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पाकःअस्थिर राजनीति,
सक्रिय आतंकवाद
तनवीर
जाफ़री
पाकिस्तान
में राजनीति के दो धुरंधरों पूर्व प्रधानमंत्री तथा पाकिस्तान
मुस्लिम लीग (नवाज़) के प्रमुख नवाज़ शरीफ़ एवं पाकिस्तान
पीपुल्स पार्टी के प्रमुख आसिफ़ अली ज़रदारी के मध्य शह-मात का
खेल जारी है। हालाँकि पी पी पी व पाकिस्तान मुस्लिम लीग दोनों
ही पाकिस्तान में एक दूसरे की मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टियाँ
मानी जाती रही हैं। परन्तु पाकिस्तान में हुए पिछले आम चुनावों
के दौरान पी पी पी प्रमुख एवं पूर्व प्रधानमंत्री बेगम बेनज़ीर
भुट्टो की हत्या के पश्चात ऐसी संभावना बन चुकी थी कि अब पी पी
पी ही पाकिस्तान की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी के रूप में उभरकर
सामने आएगी। हुआ भी यही। बेगम भुट्टो की हत्या के बाद
पाकिस्तान में पैदा हुई सहानुभूति की लहर में पी पी पी को
पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला परन्तु शहीद बेगम भुट्टो की यह
राजनैतिक पार्टी सबसे अधिक सीटें जीतने में अवश्य कामयाब रही।
चूँकि बेगम बेनज़ीर भुट्टो के पुत्र बिलावल
भुट्टो ज़रदारी उम्र व राजनैतिक तजुर्बे दोनों ही में छोटे थे
अत: बेगम के पति आसिफ़ अली ज़रदारी ही अपनी पत्नी के राजनैतिक
उत्तराधिकारी के रूप में उभर कर सामने आए। पाकिस्तान में सरकार
बनाने की चुनौती का सामना करने के लिए नवाज़ शरीफ़ की मुस्लिम
लीग तथा ज़रदारी की पी पी पी में समझौता हो गया। इस प्रकार
गठबंधन सरकार ने पाकिस्तान में सत्ता संभाल ली। ज़ाहिर है
चूँकि सबसे बड़े राजनैतिक दल के रूप में पाकिस्तान पीपुल्स
पार्टी सबसे अधिक सीटें जीतकर सामने आई थी,
अत: प्रधानमंत्री का पद भी पी पी पी को ही
मिलना था। इसी व्यवस्था के चलते पी पी पी से युसुफ़ रज़ा
गिलानी को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना दिया गया। परन्तु
नवाज़ शरीफ़ का लक्ष्य तो कुछ और ही था। वह प्रधानमंत्री अथवा
राष्ट्रपति बने बिना ही आनन-फ़ानन में हर वह काम कर देना चाहते
थे जोकि सम्भवत: वे स्वयं प्रधानमंत्री बनकर करना चाहते। नवाज़
शरीफ़ के दिल में इस बात की बहुत कसक है कि आख़िर उनके
प्रधानमंत्रित्व काल में सेना प्रमुख रहे जनरल परवेज़ मुशर्रफ़
ने उन्हें कैसे और क्योंकर सत्ता से बेदख़ल कर जेल की सलाख़ों
के पीछे धकेल दिया। यदि अरब देश मध्यस्थता न करता तो नवाज़
शरीफ़ के साथ कोई और घटना भी घट सकती थी। मुशर्रफ़ ने नवाज़
शरीफ़ को आख़िरकार देश निकाला देकर उनकी जान बख्श दी। कुछ ऐसा
ही बेनज़ीर भुट्टो के साथ भी हुआ है। परन्तु परवेज़ मुशर्रफ़
द्वारा पाकिस्तान में पनपने वाली कट्टरपंथी ताक़तों तथा
आतंकवादियों के मध्य छेड़े गए अभियान के परिणामस्वरूप मुशर्रफ़
के विरुद्ध उपजे विरोध स्वर ने भुट्टो तथा नवाज़ शरीफ़ दोनों
को ही पाकिस्तान वापस आने का अवसर दे दिया।
पाक अवाम के भारी दबाव तथा अमेरिकी
दख़लअंदाज़ी के बाद पाकिस्तान में चुनाव सम्पन्न हुए। जनरल
परवेज़ मुशर्रफ़ ने फ़ौजी वर्दी उतारी तथा स्वयं राष्ट्रपति बन
बैठे। ज़ाहिर है वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन मुशर्रफ़ को
राष्ट्रपति पद पर कैसे देख सकता था। काफ़ी हुज्जत व मशक्कत के
बाद नवाज़ शरीफ़ व ज़रदारी में मुशर्रफ़ पर महाभियोग चलाने को
लेकर समझौता हुआ। महाभियोग में अपनी हार निश्चित जान कर
दूरदर्शिता का परिचय देते हुए परवेज़ मुशर्रफ़ ने सदन में
महाभियोग प्रस्ताव आने से एक दिन पूर्व ही राष्ट्रपति पद से
त्याग पत्र दे डाला। कहा जा सकता है कि नवाज़ शरीफ़ अपने एक
सबसे बड़े मक़सद में कामयाब रहे। इसके पश्चात अब एक ओर तो
पाकिस्तान में अगले राष्ट्रपति पद पर कौन व्यक्ति आसीन हो,
इस बात को लेकर राजनैतिक सरगर्मियाँ तेज़ हुईं
तो दूसरी ओर नवाज़ शरीफ़ ने साथ ही साथ एक और राजनैतिक कार्ड
यह खेला कि उन्होंने उन समस्त न्यायाधीशों की अविलम्ब बहाली की
माँग कर डाली जिन्हें कि परवेज़ मुशर्रफ़ ने बर्ख़ास्त कर डाला
था। आसिफ़ ज़रदारी द्वारा न्यायाधीशों की बहाली में टालमटोल व
देरी किए जाने पर नवाज़ शरीफ़ ने मात्र पाँच माह पुरानी गठबंधन
