भाषा, संयम और धैर्य आदमी
को जानवर से अलग करने वाले उपकरण हैं। किसी विद्वान ने कभी कहा था कि आदमी एक सामाजिक पशु है। आदमी मूल रूप से जानवर ही है लेकिन उसकी सामाजिकता उसे जंगलीपन के अँधेरे में खो जाने से रोकती है। सामाजिक होने की सबसे बड़ी शर्त होती है, दूसरों की चिंता करना, उनके दुख-दर्द में शामिल होना, उनकी ख़ुशी और ग़म के लम्हों को पहचानना और उनमें अपनी उपस्थिति दर्ज कराना। यह सब प्रेम और करुणा के बिना संभव नहीं है। और यही वे मूल तत्व हैं जो आदमी को अन्य जानवरों से अलग करते हैं। यही उसे मनुष्य बनाते हैं। आजकल मनुष्यों की ही कमी होती जा रही है, मनुष्यता संकट में है। लोग केवल अपने बारे में सोचते हैं, अपने लाभ की चिंता करते हैं, अपने घर में ख़ुशी देखना चाहते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन जब वे अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों को नुकसान पहुँचाने की सीमा तक पहुँच जाते हैं, तो समस्या खड़ी होती है। यही चिंता की बात है। यही मनुष्य के भीतर जानवर का उदय है। इस दिशा में हम बहुत तेज़ी से भाग रहे हैं। महानगरों, शहरों, कस्बों और गाँवों को जंगल में बदलते जा रहे हैं। ऐसा जंगल, जहाँ हर कोई ख़तरे में है। सभी अपना जीवन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। जो ताक़तवर है, वह कमज़ोर को, उसके जीने के अधिकार को निगल लेना चाहता है। जो शक्तिशाली है, वही जीवित रहेगा, यही सिद्धांत जंगल में काम करता है, यही हमारे समाजों में भी काम कर रहा है। यही जंगलराज है और कहना न होगा कि हम उसी तरफ़ बढ़ रहे हैं।
सबको धन चाहिए। ठीक बात है। मेहनत करो और कमाओ। ख़र्च करो या संग्रह करो, कोई नहीं पूछेगा। पर नहीं, बिना मेहनत के धन चाहिए। फिर क्या रास्ता है। ईमानदारी से तो नहीं मिल सकता। ईमानदारी से तो जीवन चलता रहे, इसी में प्रसन्नता अनुभव की जा सकती है। पर जीवन चलने भर से कोई भी प्रसन्न नहीं दिखता। वह शानदार ढंग से चलना चाहिए। बंगला होना चाहिए, आलीशान गाड़ी होनी चाहिए। इतना धन होना चाहिए कि ऐश्वर्य-वैभव की, विलासिता की, ऐश की ज़िंदगी जी जा सके। हमारे देश की दिन-ब-दिन बिगड़ती राजनीति ने लोगों के मन में यह लोभ पैदा किया है। सभी देखते हैं कि सड़क पर अदने आदमी की तरह घूमने वाला एक नालायक बच्चा अचानक किसी पार्टी का पदाधिकारी बन जाता है और फिर कुछ ही महीनों में उसकी वेश-भूषा, उसका रहन-सहन, उसकी चाल-ढाल, सब कुछ बदल जाता है। उसके खुरदरे चेहरे पर लुनाई आ जाती है, उसके हाव-भाव में चमक पैदा हो जाती है। देखते ही देखते उसका टूटा-फूटा घर गिर जाता है, वहाँ कई मंजिला इमारत खड़ी हो जाती है, वह लंबी शानदार गाड़ी में चलने लगता है। मध्यवर्गीय परिवारों के लोग बच्चों को नौकरशाह बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर क्यों लगा रहे हैं? उनके साथ भी यही बदलाव घटता है। राजनीति और नौकरशाही मिल-बाँटकर ग़रीब जनता के हक़ को हज़म कर रहे हैं, उनके लिए बनने वाली सरकारी योजनाओं का धन दोनों हाथों से समेट रहे हैं। अब धनोपार्जन ही नैतिकता है। हर कोई किसी भी तरह येन-केन-प्रकारेण धन कमाना चाहता है।
