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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-37, जून, 2009

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। भाषांतर ।।

 


झूठ के भीतर


विलियम शेक्सपीयर का सोनेट
अनुवादक : हरिहर झा

 

 

मेरी प्रिया
सच की कसम खाती है
तो मैं विश्वास कर लेता हूँ -
जानते हुये भी कि वह झूठी है
वह मुझे शायद
अनुभवहीन समझती हो -
इस दुनिया की
झूठी सूक्ष्मताओं से अनजान
तो मैं व्यर्थ ही सोंचता हूँ
कि वह मुझे जवान समझती है
हालाकि वह जानती है
कि मेरा रंगीन समय गुजर चुका है
पर मैं उसके झूठ बोलने की
कला का आदर करता हूँ
इस तरह हम दोनो
सच को छुपाते रहते हैं
पर वह कब बोली
कि वह बिल्कुल सच्ची है
और कब उसने कहा
कि मैं बूढ़ा नहीं हूँ
प्यार की अच्छी आदत तो
दिखते हुये विश्वास में है
और फिर प्यार में उम्र -
सालों से प्यार नहीं करती
इसलिये मैं उससे झूठ बोलता हूँ
और वह मुझसे !
और इस तरह हम अपनी खामियों के बावजूद
खुश होते रहते हैं ।

हरिहर झा
2, बिल्बी स्ट्रीट, मोराबिन,
मेल्बर्न, आस्ट्रेलिया - 3189

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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