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स्वभावकवि गङ्गाधर
मेहेर : एक अमर प्रतिभा
डॉ.
हरेकृष्ण मेहेर
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(2009 श्रावण पूर्णिमा कवि गङ्गाधर मेहेर जयन्ती पर )
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भारतीय
साहित्य के प्रतिभाशाली सफल निर्माताओं में से स्वभावकवि
गङ्गाधर मेहेर अन्यतम हैं । ओड़िआ साहित्य-गगन के एक समुज्ज्वल
ज्योतिष्क के रूप में वे चर्चित हैं । कवि का आविर्भाव हुआ
था 9 अगस्त
1862, श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बन्धन के दिन तत्कालीन
सम्बलपुर-जिल्लान्तर्गत बरपालि गाँव में और तिरोभाव
4 अप्रैल
1924, चैत्र अमावस्या में। उनकी साहित्यिक कृतियों में 'तपस्विनी',
'प्रणय-वल्लरी', 'कीचक-वध', 'उत्कल-लक्ष्मी', 'अयोध्या-दृश्य',
'पद्मिनी', 'अर्घ्यथाली' और 'कृषक-संगीत' इत्यादि प्रमुख हैं ।
अपनी पैनी कलात्मक दृष्टि से उन्होंने सारे विश्वम को मधुमय और
अमृतमय रूप में दर्शन किया है और कराया है । पंक से पंकज के
विकास की भाँति संघर्षभरे परिवेश में रहकर भी उन्होंने अपनी
महान् प्रतिभा की सुरभि फैला दी । वे हैं जीवन-शास्त्र के
सार्थक कवि, मानवता के कवि, अमृत के कवि, आलोक के कवि एवं समाज
के एक महनीय सारस्वत दिग्दर्शक । भारतीय संस्कृति की पृष्ठभूमि
पर उनकी कवितायें विकसित हुई हैं ।
अन्धकार के गहन मार्ग से आलोक की ओर अग्रसर होने के लिये
भारतीय महामनीषियों ने परमेश्वर से प्रार्थना की है : “असतो मा
सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ।" कवि
गङ्गाधर ने वैदिक भारतीय परंपरा के मूल्यबोध को लेकर
काव्य-कविताऒं का प्रणयन किया है । औचित्यपूर्ण आचरण, जीवन का
विमल आदर्श और सामाजिक मूल्यबोध उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से
प्रतिफलित हुए हैं । दुःख-सुख की अनुभूतियाँ जीवन-ग्रन्थ में
लिपिबद्ध हुई हैं । विधाता की सर्जना में अच्छे-बुरे,
अन्धेरे-उजाले, मिलन-विच्छेद की तरह द्वन्द्वमय तत्त्व हर समय
प्राणी-जीवन को प्रभावित करते रहते हैं । ऐसी स्थिति में सद्गुणावली
का अभ्युदय मानव-जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक है ।
दुष्प्रवृत्तियों की व्यापकता से मनुष्य पथभ्रष्ट हो जाता है ।
हर युग में मनीषीगण की साधना समाज के लिये विशेष उपादेय होती
है । कवि गंगाधर जंजालभरे जीवन में कई दुःख-क्लेशों को झेल कर
कभी विचलित नहीं हुए हैं । उनका धैर्य है असीम एवं मनोबल
अत्यन्त सुदृढ़ । नैतिक आदर्शबोध और मानववाद की प्रतिष्टा उनकी
लेखनी का काम्य है । क्षमा, सहनशीलता, सत्कर्म की ओर तत्परता
एवं परोपकार उनके जीवन का ध्येय है । असत्य, अन्याय और अधर्म
के विरुद्ध कवि ने हमेशा संग्राम किया है । अपने जीवन में उसे
चरितार्थ भी किया है । सांसारिक दुःखों के अन्दर कवि ने
पारमार्थिक सुख का सन्धान किया है । जीवन-ज्योति और भी
दीप्तिमती हो उठी है वेदना की अनुभूति के माध्यम से । विनय,
