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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-35, अप्रैल, 2009

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।। कविता ।।

 

 

 दो कवितायें

 

प्रिय-मिलन

 

प्रियतम के साथ

जब निश्‍चित रूप से

मेरा होता है मिलन,

तब मेरे लिये

कुछ कम लगता है

सुखभरा स्वर्गभुवन 

 

मन का वृक्ष जब

उत्कण्ठा से विचलित था,

मेरा कोमल चञ्चल

धीरज-पल्लव टूट गया सर्वथा ।

 

प्रियतम की अनुपस्थिति में

आँखें मेरी रातभर

प्रतीक्षा करके बड़ी लगती थीं

अत्यन्त व्याकुल होकर ।

 

कुमुदिनी खिलती नहीं

चन्द्रमा के विरह से,

हृदय मेरा व्यथित हो उठता

प्रियतम के बिना वैसे ।

 

जब सुनाई पड़ी

कोयल की सुमधुर बोली,

तब लज्जा सहित विमोहित हो गयी

मेरी मौनता बड़ी भोली ।

 

रोमाञ्चभरा मंगलमय सुरभित

शुभ्र-मुस्कान-शोभित

प्रेम-पुष्प उन्हें

तब अर्पण कर दिया मैंने ।

 

पहचान किसीकी

 

कौन कहता तुम आलोक नहीं ?

कौन कहता तुम पुण्यश्‍लोक नहीं ?

अब आच्छन्न हो  केवल माया से,

लगन  तुम्हारी है केवल काया से ।

 

संसार-समुन्दर के अन्दर तुम बिखरे मोती हो,

तुम कितने सुन्दर भव्य-दिव्य ज्योति हो ।

पूछ लो अपने आपसे, तरसे हो क्यों भव-ताप से ?

 

पूछ लो फिर काल से, उलझे हो मोह-जाल से ।

ज्ञान-नयनों से जान लो और अपने को पहचान लो ।

तुम तो अनन्त आकाश हो, स्वयंप्रकाश हो

सहस्रांशु सूर्य समान, ज्योति से है जिसका भान ।

 

फिर भी तुम तो हो अनजान, तुम्हारी क्या पहचान ?

क्यों कैसे और कब आये ? कौन हैं अपने कौन पराये ?

   डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

विभागाध्यक्ष, संस्कृत, शासकीय अधिशासी महाविद्यालय

भवानीपटना, उड़ीसा - 766001

◙◙◙

 

स्मरणीय

केदारनाथ अग्रवाल

रामकुमार वर्मा

समकालीन कविता

डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

गोविन्द माथुर

श्याम विमल

डॉ. राम दरश मिश्र

अमरजीत कौंके

सुधीर सक्सेना

माह का कवि

माताचरण मिश्र

- घोड़े

- समुद्र

- अतीत

- लिफ़्टमैन

- क़स्बे की सुबह, चाह

प्रवासी कविता

पुष्पिता (नीदरलैंड)

 

 

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