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नक्सलवाद न मूल्य है न
उपाय
कुमुद
अधिकारी
कुमुद
मूलतः शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के गंभीर कर्मों से जुड़े
नेपाली युवा हैं जो नेपाली और हिंदी के बीच अनुवाद कर्म को भी
बड़ी तल्लीनता से निभा रहे हैं । वे इधर अंतरजाल पर भी नेपाली
सहित हिंदी के संवर्धन हेतु साहित्य सरिता नामक जाल पत्रिका का
संपादन कर रहे हैं । कवि, कथाकार और अनुवादक के रूप में चर्चित
। कुछ किताबें प्रकाशित। फिलहाल नेपाल के
इटहरी, सुनसरी
में अध्यापन करते हैं । वे माओवाद को बड़ी नज़दीक से
देखते-समझते रहे हैं । प्रस्तुत है माओवाद को लेकर
विभिन्न पहलुओं पर उनसे हुई चर्चा के सारांश - संपादक ।
1.
क्या नक्सलवाद प्रजातांत्रिक मूल्य हैं
?
क्या प्रजातंत्र की विकृतियों को सिर्फ़ नक्सलवाद से निराकृत
किया जा सकता है
?
यदि विश्व इतिहास में ऐसी कोई सफलता दर्ज है तो वह किस देश में
है और किस स्तर पर सफल है
?
कैसे सफल है
?
उन्हें इस उपलब्धि के लिए कितनी क़ीमत चुकानी पड़ी है
?
जो क़ीमत चुकानी पड़ी वह जायज़ था
?
वहाँ कितनी गारंटी है कि फिर से वह समस्यायें नहीं आयेगीं
जिससे नक्सलवाद का जन्म हुआ था
?
श्री अधिकारी
-
नक्सलवाद न प्रजातांत्रिक मूल्य है न ही प्रजातंत्र से उपजी
विकृतियों को निराकरण करने का उपाय। प्रजातंत्र से उपजी
विकृतियाँ केवल प्रजातांत्रिक तरीक़े से ही निराकृत किया जा
सकता है। किसी ने कहा है प्रजातंत्र का विकल्प प्रजातंत्र ही
है।
नक्सलवाद
की सफलता किस देश में दर्ज है यह तो मालूम नहीं पर जितने भी
कम्युनिस्ट देश हैं, (उत्तर कोरिया, चीन, क्यूबा...) उनमें
उत्तर कोरिया का हाल तो सभी को मालूम है। भूखमरी एक तरफ़ और
युरेनियम की खेती दूसरी तरफ़। माओ जे दोङ के देश चीन में भी
आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक उदारिकरण ने जो कमाल दिखाए हैं
वे जगजाहिर हैं। अभी नेपाल में माओवादीयों ने चुनाव में भारी
सफलता प्राप्त की है, पर वे चुनाव में भाग लेकर आए,
प्रजातांत्रिक मूल्यों को स्वीकार कर। वे बंदूक से दश सालों
में तेरह हज़ार से ज़्यादा जाने लेने के सिवा कुछ नहीं कर सके
। बंदूक फेंककर सामने आए, थोड़ा नज़रिया बदला तो नतीजा सामने
है।
2.
नक्सलवाद मानव अधिकारवादी संकल्पना है तो फिर इसमें जन-धन की
हानि,
यानी हिंसा,
मारकाट का तांडव किस विशेष अधिकार का प्रमाण है?
यह अधिकार नक्सलवादियों को कौन प्रदान करता है
?
श्री
अधिकारी
-
नक्सलवाद जो अभी सामने है, मानव अधिकारवादी संकल्पना है ही
नहीं। हिंसा, मारकाट और जनधन की हानि अशिक्षित नक्सलियों का
उन्माद है, जिन्हें यह भी मालूम नहीं की असली माओवाद,
कम्युनिज्म क्या है।
3.
