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दो कवितायें
प्रिय-मिलन
प्रियतम के साथ
जब
निश्चित
रूप से
मेरा होता है
मिलन,
तब
मेरे लिये
कुछ कम लगता है
सुखभरा
स्वर्गभुवन
।
मन
का वृक्ष
जब
उत्कण्ठा से
विचलित था,
मेरा कोमल चञ्चल
धीरज-पल्लव टूट
गया सर्वथा ।
प्रियतम की
अनुपस्थिति में
आँखें मेरी रातभर
प्रतीक्षा करके
बड़ी लगती थीं
अत्यन्त व्याकुल
होकर ।
कुमुदिनी खिलती
नहीं
चन्द्रमा के विरह
से,
हृदय मेरा व्यथित
हो उठता
प्रियतम के बिना
वैसे ।
जब
सुनाई पड़ी
कोयल की सुमधुर
बोली,
तब लज्जा सहित विमोहित हो गयी
मेरी मौनता बड़ी
भोली ।
रोमाञ्चभरा
मंगलमय सुरभित
शुभ्र-मुस्कान-शोभित
प्रेम-पुष्प
उन्हें
तब
अर्पण कर
दिया मैंने ।
पहचान किसीकी
कौन कहता तुम
आलोक नहीं
?
कौन कहता तुम
पुण्यश्लोक नहीं
?
अब
आच्छन्न
हो
केवल माया
से,
लगन
तुम्हारी
है केवल काया से ।
संसार-समुन्दर के अन्दर
तुम बिखरे मोती
हो,
तुम कितने सुन्दर
भव्य-दिव्य ज्योति हो ।
पूछ लो अपने आपसे,
तरसे हो क्यों भव-ताप से
?
पूछ लो फिर काल
से,
उलझे हो मोह-जाल से ।
ज्ञान-नयनों से
जान लो और
अपने को
पहचान लो ।
तुम तो अनन्त
आकाश हो,
स्वयंप्रकाश हो
सहस्रांशु सूर्य
समान,
ज्योति से है जिसका भान ।
फिर भी तुम तो हो
अनजान,
तुम्हारी क्या पहचान
?
क्यों कैसे और कब आये
?
कौन हैं अपने कौन
पराये ?
डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
विभागाध्यक्ष, संस्कृत,
शासकीय अधिशासी महाविद्यालय
भवानीपटना, उड़ीसा
- 766001
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