सकता है। हिन्दी भाषा(साहित्य नहीं) हिन्दी और अंग्रेज़ी माध्यम दोनो ही प्रकार के विद्यालयों मे बारहवीं कक्षा तक अनिवार्य होनी चाहये। कक्षा 11 और 12 मे हिन्दी साहित्य एक वैकल्पिक विषय होना चाहिये।
हिन्दी माध्यम से पढने वाले छात्रों को भले ही अंग्रज़ी अनिवार्य रूप से आठवीं कक्षा के बाद न पढाई जाय पर वैकल्पिक विषय के रूप में अंग्रज़ी भाषा और साहित्य पढ़ने का प्रावधान होना चाहिये जिससे हिन्दी माध्यम से पढ़ने वाले छात्र अपनी क्षमता के अनुसार उच्च शिक्षा से केवल इसलियें न वंचित रह जांय कि उनकी शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई थी। फ़िलहाल वख्त का तक़ाज़ा यही है कि हमे हिन्दी के साथ साथ अंग्रेज़ी की भी ज़रूरत है, इससे हमे कोई नुकसान भी नहीं है, ,बल्कि अतंराष्ट्रीय स्तर पर लाभ ही है,, पर जब विदेशी भाषा अपनी भाषा को निगलने लगे,, उसका रूप विकृत करने लगे तो भाषा की नीति पर विचार करना ज़रूरी है, अब वह समय आगया है।
आजकल जिस प्रकार से शिक्षा दी जा रही है उसमे भाषा का महत्व ही समाप्त हो गया है। अंग्रेज़ी माध्यम मे पढने वाले छात्रों का हिन्दी ज्ञान ही नहीं अंग्रेज़ी का ज्ञान भी अच्छा नहीं है, कारण यही है कि उन्हे हर विषय मे छोटे छोटे रटे रटाये उत्तर देने होते हैं। लीक से हटकर सोचने और लिखने की क्षमता का न विकास होता है न आज़ादी। सैम्पल पेपर के अनुसार सीमित परिधि मे उत्तर की अपेक्षा की जाती है। कुँजियो से वैसा का वैसा रटकर 90-95 प्रतिशत अंक यदि भाषा मे मिल जांय तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उस छात्र को अपनी भाषा पर अधिकार है, वह अपने विचारों को सही तरह से अभिव्यकत कर सकता है।
हिन्दी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों मे अधिकतर सरकारी या नगर निगम के स्कूल हैं , यहाँ शिक्षा के स्तर मे सुधार की बहुत आवश्यकता है। भाषा मे सबसे पहले सभ्यता लाना ज़रूरी है। भौंडे और अश्लील शब्द (गालियाँ) यदि छात्र प्रयोग मे लायें तो शिक्षक हर मुमकिन कोशिश करके छात्रों को सभ्य भाषा बोलने और लिखने के लियें प्रेरित करें।
हिन्दी भाषी राज्यों मे बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद छात्रों को सही,, सरल व व्याकरण सम्मत हिन्दी मे किसी भी विषय मे अपने विचार लिखने मे या दूसरों के विचार पढने मे कठिनाई नहीं होनी चाहिये, भले ही उन्होने श्रेष्ठ कवियों या लेखकों की रचनायें न पढी हों, पर मातृभाषा का व्यावाहरिक ज्ञान होना आवश्यक है।