नक्सलवाद से संबंद्ध संगठन या (कथित) मानव अधिकारवादी
स्वयंसेवी संस्थाओं या फिर बुद्धिजीवियों की उस चाल को कहाँ तक
उचित ठहराया जाना चाहिए जिसमें वे नक्सलवाद से जुझते पुलिस और
प्रशासन को कटघरे में खड़े करने के लिए उसके प्रतिबंधात्मक
कार्यवाही को मानवअधिकार का हनन बताते हुए न्यायालय में चुनौती
देते हैं (यानी प्रजातांत्रिक व्यवस्था का ही सहारा लेकर)
किन्तु नक्सलवाद से हताहत भोले-भाले आदिवासी या लोगों की हत्या
या जन-माल की हानि के बारे में चुप्पी साधते रखते हैं ।
श्री
अधिकारी
-
अधिकतर मानव अधिकारवादी संगठन या स्वयंसेवी संस्थाएँ भी वैसी
ही सिद्धांत के कमजोर और अवसरवादी हैं जैसे नक्सली। जहाँ
उन्हें कोई ख़तरा नहीं दिखाई देता वे वहीं अपना तेवर दिखाते
हैं। अगर वे नक्सलियों के बारें में लिखेंगे बोलेगें तो
बंदूकें आएँगी न सिर पर ! नेपाल का हाल भी लगभग वही है।
4.
नक्सली नक्सलवाद के मूल में जिन कारणों की दुहाई देते है, वे
कौन-कौन से हैं
?
श्री
अधिकारी
-
नक्सलियों के विद्रोह का मूल कारण (उनके ही अनुसार) ग़रीबी और
उच्च वर्गद्वारा निचले वर्गों में किया गया शोषण और अन्याय है।
कारण और भी गिनाते हैं पर घुम-फिर कर वही है।
5.
ग़रीबी,
शोषण एवं अन्याय से मुक्ति का एकमात्र निदान नक्सलवाद है
?
इस दिशा में क्या प्रजातंत्र असफल साबित हो चुका है
?
श्री
अधिकारी
-
ग़रीबी शोषण एवं अन्याय से मुक्ति का निदान नक्सलवाद कतई नहीं
है। ऐसे बहुत से प्रजातांत्रिक देश हैं जहाँ प्रजातंत्र सफल
हुआ है।
6.
यदि ऐसा है तो क्यों विश्व के कई देश जैसा कि वहाँ घोर गरीबी
है,
नक्सलवादी नहीं है?
श्री
अधिकारी -
नक्सलवादी रहित ग़रीब देश भी हैं।
7.
जिन देशों या समुदायों में नक्सलवाद नहीं है
क्या वहाँ आर्थिक असमानताएं नहीं हैं
?
यदि उन देशों,
समाजों में तुलनात्मक रूप से अधिक समृद्धि है तो फिर ऐसा क्यों
संभव हुआ है । ऐसे कारण कौन से हैं जिनसे वह देश अधिक विकसित
देशों की श्रेणी में आते हैं
?
श्री
अधिकारी
-
नक्सलवाद का न होना समस्या का न होना नहीं है। आर्थिक असमानता
जहाँ कहीँ भी है, वहाँ ग़रीबी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन
आर्थिक असमानता के चलते ही राष्ट्र समृद्धि ओर जाता है। विकसित
देशों में आर्थिक समानता है, ऐसा तो नहीं लगता।
8.
माना कि नक्सलवाद हारे हुए एवं हर संघर्ष में परास्त लोगों का
एकमात्र रास्ता भी है तो क्या अपने जैसे गरीबों,
अहसायों को भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के
लिए मौत के घाट उतार देना उचित है
?
श्री
अधिकारी
-
नक्सलियों का उन्माद न तो उचित अनुचित का ध्यान रखता है न ही
शिकार लोगों के स्तर, जाति का। अपनी बात मनवाने के लिए उन्हें
जो ठीक सूझता है वही करते हैं। वे लोगों को मानव ढाल की तरह
इस्तेमाल करते हैं। नेपाल के माओवादी जनयुद्ध के दौरान भी ऐसा
कई बार किया गया। निर्दोष लोगों को सामने कर युद्ध लड़ना जैसा
कुत्सित और अमानवीय कार्य दूसरा नहीं है।
9.