सरकार से बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में अपना समर्थन भी वापस ले
लिया।
हालाँकि राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र देने से
पूर्व बड़ी ही भावुक मुद्रा में राष्ट्र को संबोधित करते हुए
राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपनी आठ वर्षों की उपलब्धियों
का ब्यौरा दिया था। परन्तु लोकतंत्र की दुहाई देने वाले पाक
नेताओं को मुशर्रफ़ मात्र एक अमेरिका परस्त तानाशाह ही नज़र
आते थे। इराक़ व अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान द्वारा अमेरिकी
सेना का साथ दिया जाना तथा पाकिस्तान में हुई ऑप्रेशन लाल
मस्जिद जैसी कार्रवाईयों ने परवेज़ मुशर्रफ़ को कट्टरपंथियों
विशेषकर इस्लाम के नाम पर जेहाद तथा आतंकवाद का प्रसार करने
वाले वर्ग का सबसे बड़ा दुश्मन बना डाला। सोचा जा सकता है कि जब
परवेज़ मुशर्रफ़ के सत्ता में रहते हुए स्वयं उनपर कई जानलेवा
हमले हुए, बेनज़ीर भुट्टो पर हुआ एक
हमला तो असफल रहा परन्तु दूसरे हमले में वह बच नहीं सकीं।
नवाज़ शरीफ़ स्वयं आतंकी हमले का निशाना बने परन्तु बाल-बाल बच
गए। उधर ऑप्रेशन लाल मस्जिद से जहाँ आतंकवादियों के विरुद्ध
मुशर्रफ़ के इरादे साफ़ हुए वहीं लाल मस्जिद में चल रही
आतंकवादी गतिविधियों का भी पर्दाफ़ाश हुआ।
ऐसे में आसानी से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा
सकता है कि परवेज़ मुशर्रफ़ का सत्ता से दूर होना तथा देश में
वर्तमान अस्थिर राजनीति का दौर आतंकवादियों के हौसले किस क़द्र
बढ़ा सकता था। नि:सन्देह मुशर्रफ़ से राजनैतिक मतभेद रखने वाले
तथा उनसे बदला लेने की बाट जोह रहे पाक नेता व कट्टरपंथी
मुशर्रफ़ के सत्ता से हटने से बहुत ख़ुश हैं तथा मुशर्रफ़ पर
अभियोग चलाने के भी पक्षधर हैं। परन्तु लोकतंत्र के नाम पर
सत्ता में आई वर्तमान सरकार की अस्थिरता पाकिस्तान में
दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे आतंकवादियों के हौसलों को किस तरह
रोक कर रख सकेगी, यह ज़रूर एक बड़ी
चिंता का विषय है। पाक प्रधानमंत्री युसुफ़ रज़ा गिलानी की कार
पर रावलपिंडी शहर में हमला किया गया जिससे उनकी बुलेटप्रूफ़
कार के शीशे टूट गए। अब तो पाकिस्तान में तालिबान का पाक
संस्करण भी सक्रिय हो उठा है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी
टी पी) नामक इस संगठन को अलंकायदा के पाक विस्तार के रूप में
देखा जा रहा है।
उधर पाक-अफ़ग़ान सीमा के क़बायली क्षेत्र इस्लामी चरमपंथियों
के गढ़ बनते जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह क्षेत्र ओसामा
बिन लाडेन तथा एमन अल जवाहिरी के छुपने के सर्वाधिक संभावित
स्थान हैं। ख़बर तो यहाँ तक है कि इस क़बायली क्षेत्र के
मोहमन्द इलाक़े में जवाहिरी की पत्नी को देखा गया था। एक ओर तो
पाक-अफ़ग़ान सीमा पर अलक़ायदा के सदस्यों का शरण पाना तो दूसरी
ओर पाकिस्तान में तहरीके तालिबान पाकिस्तान का अलक़ायदा की
मेज़बानी हेतु पलक पांवरे बिछाना यह समझ पाने के लिए काफ़ी है
कि जब मुशर्रफ़ जैसे सख्त कमांडो द्वारा इन आतंकवादी संगठनों
पर लगाम नहीं लगाई जा सकी फिर आख़िर सफ़ेदपोश एवं भ्रष्टाचार
के छींटों से सने हुए बारीक राजनीतिज्ञ इन आतंकवादियों का कैसे
मुक़ाबला कर सकेंगे। आसिफ़ अली ज़रदारी को हालाँकि राष्ट्रपति
चुन लिया गया है परन्तु उनके राष्ट्रपति बनने की घोषणा के साथ
ही पाकिस्तान में हुए एक और बड़े आतंकवादी धमाके ने ज़रदारी को
भी अपनी भाषा में न सिर्फ़ चुनौती दी है बल्कि इन्होंने दुनिया
के सामने भी अपने ख़ौफ़नाक इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। चूँकि
पाकिस्तान एक परमाणु सम्पन्न राष्ट्र है अत: भारत व
अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों के लिए भी यह गहन चिंता का विषय है
कि कहीं आतंकवादियों के हौसले इस हद तक आगे न बढ़ जाएँ कि वे
पाकिस्तान की अस्थिर सरकार को ठेंगा दिखाते हुए पाकिस्तान के
परमाणु ठिकानों तक पर अपना नियंत्रण जमा बैठें।
तनवीर जाफ़री
सदस्य,
हरियाणा साहित्य अकादमी,
शासी परिषद
22402,
नाहन हाऊस
अम्बाला शहर,
हरियाणा
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