अलग अलग क्षेत्रों की अलग अलग आवश्यकतायें और सीमायें हैं। हिन्दी के प्रचार और प्रसार के लियें पूरे देश मे एक से स्तर नहीं बनाये जा सकते। वैसे भी शिक्षा की नीतियाँ बनाना राज्य सरकारों के क्षेत्र मे आता है। हिन्दी के साथ साथ सभी प्रदेशों की भाषायें अपने अपने क्षेत्रों मे बोली जाँये व पढाई जांये। स्थानीय भाषा मातृभाषा की तरह और हिन्दी संपर्क भाषा की तरह पढाने पर ज़ोर होना चाहिये। अधिकतर राज्यों मे काम चलाऊ हिन्दी काफ़ी लोग जानते हैं जिसका अधिकतर श्रेय हिन्दी फ़ल्मों को जाता है। हिन्दी के प्रति कहीं भी विरोध के स्वर नहीं उठें यह ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की है, किसी को भी नहीं लगना चाहिये कि हिन्दी उनपर थोपी जा रही है, यदि किसी राज्य मे ऐसी संभावना नज़र आये तो हिन्दी को वैकल्पिक विषय ही रहने देना चाहये। धीरे धीरे हिन्दी का सम्मान और उपियोगिता नज़र आने पर सबका झुकाव उसकी ओर बढेगा।
सब अहिन्दी भाषी राज्यों मे लोग स्वेच्छा से हिन्दी सीखें और उन्हें हिन्दी सीखने के लियें अपनी मातृभाषा से भी कोई समझौता न करना पड़े। हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोग सही साफ़ सुथरी हिन्दी बोलें, पढें, लिखें और समझें ये बहुत ज़रूरी है। हिन्दी की भी कई विभाषायें और बोलियाँ है जिनमे बहुत मिठास है।बोलचाल की भाषा या साहित्य के लियें भी ये बहुत उपयोगी हैं। हिन्दी के विद्वानो ने खड़ी बोली को हिन्दी के मानक रूप मे मान्यता दी है, इसलिये हर क्षेत्र के लोगों को पढने के माध्यम या एक भाषा के रूप मे खड़ी बोली को ही अपनाना आवश्यक है।
हिन्दी भाषी राज्यों के लोग सही व्याकरण सम्मत भाषा बोलें और लिखें, पर अहिन्दी भाषी राज्यों के लोगों से ये अपेक्षा नहीं की जा सकती। उनकी भाषा पर उनकी मातृभाषा का प्रभाव होना स्वाभाविक है ,वे हिन्दी सीखने का प्रयत्न करें, ,उसका सम्मान करें और उसे संपर्क भाषा के रूप मे स्वीकार कें यही बहुत है।
हिन्दी और क्षेत्रीय भाषा के साथ साथ सब स्कूलों मे अंग्रेज़ी भी वैकल्पिक विषय मे पढाई जाती रहे। बारहवी कक्षा उत्तीर्ण करने तक सबको हिन्दी क्षेत्रीय भाषा और अंग्रज़ी मे से सुविधा,, योग्यता, ,क्षमता और आवश्यकता के अनुसार तीन मे दो भाषाओं का इतना व्यवाहरिक ज्ञान हो कि उन्हे इन भाषाओं को बोलने पढने लिखने मे कोई कठिनाई नहो।
यदि ऐसा होता है तो उच्च शिक्षा का माध्यम हिन्दी को बनाने मे दिक्क़त नहीं होगी।कुछ विश्वविद्यालय कुछ विषयों मे हिन्दी माध्यम से शिक्षा दे भी रहे हैं। अंग्रेजी का कम ज्ञान होना भी किसी की उन्नति मे बाधक न बने इसलियें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये भी भारतीय भाषाओं मे लिखित परीक्षाओं और साक्षात्कार देने का विकल्प होना चाहिये।
धीरे धीरे यदि हम हिन्दी की स्थिति को सुधार सके तो विज्ञान और तकनीकी शिक्षा भी हिन्दी माध्यम से देने मे समर्थ हो सकेगें।बस अपना दृष्टिकोण बदलना पडे़गा,, अपनी भाषा से प्रेम करना होगा उसे सम्मान देना होगा, तब ‘हिन्दी दिवस’ या ‘हिन्दी सप्ताह’ मनाने की आवश्यकता ही नहीं होगी हर दिन हिन्दी दिवस होगा।
नाम - बीनू भटनागर
पता - ए-104 अभयन्त अपारटमेंट, वसुंधरा एनक्लेव, दिल्ली - 110096
दूरभाष - 01147072765, 9891468905
इ-मेल – tanuja11@gmail.com


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