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शासक वर्ग और शासित वर्ग में से प्रथम वर्ग में लोगों की संख्या कम होती है, परंतु समस्त राजनीतिक कामकाज को यही वर्ग अंजाम देता है। सारी सत्ता केवल उसी हाथों में केंद्रित होती है। वह सत्ता के लाभों को प्राप्त करने में रस लेता है। इसके विपरीत दूसरा वर्ग बहुसंख्यक है। यह पहले वर्ग द्वारा कभी कमोबेश वैधानिक तरीकों से, तो कभी कम या अधिक स्वेच्छाचारपूर्ण एवं हिंसक तरीकों से चालित-नियंत्रित होता है…।अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक समाज पर केवल इसलिए राज कर पाता है, कि वह संगठित है।—गायतानो मोस्का, दि रूलिंग क्लॉस
2014 में भाजपा की जीत के नायक मोदी जी थे। जीत इतनी शानदार थी कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे पार्टी के दिग्गज नेता नेपथ्य में खिसका दिए गए। इसे परिणाम कहें कि दुष्परिणाम, जो सरकार पूरे देश की मानी जाती है, उसे ‘मोदी सरकार’ कहा जाने लगा। कुछ नेता जीतकर भी पराजित नजर आए। राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश में अति-पिछड़ी जातियां को पार्टी से जोड़कर बड़ा काम साधा था। जिससे भाजपा की जीत की असली इबारत लिखी गई—‘हर-हर मोदी—घर-घर मोदी’ के नारों के बीच वह भी फीका पड़ गया। पूरी भाजपा मोदीमय थी। नतीजा यह हुआ कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद जिन राजनाथ सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के बराबर का दावेदार माना जा रहा था, उन्हें दूसरे नंबर के पद से संतोष करना पड़ा। उसके बाद उपचुनाव हुए। भाजपा के लिए परिणाम आशा के विपरीत थे। बिहार, दिल्ली, केरल, पश्चिमी बंगाल जैसे प्रदेशों में वह कोई सफलता प्राप्त न कर सकी। सिवाय मीडिया के हर कोई मान चुका था कि मोदी का जादू उतार पर है। यहां तक कि पार्टी के भीतर से भी विरोधी स्वर उभरने लगे थे। कुछ नया करने की जरूरत थी। सो मीडिया को साधते हुए मोदीजी ने नोट-बंदी जैसा सबको हैरान-परेशान करने वाला कदम उठा लिया। चाहते तो फैसला लेकर रिजर्ब बैंक को आगे कर सकते थे। परंतु सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। नोटबंदी की सफलता से अधिक असफलताएं सामने आईं। नोट बदलने के लिए कतार में लगे 130 लोगों को जान गंवानी पड़ी। नकदी के अभाव में बाजार सूने पड़ गए। शहरों में काम करने वाले लाखों मजदूर, कारीगर बेरोजगार होकर अपने ‘देस’ लौट गए। सरकार की खूब आलोचना हुई। मीडिया बचाव करता रहा। सरकार कदम-कदम पर संवेदनहीन नजर आई। मोदी और पार्टी नेता चुप्पी साधे रहे।

फिर एक समय ऐसा आया जब मोदी और मीडिया एक ओर थे, पूरा विपक्ष दूसरी ओर। यहां तक कि भाजपा के अपने ही लोग दबे स्वर में नोटबंदी के कदम को आत्मघाती बताने लगे थे। मानो सब कुछ सोची-समझी नीति के अनुसार हो। मोदी न केवल नोटबंदी को राष्ट्रहित में बताकर उसके लाभ गिनाते रहे, बल्कि विधानसभा चुनावों से ऐन पहले बेनामी संपत्ति का मसला उठाकर उन्होंने एक और धमाका कर दिया था। हर बार की भांति इस बार भी पूरा विपक्ष दो-फाड़ नजर आया। एक ओर मीडिया और मोदी। दूसरी ओर अपने आप से हैरान-परेशान विपक्ष जो सिवाय मोदी की आलोचना के बाकी सब मुद्दों पर विभाजित था। राजनीति के बड़े-बड़े पंडित समझ ही नहीं पाए कि नोटबंदी जैसे आत्मघाती कदम के तुरंत बाद बेनामी संपत्ति का मुद्दा उठाना मोदी तथा उनके सहयोगियों की चाल हो सकती है। मोदी यदि भ्रष्टाचार से सचमुच लड़ना चाहते तो सरकार के पास स्विस बैंक के खाताधारों की सूची तैयार थी। उनपर कार्रवाही करते; या फिर जांच एजेंसियों के माध्यम से भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाते; जैसा कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था। असल में वह आने वाले विधानसभा चुनावों में जनमत को ‘मोदी बनाम गैर-मोदी’ में बांट देने की कूटनीति थी, जिसमें वे कामयाब नजर आए। पूरा चुनाव मुद्दों के बजाय व्यक्तियों पर केंद्रित रहा। उसमें बाजी मोदी के हाथ लगनी थी, सो लगी।