जो ग़रीब हैं उन्हें अमीर बनने या स्तरीय जीवन
जीने के लिए केवल नक्सवादी बन जाना चाहिए
?
अपने विकास के लिए पूरजोर संषर्ष करना चाहिए
?
विकास के लिए इस संघर्ष-पथ में उसकी सामाजिक,
प्रशासनिक,
राजनैतिक,
सांस्कृतिक,
व्यापारिक परिस्थितियाँ बाधक हैं,
उससे कैसे निपटा जा सकता है
?
श्री
अधिकारी
-
नक्सलवादी बन जाने से गरीबी हटती या जीवन स्तर ऊँचा होता तो
नेपाल के माओवादी दश वर्षों में बिल गेट्स बन गए होते। कुछेक
नेताओं और ऊँचे स्तर के कार्यकर्ताओं(जिन्होंने सीधी-साधी जनता
से जबरन चंदा वसूल किया) को छोड़कर सभी लोग वहीं हैं जहाँ से
वे चले थे। विकास के लिए प्रजातांत्रिक मूल्य वाधक हैं, ऐसा तो
नहीं लगता। हाँ समाज में, प्रशासन में, राजनीति में और व्यापार
में उनलोगों का होना ज़रूरी है जो मानव मूल्यों के प्रति सचेत
हों। ऐसे जगहों में अगर बेईमान हों तो उन्हें उखाड़ फेंकने की
ज़रूरत है। नेपाल की राजनीति एक तरह से बेइमानी का खेल
ही रहा है और ऐसा नहीं लगता की उसमें कुछ बदलाव आया है, हाँ
चेहरा ज़रूर बदला है।
10.
यदि कोई किसी शोषण का शिकार है तो उसे कुछ संघर्ष ना करते हुए
सिर्फ़ हथियार उठा लेना चाहिए और नक्सलवादी बन जाना चाहिए
?
ताकि वह आक्रोशजन्य प्रतिकार कर सके सके । क्या शोषकों को मार
देना ही एक मात्र निदान है शोषण के खिलाफ
?
श्री
अधिकारी
-
शोषकों को मौत के घाट उतार कर अभी तक कोई भी शोषण से मुक्त
नहीं हुआ है। शोषकों के ख़िलाफ़ एकीकृत संघर्ष की ज़रूरत
है, जहाँ हिंसा का कोई स्थान नहीं। ऐसे कई उपाय हैं जिससे शोषण
को ख़त्म किया जा सकता है।
11.
जो सताये जाते हैं उसे भी आततायियों के ख़िलाफ़ मारकाट का
सहारा लेना चाहिए
?
बदला लेने की कैसी कार्यवाही की जानी चाहिए । बदला नहीं लेना
चाहिए तो क्या किया जाना चाहिए
?
श्री
अधिकारी -
जो मारता है उसे भी मार देना, बदले की दृष्टि से ठीक तो लगता
है पर इससे होगा क्या ? मारकाट बढ़ेगी तो नुकसान भी बढ़ेगा।
हिंसा के प्रतिकार के लिए संगठित प्रयास की ज़रूरत है,
हिम्मत की ज़रूरत है। हो सकता है कुछ लोग शहीद हो जाएँ
पर इससे समाज का या उस वर्ग का भला ही होगा।
12.
शोषण के और क्या-क्या कारण हैं जो मानव इतिहास में सिद्ध होते
रहे हैं
?
श्री
अधिकारी
-
शोषण का मूल कारण मनुष्य की वह महत्त्वाकांक्षा है, जिससे वह
बड़ा होना चाहता है, दूसरों से ऊपर होना चाहता है। अपने
सत्प्रयास और सत्कर्मों से कुछ नहीं कर पाता तो शोषण कर बड़ा
बनने का प्रयास करता है। इतिहास गवाह है, अपने को बड़ा सिद्ध
करने के लिए आदमी कहाँ तक गिर सकता है। यह बड़प्पन जिस किसी
रूप में भी हो सकता है।
13.
