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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-36, मई, 2009

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।। भाषांतर ।।

 

 

गंगाधर मेहेर की दो कविताएँ

(स्वभावकवि गंगाधर मेहेर - १८६२ - १९२४)

                            मूल उड़िया से हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

 

 अमृतमय

 

मैं तो बिन्दु हूँ

अमृत-समुन्दर का,

छोड़ समुन्दर अम्बर में

ऊपर चला गया था

अब नीचे उतर

मिला हूँ अमृत-धारा से ;

चल रहा हूँ आगे

समुन्दर की ओर

पाप-ताप से राह में

सूख जाऊँगा अगर,

तब झरूँगा मैं ओस बनकर

अमृतमय अमृत-धारा के संग

समा जाऊँगा समुन्दर में

( 'अर्घ्यथाली कविता-संकलन से )

 000

 

सीता-राम का दाम्पत्य प्रेम

सागर के प्रति
सरिता की गति
रहती स्वभाव से
जब शिला-गिरिसंकट
सामने विघ्न-रूप हो जाते प्रकट,
उन्हें लाँघ जाती ताव से

भूल जाती सब
पिछली व्यथाएँ सागर से मिलकर
दोनों के जीवन में तब
रहता नहीं तनिक-भी अन्तर

संयोग-वश यदि बीच में उभर
ऊपर को भेदकर
छिन्न कर डालता बालुका-स्तूप
सरिता और सागर के हृदय को किसी रूप;
वह स्रोतस्वती
मर तो नहीं सकती
सम्हालती अपना जीवन-भार
ह्रद-रूप बन हृदय पसार


कहता हूँ और एक बात,
तुमलोग मन के साथ
सब सम्मिलित होकर
चलो हृदय-सरोवर
उधर अनन्त दिनों तक
रमते रहोगे रस-रंग में अथक

वहाँ खिली है नयी पद्मिनी
मेरी जीवन-संगिनी
स्मरण का सूरज वहीं सदा जगमगाता,
अस्त कभी नहीं जाता

(तपस्विनी-काव्य. द्वितीय-तृतीय सर्ग से)

  000

   अनु. डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

वरिष्ठ रीडर एवं अध्यक्ष, संस्कृत विभाग

सरकारी स्वयंशासित महानविद्यालय, भवानीपाटना, उड़ीसा - 766001

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स्तेफ़ान स्पेंडर

गंगाधर मेहर

 

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