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आतंकवाद के शिकंजे में
भारत
तनवीर
जाफ़री
भारत
की राजधानी दिल्ली में आतंकवादियों द्वारा किए गए सिलसिलेवार
बम धमाकों को अभी एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि गत
19
सितम्बर को दिल्ली एक बार फिर उस समय
सुर्ख़ियों में आ गई जबकि दिल्ली पुलिस तथा राष्ट्रीय सुरक्षा
गार्ड के जवानों ने दिल्ली के ओखला क्षेत्र में आतंकवादियों के
छुपने के एक ठिकाने पर छापा मार कर दो आतंकवादियों को मार
गिराया। इस कार्रवाई में दिल्ली पुलिस का एक जाबाज़ इंस्पेक्टर
मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गया। घनी आबादी में सुबह के समय हुई
इस मुठभेड़ में सैफ़ नामक एक आतंकवादी को जीवित गिरफ़्तार कर
लिया गया जबकि दो आतंकवादी भागने में सफल हुए बताए जा रहे हैं।
शुक्रवार के दिन हई इस मुठभेड़ में स्थानीय मुस्लिम बाहुल्य
आबादी में कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस मुठभेड़ को फ़र्जी तथा
मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने वाली मुठभेड़ बताने की कोशिशें कर
रहे थे जबकि अनेक मुसलमान व आम दर्शक ऐसे भी थे जिन्होंने इस
मुठभेड़ को तथा आतंकवादियों व पुलिस के मध्य हुए गोलियों के
आदान-प्रदान को अपनी आँखो से देखा। और इनसे बड़ी बात यह थी कि
इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत स्वयं इस बात का प्रमाण है कि
आतंकवादियों द्वारा सुरक्षाबलों पर निरंतर गोली चलाई जा रही थी
जिसके जवाब में ही पुलिस को भी फ़ायरिंग करनी पड़ी।
देश में आतंकवाद विशेषकर धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर सुनियोजित
ढंग से फैलाया जाने वाला आतंकवाद जिस प्रकार पूरे देश में अपना
शिकंजा मज़बूत करता जा रहा है,
इन हालात में अब आतंकवाद को अथवा आतंकवादियों
को आश्रय देने वाली गतिविधियों तथा इन्हें प्रोत्साहन देने
वाले वक्तव्यों पर तत्काल लगाम लगाए जाने की ज़रूरत है। भारत
के मुसलमानों को दिल्ली में हुई मुठभेड़ में पकड़े गए सैफ़ नामक
आतंकवादी के पिता के इस कथन को मद्देनज़र रखना चाहिए जिसमें कि
उसने स्पष्ट कहा है कि 'यदि मेरा बेटा
आतंकवादी है तो उसे मेरी नज़रों के सामने गोली मार दी जाए।'
भारत के मुसलमानों को एक और फ़रार आतंकवादी
तौक़ीर की माँ ज़ुबैदा के बयान से सबक़ लेना चाहिए जिसमें कि
उस माँ ने भी अपनी औलाद के लिए यही बात कही है कि यदि 'उसका
बेटा ऐसी आतंकवादी घटनाओं में सम्मिलित है तो उसे भी फाँसी दे
दी जानी चाहिए।'
परन्तु इन सबके बावजूद यह एक बड़ी चिंता का विषय है कि अब तक
आतंकवादी घटनाओं में भारतीय लोगों को इस बात पर गर्व होता था
कि आतंकी घटनाओं में अन्य देशों के लोग भले ही संलिप्त क्यों न
रहते हों परन्तु कोई भारतीय नागरिक आतंकवादी घटनाओं में
संलिप्त नहीं पाया जाता। परन्तु दुर्भाग्यवश अब तो भारत की ही
सरज़मीं पर बाक़ायदा
'इंडियन
मुजाहिदीन' नामक आतंकवादी संगठन का नाम
सुर्ख़ियों में सुनाई दे रहा है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि
हमारे देश में कट्टरपंथी जेहादी विचारधारा से प्रभावित गुमराह