नक्सलवाद से कितने लोगों का भला हुआ है
?
नक्सलवाद से किसका भला हुआ है
?
कैसे भला हुआ है
?
किसका भला होगा । यदि नक्सलवाद से सताये हुए लोगों का भला नहीं
हुआ है या भविष्य में नहीं हो सकता तो फिर उन्हें कौन ऐसे
हिंसक आंदोलन में धकेल रहा है
?
श्री
अधिकारी -
ऐसा तो नहीं लगता कि नक्सलवाद से किसी का भला हुआ हो। हाँ,
ऊपरी और अस्थायी तौर पर नक्सली ग़रीबों और शोषितों को मुक्ति
का आभास दिला सकते हैं, बहला फुसला सकते हैं। वे जिन लोगों कि
दुहाई देते हैं वे ही सबसे ज़्यादा प्रताडित हैं उन्हीं से।
क्रांति सिर्फ़ बंदूक से ही संभव है- माओ जे दोङ ने जो कहा किन
परिस्थितियों में कहा, वह कौन सा समय था नक्सली यह तो जानते ही
नहीं। बस उन्होंने इसी बात को मूल मंत्र बना लिया और बंदूक चला
दिया। उन्मादी नक्सली ही हिंसा की ओर ग़रीबों को धकेल रहे हैं।
14.
कुछ नक्सलवाद समर्थक कहते हैं जहाँ अशिक्षा है
वहाँ नक्सलवाद ज़रूरी है
?
क्या वे मनुष्य की हर संस्कृति में नक्सलवाद को मान्यताप्राप्त
है
?
है तो क्यों
?
नहीं है तो क्यों?
श्री
अधिकारी
-
अशिक्षा का अचूक उपाय तो शिक्षा ही है, बंदूक नहीं। जहाँ
अशिक्षा और ग़रीबी हो वहाँ नक्सलबाद को मान्यता प्राप्त है,
ऐसा तो नहीं कहा जा सकता पर यह बात ज़रूर है कि जहाँ अशिक्षा
है वहाँ नक्सली कामयाब रहे हैं। अशिक्षित लोगों को आसानी से
भड़काया जा सकता है और वही उन्होंने किया है।
15.
कुछ लोग नक्सलवाद माओवाद को भारतीय संस्करण
मानते हैं तो ऐसे में प्रश्न उठता है कि माओवादी देशज है या
विदेशज श्रद्दा का विषय
?
श्री
अधिकारी
-
नक्सलावाद नाम ज़रूर भारतीय है, जो कि नक्सलबाड़ी से जुड़ा है
जहाँ से क्रांति शुरू हुई थी। माओवाद या नक्सलवाद जो भी कहें
मेरे हिसाब में इतिहास में दर्ज एक घटना है, सिद्धान्त है जो
नाकाम हो चुका है। इसे भारतीय नहीं माना जा सकता। जहाँ तक
श्रद्धा का विषय है, वह तो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है।
हाँ सिर्फ़ श्रद्धा करना एक बात है और अमल में लाना दूसरी बात।
16.
क्या मार्क्स या माओ ने समाज में समानता लाने के लिए(सत्ता में
भागीदारी) कभी गरीबों,
असहायों,
दलितों,
आदिववासियों को भी बली बनाने का मुहिम चलाया था । वामपंथ को
किस स्तर पर जनता समर्थन दे ।
श्री
अधिकारी
-
कार्ल मार्क्स के सिद्धांत (कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो) तो ऐसी
बाते कहीं नहीं करता। माओ की बंदूक की क्रांति में बहुत से लोग
जुड़े पर दलितों, असहायों और आदिवासियों को बलि चढ़ाने की बात
समझ में नहीं आती।
वामपंथ सिर्फ़ नक्सलवाद नहीं हो सकता। पश्चिम बंगाल में भी
1977 से वाम सरकार टिकी हुई है। क्यों ? गहन अध्ययन और
विश्लेषण की ज़रूरत है।
17.
