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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-34, मार्च, 2009

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।।आस्ट्रेलिया से।।

 

 

धर्म बनाम संस्कृति


हरिहर झा

             

  विदेश में जाकर बसने के बाद भी दीवाली हो, दशहरा हो या गणपति-विसर्जन कोई भी त्योहार आने पर सभी प्रवासियों के मन में एक हूक-सी उठती है हम आस्तिक हों  या भले ही नास्तिक  क्यों हों  ऐसा सभी के साथ होता है।  ऐसा क्यों ? इसको समझना ज़रा टेढ़ी खीर है अभी कुछ समय पहले किसी सभा में मधुर स्वर में  मीरा का भजन सुन कर एक नास्तिक महोदय भी भाव विभोर हो गये व्यक्तिगत रूप से मैं उन्हें जानता हूँ  इसलिये तो मैं उनकी नास्तिकता को कोई चुनौती दे रहा हूँ और ही वे कोई कम नास्तिक हैं ऐसा मेरा कोई अभिप्राय है पर प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों होता है?

 

इस सवाल का जवाब मुझे मिला आस्ट्रेलिया की हाल में दिवंगत लेखिका पेमेला बोन से उन्होने    द्रढ़तापूर्वक नास्तिकता के पक्ष में इतने लेख लिखे कि वे इस बात के लिये प्रसिद्ध भी हो गई मरने के पहले उन्होने जो अपनी अन्तिम इच्छा व्यक्त की कि उन्हे ईसाई धर्म के रिवाज़ों के अनुसार दफ़नाया जाय तो उनके प्रशंसक और विरोधी सभी अचंभित हो गये पर लेखिका ने कहा कि  नास्तिक होते हुये भी मुझे अपनी परंपराओं और संस्कृति से प्यार  है। पादरियों के द्वारा पढ़े गये मन्त्र या क्रिसमस में गाये गयेकेरोल मेरे मन को आज भी आकृष्ट करते हैं। भले ही लोग इसके लिये मेरे मरने के बाद मुझे पाखंडी कहें या मुझ पर हँसे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता मानव संस्कृति में परंपराओं का जो मूल्य है  उसे कभी नकारा नहीं जा सकता

 

 पेमेला बोन के  उपरोक्त कथन में कुछ लोगों को शायद  बौद्धिक भावनात्मक स्तर पर दोहरे मापदडों की बू आये या वे ऐसा सोंचे कि मौत को सामने देख कर ईश्वर की याद गई  पर  जिस लेखिका ने हिन्दुस्तान के दीन हीन बच्चों की ग़रीबी में झांकती हुई संस्कृति के दर्शन किये हों इसे बचाने की अपील भी की हो उस पर ऐसा इल्जाम लगाने का कोई तुक ज़ नही आता वह केवल अपने लिये नहीं पूरी मानव जाति के लिये परंपरा-रक्षण के अधिकार की समर्थक रही हैं।                

   

कहना होगा धर्म और संस्कृति एक दुसरे से कितने भी जुड़े हुये हों  दोनो के बीच में एक अदृश्य  रेखा है जब एक नास्तिक भी किसी परंपरा में आकृष्ट होने लगे तो उसे संस्कृति का हिस्सा मानना पड़ेगा मनोवैज्ञानिक  कहते हैं  कि सभी धार्मिक गतिविधियाँ चाहे पूजा-पाठ हो या प्रार्थना सब कुछ बचपन में हुईकन्डिशनींग का परिणाम है इसे संस्कार  कहें या कि दुष्चक्र यह केवल आपके द्रष्टिकोण की बात है तात्पर्य यह निकला कि बचपन से मस्तिष्क में डाली गई ईश्वर-आस्था की कन्डिशनींग से कुछ लोग बाहर निकल पाते हैं पर संस्कार या संस्कृति  से बाहर निकल पाना ज़्यादा  मुश्किल है।

 

अभी कुछ समय पहले की बात है एक प्रसिद्ध नास्तिक लेखक ज़ेफ़ होर्थ महोदय ने अपने लेखन के बहाव मेंदी एज”(The Age) – आस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय अँगरेज़ी अखबार में लिख मारा कि यह ज़माना बड़ा अजीब है लोग तीन सिर वाले भगवान में मानने वाले व्यक्ति के साथ रह लेते हैं पर एक नास्तिक के साथ रहना उन्हें गवाँरा नहीं।

 

मुझे पूरे लेख में कोई बात आपत्तिजनक नही लगी जितनी कि उपरोक्त बात कुछ कारणवश नास्तिकता के प्रति मेरे मन में आदर है ज़रूर कुछ कारण होंगे कि भारत में चार्वाक को भी ऋषि कहा गया तथा सांख्य और पूर्व-मिमांसा में नास्तिकता का पुट होते हुये भी षट-दर्शन में जगह मिली शायद इसलिये कि आस्तिकवाद और नास्तिकवाद दोनो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं   समय आने पर अच्छे अच्छे आस्तिकों का नास्तिक चेहरा भयंकर रूप से दिखने लगता है और मेरे नास्तिक होने का मतलब यह नहीं कि जब भारत की संस्कृति को कोई छद्म रूप से और अकारण ही अपमानित करे तो मैं चुपचाप देखता रहूँ  ज़ेफ़ महोदय  ईश्वर के साथ साथ दुनिया के तमाम धर्मों को कलम की एक धार से नकार दें यह द्रष्टिकोण की बात है तो फिर उपरोक्त पँक्तियों में क्या था जो बुरा लगा पढ़ कर ?

 

एकदेववाद और बहुदेववाद इन दो असत्यों में एक को ऊँचा और दूसरे को निकृष्ट समझा जाय तो इसका प्रतिकार तो मुझे करना ही था ( इसके मूल में थी अहं पर चोंट या संस्कारों की पकड़ ! मेरे लिये यह कहना मुश्किल है )  मैंने तुरन्त संपादक जी को पत्र लिखा कि मैं लेखक महोदय के नास्तिक दर्शन से पूरी तरह सहमत हूँ  पर उन के  इस रहस्योद्घाटन से  विस्मित भी हूँ कि एक सिर या बिना सिर के भगवान में मानने वाले व्यक्ति की अपेक्षा तीन सिर वाले भगवान में मानने वाला व्यक्ति ज्यादा असहनीय होता हैं। मैं नहीं जानता कि मुझे  इस बात से अपने आप पर शर्म आनी चाहिये या नहीं क्योंकि हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमे वे तीन सिर भी अपने आप में ईश्वर समझे जाते हैं सृजन के, पालन के और विनाश के

 

ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन शब्दों का पत्र में उल्लेख भी कर पाया क्योंकि यह भैंस के आगे बीन बजाने जैसा था पर कितना आसान है अनजानी संस्कृति  को हीन भाव से देखना !

 

संपादक जी मेरे पत्र को प्रकाशित करने के अलावा तो और  क्या कर सकते थे !       

    हरिहर झा
2,
बिल्बी स्ट्रीट, मोराबिन,
मेल्बर्न, आस्ट्रेलिया - 3189

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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