नम्रता, शिष्टता आदि सदाचार उनके सामाजिक जीवन के श्रेष्ठ गुण
हैं, जो उनकी रचनाओं में भी रूपायित हुए हैं । उनके हृदय में
अहमिका अथवा गर्व का स्थान नहीं है । निश्छल एवं सरल
व्यक्तित्व उनके जीवन का उत्कर्ष है ।
संस्कृत के महाकवि कालिदास और अंग्रेजी के वाड्वाा र्थ की भाँति
गंगाधर मेहेर ओड़िआ साहित्य के 'प्रकृति-कवि' माने जाते हैं ।
कवि गंगाधर ने अपनी प्रतिभा की आँखों से प्रकृति के
अन्तःस्वरूप का सूक्ष्म तथा गहरा निरीक्षण किया है । कवि की
समस्त कृतियों में बाह्य प्रकृति और अन्तःप्रकृति का रोचक
मनोरम चित्र अंकित हुआ है । प्रकृति के अनन्य रूपकार और
व्याख्याकार हैं रंगाजीव कवि गंगाधर । उनकी रचनावली में
श्रेष्ठ है "तपस्विनी" महाकाव्य । रामायण उत्तरकाण्ड में
वर्णित सीता-वनवास की करुण गाथा इस काव्य का उपजीव्य है ।
वाल्मीकि-आश्रम में सौम्य शान्त कान्त उषाकाल का वर्णन कवि की
भावुकता की एक विशिष्ट पहचान है । मानवीय सूक्ष्म भावों के
सच्चे विश्ले षक एवं प्रकृति के एक निपुण सफल चित्रकार के रूप
में कवि गंगाधर चिर-स्मरणीय हैं । चतुर्थ सर्ग में उषा-वर्णन
का माधुर्य विशेष आस्वादनीय है । कवि की लेखनी में :
" समंगल आई सुन्दरी
प्रफुल्ल-नीरज-नयना उषा,
हृदय में ले गहरी
जानकी-दर्शन की तृषा ।
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में
सती-कुटीर के बाहर
आंगन में खड़ी होकर
बोली कोकिल-स्वर में :
'दर्शन दो सती अरी !
बीती विभावरी ॥'
*
अरुणिमा कषाय परिधान,
सुमनों की चमकीली मुस्कान
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :
आकर कोई योगेश्वरी
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी,
सारा दुःख मिटाने पास
कर रही हैं आह्वान ।
मानो स्वर्ग से उतर
पधारी हैं धरती पर
करने नया जीवन प्रदान ॥"
अपनी अन्तर्दृष्टि से कवि ने प्रकृति और मनुष्य के बीच
संवेदनशील गहरा अन्तरंग सम्बन्ध स्थापित किया है ।
तपस्विनी-काव्य के चतुर्थ सर्ग में तमसा-नदी के मुख में कवि ने
जो कुछ अभिव्यक्त किया है, उसमें जीवन-दर्शन का सार-तत्त्व
प्रतिफलित हुआ है । जल- दान-रूप सत्कार्य से नदी का जीवन
सार्थक और धन्य हो जाता है । तमसा-नदी की स्वार्थहीन सेवा के
वर्णन में मनुष्य-जीवन का साफल्य गर्भित हुआ है । जीवन में कई
प्रकार के बाधा-विघ्न आते हैं; फिर भी दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास
एवं धैर्य के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिये कवि की वाणी में
प्रेरणा भरी है । प्रकृति के सारे विभाव कवि की लेखनी में सजीव,
सरस और मानवायित हैं । चतुर्थ सर्ग का और एक उदाहरण उल्लेखनीय
है, सीता के प्रति वनलक्ष्मी का सख्यपूर्ण आदर । आश्रम के उपवन
में कवि-कल्पिता वनलक्ष्मी सीता के समक्ष अपना आन्तरिक भाव
व्यक्त करती है इस प्रकार :-
' जा रही थी जब लौट चली
पुष्पकारूढ़ तू गगन-मार्ग पर,
खड़ी मैं तब ले पुष्पाञ्जली
हरिण-नयनों में शोकभर
ऊपर को निहार
तुझे मयूरी की बोली में पुकार
रही थी बड़ी चाह से,
लम्बी राह से ।
अरी प्यारी !