यह लोभ इतना भयानक और विकराल होकर सामने आ रहा है कि लोग अपने लाभ के लिए दूसरों को केवल सामाजिक या आर्थिक ही नहीं बल्कि जान की क्षति भी पहुँचाने से नहीं चूक रहे। मिलावट, जमाखोरी, ठगी का साम्राज्य तेज़ी से फैल रहा है। नकली सामानों से बाज़ार पटा पड़ा है। फल, सब्जियाँ, खाद्यान्न सब कुछ मिलावटी है। कृत्रिम तरीक़े से सस्ते और ख़तरनाक रसायनों से दूध और घी बनाने की फ़ैक्ट्रियाँ चल रही हैं। नकली दवाइयाँ बाज़ार में पटी पड़ी हैं। लोग इतने निर्मम हो गये हैं कि मौत का सामान बेचकर रातोंरात अपनी तिजोरियाँ भर लेना चाहते हैं। कोई मरे तो अपनी बला से। हाल के वर्षों में राजनीति में अपराधियों का जिस तेज़ी से प्रवेश हुआ, उसके पीछे भी कुछ इसी तरह का लोभ काम कर रहा है। अपराधियों को साफ़ नज़र आता है कि तमाम राजनेता तो उनसे ज़्यादा धन बटोर रहे हैं और क़ानून उनके प्रति या तो मौन है या लाचार। राजनेताओं के बहुत सारे काम अपराधियों के खद्दर में उतर आने से आसान हो गये। इस नाते दोनों का गठजोड़ बहुत मज़बूत हुआ। क़ानून और न्याय का मूल तंत्र निहायत ग़ैर-ज़िम्मेदार है और काफ़ी हद तक अपराध और अपराधी के संरक्षण में जुटा हुआ है। आख़िर इस तंत्र में शामिल लोगों को भी तो ऐश की ज़िंदगी की अपनी आकांक्षा पूरी करनी है। थाने, चौकियों से लेकर पुलिस अफ़सरों के दफ़्तरों में क्या-क्या खिचड़ी पकती है, यह अब किसी से छिपा नहीं है। मीडिया का एक वर्ग भी इस लूट-तंत्र में बाक़ायदा हिस्सेदारी कर रहा है। सही मायने में तो दलालों ने सारी व्यवस्था का अपहरण कर लिया है और सब मिलकर लोगों की जेबें हल्क़ी करने में लगे हुए हैं। ग़रीब जनता मूक और कातर इस कंचन-कीर्तन को देख रही है जबकि मध्यवर्ग इसे अपनी नियति मानकर रिश्वत देकर अपने काम कराने के लिए अभिशप्त है। अमीरों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके पास दलालों, अपराधियों और घूसखोर अफ़सरों पर ख़र्च करने के लिए पर्याप्त पैसा है।
धन और सत्ता को अन्योन्याश्रय का संबंध है। सत्ता व्यक्ति को शक्ति देती है और शक्ति से आप किसी का उपकार भी कर सकते हैं और किसी को तबाह भी कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में इस तरह के उदाहरण बार-बार दिखायी पड़ते रहे हैं। सत्ता के लोभ ने राजनीति का चरित्र ही बदल दिया है। सैद्धांतिक विरोध और असहमति की जगह राजनेताओं में व्यक्तिगत शत्रुता की भावना देखी जा सकती है। यह भाव उनके समर्थकों में भी दिखायी पड़ता है। दरअसल राजनीति को अब जनकल्याण के माध्यम के रूप में नहीं देखा जाता बल्कि अपने स्वार्थों की पूर्ति के तंत्र के रूप में देखा जाता है। इसीलिए हर पार्टी सत्ता में पहुँचना चाहती है, हर नेता मंत्री बनना चाहता है। और एक बार वहाँ पहुँच जाने के बाद कीर्ति और कंचन के गुह्य द्वार अपने-आप खुल जाते हैं। बहुत कम नेता