लोकतंत्र में चुनावों का लोकहितकारी मुद्दों के बजाय कुछ चेहरों पर केंद्रित होकर रह जाना, अपने आपमें त्रासदी है। उसमें जनता के सवाल गौण हो जाते हैं। चूंकि चेहरों की स्पर्धा में मीडिया की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, इसलिए मीडिया से गठजोड़ से वास्तविक चेहरों के स्थान पर कठपुतलियां चुनावी समर में कब उतार दी जाती हैं, जनसाधारण को पता ही नहीं चलता। हाल के विधानसभा चुनावों में तो पक्ष-विपक्ष दोनों ही मुद्दों के साथ चुनावों में उतरने की हिम्मत खो चुके थे। भाजपा के लिए यह सबसे सुरक्षित मोर्चा था। उसे पूरा विश्वास था कि चुनाव को ‘मोदी बनाम अन्य’ कर देने से हिंदुत्व की सोच रखने वाला मतदाता, घुटनों के बल चलकर भी भाजपा को वोट देने आएगा। विरोधी मत जहां अलग-अलग हिस्से में बंट जाएंगे, वहीं समर्थन में इतने मत निकल आएंगे कि जीत का जश्न मनाया जा सके। इसी फार्मूले के तहत लड़े गए पिछले लोकसभा चुनाव में केवल 31 प्रतिशत मत पाने वाली भाजपा की जीत को धमाकेदार माना गया था, क्योंकि शेष 69 प्रतिशत मत अलग-अलग दलों में बंटकर बेअसर हो चुके थे।

यह समझना मुश्किल नहीं है कि जो भाजपा 2014 में विकास के मुद्दे के साथ आई थी, वह विधानसभा चुनावों को व्यक्तित्वों की लड़ाई में बदल देने को क्यों उत्सुक थी। दरअसल अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में सिवाय पुरानी योजनाओं को आधे-अधूरे मन से आगे बढ़ाने के सरकार कुछ खास नहीं कर पाई है। पार्टी नेता जानते थे कि बढ़ती बेरोजगारी, सकल उत्पादन और व्यापार में गिरावट, मुद्रा स्फीति जैसे कई विषय हैं, जिन्हें विपक्ष उठाने लगा तो जवाबदेही कठिन हो जाएगी। यही समस्या प्रांतीय सरकारों के साथ भी थी। इसलिए वही हुआ जो भाजपा चाहती थी। चुनाव अभियान के दौरान एक-दूसरे को खूब अपशब्द कहे गए। शालीनता की सीमाएं पक्ष-विपक्ष दोनों ओर से जमकर लांघी गईं। जुबानी लड़ाई में जीत प्रायः बड़बोले की होती है, वही इन चुनावों में हुआ।

उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत के कई कारण गिनाए जा सकते हैं। प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो भी भाजपा ने ये चुनाव ज्यादा सूझबूझ, कूटनीति, प्रबंधकीय कौशल तथा कार्यकर्त्ताओं के साथ बेहतर तालमेल से लड़े थे। जीत के लिए उसने हर वह पैंतरा आजमाया जिसे वह आजमा सकती थी। संघ समझता है कि भारत का आम मतदाता किसी भी प्रकार के अतिवाद को पसंद नहीं करता। उग्र हिंदूवाद समाज के एक वर्ग को पार्टी के पक्ष में संगठित रख सकता है, अपने दम पर सरकार नहीं बनवा सकता। अगर ऐसा होता तो लालकृष्ण अडवाणी पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते तथा अटलविहारी वाजपेयी को उनके पीछे कदम-से-कदम मिलाकर चलना पड़ता। उस समय संघ और पार्टी ने अटलविहारी वाजपेयी के नरमपंथी ‘मुखौटे’ के पीछे चुनाव लड़ा था। उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियों के मन में भाजपा को लेकर अविश्वास था। इसलिए सरकार बनाने के लिए अटलजी को दूसरे दलों की मदद लेनी पड़ी थी। पिछले कुछ दशकों में दलितों और पिछड़े वर्गों में फूट डालने के लिए जमकर चालें चली गईं। राजनीति में स्थायी दोस्ती-दुश्मनी नहीं होती। परंतु मीडिया ने मुलायम और माया को उनके मतभेदों के आधार पर इतना भड़काया कि दोनों उसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई मान बैठे। अतिपिछड़ों को पिछड़ों तथा महादलितों को दलितों से अलग कर देने की रणनीति 2014 में कामयाब रही। पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी को ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जिसकी हिंदुत्व के प्रति निष्ठा असंद्धिग्ध हो। मोदी की उग्र हिंदुवादी छवि तथा उनका घोषित रूप से पिछड़े वर्ग का होना उनकी दावेदारी को पुष्ट करता था। ध्यातव्य है कि मोदी की अपनी जाति हमेशा से पिछड़े वर्गों में शुमार नहीं थी। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वयं मोदी ने उसे पिछड़ी जातियों में शामिल किया था। कदाचित सोची-समझी दूरगामी रणनीति के तहत। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी जी का यह पिछड़ावाद दशकों से चली आ रही दलित एवं पिछड़ी जातियों की राजनीति में हलचल पैदा कर, जमे-जमाए दलित-पिछड़े नेताओं को किनारे कर देगा।