सहेली की बात मन में करके याद
क्या तू आज पधारी
इतने दिनों बाद ? '
वास्तव दुनिया में निन्दुक और दोषदर्शियों की संख्या कम नहीं ।
फिर भी सज्जनों के सुकर्म और उत्कर्ष के सामने दुर्जनों का
धैर्य टूट जाता है । सज्जनों के सद्गुण-रूप दिव्य अलंकार की
दीप्ति के प्रभाव से दुर्जनों की निन्दुकता और बुरी नज़र सब
मूल्यहीन हो जाती है । कवि गंगाधर हैं सारस्वत कलाकार,
निष्ठापरायण साधक, समाज-संस्कारक, कर्मयोगी, भाग्यवादी,
ईश्वर-विश्वासी और आशावादी; परन्तु नैराश्यवादी कभी नहीं ।
आशावाद की ज्योति से उनकी वर्णावली अत्यन्त उज्ज्वल और उद्भासित
हुई है । भारतीय दर्शन में भाग्य और कर्मफल की भूमिका विशेष
महत्वपूर्ण है । हर प्रकार की चेष्टाओं के बावजूद यदि सफलता की
प्राप्ति नहीं होती, तब मनुष्य भाग्य को स्वीकार कर लेता है ।
कवि का मत है कि सौभाग्य के बिना सुफल प्राप्त नहीं होता । मन
की भावना और चिन्तन-धारा उन्नत है तो कर्म और परिणाम भी उन्नत
होते हैं । ऐसी ऊँची भावना की प्रक्रिया मानव-समाज और देश के
लिये मान-मर्यादा एवं गौरव को बढ़ाती है । कवि के विचार में
हीनमन्यता को प्रश्रय देना अपनी दुर्वलता है एवं वास्तव जीवन
में सदा ऊँची भावना का पोषण करना चाहिये ।
असत्य, अन्याय और अधर्म के विरुद्ध कवि गंगाधर ने हमेशा
संग्राम किया है । अपने जीवन में उसे चरितार्थ भी किया है ।
शासक-रूपी शोषकों को एवं रक्षक-रूपी भक्षकों को ‘धर्मावतार’
कहकर व्यंग्य चित्रण किया है और समाज में जन-सचेतनता की सृष्टि
हेतु सहायता की है । कवि का कहना है :
" जिसकी विद्या धर्म-नीति का शीश मरोड़ती,
बुद्धि जिसकी सौ सत्यों को चूर डालती;
धन से खरीदा जाता जिसका विचार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥"
गंगाधर की कवितायें करुणा की विमल भाव-सुरभि से महिमान्वित हैं
। उनकी भाषा हृदय को सीधा स्पर्श कर लेती है । भावानुरूप
अभिव्यक्ति से उनकी रचनावली रसोत्तीर्ण हुई है । उनकी लेखनी का
प्रकाश अन्तर के कोने-कोने में फैल जाती है । कविता का भाव और
हृदय का भाव हो जाते हैं एकाकार । इसी कारण जाग उठती है अन्तर
की कारुणिकता, समवेदना, सहानुभूति, जीवों में दया, नारी-समाज
के प्रति सम्मान- भावना एवं विश्व-बन्धुता की भावधारा-जैसी
महनीय मानवता के संग सद्गु।णावली की आत्मीयता। सामाजिक परिवेश
में नारी-जाति की मर्यादा-वृद्धि के लिये कवि का सारस्वत
प्रयास सदैव प्रशंसनीय है । पत्नी के आदर्श एवं चारित्रिक
तेजोराशि से विमण्डित हुई हैं कवि की लेखनी-नायिका सीता,
द्रौपदी, शकुन्तला और पद्मिनी आदि महीयसी महिलायें ।
देशभक्ति-परक कविताओं में कवि की "भारती-भावना" उल्लेखनीय है ।
यहाँ श्ले-षालंकार में अंग्रेज शासन के विरुद्ध और महात्मा
गान्धी आदि स्वतन्त्रता-संग्रामी के अनुकूल पद्य-रचना की गयी
है । "मातृभूमि" कविता में अपने देश की भाषा के लिये कवि की
उक्ति स्मरणीय है इसप्रकार :-
"मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति
जिसके हृदय में अपनापन जन्मा नहीं,
करेंगे जब ज्ञानियों में उसकी गिनती
तो कहाँ रहेंगे अज्ञानी ?"