युवकों ने एक ऐसे संगठन के साथ काम करना शुरु कर दिया है जिसने
भारत के साम्प्रदायिक सौहार्द्र पर प्रहार किए जाने का बेड़ा
उठाया हुआ है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय मुसलमानों विशेषकर इस्लामी
विद्वानों में इस विषय को लेकर बहुत बड़ी चिंता व्याप्त है कि
कुछ गुमराह मुस्लिम नौजवानों की ग़ैर इन्सानी हरकतों की वजह से
इस्लाम को काफ़ी बदनामी का सामना करना पड़ रहा है। अपनी इन्हीं
चिंताओं को सार्वजनिक करने हेतु पिछले दिनों कभी देवबंद में तो
कभी दिल्ली में मुस्लिम उलेमाओं द्वारा इमामों तथा इस्लामी
छात्रों व आम मुसलमानों के बड़े से बड़े आयोजन कर दुनिया को यह
बताने की कोशिश की गई कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई लेना-देना
नहीं है। मुस्लिम विद्वानों ने स्पष्ट किया कि इस्लाम धर्म न
तो आतंकवाद की शिक्षा देता है न ही आतंकवाद हेतु प्रेरित करता
है। बेगुनाहों व निहत्थे लोगों की जान लेना,
औरतों, बच्चों,
बुज़ुर्गों अथवा असहाय लोगों की हत्या करना
क़तई तौर पर इस्लाम विरोधी है। यहाँ तक कि ऐसी हरकतों को अंजाम
देने वाला व्यक्ति स्वयं को जेहादी कहना तो दूर मुसलमान कहलाने
के योग्य भी नहीं है। परन्तु आख़िर क्या वजह है कि मुस्लिम
विद्वानों की इन घोषणाओं के बावजूद भारत में आतंकवाद बढ़ता ही
जा रहा है। सीमा पार अथवा अधिक से अधिक कश्मीर के क्षेत्र में
कभी-कभी सुनाई देने वाला जेहाद जैसा शब्द तो अब इंडियन
मुजाहिदीन के रूप में भारत में ही अपना फन फैला चुका है। और
ऐसे ही चन्द गुमराह मुस्लिम युवकों की आतंकवादी हरकतों की वजह
से न केवल देश का साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ रहा है बल्कि
इस्लाम धर्म के दुश्मनों को भी इस्लाम पर उँगली उठाने का पूरा
मौक़ा मिल रहा है।
प्रश्न यह है कि अब आगे भारतीय मुसलमानों के समक्ष किस प्रकार
की चुनौतियाँ हैं तथा ऐसा क्या किए जाने की ज़रूरत है जिससे कि
आतंकी घटनाएं भी कम हो सकें तथा इस्लाम विरोधियों को इस्लाम को
बदनाम करने का अवसर भी न मिल सके। ज़ाहिर है अब इस बात का समय
नहीं रहा कि हम किसी ऐसी बहस में अपना समय गँवाएँ कि यह सब
क्यों हुआ,
कैसे हुआ और क्यों हो रहा है। मेरे विचार से
हमने पहले भी इन्हीं व ऐसी ही बहसों में समय ख़राब कर इस्लाम व
मुसलमानों को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। अब ज़रूरत है इन
समस्याओं का तत्काल समाधान ढूँढने की। और ऐसे समाधानों में
सर्वप्रथम ज़रूरी यह है कि भारतीय मुसलमान स्वयं को अरबी
मुसलमानों से अलग समझें तथा अरबी इस्लाम व भारतीय इस्लाम के
बीच के अन्तर को समझने का प्रयास करें। दूसरी कोशिश भारतीय
मुसलमानों की ओर से यह होनी चाहिए कि वे तालिबानी शिक्षाओं व
गतिविधियों को इस्लामी शिक्षाओं व गतिविधियों से हरगिंज न
जोड़ें। मुसलमानों द्वारा एक और प्रयास यह होना चाहिए कि चूँकि
शुक्रवार का दिन सामूहिक नमाज का दिन हुआ करता है तथा इस दिन
अधिकांश मुसलमान जुमे की नमाज हेतु अधिक से अधिक संख्या में
मस्जिदों में इकट्ठा होते हैं। प्रत्येक शुक्रवार के दिन पूरे