रणनीति के तहत बड़बोले भाजपाई नेता प्रायः उकसावे वाले बयान देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश लगातार करते रहते हैं। परंतु इन चुनावों के दौरान पार्टी अपेक्षाकृत शांत थी। इसलिए भी कि पूरा विपक्ष, विशेषकर उत्तरप्रदेश में, उसका मददगार बना था। वहां जीत के दावेदार दो प्रमुख दलों के बीच मुस्लिम मतों के लिए अलग तरह का दंगल जारी था। समाजवादी पार्टी का मानना था कि प्रदेश में उसे छोड़कर मुस्लिम मतदाताओं के लिए दूसरा कोई विकल्प नहीं है। लगभग सौ मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर बसपा भी एकमुश्त मुस्लिम मतों की उम्मीद लगाए बैठी थी। मायावती अपनी सभाओं में शान से बताती थीं कि उनकी पार्टी ने सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव में उतारे हैं। ऐसे दल के लिए जिसका गठन ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को पुष्ट करने के पीठिका पर हुआ हो, क्या ऐसा करना उचित था? प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 18 प्रतिशत है। टिकट दिए गए 24 प्रतिशत को। मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में छह प्रतिशत की बढ़ोत्तरी अतिपिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व में कटौती के बाद ही संभव थी। कुछ ऐसा ही सपा ने भी किया था। जबकि समीकरण चाहे जो रहे हों, ये दोनों दल जब-जब सत्ता में आए हैं, जीत में अतिपिछड़ी कही जाने वाली जातियों का बड़ा योगदान रहा है। पहले यह वर्ग कांग्रेस का मतदाता था। आगे चलकर सपा और बसपा के बीच झूलने लगा। दोनों दलों की मूल वैचारिकी, जो केवल नारेबाजी तक शेष बची है—सामाजिक न्याय से जुड़ी है। एक बरास्ते फुले-अंबेडकरवाद तो दूसरी राममनोहर लोहिया के माध्यम से। इसलिए दोनों दल बहुजन हितों की नुमाइंदगी का दावा कर सकते हैं। इस बार दोनों अतिपिछड़ों की ओर से उदासीन थे। मायावती को अपनी जाति के एक-मुश्त वोटों का भरोसा क्या मिला, उन्होंने बाकी दलित एवं अतिपिछड़े वर्गों की उपेक्षा करनी शुरू कर दी। सोचती थीं कि मुसलमानों को साध लिया तो सब सधते चले जाएंगे। नतीजा यह हुआ कि गैर जाटव दलित और अतिपिछड़ी जातियां बसपा से छिटकने लगीं, जिसका लाभ सीधे भाजपा को मिला।

इस तरह उत्तरप्रदेश में भाजपा को जीत सपा-बसपा ने थाली में सजाकर भेंट की है? जब ये तीनों पार्टियां प्रदेश के मुसलमानों को लुभाने के लिए एक किए थीं, भाजपा एक भी मुसलमान को टिकट न देकर, मतों के मौन धु्रवीकरण में लगी थी। जिन दिनों कांग्रेस के नेता प्रशांत किशोर के आगे दंडवत थे, संघ भाजपा के लिए प्रदेश में केसरिया कालीन बिछाने में लगा था। वैसे भी देश की सबसे बड़ी पार्टी का, उस पार्टी का जो स्वाधीनता समर से तपकर निकली हो, आंदोलन जिसका इतिहास रहा हो, वह अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से विश्वास खोकर चुनाव-प्रबंधकों की शरण में चली जाए, सीधे-सीधे उसके नेताओं के अपरिपक्व सोच और आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है।

