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गंगाधर मेहेर की दो कविताएँ
(स्वभावकवि
गंगाधर
मेहेर
- १८६२
-
१९२४)
मूल
उड़िया से हिन्दी अनुवाद
:
डॉ.
हरेकृष्ण
मेहेर
अमृतमय
मैं
तो
बिन्दु
हूँ
अमृत-समुन्दर
का,
छोड़
समुन्दर
अम्बर
में
ऊपर
चला
गया
था
।
अब
नीचे
उतर
मिला
हूँ
अमृत-धारा
से
;
चल
रहा
हूँ
आगे
समुन्दर
की
ओर
।
पाप-ताप
से
राह
में
सूख
जाऊँगा
अगर,
तब
झरूँगा
मैं
ओस
बनकर
।
अमृतमय
अमृत-धारा
के
संग
समा
जाऊँगा
समुन्दर
में
॥
( 'अर्घ्यथाली'
कविता-संकलन
से
)
000
सीता-राम
का
दाम्पत्य
प्रेम
सागर
के
प्रति
सरिता
की
गति
रहती
स्वभाव
से
।
जब
शिला-गिरिसंकट
सामने
विघ्न-रूप
हो
जाते
प्रकट,
उन्हें
लाँघ
जाती
ताव
से
॥
भूल
जाती
सब
पिछली
व्यथाएँ
सागर
से
मिलकर
।
दोनों
के
जीवन
में
तब
रहता
नहीं
तनिक-भी
अन्तर
॥
संयोग-वश
यदि
बीच
में
उभर
ऊपर
को
भेदकर
छिन्न
कर
डालता
बालुका-स्तूप
सरिता
और
सागर
के
हृदय
को
किसी
रूप;
वह
स्रोतस्वती
मर
तो
नहीं
सकती
।
सम्हालती
अपना
जीवन-भार
ह्रद-रूप
बन
हृदय
पसार
॥
कहता
हूँ
और
एक
बात,
तुमलोग
मन
के
साथ
सब
सम्मिलित
होकर
चलो
हृदय-सरोवर
।
उधर
अनन्त
दिनों
तक
रमते
रहोगे
रस-रंग
में
अथक
॥
वहाँ
खिली
है
नयी
पद्मिनी
मेरी
जीवन-संगिनी
।
स्मरण
का
सूरज
वहीं
सदा
जगमगाता,
अस्त
कभी
नहीं
जाता
॥
(तपस्विनी-काव्य.
द्वितीय-तृतीय
सर्ग
से)
000
अनु.
डॉ.
हरेकृष्ण मेहेर
वरिष्ठ रीडर एवं अध्यक्ष,
संस्कृत विभाग
सरकारी स्वयंशासित महानविद्यालय,
भवानीपाटना,
उड़ीसा - 766001
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