"भक्ति" कविता गंगाधर के जीवन-दर्शन की एक बड़ी उपलब्धि है ।
विभु-प्रीति की अमृत-धारा उनकी रचना में निरन्तर प्रवाहित है ।
ब्रह्माण्ड की सारी वस्तु परमेश्वर का दिआ हुआ प्रसाद है । कवि
के मत में, उन महान् दाता परमेश्वर के लिये प्रतिदान में उनका
प्रसाद अर्पण करना अपराध होगा । इसी कारण कवि ने अपनी निजस्व
वस्तु "मुँकार" अर्थात् अहंभाव को ईश्वर के चरणों में सविनय
समर्पित किया है । आनन्द एवं अमृत के निधान हैं प्रभु परमेश्वर
। उसीसे सब की सर्जना, उसीमें सब की स्थिति एवं उसीमें ही सब
का विलय । कवि गंगाधर ने अपने को अमृत-सागर के एक बिन्दु के
रूप में चित्रित किया है । आध्यात्मिकता के साथ प्राणी-जीवन की
तत्त्वावली को महिमामय रूप में अभिव्यक्त किया है । "अमृतमय"
कविता में कवि ने कहा है :
"मैं तो बिन्दु हूँ
अमृत-समुन्दर का,
छोड़ समुन्दर अम्बर में
ऊपर चला गया था ।
अब नीचे उतर
मिला हूँ अमृत-धारा से ;
चल रहा हूँ आगे
समुन्दर की ओर ।
पाप- ताप से राह में
सूख जाऊँगा अगर,
तब झरूँगा मैं ओस बनकर ।
अमृतमय अमृत-धारा के संग
समा जाऊँगा समुन्दर में ॥"
ओड़िआ साहित्य के प्रसिद्ध समालोचक मायाधर मानसिंह ने स्वभावकवि
गंगाधर के व्यक्तित्व एवं साहित्य का सामग्रिक अनुशीलन करके
यथार्थ में उन्हें एक "साहित्यिक वीर" के रूप में प्रतिपादित
किया है । सत्कर्म और उच्च कर्म से ही मनुष्य का जीवन गौरवमय
बनता है । अपनी काव्य-माधुरी के साथ गंगाधर अर्पण कर गये हैं
मानवीय सुक्ष्म अनुभूति-संवलित अनेक काव्य-कवितायें, जो
जन-समाज के संस्कार और उपकार की दिशा में एक एक महनीय अनमोल
रत्नर-रूप हैं । जीवन एवं साहित्य का मधुर समन्वय उनकी कृतियों
में सुपरिलक्षित होता है । आज के कलुषित और प्रदूषित वातावरण
में कवि का तात्त्विक चिन्तन विशेष प्रणिधान-योग्य है ।
सत्य-शिव-सुन्दर के परम उपासक और अनन्य व्याख्याकार यशस्वी
सारस्वत शिल्पी गंगाधर मेहेर वास्तव में सभी सहृदयों और
साहित्य-प्रेमियों के आदरणीय हैं ।
डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
वरिष्ठ रीडर एवं अध्यक्ष
संस्कृत विभाग
सरकारी स्वयंशासित महाविद्यालय
भवानीपाटना - ७६६००१ (ओड़िशा)
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