भाजपा की जीत में सपा का योगदान भी कम नहीं हैं। मुलायम सिंह ने उसे अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के कारण गढ़ा था। लोहिया और समाजवाद का नाम पार्टी ठीक ऐसे ही इस्तेमाल करती है, जैसे कांग्रेस गांधी और गांधीवाद का। मुलायम सिंह के नेतृत्व में पार्टी में खूब परिवारवाद पनपा। आंतरिक कलह से जूझ रही समाजवादी पार्टी अपने परंपरागत वोटों के अलावा ब्राह्मणों और ठाकुरों को साधने में जुटी थी। यह कुछ ऐसा ही था जैसे अपने घर की रखवाली छोड़ दूसरे के घर में ताकझांक करना। उधर मीडिया प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में यह प्रचारित करने में जुटा था कि समाजवादी पार्टी के राज में केवल यादवों तथा बसपा के राज्य में सिर्फ जाटवों को लाभ पहुंचा है। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए मीडिया के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था। सपा और बसपा दोनों इसका खंडन सकती थीं। परंतु एक ने भी प्रतिवाद नहीं किया। कदाचित एकमुश्त जातीय मतों के लालच में वे इस भ्रम(!) को बनाए रखना चाहते थे। इससे अतिपिछड़े वर्गों का भरोसा इन दलों से टूटा और लगभग बिना किसी शर्त के वे भाजपा से जुड़ते चले गए। यह जानते हुए भीकि भाजपा के पास उनके लिए न तो कोई नया विचार है, न ही योजना। जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का समर्थन वह करती है, उसमें शूद्रों के लिए कोई सम्मानजनक स्थान नहीं है। बल्कि लोकतंत्र के बल पर जो अधिकार और अवसर उन्होंने प्राप्त किए हैं, उनके भी छिन जाने की संभावना है।

संघ के लिए राजनीतिक परिवर्तन उतना आवश्यक नहीं है, जितना कि सांस्कृतिक परिवर्तन। राजनीति उसके लिए सिर्फ औजार है, जिससे वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और प्रकारांतर में हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करना चाहता है। उसकी सारी प्रेरणाएं और विमर्श वर्ण-व्यवस्था समर्थक वेदादि ग्रंथों, स्मृतियां और महाकाव्यों से आते हैं। उस व्यवस्था में खुद को पिछड़ी जाति का बताने वाले मोदी को प्रधानमंत्री पद देना ‘आपद्धर्म’ हैं; जबकि आदित्यनाथ के हाथों में सत्ता आना उनका स्वाभाविक कर्म। यह अनायास नहीं है कि विगत चार-पांच वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति में सर्वाधिक स्पेस घेरने वाले मोदी इन दिनों मीडिया के फोकस से बाहर हैं। आदित्यनाथ उनसे कहीं अधिक स्पेस घेर रहे हैं।

2019 के चुनावों की तैयारी पर आदित्यनाथ का बयान दर्शाता है कि आने वाले समय में बहुत कुछ बदलने वाला है। लगता है, संघ मान चुका है कि ‘मोदी मैजिक’ से जितना काम लेना था, लिया जा चुका है? कि यह इशारों या प्रतीकों के माध्यम से बात करने का नहीं, सीधी कार्रवाही का समय है। उसके लिए योगी आदित्यनाथ ज्यादा उपयोगी सिद्ध होंगे। हो सकता है, अमेरिका में टं्रप का उभार इसकी तात्कालिक प्रेरणा हो। तो क्या मोदी पार्टी के लिए महज मुखौटे थे? ठीक ऐसे ही जैसे कभी अटल पार्टी के मुखौटे कहे जाते थे? सच तो यही है कि हिंदुत्व के जिस सांस्कृतिक परिक्षेत्र के रूप में संघ और भाजपा भारत की परिकल्पना करते हैं, उसमें एक शूद्र की नियति इससे अधिक हो ही नहीं सकती। अगर माहौल अनुकूल रहा तो संघ की अगली कोशिश संविधान का हिंदूकरण करने की होगी। एक तरह से मनुवाद की वापसी। यह कार्य आसान नहीं है। किंतु पिछड़ों और दलितों का बिखराव तथा उनके नेताओं के अहं का टकराव इसी तरह रहा तो दूर-भविष्य में यह असंभव भी नहीं हैं।