भारतवर्ष की प्रत्येक छोटी व बड़ी मस्जिदों में नमाज़ पढ़ाने
वाले इमामों को नमाज़ पढ़ने वाले मुसलमानों के बीच सार्वजनिक
तौर पर यह ख़ुतबा (सम्बोधन) करना चाहिए कि आतंकवाद ग़ैर
इस्लामी है, भारतीय मुसलमान आतंकवाद
विरोधी हैं तथा बेगुनाहों की हत्या करना जहन्नुम में जाने का
रास्ता है। और यह भी कि भारत में जेहादी गतिविधियों का न तो
कोई स्थान है और न ही वर्तमान समय में इसकी कोई ज़रूरत है।
इमामों को अपने ख़ुतबे में भारतीय मुसलमानों को सभी धर्मों व
समुदायों के साथ प्रेम व सद्भाव के साथ मिलजुल कर रहने तथा
दूसरे समुदायों की सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में शरीक होने
की सीख देनी चाहिए। मस्जिदों में दिए जाने वाले ऐसे ख़ुतबों
(सम्बोधनों) में किसी अन्य सम्प्रदाय को नीचा दिखाने,
वैमनस्य पैदा करने,
सामाजिक दुर्भावना उत्पन्न करने व स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने
व अन्य सम्प्रदायों को निम्स्तरीय समझने जैसी बातों का क़तई
समावेश नहीं होना चाहिए।
आवश्यकता इस बात की है कि मस्जिद व अन्य इस्लामी धर्मस्थलों से
इस्लामी धर्मगुरुओं द्वारा ही भारतीय मुसलमानों को राष्ट्रीयता
का पाठ पढ़ाया जाए,
साम्प्रदायिक सौहार्द्र व सर्वधर्म सम्भाव से
संबंधित बातें बताई जाएँ। यदि आज कुछ गुमराह मुसलमान तथा
रूढ़ीवादी साम्प्रदायिक विचारधारा रखने वाले मुसलमान ग़जनवी
अथवा तुग़लक़ जैसे शासकों को अपने मार्गदर्शक अथवा
प्रेरणास्रोत के रूप में याद करते हैं तो दरअसल वे इस्लाम व
मुसलमानों को बदनाम करने का ही काम कर रहे हैं। एक सच्चे
राष्ट्रवादी मुसलमान के लिए कोई लुटेरा मुग़ल शासक या
आक्रमणकारी मुस्लिम शासक उनका प्रेरणास्रोत आख़िर कैसे हो सकता
है?
एक सच्चे भारतीय मुसलमान को वीर अब्दुल हमीद जैसे परमवीर चक्र
विजेता से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है। आज का भारतीय मुसलमान जब
अशफ़ाक़उल्लाह को अपना आदर्श मानेगा तभी वह स्वयं को सच्चा
मुसलमान कहलाने का अधिकारी है। देश में भारत रत्न ए पी जे
अब्दुल कलाम,
डॉ ज़ाकिर हुसैन, अबुल
कलाम आज़ाद, रफ़ी अहमद क़िदवई व अज़ीम
प्रेमजी जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा रखने वालों को अपना आदर्श
मानने की ज़रूरत है। यदि ऐसे राष्ट्रवादी मुस्लिम रहनुमाओं का
ज़िक्र धर्माधिकारियों द्वारा सार्वजनिक तौर पर मुस्लिम भाईयों
के मध्य किया जाए तथा मुस्लिम नवयुवकों को यह बताया जाए कि वे
इन महान मुस्लिम हस्तियों से प्रेरणा लेते हुए इनके बताए हुए
रास्तों पर चलें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भविष्य में
मुस्लिम नवयुवक न सिर्फ़ राष्ट्रवादी विचारधारा से सराबोर
होंगे बल्कि वर्तमान समय में आतंकवादी गतिविधियों के
परिणामस्वरूप मुसलमानों व इस्लाम पर निरंतर लगते जा रहे काले
धब्बों को धो पाने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा
सकेंगे।
तनवीर
जाफ़री
सदस्य,
हरियाणा साहित्य अकादमी,
शासी परिषद
22402,
नाहन हाऊस
अम्बाला शहर,
हरियाणा
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