मिलेंगे, जो ईमानदारी से जनता की सेवा करने के लिए राजनीति में आये हों। राजनेताओं के पास अकूत धन कहाँ से आ जाता है। जीवन भर परम साधुत्व का लबादा ओढ़कर रहने वालों के पास भी जीवन की संध्या में करोड़ों की रक़म बच जाती है, जिसके लिए उनके परिजनों में द्वंद्व छिड़ जाता है। आशय स्पष्ट है कि सत्ता ताक़तवर और अमीर बनने की कुंजी है। इस कुंजी को हथियाने के लिए नेता सारी मर्यादाओं को ताक पर रख सकता है, अपनी भाषा को, अपने संयम को तलाक दे सकता है। यह हो भी रहा है। सदनों में मारपीट, जूते-चप्पल चलना आख़िर किस ओर संकेत करता है। जब हाथ में चप्पल, ग़मले, कुर्सी आ जायें तो समझना चाहिए कि व्यक्ति ने ख़ुद को भाषा में व्यक्त करने की संभावना खो दी है। यह पागलपन है, यही आदमी को जानवर हो जाना है।
ऐसी हालत में मीडिया पर बड़ी ज़िम्मेदारी है, पर मीडिया पर भी ज़्यादातर उन्हीं लोगों का नियंत्रण है, जो इस नकारात्मक बदलाव में कोई बुराई नहीं देखते। आख़िर उन्हें भी तो अपना व्यापार चलाना होता है, ज़्यादा से ज़्यादा पाठक और विज्ञापन जुटाने होते हैं। यह नज़रिया मीडिया को अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी से विचलित करके उसी अँधेरी सुरंग में जाने को विवश करता है, जहाँ सब केवल धन उगाहने में जुटे हैं। मीडिया की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता पर यदा-कदा ऊँगलियाँ उठती दिखायी पड़ती हैं लेकिन यह कहना ग़लत नहीं होगा कि वह अभी भी पूरी तरह स्खलित नहीं हुआ है। सर्वतोमुखी भ्रष्टाचार और सिद्धांतहीनतावाद के बावजूद मीडिया और ऊँची अदालतों में अभी साँस बाक़ी है। हमने देखा है कि रुचिका के परिजनों को न्याय दिलाने में, आयुषी के मामले में जाँच का पीछा करने में, मट्टो कांड को कब्र से बाहर घसीट लेने में, सांसदों को रिश्वत लेते पकड़ने में और इस तरह के तमाम ऐसे मामलों को न्याय की देहरी तक ले जाने में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जो अपराधियों और पुलिस की मिलीभगत से लगभग दफ़न ही कर दिये गये थे। टीआरपी और पाठक संख्या बढ़ाने की होड़ में हालाँकि मीडिया ने भी अपना चेहरा काफ़ी गंदा कर लिया है लेकिन उससे नाउम्मीद होने का कोई कारण नहीं दिखता। धीरे-धीरे हाल के वर्षों में मीडिया के भीतर एक और मीडिया जन्म ले रहा है, जो अपेक्षाकृत ज़्यादा स्वाधीन, उग्र और आक्रामक दिखता है लेकिन अभी उसके भविष्य के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। स्वतंत्रता जिस आत्मसंयम की माँग करती है, वह कठिन काम है। अगर यह नया मीडिया संयम, निर्लिप्तता और मानवीय मूल्यगत प्रतिबद्धता के साथ अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरा करने के रास्ते पर चल सका तो निश्चित ही यह एक सार्थक और ताक़तवर मंच की तरह उभरेगा। मीडिया को मनुष्य के लिए लड़ना है, इसलिए उसे अपनी स्वतंत्रता को संयमित रखना होगा, अपनी पक्षधरता बनाये रखनी होगी।

![Validate my Atom 1.0 feed [Valid Atom 1.0]](valid-atom.png)