नक्सलवाद को राज्य सरकार का स्थानीय विषय मानकर कभी केंद्र
सरकार चुप्पी साध लेती है और कभी राज्य सरकार इसे संपूर्ण देश
की चुनौती मानकर अधिक केंद्र शासनान्मुखी होकर औपचारिकता
निभाने लगते हैं । आप निटपने की कैसी व्यवस्था के पक्षधर हैं
?
श्री
अधिकारी
-
लचकता दोनों ओर से होनी चाहिए। नक्सली नेपाल के माओवादीओं के
कुछ सिखें। दस वर्षों तक लोगों को मौत के घाट उतारकर उन्हें
कुछ नहीं मिला। इसलिए वे अपने आपको ख़तरे में डालकर बंदूक
फेंककर प्रजातांत्रिक पद्धति में आए। केंद्र सरकार और राज्य
सरकार को भी यह समझना चाहिए की वे भी अपने ही लोग हैं, थोड़े
गुस्सैल हैं तो क्या हुआ हैं तो अपने भाई। थोड़ा गुस्सा सह लो।
चूँकि यह समस्या अकेले छत्तीसगढ़ राज्य की नहीं है, केंद्र
सरकार को पहल करनी चाहिए। घर के एक कमरे में समस्या है तो घर
के मालिक का चुप रहना ठीक नहीं लगता।
18.
छत्तीसगढ़ में नक्लसवाद के प्रतिरोध में उठ खड़े हुए
आदिवासियों द्वारा संचालित और राज्य सरकार द्वारा समर्थित
"सलवा
जुडूम"
को किस दृष्टि से लिया जाना चाहिए
?
श्री
अधिकारी
-
आदिवासियों ने नक्सली हिंसा के विरूद्ध जिस तरह की सचेतता
दिखाई है उसे हर हालत में समर्थन किया जाना चाहिए। समाज के हर
वर्ग के लोग उठें
"सलवा
जुडूम"
को समर्थन दें। नक्सलियों को बाध्य करे कि वे बंदूकें छोड़ दे,
निर्दोष लोगों का गला घोटना बंद कर दे।
19.
नक्सलवाद की चुनौतियों को देखते हुए मीडिया,
राजनैतिक दलो,
बुद्धिजीवियों,
साहित्यकारों,
कानून व्यवस्था (सरकार) की कैसी भूमिका होनी
चाहिए
?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर नक्सलवाद के पक्ष में ऐसे
तत्वों को कितनी छूट देनी चाहिए
?
श्री
अधिकारी
-
मीडिया की निष्पक्षता अहम मुद्दा है। हर मीडिया, राजनीतिक दल,
सरकार आदि अपने छोटे-मोटे मतभेद भुलाकर एक साझा रणनीति तैयार
करे जिससे नक्सलवाद से लड़ा जा सके।
साहित्यकारों का काम भी वैसा ही होना चाहिए की वे हिंसा के
विरूद्ध लिखें। जागरूकता फैलाए।
प्रजातांत्रिक मूल्यों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि
है। पर प्रजातांत्रिक मूल्य दूसरों को मार गिराने की
अभिव्यक्ति के लिए कभी छूट नहीं देते। अनुशासनहीनता का स्थान
प्रजातंत्र में नहीं है।
20.
इस समस्या के स्थायी निदान के लिए आप क्या रचनात्मक सुझाव देना
चाहेंगे
?
श्री
अधिकारी
-
सबसे पहली और अहम बात है, बातचीत। सरकार (विशेषकर केंद्र
सरकार) बिना शर्त नक्सलियों से बातचीत करे। उनकी समस्याओं को
सुने, अपनी बात बताए। अपने ही लोग हैं वे, आप उनसे शर्तों की
गठरी सामने रखकर बात नहीं कर सकते। नक्सलियों को भी इस बात के
लिए तैयार होना ज़रूरी है। सरकार बंदूक का जबाव बंदूक से देती
रहेगी, और नक्सली निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारते रहेंगे
तो समस्या कभी हल नहीं होगी।
कुमुद अधिकारी
इटहरी, सुनसरी
नेपाल
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